Thursday, March 8, 2018

महिला दिवस पर विशेष

दरअसल क्या है कि हम भारतीय लोग माँ का नाम सुनते ही बहुत जल्दी इंपैक्ट हो जाते हैं, क़ि माँ बहुत रिस्पेक्टैब्ल है, माँ की पूजा होनी चाहिए. अभी मै मां पर दो शायरी बोल दूं तो आप सब इमोशनल हो जाओगे।
लेकिन आज मैं आपको इससे उल्टी बात बताना चाहूँगा क़ि जिस समाज में माँ की बहुत पूजा होगी वहाँ महिलाओं के सम्मान की उम्मीद करना बहुत मुश्किल काम है. तभी तो हमारे ही देश में हज़ारो साल से पूजा हो रही है लेकिन फिर भी कितने % औरतें अपने अधिकार जानती हैं? कितनी समानता आ गई है?
मैं आपको इसका एक साइकॉलॉजिकल कारण बताना चाहता हूँ। असल में कोई बच्चा पैदा होने के बहुत दिनों बाद तक तो यही नहीं समझ पाता है क़ि वो और माँ दो अलग अलग जिस्म हैं. उसको कोई हाथ से थपकी देता है तो सो जाता है, उसको कोई हिलाने लगता है तो वो सो जाता है. कभी कभी वो कोई आवाज़ सुनकर सो जाता है. जबकि आप किसी बड़े आदमी के साथ ऐसा करें तो वो जाग जाएगा. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वो बच्चा खुद को माँ के पेट में ऐसे ही महसूस करता रहा है. जब उसे हिलाते हैं तो लगता है जैसे माँ के पेट में उसकी  धड़कने चल रही हैं, जो उसने पहले सुनी हुई हैं. इसलिए वो सो जाता है.
फिर काफ़ी अरसे बाद उसे पता चलता है क़ि वो और माँ तो दो अलग अलग इंसान हैं. इसीलिए उस गम को दूर करने के लिए  कोई चीज़ ढूढ़ता है, जैसे टेडी या ब्लैंकेट.......... और वो चीज हमेशा साॅफ्ट होगी, नरम होगी बिलकुल मां की तरह।
इसलिए उसके अंदर माँ को लेकर बड़ा प्यार होता है. लेकिन जब वो धीरे धीरे बड़ा होता है तो दूसरे लोगों से अपनी माँ को ह्यूमिलेट होते देखता है, कभी बाप से, तो कभी अपनी दादी से. उस बच्चे के मन में अपनी माँ के लिए बेपनाह प्यार और सम्मान होता है. वो हमेशा सोचता है कि जब वो बड़ा हो जाएगा तो माँ के लिए कुछ करेगा. फिर जब वो खुद बड़ा होता है तो खुद तो बेटा तो होता है लेकिन तबतक किसी का हसबैंड भी हो जाता है. तो उसके जो माँ के लिए पॉजिटिव इमोशंस होते हैं उसको वो भी विप बना लेता है. और दूसरी औरतो पर यूज करता है. फिर कभी अपनी वाईफ पर रोज ताने मरेगा, क़ि तुम ना मेरी माँ जैसी दाल नहीं बना पाती हो. तुम ना मेरी माँ की तरह नहीं घर संभाल पाती हो. वो अपनी माँ को एक कैरेट बना कर अपनी बीवी के सामने टांग देता है फिर वो बीवी पूरी जिंदगी वैसे ही चलती है लेकिन उस कैरेट तक नहीं पहुँच सकती है. हमारे समाज में हर माँ अपनी बहू से बेहतर खाना बनाती थी. यानी पाँच हज़ार साल से हमारे देश में खाने का स्तर नीचे जा रहा है? इसलिए ये कहना क़ि माँ की पूजा होनी चाहिए, माँ के पैरों के लिए तो जन्नत है. ये सब केवल नाटक है. जब आप बार बार कहते हैं क़ि माँ बहुत रिस्पेक्टैब्ल है तो कौन है जो रिस्पेक्टैब्ल नहीं है? बाकी औरतें? बाप के बारे में तो कोई नहीं कहता है? कि बाप की इज़्ज़त करनी चाहिए. अरे उसकी करनी पड़ेगी नहीं तो घर से निकाल देगा. करनी ही पड़ेगी. मां के पैरों तले जन्नत है तो बाप के पैरों तले जायदाद।
इसलिए माँ की बहुत इज़्ज़त करो कहना एक लाइसेंस है क़ि माँ की इज़्ज़त करो और बाकियों को छोड़ दो. और कौन सी माँ? मेरी माँ की इज़्ज़त होनी चाहिए? मेरे बच्चों की माँ की इज़्ज़त नहीं होनी चाहिए? और मेरी माँ की इज़्ज़त कब होनी चाहिए? मान लो मैं पैदा हुआ था 01 जनवरी को. तो एक सवाल का जवाब दे दो क़ि 1 जनवरी के पहले या 31 दिसंबर तक मेरी माँ इज़्ज़त के काबिल थी क़ि नहीं? अगर नहीं थी तो वो काहे रिस्पेक्टैब्ल? रिस्पेक्टैब्ल तो मैं हुआ? ये सब बकवास है. अरे हर औरत की इज़्ज़त होनी चाहिए. माँ की ही क्यों? तो जिस समाज में औरत को देवी मानने का नाटक होता है वहाँ  असलियत में कुछ और ही होता है. उदाहरण के तौर पर आप आजकल भारत माता की जय का नारा खूब सुनते हैं और आप भी लगाते होंगे. लेकिन भारत माता वो कैलेंडर में छपी खूबसूरत तिरंगा पकड़े, साडी पहने अकेली भारत माता नहीं है. वो भारत माता समाज की हर लड़की और औरत है. वो गोरी हो काली, हो मोटी हो पतली हो, ग़रीब हो अमीर हो, बूढ़ी हो या बच्ची, जींस पहने, साडी पहने या बुर्क़ा, नीता अंबानी हों या किसी मजदूर की बेटी। सबकी बराबर इज़्ज़त होनी चाहिए. ये नहीं क़ि भारत माता  की जय भी बोल दें और उनपर कमेंट्स भी पास कर दें. इसलिए मां ही नहीं हर औरत की इज्जत होनी चाहिये।

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...