Thursday, March 15, 2018

सिंधिया बनाम शिवराज

यूं तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपचुनावों में जीत दर्ज करने के बाजीगर माने जाते हैं। और इस चुनाव को सत्ता का सेमीफाइनल माना जाने लगा। कोलारस और मुंगावली विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. सीएम शिवराज की प्लानिंग थी कि वह कांग्रेस के गढ़ में ज्योतिरादित्य को चित करें. इसी के चलते सीएम ने खुद प्रचार का मोर्चा संभाल रखा था. दूसरी तरफ राहुल गांधी यूथ ब्रिगेड के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने चुनौती स्वीकार की और उनके सामने शिवराज के हर दांव फेल साबित हुए हैं.   मुंगावली चुनाव दो बडे नेताओं की निजी अस्मिता का चुनाव था। शिवराज सिंह चौहान के बेटे ने जिस जंग की शुरूआत की वो लगातार दो महीने से जारी थी। राज्य के मुख्यमंत्री को एक विधानसभा में दो दर्जन से अधिक सभाएं करनी पडी। सब विधायक और पूरा मंत्रिमंडल जोरदार प्रचार में शामिल था वहीं सिंधिया को कांग्रेस नेताओं से ही खतरा था। ज्योतिरादित्य ने साबित किया गढ़ में कैसे घेरे जाते हैं विरोधी. पूरे चुनाव प्रचार में शिवराज ने 'लाड़ली लक्ष्मी' और 'मुख्यमंत्री तीथदर्शन योजना' की उपलब्धियां गिनाने के बजाय सिंधिया पर निशाने साधने में लगे रहे.
इसके जवाब में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्थानीय मुद्दों को उठाने के साथ जातीय समीकरण को साधने में पूरी ताकत झोंकी. सिंधिया की रणनीति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुंगावली क्षेत्र में पड़ने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी शासकीय महाविद्यालय के प्रिंसिपल के सस्पेंड किए जाने की घटना को भी उन्होंने राजनीतिक रंग दे दिया था. दरअसल, प्रिंसिपल बीएल अहिरवार के सस्पेंड किए जाने से वहां का युवा नाराज था. ज्योतिरादित्य ने इसे भांपते हुए युवाओं के साथ धरने पर बैठ गए थे, जिसके बाद सरकार को अपना फैसला पलटना पड़ा था. इसके अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अशोक नगर जिले की मुंगावली और शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा सीट पर यहां जाति आधारित समूहों के साथ कई बार सीधा संवाद किया. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सिंधिया सकारात्मक एजेंडा रखा.
शिवराज जहां सिंधिया पर पर्सनल अटैक करने में लगे थे, वहीं सिंधिया लगातार ये कहते रहे कि वे राज्य में बदलाव के लिए आए हैं. वे चाहते हैं कि कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में आए ताकि गांव के लोगों की हर इच्छा को पूरा किया जाएगा. मैंने ये चुनाव पर कडी नजर रखी स्थानीय मीडिया के माध्यम से। ऐसे भाषण होते कि जिस जगह पहले सिंधिया सवाल करते तो 20 मिनट बाद शिवराज सिंह चौहान आकर एक एक वाक्य का जवाब देते। कभी कभी तो एक दीवार के फासले पर ही दोनों की  जुबानी जंग एक साथ शुरू हो जाती थी। खूब तंज शायरी सब प्रयोग हुआ। कांग्रेस में भितरघात हो सकता था। क्योंकि ये उनके क्षेत्र के चुनाव थे और अगर कांग्रेस हार जाती तो विधानसभा चुनाव में उनके मुख्यमंत्री पद का दावा कमजोर होता। ये बात राहुल गांधी को भी पता है कि सिंधिया को कमान देने से राहुल को भी कम मेहनत करनी पडेगी वो खुद जोरदार  चुनाव लडेंगे। लेकिन सोनिया गांधी कमलनाथ को नकारने से कतरा रही हैं इसीलिये अभी कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने दोनों से जीत के फार्मूले मांगे थे। सिंधिया को घेरकर अभिमन्यु बनाने की भरपूर कोशिश की गई लेकिन वो बच निकले।

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