राजस्थान की दो लोकसभा और एक विधानसभा के साथ ही मध्य प्रदेश में दो बार में चार विधानसभा उपचुनावों में हार के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह ठंडा पड़ा हुआ है. ऐसे में त्रिपुरा की जीत लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए भारतीय जनता पार्टी में नयी उमंग लाने में कामयाब हो सकती है. त्रिपुरा की जीत के विश्लेषण से पहले इसके तात्कालिक असर पर ध्यान दिया जाना चाहिए. लगातार बढ़ते बेरोजगारी के आंकड़ों और बैंकिंग सेक्टर में घोटालों के लगातार खुलासे से भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार की पेशानी पर बल पड़ा हुआ है...त्रिपुरा की जीत और नगालैंड के बेहतर प्रदर्शन से पार्टी इन चिंताओं को कुछ हद तक परे रखने में कामयाब होगी. इस जीत से बीजेपी में दो लोगों का कद बढ़ेगा. त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर जो अभी बीजेपी में सचिव के पद पर हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि वो दस साल तक मेघालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं.
त्रिपुरा की जीत में देवधर के इन गुणों ने बड़ी भूमिका निभाई है. सुनील देवधर उत्तर पूर्व के लोगों की सहायता के लिए माई होम इंडिया नाम से संस्था और हेल्पलाइन सालों से चला रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आदि शहरों में उत्तर पूर्व को लोगों को जब भी परेशानी होती है, उनके कार्यकर्ता मदद करते हैं...त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की पैठ बढ़ाने में सुनील के इस नेटवर्क ने भी योगदान दिया है.”
त्रिपुरा की जीत में देवधर के इन गुणों ने बड़ी भूमिका निभाई है. सुनील देवधर उत्तर पूर्व के लोगों की सहायता के लिए माई होम इंडिया नाम से संस्था और हेल्पलाइन सालों से चला रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आदि शहरों में उत्तर पूर्व को लोगों को जब भी परेशानी होती है, उनके कार्यकर्ता मदद करते हैं...त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की पैठ बढ़ाने में सुनील के इस नेटवर्क ने भी योगदान दिया है.”
उत्तर-पूर्व में पैर जमाना बीजेपी का पुराना एजेंडा रहा है. बीजेपी की पकड़ मजबूत करने में संघ के मजबूत संगठन का भी बहुत योगदान रहा है. बोडो आंदोलन के उभार के दौरान कोकराझार में संघ प्रचारक ओमप्रकाश चतुर्वेदी की हत्या भी हुई. करीब छह प्रचारक उग्रवादियों के शिकार भी बने. संघ ने फिर महाराष्ट्र से सुनील देवधर, उत्तर प्रदेश के शीलभूषण शर्मा, केरल से प्रमोदन और अनिलन के साथ कर्नाटक से एक प्रचारक को उत्तर पूर्व भेजा. जिन्होंने उत्तर पूर्व में संगठन का आधार बढ़ाने में योगदान दिया.
वैसे भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आक्रामक प्रचार की शैली को भी जीत का श्रेय जाता है. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का दावा है कि उत्तर पूर्व में लोगों को पिछले चार साल मे पहली बार अहसास हो रहा है कि उनका विकास हो रहा है. इसलिए वह भारतीय जनता पार्टी में भरोसा जता रहा है.
त्रिपुरा की जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के एक और नेता का कद कुछ और बढ़ जाएगा. गुजरात के बाद त्रिपुरा में भी भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना चेहरा बनाया था. त्रिपुरा के एक-तिहाई मतदाता उस नाथ संप्रदाय के अनुयायी हैं, योगी जिनकी गुरुगद्दी के महंत हैं. त्रिपुरा की जीत के बाद अब पार्टी उनका इस्तेमाल कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में भी जरूर करेगी. वैसे योगी आदित्यनाथ वहां के कई दौरे कर भी चुके हैं. त्रिपुरा में बीजेपी की जीत को केरल की हार का बदला भी कहा जा सकता है. केरल में पंद्रह परसेंट वोट पाने वाली बीजेपी एक ही विधायक विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो पाई थी. हालांकि छह सीटों पर एक से लेकर पांच सौ वोटों से उसके प्रत्याशी पराजित हुए थे. अब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को सोचना होगा कि पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा का उसका गढ़ क्यों ढह गया? पश्चिम बंगाल में तो वो अब तीसरे स्थान की तरफ खिसकती नजर आ रही है. इसलिए उसके लिए बड़े चिंतन का वक्त है. उसे विचार करना होगा कि आखिर उसकी सोच में कहां खामी है कि विरोधाभाषी आर्थिक आधार के बावजूद वह लगातार अपनी प्रासंगिकता खोते जा रही है. अब एक नजर बीजेपी को मिले वोटों पर भी डाल लेते हैं. पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की मौजूदगी शून्य से कुछ ही ज्यादा यानी करीब डेढ़ परसेंट थी. यह बात और है कि लोकसभा चुनाव आते-आते पार्टी का राज्य में वोट शेयर बढ़कर 5.7 परसेंट हो गया था.
वैसे भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आक्रामक प्रचार की शैली को भी जीत का श्रेय जाता है. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का दावा है कि उत्तर पूर्व में लोगों को पिछले चार साल मे पहली बार अहसास हो रहा है कि उनका विकास हो रहा है. इसलिए वह भारतीय जनता पार्टी में भरोसा जता रहा है.
त्रिपुरा की जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के एक और नेता का कद कुछ और बढ़ जाएगा. गुजरात के बाद त्रिपुरा में भी भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना चेहरा बनाया था. त्रिपुरा के एक-तिहाई मतदाता उस नाथ संप्रदाय के अनुयायी हैं, योगी जिनकी गुरुगद्दी के महंत हैं. त्रिपुरा की जीत के बाद अब पार्टी उनका इस्तेमाल कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में भी जरूर करेगी. वैसे योगी आदित्यनाथ वहां के कई दौरे कर भी चुके हैं. त्रिपुरा में बीजेपी की जीत को केरल की हार का बदला भी कहा जा सकता है. केरल में पंद्रह परसेंट वोट पाने वाली बीजेपी एक ही विधायक विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो पाई थी. हालांकि छह सीटों पर एक से लेकर पांच सौ वोटों से उसके प्रत्याशी पराजित हुए थे. अब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को सोचना होगा कि पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा का उसका गढ़ क्यों ढह गया? पश्चिम बंगाल में तो वो अब तीसरे स्थान की तरफ खिसकती नजर आ रही है. इसलिए उसके लिए बड़े चिंतन का वक्त है. उसे विचार करना होगा कि आखिर उसकी सोच में कहां खामी है कि विरोधाभाषी आर्थिक आधार के बावजूद वह लगातार अपनी प्रासंगिकता खोते जा रही है. अब एक नजर बीजेपी को मिले वोटों पर भी डाल लेते हैं. पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की मौजूदगी शून्य से कुछ ही ज्यादा यानी करीब डेढ़ परसेंट थी. यह बात और है कि लोकसभा चुनाव आते-आते पार्टी का राज्य में वोट शेयर बढ़कर 5.7 परसेंट हो गया था.
लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनावों में पलटाई यानी बदलाव का नारा देने वाली पार्टी ने चुनावी और राजनीतिक परिदृश्य ही बदलकर रख दिया है. उसके गठबंधन को 49.6 प्रतिशत वोट मिला है, यानी आधे से कुछ ही कम, जिसमें बीजेपी की हिस्सेदारी 41.7 परसेंट है. तो उसके सहयोगी इंडियन पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा को 7.9 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि लोकसभा चुनावों में 64 परसेंट वोट पाने वाला सीपीएम गठबंधन करीब 45 परसेंट वोटों पर सिमट गया है. राष्ट्रीय मीडिया में माना जाने लगा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को गंभीरता से लिया जाने लगा है. लेकिन उत्तर पूर्व में कांग्रेस बड़ी ताकत रही है, वहां सिर्फ मेघालय में वो बड़ा दल बन पाया है, इसलिए चिंतन तो राहुल गांधी को भी करना होगा कि कांग्रेस की सोच में आखिर कैसा विचलन शुरू हुआ कि वो लगातार चुनावी अखाड़ों में बीजेपी से मात खा रही है. त्रिपुरा में जीत और नगालैंड में बढ़त के बाद बीजेपी विरोधी विपक्ष को भी माथापच्ची करनी चाहिए कि वो नरेंद्र मोदी को आखिर घेर पाने में कामयाब क्यों नहीं हो पा रहा है. चूंकि लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है, इसलिए अब बीजेपी के सामने त्रिपुरा की जनता को दिए तमाम वादे निभाने की चुनौती होगी. राज्य में ढाई दशक बाद सत्ता परिवर्तन हुआ है उम्मीद की जानी चाहिए कि नई सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करेगी.
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