Friday, October 20, 2017

गुजरात की युवा तिकड़ी

गुजरात विधानसभा चुनावों के नज़दीक आते-आते राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं. सभी राजनीतिक दल गुजरात में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. बीजेपी ने भी गुजरात में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. पार्टी कोई भी ऐसा कारण नहीं छोड़ना चाहती जो किसी तरह के बुरे परिणाम का नतीजा बने. ऐसा कहा जा रहा कि पिछले दो सालों में उभरकर सामने आए पाटीदार, ओबीसी और दलित समुदायों को प्रभावित करने वाले तीन युवा बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर गुजरात की राजनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं.
साल 2015 में पटेल आरक्षण की मांग के बाद हार्दिक पटेल का नाम तेज़ी से उभरकर सामने आया. इस आंदोलन को दबाने की गुजरात सरकार की कोशिशों के बावजूद अभी तक यह मांग शांत नहीं हुई है.
पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के संयोजक हार्दिक पटेल किसी भी पार्टी में न शामिल होने की बात कह चुके हैं. हार्दिक पटेल ने सार्वजनिक तौर पर बीजेपी को आरक्षण न देने के लिए दोषी ठहराया है. अमित शाह को गुजरात गौरव यात्रा के दौरान पाटीदार युवाओं का विरोध भी झेलना पड़ा था. साथ ही हार्दिक पटेल ने कांग्रेस की तरफ़ झुकाव भी प्रकट किया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के गुजरात जाने पर हार्दिक ने ट्वीट करके उनका स्वागत किया था. ऐसे में बीजेपी की चिंताएं बढ़ना लाज़मी है. पाटीदार भले ही 12 प्रतिशत का वोट शेयर रखते हों लेकिन अपनी आर्थिक ताक़त के कारण वो ​स्थितियां प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. शुरुआत में इस आंदोलन का विरोध करने के बाद आज बीजेपी पाटीदारों का वोट पाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है. आंदोलन में शामिल पाटीदार नेताओं के ख़िलाफ़ केस वापस लिए गए हैं और अनामत आंदोलन समिति के सदस्यों पर हुए पुलिस अत्याचार की जांच के लिए समिति का निर्माण किया गया है. हालांकि, इसके बावजूद भी हार्दिक पटेल का रुख़ बीजेपी के प्रति नरम पड़ता नहीं दिख रहा है. राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संयोजक जिग्नेश मेवाणी राज्य में दलितों पर हो रहे हमलों के लिए गुजरात सरकार को ज़िम्मेदार मानते हैं. लगातार दलितों पर हुए हमले की ख़बरों के बाद बीजेपी की छवि का पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक भी है. गुजरात में युवा दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. ऊना में गोरक्षा के नाम पर दलितों की पिटाई के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन का जिग्नेश ने नेतृत्व किया था. 'आज़ादी कूच आंदोलन' में जिग्नेश ने 20 हज़ार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी. इस आंदोलन में दलित मुस्लिम एकता भी दिखाई दी थी.
जिग्नेश मेवाणी का कहना है, ''राज्य में दलित पर हो रहे हमलों को रोकने और उनकी स्थिति में सुधार के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है. बीजेपी का हिंदुत्व का एजेंडा है और इस सरकार के रहते उनका भला नहीं हो सकता.'' मेवाणी साफ़-साफ़ कहते हैं, ''इस बार बीजेपी को हर क़ीमत पर हराया जाना चाहिए.'' हालांकि, वह अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ भी साफ़ तौर पर नहीं कह रहे हैं. राज्य में दलितों का वोट प्रतिशत क़रीब सात फ़ीसदी है. राज्य की कुल आबादी लगभग 6 करोड़ 38 लाख है, जिनमें दलित 35 लाख 92 हज़ार के क़रीब हैं. गुजरात में दलितों का प्रतिनिधित्व बहुत ज्यादा न होने के बावजूद भी चुनाव में हर एक वोट बहुत कीमती होता है. ऐसे में बीजेपी के लिए जिग्नेश मेवाणी मुसीबत ला सकते हैं. ओबीसी नेता के तौर पर उभरे अल्पेश ठाकुर पाटीदारों को आरक्षण देने का विरोध करते रहे हैं. साथ ही वह देसी शराब से होने वाले नुक़सान के चलते शराबबंदी के पक्षधर रहे हैं. ओबीसी, एससी और एसटी एकता मंच के संयोजक अल्पेश ठाकुर ने अलग-अलग मंचों से गुजरात की हालत ख़राब होने की बात कही है. वह कहते हैं कि विकास सिर्फ दिखावा है. गुजरात में लाखों लोगों के पास रोज़गार नहीं है. ओबीसी का वोट प्रतिशत 40 है जो पाटीदार और एससी व एसटी से कहीं ज्यादा है. ऐसे में बीजेपी के लिए ये वर्ग और महत्वपूर्ण हो जाता है. लेकिन, पाटीदारों को आरक्षण देने के मसले पर बीजेपी और उनकी राय एक होने के चलते अल्पेश ठाकुर का झुकाव बीजेपी की तरफ जाने की संभावना है. उनका रुख साफ़ नहीं है. लेकिन, अगर वो बीजेपी की तरफ जाते हैं तो उनके सपोर्ट बेस में दरार पड़ सकती है. अल्पेश का बीजेपी की तरफ झुकाव होना मुश्किल है. क्योंकि बीजेपी ने पाटीदारों को जो लाभ दिए हैं वो ओबीसी को नहीं दिए हैं. इन तीनों नेताओं के उभरने की कहानी निजीकरण से शुरू होती है. जब पीएम नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने वाइब्रेंट गुजरात की बात की.उस समय काफ़ी निजीकरण हुआ. बहुत सारे निजी शैक्षणिक संस्थान आ गए. बहुत बड़े-बड़े समिट होने लगे जिनमें बड़े स्तर पर निवेश होने और रोजगार के अवसर खुलने की बातें कही गईं. लोगों को सुखद भविष्य के सपने दिखाए गए. लोगों ने अपने बच्चों को उन्हीं प्राइवेट इंस्टीट्यूट में महंगी फीस देकर पढ़ाया. लेकिन, जब उनके बच्चे बाज़ार में आए तो उन्हें नौकरी ही नहीं मिली. नौकरी मिली भी तो 5-6 हज़ार की.  'सरकार की कथनी और करनी के अंतर की वजह से युवाओं में निराशा और ग़ुस्सा भर गया है. पाटीदार एक संपन्न वर्ग है. जब उनके बच्चे भी सड़क पर उतरे हैं तो दूसरों का क्या हाल होगा.' घनश्याम दास कहते हैं, ''बीजेपी को ओबीसी से मुश्किल ज़रूर होगी. दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश का रुख साफ़ नहीं है कि वह किस तरफ जाएंगे. उन्होंने कांग्रेस की तरफ भी झुकाव नहीं दिखाया है.'' बीजेपी पर गुजरात में चुनौतियां का असर दिखने लगा है तभी बीजेपी नेता लगातार गुजरात दौरे कर रहे हैं.

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