दिसंबर 2016 में अमरीका की डिज़ाइन की प्रोफेसर ने अपने रिसर्च के दौरान पाया कि अमरीकी चुनाव में कैंब्रिंज एनालिटा की भूमिका है और उसका संबंध यूरोपीयन यूनियन से ब्रिटेन को अलग करने के अभियान में भी है. कैंब्रिज एनालिटिका को 5 करोड़ से अधिक अमरीकी नागरिकों का डेटा एक रिसर्चर से मिला. इस रिसर्चर ने एक ऐप बनाया था, जिससे लोग अपनी सहमति से जुड़े थे. जैसे फेसबुक पर बहुत से एप आते हैं, आप क्लिक कर जुड़ने लग जाते हैं और आई एग्री का बटन दबा देते हैं. या तो आप समझ नहीं पाते या लापरवाह हो जाते हैं, उधर वह एप आपकी सारी जानकारी लेकर किसी तीसरी पार्टी को बेच देते हैं. वह कंपनी उस डेटा का इस्तेमाल राजनीतिक की हवा बदलने में करती है या किसी प्रोडक्ट को बेचने में करती है. यही हुआ है इस विवाद में. अब पांच दिनों तक फेसबुक के मार्क ज़ुकरबर्ग ने माना कि बहुत बड़ी ग़लती हो गई है. आगे से नहीं हो इसके लिए व्यवस्था की जाएगी. डेटा और प्राइवेसी से जुड़े लोग कहते हैं कि यह काफी नहीं है. ज़ुकरबर्ग यह बतायें कि 2014 से पहले जिन जिन एप ने डेटा चुराया है, उसका वे क्या कर रहे हैं इसकी जांच संभव नहीं है, क्योंकि एप की संख्या तो कई हज़ार में है. हम और आप फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं. एक भरोसा होता है मगर उसी से जानकारी किसी और के पास चली जाए तो फिर भरोसा टूटता है. और उस जानकारी का इस्तेमाल आपके राजनीतिक मत को प्रभावित करने में रूस या अमरीका में बैठी कोई कंपनी कर ले तो सीधा मतलब यह हुआ कि लोकतंत्र टेक्नॉलजी के कारण कभी भी खतरे में पड़ सकता है. आप देखिए कि कई जगहों पर ऐसा हो रहा है. एक बार जो सत्ता में आ रहा है, वो हार ही नहीं रहा है. रूस के राष्ट्रपति पुतिन को देखिए, चीन के राष्ट्रपति तो आजीवन ही गद्दी पर बैठ गए हैं. भारत में कोई इस तरह का सपना न देखे इसलिए जनता को इस विषय को लेकर सतर्क हो जाना चाहिए. यह मसला फेसबुक का है मगर आपको सोचना चाहिए कि कहीं आधार नंबर के कारण यह खतरा करीब तो नहीं है. अमरीका, इटली, फ्रांस और जर्मनी में आधार नंबर नहीं है, भारत में आधार नंबर है. कहीं ऐसा न हो कि सब्सिडी बचाने के नाम पर लोकतंत्र ही हाथ से चला जाए. ब्रिटेन में मामला उठा तो वहां का चुनाव आयोग तुरंत जांच करने लगा, भारत में कांग्रेस बीजेपी आरोप लगा रहे हैं, खुलेआम कह रहे हैं कि आपने ऐसा किया तो आपने ऐसा किया. मगर चुनाव आयोग का पता नहीं. क्या पता उसके अधिकार क्षेत्र में ही यह न आता हो. भारत में जब भी ईवीएम के हैक किए जाने का सवाल उठता है तो हम मज़ाक उड़ाते हैं. सबसे बड़ी दलील है कि चुनाव आयोग पर शक कैसे कर सकते हैं. हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी चुनाव आयोग के रहते दशकों बूथ लूटे जाते रहे. आयोग ने नहीं, एक व्यक्ति ने आयोग को भरोसे लायक बनाया था. क्या आपको यह लगता है कि अमरीका, फ्रांस, इटली, जर्मनी के चुनाव आयोग में लोगों का विश्वास ही नहीं हैं. फिर भी वहां बहस हो रही है कि टेक्नालजी से कहीं रिज़ल्ट या चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित तो नहीं किया जा रहा है. जर्मनी में आम चुनाव के पहले वहां खूब चर्चा हुई. वहां के फेडरल ऑफिस फार दि प्रोटेक्शन ऑफ दि कांस्टिट्यूशन के प्रमुख ने कहा था कि चुनाव को हैक करना, बाहर से प्रभावित करना बिल्कुल संभव है. एक रिपोर्ट पढ़ रहा था जिसमें कहा गया कि जर्मनी में एक काउंटिंग सॉफ्टवेयर है जिसे .-. है, इसे हैक किया जा सकता है. इसके डेटा को छेड़ कर रिज़ल्ट बदला जा सकता है. उन देशों में ऐसे सवालों को गंभीरता से लिया जाता है, हमारे यहां ऐसे सारे सवाल का यही जवाब है कि हम चुनाव आयोग पर शक कैसे कर सकते हैं. यही पूछ लीजिए कि चुनाव आयोग के पास ऐसी संभावना को रोकने के लिए सिस्टम ही क्या है. बैलेटबॉक्स इंडिया के राकेश ने हाल ही में एक लंबा पत्र लिखकर इन खतरों के प्रति आगाह किया था मगर वही जवाब मिला, बल्कि अब तो जवाब न मिलना ही जवाब समझा जाने लगा है.
Tuesday, March 27, 2018
फेसबुक डेटा चोरी क्या है?
दिसंबर 2016 में अमरीका की डिज़ाइन की प्रोफेसर ने अपने रिसर्च के दौरान पाया कि अमरीकी चुनाव में कैंब्रिंज एनालिटा की भूमिका है और उसका संबंध यूरोपीयन यूनियन से ब्रिटेन को अलग करने के अभियान में भी है. कैंब्रिज एनालिटिका को 5 करोड़ से अधिक अमरीकी नागरिकों का डेटा एक रिसर्चर से मिला. इस रिसर्चर ने एक ऐप बनाया था, जिससे लोग अपनी सहमति से जुड़े थे. जैसे फेसबुक पर बहुत से एप आते हैं, आप क्लिक कर जुड़ने लग जाते हैं और आई एग्री का बटन दबा देते हैं. या तो आप समझ नहीं पाते या लापरवाह हो जाते हैं, उधर वह एप आपकी सारी जानकारी लेकर किसी तीसरी पार्टी को बेच देते हैं. वह कंपनी उस डेटा का इस्तेमाल राजनीतिक की हवा बदलने में करती है या किसी प्रोडक्ट को बेचने में करती है. यही हुआ है इस विवाद में. अब पांच दिनों तक फेसबुक के मार्क ज़ुकरबर्ग ने माना कि बहुत बड़ी ग़लती हो गई है. आगे से नहीं हो इसके लिए व्यवस्था की जाएगी. डेटा और प्राइवेसी से जुड़े लोग कहते हैं कि यह काफी नहीं है. ज़ुकरबर्ग यह बतायें कि 2014 से पहले जिन जिन एप ने डेटा चुराया है, उसका वे क्या कर रहे हैं इसकी जांच संभव नहीं है, क्योंकि एप की संख्या तो कई हज़ार में है. हम और आप फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं. एक भरोसा होता है मगर उसी से जानकारी किसी और के पास चली जाए तो फिर भरोसा टूटता है. और उस जानकारी का इस्तेमाल आपके राजनीतिक मत को प्रभावित करने में रूस या अमरीका में बैठी कोई कंपनी कर ले तो सीधा मतलब यह हुआ कि लोकतंत्र टेक्नॉलजी के कारण कभी भी खतरे में पड़ सकता है. आप देखिए कि कई जगहों पर ऐसा हो रहा है. एक बार जो सत्ता में आ रहा है, वो हार ही नहीं रहा है. रूस के राष्ट्रपति पुतिन को देखिए, चीन के राष्ट्रपति तो आजीवन ही गद्दी पर बैठ गए हैं. भारत में कोई इस तरह का सपना न देखे इसलिए जनता को इस विषय को लेकर सतर्क हो जाना चाहिए. यह मसला फेसबुक का है मगर आपको सोचना चाहिए कि कहीं आधार नंबर के कारण यह खतरा करीब तो नहीं है. अमरीका, इटली, फ्रांस और जर्मनी में आधार नंबर नहीं है, भारत में आधार नंबर है. कहीं ऐसा न हो कि सब्सिडी बचाने के नाम पर लोकतंत्र ही हाथ से चला जाए. ब्रिटेन में मामला उठा तो वहां का चुनाव आयोग तुरंत जांच करने लगा, भारत में कांग्रेस बीजेपी आरोप लगा रहे हैं, खुलेआम कह रहे हैं कि आपने ऐसा किया तो आपने ऐसा किया. मगर चुनाव आयोग का पता नहीं. क्या पता उसके अधिकार क्षेत्र में ही यह न आता हो. भारत में जब भी ईवीएम के हैक किए जाने का सवाल उठता है तो हम मज़ाक उड़ाते हैं. सबसे बड़ी दलील है कि चुनाव आयोग पर शक कैसे कर सकते हैं. हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी चुनाव आयोग के रहते दशकों बूथ लूटे जाते रहे. आयोग ने नहीं, एक व्यक्ति ने आयोग को भरोसे लायक बनाया था. क्या आपको यह लगता है कि अमरीका, फ्रांस, इटली, जर्मनी के चुनाव आयोग में लोगों का विश्वास ही नहीं हैं. फिर भी वहां बहस हो रही है कि टेक्नालजी से कहीं रिज़ल्ट या चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित तो नहीं किया जा रहा है. जर्मनी में आम चुनाव के पहले वहां खूब चर्चा हुई. वहां के फेडरल ऑफिस फार दि प्रोटेक्शन ऑफ दि कांस्टिट्यूशन के प्रमुख ने कहा था कि चुनाव को हैक करना, बाहर से प्रभावित करना बिल्कुल संभव है. एक रिपोर्ट पढ़ रहा था जिसमें कहा गया कि जर्मनी में एक काउंटिंग सॉफ्टवेयर है जिसे .-. है, इसे हैक किया जा सकता है. इसके डेटा को छेड़ कर रिज़ल्ट बदला जा सकता है. उन देशों में ऐसे सवालों को गंभीरता से लिया जाता है, हमारे यहां ऐसे सारे सवाल का यही जवाब है कि हम चुनाव आयोग पर शक कैसे कर सकते हैं. यही पूछ लीजिए कि चुनाव आयोग के पास ऐसी संभावना को रोकने के लिए सिस्टम ही क्या है. बैलेटबॉक्स इंडिया के राकेश ने हाल ही में एक लंबा पत्र लिखकर इन खतरों के प्रति आगाह किया था मगर वही जवाब मिला, बल्कि अब तो जवाब न मिलना ही जवाब समझा जाने लगा है.
Friday, March 16, 2018
गेस्ट हाउस कांड की कहानी
Thursday, March 15, 2018
सफल हुई बुआ भतीजे की जोड़ी
पूर्वोत्तर से ख़त्म होती लेफ्ट
त्रिपुरा की जीत में देवधर के इन गुणों ने बड़ी भूमिका निभाई है. सुनील देवधर उत्तर पूर्व के लोगों की सहायता के लिए माई होम इंडिया नाम से संस्था और हेल्पलाइन सालों से चला रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आदि शहरों में उत्तर पूर्व को लोगों को जब भी परेशानी होती है, उनके कार्यकर्ता मदद करते हैं...त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की पैठ बढ़ाने में सुनील के इस नेटवर्क ने भी योगदान दिया है.”
वैसे भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आक्रामक प्रचार की शैली को भी जीत का श्रेय जाता है. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का दावा है कि उत्तर पूर्व में लोगों को पिछले चार साल मे पहली बार अहसास हो रहा है कि उनका विकास हो रहा है. इसलिए वह भारतीय जनता पार्टी में भरोसा जता रहा है.
त्रिपुरा की जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के एक और नेता का कद कुछ और बढ़ जाएगा. गुजरात के बाद त्रिपुरा में भी भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना चेहरा बनाया था. त्रिपुरा के एक-तिहाई मतदाता उस नाथ संप्रदाय के अनुयायी हैं, योगी जिनकी गुरुगद्दी के महंत हैं. त्रिपुरा की जीत के बाद अब पार्टी उनका इस्तेमाल कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में भी जरूर करेगी. वैसे योगी आदित्यनाथ वहां के कई दौरे कर भी चुके हैं. त्रिपुरा में बीजेपी की जीत को केरल की हार का बदला भी कहा जा सकता है. केरल में पंद्रह परसेंट वोट पाने वाली बीजेपी एक ही विधायक विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो पाई थी. हालांकि छह सीटों पर एक से लेकर पांच सौ वोटों से उसके प्रत्याशी पराजित हुए थे. अब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को सोचना होगा कि पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा का उसका गढ़ क्यों ढह गया? पश्चिम बंगाल में तो वो अब तीसरे स्थान की तरफ खिसकती नजर आ रही है. इसलिए उसके लिए बड़े चिंतन का वक्त है. उसे विचार करना होगा कि आखिर उसकी सोच में कहां खामी है कि विरोधाभाषी आर्थिक आधार के बावजूद वह लगातार अपनी प्रासंगिकता खोते जा रही है. अब एक नजर बीजेपी को मिले वोटों पर भी डाल लेते हैं. पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की मौजूदगी शून्य से कुछ ही ज्यादा यानी करीब डेढ़ परसेंट थी. यह बात और है कि लोकसभा चुनाव आते-आते पार्टी का राज्य में वोट शेयर बढ़कर 5.7 परसेंट हो गया था.
सिंधिया बनाम शिवराज
इसके जवाब में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्थानीय मुद्दों को उठाने के साथ जातीय समीकरण को साधने में पूरी ताकत झोंकी. सिंधिया की रणनीति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुंगावली क्षेत्र में पड़ने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी शासकीय महाविद्यालय के प्रिंसिपल के सस्पेंड किए जाने की घटना को भी उन्होंने राजनीतिक रंग दे दिया था. दरअसल, प्रिंसिपल बीएल अहिरवार के सस्पेंड किए जाने से वहां का युवा नाराज था. ज्योतिरादित्य ने इसे भांपते हुए युवाओं के साथ धरने पर बैठ गए थे, जिसके बाद सरकार को अपना फैसला पलटना पड़ा था. इसके अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अशोक नगर जिले की मुंगावली और शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा सीट पर यहां जाति आधारित समूहों के साथ कई बार सीधा संवाद किया. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सिंधिया सकारात्मक एजेंडा रखा.
शिवराज जहां सिंधिया पर पर्सनल अटैक करने में लगे थे, वहीं सिंधिया लगातार ये कहते रहे कि वे राज्य में बदलाव के लिए आए हैं. वे चाहते हैं कि कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में आए ताकि गांव के लोगों की हर इच्छा को पूरा किया जाएगा. मैंने ये चुनाव पर कडी नजर रखी स्थानीय मीडिया के माध्यम से। ऐसे भाषण होते कि जिस जगह पहले सिंधिया सवाल करते तो 20 मिनट बाद शिवराज सिंह चौहान आकर एक एक वाक्य का जवाब देते। कभी कभी तो एक दीवार के फासले पर ही दोनों की जुबानी जंग एक साथ शुरू हो जाती थी। खूब तंज शायरी सब प्रयोग हुआ। कांग्रेस में भितरघात हो सकता था। क्योंकि ये उनके क्षेत्र के चुनाव थे और अगर कांग्रेस हार जाती तो विधानसभा चुनाव में उनके मुख्यमंत्री पद का दावा कमजोर होता। ये बात राहुल गांधी को भी पता है कि सिंधिया को कमान देने से राहुल को भी कम मेहनत करनी पडेगी वो खुद जोरदार चुनाव लडेंगे। लेकिन सोनिया गांधी कमलनाथ को नकारने से कतरा रही हैं इसीलिये अभी कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने दोनों से जीत के फार्मूले मांगे थे। सिंधिया को घेरकर अभिमन्यु बनाने की भरपूर कोशिश की गई लेकिन वो बच निकले।
Thursday, March 8, 2018
महिला दिवस पर विशेष
दरअसल क्या है कि हम भारतीय लोग माँ का नाम सुनते ही बहुत जल्दी इंपैक्ट हो जाते हैं, क़ि माँ बहुत रिस्पेक्टैब्ल है, माँ की पूजा होनी चाहिए. अभी मै मां पर दो शायरी बोल दूं तो आप सब इमोशनल हो जाओगे।
लेकिन आज मैं आपको इससे उल्टी बात बताना चाहूँगा क़ि जिस समाज में माँ की बहुत पूजा होगी वहाँ महिलाओं के सम्मान की उम्मीद करना बहुत मुश्किल काम है. तभी तो हमारे ही देश में हज़ारो साल से पूजा हो रही है लेकिन फिर भी कितने % औरतें अपने अधिकार जानती हैं? कितनी समानता आ गई है?
मैं आपको इसका एक साइकॉलॉजिकल कारण बताना चाहता हूँ। असल में कोई बच्चा पैदा होने के बहुत दिनों बाद तक तो यही नहीं समझ पाता है क़ि वो और माँ दो अलग अलग जिस्म हैं. उसको कोई हाथ से थपकी देता है तो सो जाता है, उसको कोई हिलाने लगता है तो वो सो जाता है. कभी कभी वो कोई आवाज़ सुनकर सो जाता है. जबकि आप किसी बड़े आदमी के साथ ऐसा करें तो वो जाग जाएगा. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वो बच्चा खुद को माँ के पेट में ऐसे ही महसूस करता रहा है. जब उसे हिलाते हैं तो लगता है जैसे माँ के पेट में उसकी धड़कने चल रही हैं, जो उसने पहले सुनी हुई हैं. इसलिए वो सो जाता है.
फिर काफ़ी अरसे बाद उसे पता चलता है क़ि वो और माँ तो दो अलग अलग इंसान हैं. इसीलिए उस गम को दूर करने के लिए कोई चीज़ ढूढ़ता है, जैसे टेडी या ब्लैंकेट.......... और वो चीज हमेशा साॅफ्ट होगी, नरम होगी बिलकुल मां की तरह।
इसलिए उसके अंदर माँ को लेकर बड़ा प्यार होता है. लेकिन जब वो धीरे धीरे बड़ा होता है तो दूसरे लोगों से अपनी माँ को ह्यूमिलेट होते देखता है, कभी बाप से, तो कभी अपनी दादी से. उस बच्चे के मन में अपनी माँ के लिए बेपनाह प्यार और सम्मान होता है. वो हमेशा सोचता है कि जब वो बड़ा हो जाएगा तो माँ के लिए कुछ करेगा. फिर जब वो खुद बड़ा होता है तो खुद तो बेटा तो होता है लेकिन तबतक किसी का हसबैंड भी हो जाता है. तो उसके जो माँ के लिए पॉजिटिव इमोशंस होते हैं उसको वो भी विप बना लेता है. और दूसरी औरतो पर यूज करता है. फिर कभी अपनी वाईफ पर रोज ताने मरेगा, क़ि तुम ना मेरी माँ जैसी दाल नहीं बना पाती हो. तुम ना मेरी माँ की तरह नहीं घर संभाल पाती हो. वो अपनी माँ को एक कैरेट बना कर अपनी बीवी के सामने टांग देता है फिर वो बीवी पूरी जिंदगी वैसे ही चलती है लेकिन उस कैरेट तक नहीं पहुँच सकती है. हमारे समाज में हर माँ अपनी बहू से बेहतर खाना बनाती थी. यानी पाँच हज़ार साल से हमारे देश में खाने का स्तर नीचे जा रहा है? इसलिए ये कहना क़ि माँ की पूजा होनी चाहिए, माँ के पैरों के लिए तो जन्नत है. ये सब केवल नाटक है. जब आप बार बार कहते हैं क़ि माँ बहुत रिस्पेक्टैब्ल है तो कौन है जो रिस्पेक्टैब्ल नहीं है? बाकी औरतें? बाप के बारे में तो कोई नहीं कहता है? कि बाप की इज़्ज़त करनी चाहिए. अरे उसकी करनी पड़ेगी नहीं तो घर से निकाल देगा. करनी ही पड़ेगी. मां के पैरों तले जन्नत है तो बाप के पैरों तले जायदाद।
इसलिए माँ की बहुत इज़्ज़त करो कहना एक लाइसेंस है क़ि माँ की इज़्ज़त करो और बाकियों को छोड़ दो. और कौन सी माँ? मेरी माँ की इज़्ज़त होनी चाहिए? मेरे बच्चों की माँ की इज़्ज़त नहीं होनी चाहिए? और मेरी माँ की इज़्ज़त कब होनी चाहिए? मान लो मैं पैदा हुआ था 01 जनवरी को. तो एक सवाल का जवाब दे दो क़ि 1 जनवरी के पहले या 31 दिसंबर तक मेरी माँ इज़्ज़त के काबिल थी क़ि नहीं? अगर नहीं थी तो वो काहे रिस्पेक्टैब्ल? रिस्पेक्टैब्ल तो मैं हुआ? ये सब बकवास है. अरे हर औरत की इज़्ज़त होनी चाहिए. माँ की ही क्यों? तो जिस समाज में औरत को देवी मानने का नाटक होता है वहाँ असलियत में कुछ और ही होता है. उदाहरण के तौर पर आप आजकल भारत माता की जय का नारा खूब सुनते हैं और आप भी लगाते होंगे. लेकिन भारत माता वो कैलेंडर में छपी खूबसूरत तिरंगा पकड़े, साडी पहने अकेली भारत माता नहीं है. वो भारत माता समाज की हर लड़की और औरत है. वो गोरी हो काली, हो मोटी हो पतली हो, ग़रीब हो अमीर हो, बूढ़ी हो या बच्ची, जींस पहने, साडी पहने या बुर्क़ा, नीता अंबानी हों या किसी मजदूर की बेटी। सबकी बराबर इज़्ज़त होनी चाहिए. ये नहीं क़ि भारत माता की जय भी बोल दें और उनपर कमेंट्स भी पास कर दें. इसलिए मां ही नहीं हर औरत की इज्जत होनी चाहिये।
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
-
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
-
कुछ ही दिन पहले पूर्व फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता और अब कंगना रनौट द्वारा साथी कलाकारों व फिल्म निर्देशकों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के ...
-
इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...