Tuesday, March 27, 2018

फेसबुक डेटा चोरी क्या है?

फेसबुक, क्रैंब्रिज एनालिटिका से जुड़ी बहस बहुत गंभीर है. इसे ध्यान से समझा जाना चाहिए. भारत में कानून तो है, लेकिन क्या उसे लेकर हमारी आपकी समझ है. कल जब कोई आधार नंबर के सहारे चुनावी खेल कर जाए, तब आप और हम कैसे समझेंगे कि इन जानकारियों के ज़रिए जनमत को पलट दिया गया. हम कैसे समझेंगे कि जो हुआ वो गलत था, उसके लिए हमीं ज़िम्मेदार थे, हमने ही जानकारी दे दी थी और उसके बाद यह साबित कैसे होगा. क्या चुनाव आयोग ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार है. भारत जैसे देश में हर चुनाव में किसी न किसी की सेक्स टीवी चैनलों पर चलने लगती है, उस देश में हमारे नेता प्राइवेसी के एक्सपर्ट बनकर भाषण दे रहे हैं. जनता को आश्वस्त कर रहे हैं कि आपका डेटा यानी आपकी जानकारी सुरक्षित है. आप अपने शहर के किसी भी साइबर सेल में चले जाइये. उसकी हालत देख लीजिए फिर पता चलेगा कि भारत ने क्या इंतज़ाम किए हैं. पूरी दुनिया में बहस चल रही है कि कहीं बाहर का देश, कंपनियों का गिरोह मिलकर हमारे आपके डेटा से चुनाव का नतीजा ही न बदल दे. पिछले साल सितंबर में इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस हुई थी. उस वक्त सरकार ने सितंबर 2017 में स्मार्ट फोन बनाने वाली 21 कंपनियों से पूछा था कि आपके मोबाइल फोन में डेटा कितना सुरक्षित है. व्हाट्स अप ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि वह किसी भी थर्ड पार्टी को अपना डेटा नहीं देगा. इसी में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने डेटा की सुरक्षा के लिए एक कमेटी बनाई है. 23 जनवरी 2018 को सेंटर ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि रिटायर जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में जो कमेटी बनाई गई है वो बिल मार्च तक तैयार हो जाएगा. यानी भारत अभी काफी पीछे है. दुनिया की सरकारें पहले से ही जग चुकी हैं. 
अमरीका में हुए राष्ट्रपति चुनाव, इटली, फ्रांस और जर्मनी के चुनावों के दौरान ही वहां चर्चा चल पड़ी कि रूस उनके चुनावों को बदलने की ताकत रखता है. टेक्नॉलजी और डेटा के ज़रिए वह चुनाव को प्रभावित कर रहा है. झूठ और नफरत की बातों का ज़ोर-शोर से प्रचार होता है, जिसके प्रभाव में नतीजे बदल जाते हैं. खासकर यूरोपीयन यूनियन को लगा कि रूस हर चुनाव में हस्तक्षेप कर यूरोपीय यूनियन की एकता को प्रभावित कर रहा है. यूरोपीयन यूनियन को तोड़ रहा है. खासकर ब्रिटेन के अलग होने को भी डेटा के इस्तमाल से जोड़ा जा रहा है. सोचिए भारत में चुनाव हो रहे हैं और हमारे डेटा से अमरीका तय कर रहा हो कि कौन से दल को बहुमत मिलना चाहिए ताकि उसकी सरकार बनने के बाद वो मनचाहे ढंग से नीतियां बना सके. क्या आप ऐसा चाहेंगे. यूरोपीयन यूनियन के 28 देशों ने अपने यहां होने वाले चुनावों को बचाने के लिए डेटा प्रोटेक्शन कानून बनाया है. आप जानते हैं कि अमरीका की कई टेक्नॉलजी कंपनी फेसबुक गूगल का मुख्यालय आयरलैंड में है, क्योंकि आयरलैंड में बाकी देशों का कानून लागू नहीं होता था. यूरोपीयन यूनियन ने कानून के ज़रिए इस व्यवस्था को बदल दिया है. अब इन कंपनियों पर यूरोपीयन यूनियन के बनाए नियम लागू होने थे. जर्मनी ने भी अपने कानून काफी सख्त किए हैं. कुछ साल पहले बेल्जियम ने फेसबुक को प्राइवेसी डेटा कानून के उल्लंघन के मामले में अदालत में घसीट लिया था. ब्रिटेन की संसद में एक कमेटी बनी है कि सोशल मीडिया का चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, वहां इंफॉर्मेशन कमिश्नर ऑफिस है जो ऐसे मामलों की जांच करता है. 
भारत दावा तो करता है कि उसके कानून सख्त हैं मगर वह काफी पीछे चल रहा है. किसी ज़िले में तनाव हो जाए तो सीधा इंटरनेट बंद करना पड़ता है. जिन तत्वों की वजह से बंद करना पड़ता है उन्हें कभी इन सख्त कानूनों के दम पर सज़ा मिली है या नहीं, इसका रिकॉर्ड बहुत ख़राब ही होगा.
आप जानते हैं कि जब से ट्रंप जीते हैं अमरीका में जांच हो रही है कि क्या इस चुनाव में रूस ने दखल दिया था, मतलब क्या रूस ने अपनी तरफ से कोई प्रोपेगैंडा चलाया जिसका लाभ ट्रंप को मिला. इसीलिए दुनिया भर में रिसर्च चल रहा है कि कहीं डेटा के इस्तमाल से लोकतंत्र ही न समाप्त हो जाए. अभी यह समझा ही जा रहा है कि क्या गलत है, क्या सही है. लेकिन भारत में कांग्रेस और बीजेपी इस तरह एक दूसरे पर आरोप लगा रही हैं जैसे इन दोनों ने सबकुछ समझ लिया हो.
दिसंबर 2016 में अमरीका की डिज़ाइन की प्रोफेसर ने अपने रिसर्च के दौरान पाया कि अमरीकी चुनाव में कैंब्रिंज एनालिटा की भूमिका है और उसका संबंध यूरोपीयन यूनियन से ब्रिटेन को अलग करने के अभियान में भी है. कैंब्रिज एनालिटिका को 5 करोड़ से अधिक अमरीकी नागरिकों का डेटा एक रिसर्चर से मिला. इस रिसर्चर ने एक ऐप बनाया था, जिससे लोग अपनी सहमति से जुड़े थे. जैसे फेसबुक पर बहुत से एप आते हैं, आप क्लिक कर जुड़ने लग जाते हैं और आई एग्री का बटन दबा देते हैं. या तो आप समझ नहीं पाते या लापरवाह हो जाते हैं, उधर वह एप आपकी सारी जानकारी लेकर किसी तीसरी पार्टी को बेच देते हैं. वह कंपनी उस डेटा का इस्तेमाल राजनीतिक की हवा बदलने में करती है या किसी प्रोडक्ट को बेचने में करती है. यही हुआ है इस विवाद में. अब पांच दिनों तक फेसबुक के मार्क ज़ुकरबर्ग ने माना कि बहुत बड़ी ग़लती हो गई है. आगे से नहीं हो इसके लिए व्यवस्था की जाएगी. डेटा और प्राइवेसी से जुड़े लोग कहते हैं कि यह काफी नहीं है. ज़ुकरबर्ग यह बतायें कि 2014 से पहले जिन जिन एप ने डेटा चुराया है, उसका वे क्या कर रहे हैं इसकी जांच संभव नहीं है, क्योंकि एप की संख्या तो कई हज़ार में है. हम और आप फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं. एक भरोसा होता है मगर उसी से जानकारी किसी और के पास चली जाए तो फिर भरोसा टूटता है. और उस जानकारी का इस्तेमाल आपके राजनीतिक मत को प्रभावित करने में रूस या अमरीका में बैठी कोई कंपनी कर ले तो सीधा मतलब यह हुआ कि लोकतंत्र टेक्नॉलजी के कारण कभी भी खतरे में पड़ सकता है. आप देखिए कि कई जगहों पर ऐसा हो रहा है. एक बार जो सत्ता में आ रहा है, वो हार ही नहीं रहा है. रूस के राष्ट्रपति पुतिन को देखिए, चीन के राष्ट्रपति तो आजीवन ही गद्दी पर बैठ गए हैं. भारत में कोई इस तरह का सपना न देखे इसलिए जनता को इस विषय को लेकर सतर्क हो जाना चाहिए. यह मसला फेसबुक का है मगर आपको सोचना चाहिए कि कहीं आधार नंबर के कारण यह खतरा करीब तो नहीं है. अमरीका, इटली, फ्रांस और जर्मनी में आधार नंबर नहीं है, भारत में आधार नंबर है. कहीं ऐसा न हो कि सब्सिडी बचाने के नाम पर लोकतंत्र ही हाथ से चला जाए. ब्रिटेन में मामला उठा तो वहां का चुनाव आयोग तुरंत जांच करने लगा, भारत में कांग्रेस बीजेपी आरोप लगा रहे हैं, खुलेआम कह रहे हैं कि आपने ऐसा किया तो आपने ऐसा किया. मगर चुनाव आयोग का पता नहीं. क्या पता उसके अधिकार क्षेत्र में ही यह न आता हो. भारत में जब भी ईवीएम के हैक किए जाने का सवाल उठता है तो हम मज़ाक उड़ाते हैं. सबसे बड़ी दलील है कि चुनाव आयोग पर शक कैसे कर सकते हैं. हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी चुनाव आयोग के रहते दशकों बूथ लूटे जाते रहे. आयोग ने नहीं, एक व्यक्ति ने आयोग को भरोसे लायक बनाया था. क्या आपको यह लगता है कि अमरीका, फ्रांस, इटली, जर्मनी के चुनाव आयोग में लोगों का विश्वास ही नहीं हैं. फिर भी वहां बहस हो रही है कि टेक्नालजी से कहीं रिज़ल्ट या चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित तो नहीं किया जा रहा है. जर्मनी में आम चुनाव के पहले वहां खूब चर्चा हुई. वहां के फेडरल ऑफिस फार दि प्रोटेक्शन ऑफ दि कांस्टिट्यूशन के प्रमुख ने कहा था कि चुनाव को हैक करना, बाहर से प्रभावित करना बिल्कुल संभव है. एक रिपोर्ट पढ़ रहा था जिसमें कहा गया कि जर्मनी में एक काउंटिंग सॉफ्टवेयर है जिसे .-. है, इसे हैक किया जा सकता है. इसके डेटा को छेड़ कर रिज़ल्ट बदला जा सकता है. उन देशों में ऐसे सवालों को गंभीरता से लिया जाता है, हमारे यहां ऐसे सारे सवाल का यही जवाब है कि हम चुनाव आयोग पर शक कैसे कर सकते हैं. यही पूछ लीजिए कि चुनाव आयोग के पास ऐसी संभावना को रोकने के लिए सिस्टम ही क्या है. बैलेटबॉक्स इंडिया के राकेश ने हाल ही में एक लंबा पत्र लिखकर इन खतरों के प्रति आगाह किया था मगर वही जवाब मिला, बल्कि अब तो जवाब न मिलना ही जवाब समझा जाने लगा है. 
यह जटिल मसला है मगर समझना आसान है. क्या होगा कि आप सहमति से अपनी जानकारी किसी एप को दे दें, और वह उसका इस्तमाल किसी और काम के लिए कर ले. जैसा कि क्रैंबिंज एनालिटिका के मामले में हुआ. लोगों ने खुद ही कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के रिसर्चन कोगन को जानकारी दी. उसने ज़रूर कैंब्रिज एनालिटिका को बेच दिया. इतनी जल्दी से कांग्रेस बीजेपी के खेल में मत पड़िए. मेहनत से हासिल लोकतंत्र की चिन्ता कीजिए. भारत में हर दल अब डेटा का इस्तेमाल कर रहा है. इसीलिए हर चुनाव में आप देखेंगे कि झूठ का बोलबाला हो गया है. हर झूठ दूसरे झूठ से बड़ा होता है. भारत में कैंब्रिज एनेलिटिका कंपनी के सूत्र अब जेडीयू के नेता केसी त्यागी के बेटे अमरीश त्यागी से जुड़ रहे हैं. कैंब्रिज एनेलिटिका कंपनी के संस्थापक अलेक्जेंडर निक्स ने भारत में स्ट्रेटिजिक कम्यूनिकेशन लेबोरेटरी बनाई.निक्स दो लोगो के साथ मिलकर देख रहे थे जिनमें से एक हैं अवनीश राय और दूसरे हैं अमरीश त्यागी, केसी त्यागी के लड़के. अवनीश राय ने श्रीनिवासन जैन से बात की और विस्तार से बताया कि कैसे निक्स की रूचि भारत के चुनाव में थी. शुरुआत में निक्स ने कहा था कि वो कांग्रेस के लिए डेटा कलेक्शन की बात करने आए हैं मगर बाद में पचा चला कि वे कांग्रेस को हराने के लिए काम कर रहे थे.

Friday, March 16, 2018

गेस्ट हाउस कांड की कहानी

सियासत में न दोस्त स्थाई होते हैं , न दुश्मन . मौके की नजाकत हमेशा नए रिश्ते की बुनियाद रखता है . कल देर शाम अखिलेश यादव जब काली मर्सिडीज में बैठकर मायावती के घर पहुंचे तो इस नए रिश्ते की बुनियाद रख दी गई . यूपी के गेस्ट हाउस कांड के बाद शुरु हुई पच्चीस साल पुरानी दुश्मनी को मायावती अब भूलने को तैयार हो गई हैं . अखिलेश ने भी कहा कि पुरानी बातें भूलनी पड़ती है . तो क्या है वो पुरानी बातें ? क्या हुआ था लखनऊ से उस वीआईपी गेस्ट हाउस में , जिसे भूलना मायावती के लिए आसान नहीं था . तारीख थी 2 जून 1995 . बीएसपी ने एक दिन पहले ही मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में बनी सपा-बसपा सरकार के समर्थन वापस ले लिया था . अब तैयारी मायावती को यूपी की सत्ता पर बैठाने की थी . बीमारी से जूझ रहे बीएसपी सुप्रीमो कांशीराम दिल्ली में थे . मायावती लखनऊ में . दोनों पल -पल बदलती राजनीति और दांव-पेच पर एक दूसरे से लगातार बात कर रहे थे . यूपी के राज्यपाल मोतीलाल वोरा से मिलकर मायावती बीजेपी , कांग्रेस और जनता दल के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश कर चुकी थीं . हर खेमे में मीटिंगों का दौर चल रहा था . कांशीराम और मायावती की इस चाल से आग बबूला हुए मुलायम सिंह किसी भी हाल में अपने हाथों से सत्ता की डोर फिसलने नहीं देना चाहते थे और इधर वीआईपी गेस्ट हाउस में मायावती तख्तापलट की फुल प्रूफ योजना पर अपने सिपहसालारों के साथ बैठक कर रही थीं .
वीआईपी गेस्ट हाउस के कॉमन हॉल में बीएसपी विधायकों और नेताओं की बैठक खत्म करने के बाद कुछ चुनिंदा विधायकों को लेकर मायावती अपने रुम नंबर एक में चली गई . बाकी विधायक कॉमन हॉल में ही बैठे थे . शाम के करीब चार से पांच के बीच का वक्त रहा होगा . करीब दो सौ समाजवादी पार्टी के विधायकों और कार्यकर्ताओं के उत्तेजित हुजूम ने वीआईपी गेस्ट हाउस पर धावा बोल दिया . वे चिल्ला रहे थे - ‘चमार पागल हो गए हैं .हमें उन्हें सबक सिखाना होगा’ . इस नारे के साथ -साथ और भी नारे लगा रहे थे , जिनमें बीएसपी विधायकों और उनके परिवारों को घायल करने या खत्म करने के बारे में खुल्लम -खुल्ला धमकियां थीं . ज्यादातर नारे जातिवादी थी , जिनका उद्देश्य बीएसपी नेताओं को अधिक से अधिक अपमानित करना था . चीख -पुकार मचाते हुए वे गंदी भाषा और गाली - गलौज का इस्तेमाल कर रहे थे.
कॉमन हॉल में बैठे विधायकों ने जल्दी से मुख्य द्वार बंद कर दिया लेकिन उत्पाती झुंड ने उसे तोड़कर खोल दिया . फिर वे असहाय बीएसपी विधायकों पर टूट पड़े और उन्हें थप्पड़ मारने लगे और लतियाने लगे . कम से कम पाच बीएसपी विधायकों को घसीटते हुए जबरदस्ती वीआईपी गेस्ट हाउस से बाहर ले जाकर गाड़ियों में डाला गया और उन्हें मुख्यमंत्री आवास ले जाया गया . उन्हें राजबहादुर के नेतृत्व में बीएसपी विद्रोही गुट में शामिल होने के लिए और मुलायम सरकार को समर्थऩ देने वाले पत्र पर दस्तखत करने को कहा गया . कुछ विधायक तो इतने डरे हुए थे कि कोरे कागज पर ही उन्होंने दस्तखत कर दिए .इधर विधायकों को घेरा जा रहा था और उधर मायावती की तलाश हो रही थी .
तभी कुछ विधायक दौड़ते हुए मायावती के रुम में आए और नीचे चल रहे उत्पात की जानकारी दी . बाहर के भागकर आए विधायक आरके चौधरी और उनके गार्ड के कहने पर भीतर से दरवाजा बंद कर लिया गया . इसी बीच समाजवादी पार्टी के उत्पाती दस्ते का एक झुंड धड़धड़ाता हुआ गलियारे में घुसा और मायावती के कमरे का दरवाजा पीटने लगा . ‘चमार औरत को उसकी मांद से घसीट कर निकालो ‘ जैसी आवाजें बाहर से भीतर आ रही थी . दरवाजा पीटने वाली भीड़ लगातार मायावती के लिए बेहद अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रही थी . गालियां दे रही थी . कमरे के भीतर सभी सहमे हुए थे कि पता नहीं क्या होने वाला है .
तभी हजरतगंज के एसएचओ विजय भूषण और दूसरे एसएचओ सुभाष सिंह बघेल कुछ सिपाहियों के साथ वहां पहुंचे . इस बीच गेस्ट हाउस की बिजली और पानी की सप्लाई भी काट दी गई थी . दोनों पुलिस अधिकारियों ने किसी तरह से भीड़ को काबू में करने की कोशिश की लेकिन नारेबाजी और गालियां नहीं थम रही थी . थोड़ी देर बाद जब जिला मजिस्ट्रेट वहां पहुंचे तो उन्होंने पुलिस को किसी भी तरह से हंगामे को रोकने और मायावती को सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए .इस बीच केन्द्र सरकार , राज्यपाल और बीजेपी नेता सक्रिय हो चुके थे . इसका ही असर था कि भारी तादाद में पुलिस बल को वहां भेजा गया . डीएम ने मोर्चा संभाला और मायावती के खिलाफ नारे लगा रही भीड़ को वहां से बाहर किया . समाजवादी पार्टी के विधायकों पर लाठी चार्ज तक का आदेश दिया , तब जाकर वहां स्थिति नियंत्रण में आ सकी . मायावती के कमरे के बाहर वो खुद डटे रहे , जब तक खतरा टल नहीं गया . फिर काफी देर तक भरोसा दिलाने के बाद कि अब कोई खतरा नहीं है , तब मायावती के कमरे का दरवाजा खुला .
कहा जाता है कि जिस वक्त वहां से बीएसपी विधायकों को घसीटकर सीएम हाउस ले जाया जा रहा था और मायावती के कमरे के बाहर हंगामा हो रहा था , उस वक्त लखनऊ के एसएसपी ओपी सिंह भी मौजूद थे . चश्मदीदों के अनुसार वो सिर्फ खड़े होकर सिगरेट पी रहे थे . पुलिस और स्थानीय प्रशासन मूकदर्शक बना सब कुछ देख रहा था . जिला मजिस्ट्रेट मौके पर न पहुंचे होते और इस तेवर के साथ उन्होंने समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को न हटाया होता तो पता नहीं उस शाम वहां क्या हो जाता . लेकिन मायावती तो उस रात सुरक्षित बच गईं लेकिन अपनी डियूटी निभाने की सजा जिला मजिस्ट्रेट को मिली. रात को ही उनका तबादला कर दिया गया .
मायावती पर वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस की लिखी किताब ‘ बहन जी ‘ में गेस्ट हाउस कांड के बारे में विस्तार से कुछ इसी तरह लिखा गया है . लेकिन इस गेस्ट हाउस कांड से मायावती के बचाने वाले एक और किरदार का जिक्र लोग करते आए हैं , वो हैं यूपी बीजेपी के कद्दावर नेता रहे ब्रह्मदत्त द्विवेदी . कहा जाता है कि जब मायावती अपने कमरे में बंद हो गई थीं और पूरे गेस्ट हाउस में हंगामा मचा था , तब मायावती ने अपने बचाव के लिए कई लोगों को फोन किया था . उन्हीं से एक ब्रह्मदत्त द्विवेदी भी थे . गेस्ट हाउस के कमरे में बंद बेहद डरी -सहमी मायावती को समाजवादी पार्टी के बेलगाम कार्यकर्ताओं के खौफ से बचाने के लिए तुरंत ब्रह्मदत्त द्विवेदी वहां पहुंच गए थे . कहा तो ये भी जाता है कि पुलिस के कुछ अधिकारी जब तमाशबीन बने थे , तब ब्रह्मदत्त द्विवेदी ही थे , जिन्होंने दबंगई के साथ मायावती के न सिर्फ बचाया था , बल्कि उनके कमरे के बाहर जमा उत्पाती दस्ते को भगाया था . ब्रह्मदत्त द्विवेदी के इस अहसान को मायावती कभी नहीं भूल पाई .उन्होंने ब्रह्मदत्त द्विवेदी को भाई की तरह माना और विरोधी पार्टी में होते हुए भी कभी भी ब्रह्मदत्त द्विवेदी के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा नहीं किया. ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या के बाद वे उनके घर पहुंची और फूट-फूटकर रोई थीं . जब ब्रह्मदत्त की पत्नी चुनाव मैदान में उतरीं तो मायावती ने अपील की थी- ‘ मेरे लिए अपनी जान देने वाले मेरे भाई की पत्नी को वोट दें ‘ खैर , उस दिन मायावती तो बाल -बाल बच गईं लेकिन उनकी ताजपोशी को मुलायम सिंह टाल नहीं सके.
मुलायम सिंह यादव की सारी तिकड़म और साजिशें नाकाम हुई . अगले ही दिन तीन जून को कांशीराम अस्पताल से बीमारी की हालत में सीधे लखनऊ पहुंचे .उनकी मौजूदगी में मायावती ने यूपी के सीएम पद की शपथ ली . मुलायम सिह बेदखल हुए और यूपी की राजनीति में मायावती एक दबंग महिला के तौर पर स्थापित हो गईं . इस घटना को गेस्ट हाउस कांड के नाम से जाना जाता है . गेस्ट हाउस कांड के तुरंत बाद माया सरकार ने एक कमेटी बनाकर वरिष्ठ आईएएस रमेश चंद्र को जांच का जिम्मा दे दिया . कमेटी के सामने गेस्ट हाउस कांड के गवाहों के बयान दर्ज हुए और मुलायम सिंह यादव समेत 74 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया गया . फिर लंबी कानूनी लड़ाई चलती रही थी .
थर्ड पार्टी इमेज रेफरेन्स
इधर मुलायम को गिराकर सत्ता पर काबिज हुई मायावती और बीजेपी का रिश्ता महज पांच महीने में ही टूट गया . बीएसपी और बीजेपी के तार तीन बार जुड़े और तीनों बार अप्रत्याशित ढंग से टूटे . एक दूसरे को बेआबरु करके दोनों दल हर बार अलग हुए . अब एक बार फिर जब समाजवादी पार्टी और बीएसपी के साथ आने की चर्चाएं हो रही हैं तो ये जानना जरुरी है कि दोनों के रिश्तों ने कैसे दिन देखे थे . मायावती ने उस दौरान मुलायम सिंह पर अपनी हत्या की साजिश का आरोप लगाया था और सालों साल इस आरोप को दोहराती रही थीं . ऐसा मानने वालों की कमी नहीं कि बिना मुलायम सिंह की मर्जी और इजाजत के मायावती को यूं घेरने और मारने -पीटने की हद तक डराने की हिमाकत कोई कर नहीं सकता था.
नतीजों के तुरंत बाद देर शाम अखिलेश यादव और मायावती की मुलाकात हुई . इस मुलाकात के साथ ही 2019 में नए सियासी गठजोड़ की बुनियाद रख दी गई है . अखिलेश यादव ने मीडिया के सामने कहा भी कुछ पुरानी बातें भूलनी पड़ती है . उनका इशारा इसी गेस्ट हाउस कांड की तरफ था , जो मायावती अब तक भूल नहीं सकी थीं. कहा तो ये भी गया कि मायावती ने अखिलेश के लिए काली मर्सिडीज कार भिजवाई थी , जिस पर सवार होकर वो बुआ से मिलने आए थे .छब्बीस साल पहले मुलायम और कांशीराम बीएसपी -सपा गठबंधन करके बीजेपी को यूपी की सत्ता से दूर कर दिया था , वही समीकरण एक बार फिर बीजेपी के लिए मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर सकता है .
बीजेपी नेता बुआ और बबुआ के गठजोड़ का चुनाव के पहले तक तो मजाक उड़ाते रहे . आदित्यनाथ तो इसे सांप -छुछुंदर की दोस्ती कहते रहे . लेकिन अब हार के बाद बीजेपी खेमे में चिंतन का दौर जारी है . विनय कटियार जैसे नेता खुले तौर पर मान रहे हैं कि 2019 में सपा -बसपा गठबंधन बीजेपी के लिए मुसीबत की वजह बन सकता है . इस मुसीबत की प्रस्तावना कल शाम की अखिलेश -माया मुलाकात में लिखी जा चुकी है .

Thursday, March 15, 2018

सफल हुई बुआ भतीजे की जोड़ी

पूर्वोत्तर के तीनों राज्यों त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में सरकार बनाने के बाद देश को 'कांग्रेस मुक्त' करने और अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को हिंदी बेल्ट में जबरदस्त झटका लगा है। हिंदी क्षेत्र के दो बड़े और सियासी रूप सेे अहम माने जाने वाले राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में तीन लोकसभा सीट (गोरखपुर, फूलपुर और अररिया) पर हुए उप-चुनाव में बीजेपी का सूपड़ा साफ हो गया है। सबसे करारा झटका बीजेपी को यूपी में मिला है। गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को कुल 80 सीटों में से 71 सीटों पर जबकि इसकी अगुवाई वाले एनडीए (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन) को 73 सीटें मिली थीं। कांग्रेस जहां महज दो सीटों पर सिमट कर रह गई वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपना खाता भी नहीं खोल पाई। जबकि समाजवादी पार्टी को महज 5 सीटों पर जीत मिली। लोकसभा चुनाव के बाद भी बीजेपी का 'विजय रथ' विधानसभा चुनाव में भी नहीं रुका और समाजवादी पार्टी एवं कांग्रेस के गठबंधन के बाद वह प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस आई। इसके बाद गोरखपुर के पूर्व सांसद योगी आदित्यानथ राज्य के मुख्यमंत्री बने और फूलपुर के पूर्व सांसद केशव प्रसाद मौर्य राज्य के उप-मुख्यमंत्री। फिर इन दोनों सीटों पर उप-चुनाव की घोषणा हुई और करीब तीन दशक बाद समाजवादी पार्टी और बसपा ने हाथ मिलाया। नतीजा दोनों सीटों पर बीजेपी की अप्रत्याशित हार।
गोरखपुर सीट पर जहां समाजवादी पार्टी और बसपा गठबंधन के उम्मीदवार प्रवीण कुमार निषाद ने बीजेपी उम्मीदवार उपेंद्र दत्त शुक्ला को भारी मतों से हराया वहीं फुलपूर लोकसभा सीट से सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल ने बीजेपी उम्मीदवार कौशलेंद्र सिंह पटेल करारी शिकस्त दी। गोरखपुर लोकसभा सीट में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार प्रवीण कुमार निषाद 21 हज़ार वोटों से जीते हैं। वहीं फूलपुर पर समाजवादी पार्टी के ही नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल ने 59 हज़ार वोटों से जीत दर्ज की है।
वहीं बिहार के अररिया लोकसभा सीट में राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार ने 61,988 वोटों के अंतर से बीजेपी को हराया है। गोरखपुर योगी आदित्यनाथ का गृह क्षेत्र हैं और इसे एक तरह से बीजेपी का गढ़ माना जाता रहा है। मौजूदा नतीजों ने इस गढ़ में सेंध लगाने का काम किया है। योगी और बीजेपी के लिए इन नतीजों को स्वीकार करना आसान नहीं होगा। देखा जाए तो दोनों सीटों पर मिली हार के सांकेतिक मायने सियासी जीत से कहीं अधिक अहम है। फूलपुर जहां उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का क्षेत्र था, वहीं गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का क्षेत्र है, जहां 90 के बाद से बीजेपी का कब्जा रहा है। योगी 1990 से लेकर 2017 तक इस सीट से सांसद रहें। इस सीट पर मुख्य रूप से लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी के बीच होती रही है। पहली लोकसभा, तीसरी, पांचवीं, सातवीं और आठवीं लोकसभा चुनाव के दौरान इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार ने जीत दर्ज की। लेकिन नौंवें लोकसभा चुनाव के दौरान इस सीट पर हिंदू महासभा ने कब्जा किया और फिर उसके बाद दसवीं लोकसभा से लेकर 16वीं लोकसभा तक इस सीट पर योगी का कब्जा रहा। 2018 में पहली बार इस सीट पर सपा-बसपा ने बीजेपी को सीधी टक्कर में गोरखपुर से बेदखल कर दिया। 
वहीं बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) अररिया लोकसभा सीट को बचाने में सफल रही है। महागठबंधन टूटने और लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले में सजा होने के बाद हुए यह उप-चुनाव उनके बेटे तेजस्वी यादव के लिए परीक्षा की तरह था, जिसमें वह पास होने में सफल रहे हैं। 2015 का विधानसभा चुनाव जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस महागठबंधन ने साथ में लड़ा था और तब अररिया सीट आरजेडी के खाते में गई थी और पार्टी ने तस्लीमुद्दीन को टिकट दिया था। वहीं बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए ने यह सीट राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) को दी, लेकिन चुनाव में आरजेडी विजयी हुई। तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद आरजेडी ने उनके बेटे सरफराज आलम को टिकट दिया जबकि बीजेपी ने प्रदीप कुमार सिंह अपना उम्मीदवार बनाया। इस सीट पर बीजेपी और आरजेडी के बीच सीधी टक्कर थी, जिसमें आरजेडी कामयाब रही है। अररिया सीट के नतीजों ने बीजेपी और जेडीयू गठबंधन को भी झटका दिया है।

पूर्वोत्तर से ख़त्म होती लेफ्ट

राजस्थान की दो लोकसभा और एक विधानसभा के साथ ही मध्य प्रदेश में दो बार में चार विधानसभा उपचुनावों में हार के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह ठंडा पड़ा हुआ है. ऐसे में त्रिपुरा की जीत लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए भारतीय जनता पार्टी में नयी उमंग लाने में कामयाब हो सकती है. त्रिपुरा की जीत के विश्लेषण से पहले इसके तात्कालिक असर पर ध्यान दिया जाना चाहिए. लगातार बढ़ते बेरोजगारी के आंकड़ों और बैंकिंग सेक्टर में घोटालों के लगातार खुलासे से भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार की पेशानी पर बल पड़ा हुआ है...त्रिपुरा की जीत और नगालैंड के बेहतर प्रदर्शन से पार्टी इन चिंताओं को कुछ हद तक परे रखने में कामयाब होगी. इस जीत से बीजेपी में दो लोगों का कद बढ़ेगा. त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर जो अभी बीजेपी में सचिव के पद पर हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि वो दस साल तक मेघालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं.
त्रिपुरा की जीत में देवधर के इन गुणों ने बड़ी भूमिका निभाई है. सुनील देवधर उत्तर पूर्व के लोगों की सहायता के लिए माई होम इंडिया नाम से संस्था और हेल्पलाइन सालों से चला रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आदि शहरों में उत्तर पूर्व को लोगों को जब भी परेशानी होती है, उनके कार्यकर्ता मदद करते हैं...त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की पैठ बढ़ाने में सुनील के इस नेटवर्क ने भी योगदान दिया है.”
उत्तर-पूर्व में पैर जमाना बीजेपी का पुराना एजेंडा रहा है. बीजेपी की पकड़ मजबूत करने में संघ के मजबूत संगठन का भी बहुत योगदान रहा है. बोडो आंदोलन के उभार के दौरान कोकराझार में संघ प्रचारक ओमप्रकाश चतुर्वेदी की हत्या भी हुई. करीब छह प्रचारक उग्रवादियों के शिकार भी बने. संघ ने फिर महाराष्ट्र से सुनील देवधर, उत्तर प्रदेश के शीलभूषण शर्मा, केरल से प्रमोदन और अनिलन के साथ कर्नाटक से एक प्रचारक को उत्तर पूर्व भेजा. जिन्होंने उत्तर पूर्व में संगठन का आधार बढ़ाने में योगदान दिया.
वैसे भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आक्रामक प्रचार की शैली को भी जीत का श्रेय जाता है. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का दावा है कि उत्तर पूर्व में लोगों को पिछले चार साल मे पहली बार अहसास हो रहा है कि उनका विकास हो रहा है. इसलिए वह भारतीय जनता पार्टी में भरोसा जता रहा है.
त्रिपुरा की जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के एक और नेता का कद कुछ और बढ़ जाएगा. गुजरात के बाद त्रिपुरा में भी भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना चेहरा बनाया था. त्रिपुरा के एक-तिहाई मतदाता उस नाथ संप्रदाय के अनुयायी हैं, योगी जिनकी गुरुगद्दी के महंत हैं. त्रिपुरा की जीत के बाद अब पार्टी उनका इस्तेमाल कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में भी जरूर करेगी. वैसे योगी आदित्यनाथ वहां के कई दौरे कर भी चुके हैं. त्रिपुरा में बीजेपी की जीत को केरल की हार का बदला भी कहा जा सकता है. केरल में पंद्रह परसेंट वोट पाने वाली बीजेपी एक ही विधायक विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो पाई थी. हालांकि छह सीटों पर एक से लेकर पांच सौ वोटों से उसके प्रत्याशी पराजित हुए थे. अब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को सोचना होगा कि पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा का उसका गढ़ क्यों ढह गया? पश्चिम बंगाल में तो वो अब तीसरे स्थान की तरफ खिसकती नजर आ रही है. इसलिए उसके लिए बड़े चिंतन का वक्त है. उसे विचार करना होगा कि आखिर उसकी सोच में कहां खामी है कि विरोधाभाषी आर्थिक आधार के बावजूद वह लगातार अपनी प्रासंगिकता खोते जा रही है. अब एक नजर बीजेपी को मिले वोटों पर भी डाल लेते हैं. पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की मौजूदगी शून्य से कुछ ही ज्यादा यानी करीब डेढ़ परसेंट थी. यह बात और है कि लोकसभा चुनाव आते-आते पार्टी का राज्य में वोट शेयर बढ़कर 5.7 परसेंट हो गया था.
लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनावों में पलटाई यानी बदलाव का नारा देने वाली पार्टी ने चुनावी और राजनीतिक परिदृश्य ही बदलकर रख दिया है. उसके गठबंधन को 49.6 प्रतिशत वोट मिला है, यानी आधे से कुछ ही कम, जिसमें बीजेपी की हिस्सेदारी 41.7 परसेंट है. तो उसके सहयोगी इंडियन पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा को 7.9 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि लोकसभा चुनावों में 64 परसेंट वोट पाने वाला सीपीएम गठबंधन करीब 45 परसेंट वोटों पर सिमट गया है. राष्ट्रीय मीडिया में माना जाने लगा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को गंभीरता से लिया जाने लगा है. लेकिन उत्तर पूर्व में कांग्रेस बड़ी ताकत रही है, वहां सिर्फ मेघालय में वो बड़ा दल बन पाया है, इसलिए चिंतन तो राहुल गांधी को भी करना होगा कि कांग्रेस की सोच में आखिर कैसा विचलन शुरू हुआ कि वो लगातार चुनावी अखाड़ों में बीजेपी से मात खा रही है. त्रिपुरा में जीत और नगालैंड में बढ़त के बाद बीजेपी विरोधी विपक्ष को भी माथापच्ची करनी चाहिए कि वो नरेंद्र मोदी को आखिर घेर पाने में कामयाब क्यों नहीं हो पा रहा है. चूंकि लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है, इसलिए अब बीजेपी के सामने त्रिपुरा की जनता को दिए तमाम वादे निभाने की चुनौती होगी. राज्य में ढाई दशक बाद सत्ता परिवर्तन हुआ है उम्मीद की जानी चाहिए कि नई सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करेगी.

सिंधिया बनाम शिवराज

यूं तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपचुनावों में जीत दर्ज करने के बाजीगर माने जाते हैं। और इस चुनाव को सत्ता का सेमीफाइनल माना जाने लगा। कोलारस और मुंगावली विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. सीएम शिवराज की प्लानिंग थी कि वह कांग्रेस के गढ़ में ज्योतिरादित्य को चित करें. इसी के चलते सीएम ने खुद प्रचार का मोर्चा संभाल रखा था. दूसरी तरफ राहुल गांधी यूथ ब्रिगेड के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने चुनौती स्वीकार की और उनके सामने शिवराज के हर दांव फेल साबित हुए हैं.   मुंगावली चुनाव दो बडे नेताओं की निजी अस्मिता का चुनाव था। शिवराज सिंह चौहान के बेटे ने जिस जंग की शुरूआत की वो लगातार दो महीने से जारी थी। राज्य के मुख्यमंत्री को एक विधानसभा में दो दर्जन से अधिक सभाएं करनी पडी। सब विधायक और पूरा मंत्रिमंडल जोरदार प्रचार में शामिल था वहीं सिंधिया को कांग्रेस नेताओं से ही खतरा था। ज्योतिरादित्य ने साबित किया गढ़ में कैसे घेरे जाते हैं विरोधी. पूरे चुनाव प्रचार में शिवराज ने 'लाड़ली लक्ष्मी' और 'मुख्यमंत्री तीथदर्शन योजना' की उपलब्धियां गिनाने के बजाय सिंधिया पर निशाने साधने में लगे रहे.
इसके जवाब में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्थानीय मुद्दों को उठाने के साथ जातीय समीकरण को साधने में पूरी ताकत झोंकी. सिंधिया की रणनीति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुंगावली क्षेत्र में पड़ने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी शासकीय महाविद्यालय के प्रिंसिपल के सस्पेंड किए जाने की घटना को भी उन्होंने राजनीतिक रंग दे दिया था. दरअसल, प्रिंसिपल बीएल अहिरवार के सस्पेंड किए जाने से वहां का युवा नाराज था. ज्योतिरादित्य ने इसे भांपते हुए युवाओं के साथ धरने पर बैठ गए थे, जिसके बाद सरकार को अपना फैसला पलटना पड़ा था. इसके अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अशोक नगर जिले की मुंगावली और शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा सीट पर यहां जाति आधारित समूहों के साथ कई बार सीधा संवाद किया. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सिंधिया सकारात्मक एजेंडा रखा.
शिवराज जहां सिंधिया पर पर्सनल अटैक करने में लगे थे, वहीं सिंधिया लगातार ये कहते रहे कि वे राज्य में बदलाव के लिए आए हैं. वे चाहते हैं कि कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में आए ताकि गांव के लोगों की हर इच्छा को पूरा किया जाएगा. मैंने ये चुनाव पर कडी नजर रखी स्थानीय मीडिया के माध्यम से। ऐसे भाषण होते कि जिस जगह पहले सिंधिया सवाल करते तो 20 मिनट बाद शिवराज सिंह चौहान आकर एक एक वाक्य का जवाब देते। कभी कभी तो एक दीवार के फासले पर ही दोनों की  जुबानी जंग एक साथ शुरू हो जाती थी। खूब तंज शायरी सब प्रयोग हुआ। कांग्रेस में भितरघात हो सकता था। क्योंकि ये उनके क्षेत्र के चुनाव थे और अगर कांग्रेस हार जाती तो विधानसभा चुनाव में उनके मुख्यमंत्री पद का दावा कमजोर होता। ये बात राहुल गांधी को भी पता है कि सिंधिया को कमान देने से राहुल को भी कम मेहनत करनी पडेगी वो खुद जोरदार  चुनाव लडेंगे। लेकिन सोनिया गांधी कमलनाथ को नकारने से कतरा रही हैं इसीलिये अभी कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने दोनों से जीत के फार्मूले मांगे थे। सिंधिया को घेरकर अभिमन्यु बनाने की भरपूर कोशिश की गई लेकिन वो बच निकले।

Thursday, March 8, 2018

महिला दिवस पर विशेष

दरअसल क्या है कि हम भारतीय लोग माँ का नाम सुनते ही बहुत जल्दी इंपैक्ट हो जाते हैं, क़ि माँ बहुत रिस्पेक्टैब्ल है, माँ की पूजा होनी चाहिए. अभी मै मां पर दो शायरी बोल दूं तो आप सब इमोशनल हो जाओगे।
लेकिन आज मैं आपको इससे उल्टी बात बताना चाहूँगा क़ि जिस समाज में माँ की बहुत पूजा होगी वहाँ महिलाओं के सम्मान की उम्मीद करना बहुत मुश्किल काम है. तभी तो हमारे ही देश में हज़ारो साल से पूजा हो रही है लेकिन फिर भी कितने % औरतें अपने अधिकार जानती हैं? कितनी समानता आ गई है?
मैं आपको इसका एक साइकॉलॉजिकल कारण बताना चाहता हूँ। असल में कोई बच्चा पैदा होने के बहुत दिनों बाद तक तो यही नहीं समझ पाता है क़ि वो और माँ दो अलग अलग जिस्म हैं. उसको कोई हाथ से थपकी देता है तो सो जाता है, उसको कोई हिलाने लगता है तो वो सो जाता है. कभी कभी वो कोई आवाज़ सुनकर सो जाता है. जबकि आप किसी बड़े आदमी के साथ ऐसा करें तो वो जाग जाएगा. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वो बच्चा खुद को माँ के पेट में ऐसे ही महसूस करता रहा है. जब उसे हिलाते हैं तो लगता है जैसे माँ के पेट में उसकी  धड़कने चल रही हैं, जो उसने पहले सुनी हुई हैं. इसलिए वो सो जाता है.
फिर काफ़ी अरसे बाद उसे पता चलता है क़ि वो और माँ तो दो अलग अलग इंसान हैं. इसीलिए उस गम को दूर करने के लिए  कोई चीज़ ढूढ़ता है, जैसे टेडी या ब्लैंकेट.......... और वो चीज हमेशा साॅफ्ट होगी, नरम होगी बिलकुल मां की तरह।
इसलिए उसके अंदर माँ को लेकर बड़ा प्यार होता है. लेकिन जब वो धीरे धीरे बड़ा होता है तो दूसरे लोगों से अपनी माँ को ह्यूमिलेट होते देखता है, कभी बाप से, तो कभी अपनी दादी से. उस बच्चे के मन में अपनी माँ के लिए बेपनाह प्यार और सम्मान होता है. वो हमेशा सोचता है कि जब वो बड़ा हो जाएगा तो माँ के लिए कुछ करेगा. फिर जब वो खुद बड़ा होता है तो खुद तो बेटा तो होता है लेकिन तबतक किसी का हसबैंड भी हो जाता है. तो उसके जो माँ के लिए पॉजिटिव इमोशंस होते हैं उसको वो भी विप बना लेता है. और दूसरी औरतो पर यूज करता है. फिर कभी अपनी वाईफ पर रोज ताने मरेगा, क़ि तुम ना मेरी माँ जैसी दाल नहीं बना पाती हो. तुम ना मेरी माँ की तरह नहीं घर संभाल पाती हो. वो अपनी माँ को एक कैरेट बना कर अपनी बीवी के सामने टांग देता है फिर वो बीवी पूरी जिंदगी वैसे ही चलती है लेकिन उस कैरेट तक नहीं पहुँच सकती है. हमारे समाज में हर माँ अपनी बहू से बेहतर खाना बनाती थी. यानी पाँच हज़ार साल से हमारे देश में खाने का स्तर नीचे जा रहा है? इसलिए ये कहना क़ि माँ की पूजा होनी चाहिए, माँ के पैरों के लिए तो जन्नत है. ये सब केवल नाटक है. जब आप बार बार कहते हैं क़ि माँ बहुत रिस्पेक्टैब्ल है तो कौन है जो रिस्पेक्टैब्ल नहीं है? बाकी औरतें? बाप के बारे में तो कोई नहीं कहता है? कि बाप की इज़्ज़त करनी चाहिए. अरे उसकी करनी पड़ेगी नहीं तो घर से निकाल देगा. करनी ही पड़ेगी. मां के पैरों तले जन्नत है तो बाप के पैरों तले जायदाद।
इसलिए माँ की बहुत इज़्ज़त करो कहना एक लाइसेंस है क़ि माँ की इज़्ज़त करो और बाकियों को छोड़ दो. और कौन सी माँ? मेरी माँ की इज़्ज़त होनी चाहिए? मेरे बच्चों की माँ की इज़्ज़त नहीं होनी चाहिए? और मेरी माँ की इज़्ज़त कब होनी चाहिए? मान लो मैं पैदा हुआ था 01 जनवरी को. तो एक सवाल का जवाब दे दो क़ि 1 जनवरी के पहले या 31 दिसंबर तक मेरी माँ इज़्ज़त के काबिल थी क़ि नहीं? अगर नहीं थी तो वो काहे रिस्पेक्टैब्ल? रिस्पेक्टैब्ल तो मैं हुआ? ये सब बकवास है. अरे हर औरत की इज़्ज़त होनी चाहिए. माँ की ही क्यों? तो जिस समाज में औरत को देवी मानने का नाटक होता है वहाँ  असलियत में कुछ और ही होता है. उदाहरण के तौर पर आप आजकल भारत माता की जय का नारा खूब सुनते हैं और आप भी लगाते होंगे. लेकिन भारत माता वो कैलेंडर में छपी खूबसूरत तिरंगा पकड़े, साडी पहने अकेली भारत माता नहीं है. वो भारत माता समाज की हर लड़की और औरत है. वो गोरी हो काली, हो मोटी हो पतली हो, ग़रीब हो अमीर हो, बूढ़ी हो या बच्ची, जींस पहने, साडी पहने या बुर्क़ा, नीता अंबानी हों या किसी मजदूर की बेटी। सबकी बराबर इज़्ज़त होनी चाहिए. ये नहीं क़ि भारत माता  की जय भी बोल दें और उनपर कमेंट्स भी पास कर दें. इसलिए मां ही नहीं हर औरत की इज्जत होनी चाहिये।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...