#SanjuMovie #MeraWalaReview
कल रात संजू फिल्म देखी, और उसका एक निष्कर्ष निकला, क़ि राजकुमार हिरानी ने ऐसे विषय पर फिल्म बनाई जो उनकी पिछली फिल्मों के स्तर की नहीं थी, फिर भी स्क्रिप्ट लिखते समय ऐसी चतुराई दिखाई क़ि फिल्म में हक़ीकत और इमैजिनेशन का कॉकटेल कर दिया. कई सीन में इमोशन बहुत हैं, सीन ऐसे बनाए गए हैं कि हम तुरंत संजय दत्त को पसंद करने लगते हैं. इसके बाद सभी बातों में मजा आने लगता है और पूरी सहानुभूति संजय दत्त के साथ हो जाती है. जैसे वो अस्पताल वाला ही सीन है, जिसमें नरगिस कैंसर से जूझ रही हैं और बेटा ड्रग्स ले रहा है. लोग उसपर धिक्कारते थे उसे लेकिन सीन ऐसे फिल्माया कि अच्छा लगता है, और ग़लती उसकी नहीं उसको ड्रग्स के दलदल में घुसाने वाले की लगती है. मतलब संजय दत्त को पूरी तरह से मासूम दिखाने की कोशिश की है. विनी (राइटर) का उसपर बुक लिखने से मना करना और फिर लिखना एक हमदर्दी का ही सीक़वेंस है. उनके जीवन के कई ऐसे पहलू हैं जिनका फिल्म में ज़िक्र भी नहीं है. कई लोगों से उनके रिश्ते, चाहे वो हीरोइनों (माधुरी दीक्षित, रेखा और भी कई) के साथ रहे हों, या अंडरवर्ड के लोगों के साथ. किसी को धमकाना या घर के बाहर फायर करना, उनकी बेटी के साथ उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे, राजनीति में उनका करियर, बाला साहब ठाकरे से उनका और सुनील दत्त का मिलना. उन्होंने वहीं पहलू चुने जिससे यह लगे कि संजय दत्त मासूम थे और न चाहते हुए भी उलझते चले गए। कह सकते हैं क़ि 35-40 साल की जिंदगी 3 घंटे में समेटना था ड्रग्स और जेल वाले एपीसोड ने ही एक एक हाफ़ ख़त्म कर दिया है. लोग रणबीर कपूर की संजय दत्त की एक्टिंग की तारीफ कर रहे हैं. जो मुझे एवरेज ही लगी. ऐसे तो कपिल शर्मा के शो में कोई कर जाता था. आप बरफी जैसी फिल्म करने वाले रणबीर कपूर से और बेहतर की उम्मीद करते थे. एमएस धोनी में सुशांत सिंह राजपूत इससे बेहतर थे कॉपी करने में. लेकिन अंत में रणबीर कपूर को ठीक कह सकते हैं, लुक पर काफ़ी मेहनत की है उनके बुढ़ापे से लेकर जवानी तक और चरसी से लेकर वजन बढ़ने तक का रोल किया है.
इसके अलावा सुनील दत्त का रोल भी परेश रावल नहीं कर पाए, इमोशनल सीन और सब बेहतर था लेकिन बार बार लग रहा था क़ि ये सुनील दत्त नहीं परेश रावल हैं. अन्नू कपूर जैसा कोई दूसरा एक्टर और अच्छा होता. वहीं संजय दत्त को ड्रग्स देने वाले व्यक्ति का किरदार जिसने निभाया नाम नहीं पता लेकिन उसने इतने शानदार तरीके से किया है उससे आप नफरत करने लगते हैं. छोटे-छोटे रोल में अनुष्का शर्मा, दीया मिर्जा, सोनम कपूर, बोमन ईरानी, करिश्मा तन्ना, मनीषा कोइराला, ने अपना काम बढ़िया तरीके से किया है. सबसे अच्छा काम संजय दत्त के दोस्त का रोल करने वाले विकी कौशल ने किया है. फिल्म का एक गाना, कर हर मैदान फ़तेह अच्छा है. कुल मिलकर मैं 5 में से 3 स्टार ही दूँगा. अगर उनकी जिंदगी के कुछ हिस्से और दिखाए होते तो 1 स्टार और बढ़ जाता। क्योकि ये बायोपिक है। बाकी का आधा स्टार परेश रावल के हिस्से काट लिया.
इसे संजय दत्त का सफाइनामा कह सकते हैं. एक चीज़ इससे किसी भी लत में डूबे लोगों सीखने लायक है क़ि अगर आप ज़िद कर लें तो हर चीज़ छोड़ सकते हैं. केवल एक बार बात दिल को लग जाए. वहीं दूसरी तरफ इसमें एक पुरषवादी समाज की हक़ीकत भी नज़र आती है. कोई आदमी ये क़ुबूल करता है कि वो 308 लड़कियों के साथ सोया है, लेकिन हम सिर्फ़ हंस देते हैं. और अगर यही बात किसी महिला ने कही होती तो रंडी वैश्या ना जाने क्या क्या कहकर थूकने लगते उसपर. लेकिन यहाँ हंसकर आगे बढ़ गए. मैं ना इसे राजकुमार हिरानी की बेस्ट फिल्म कहूँगा, ना रणबीर कपूर की, और संजय दत्त का तो सवाल ही नहीं.
कल रात संजू फिल्म देखी, और उसका एक निष्कर्ष निकला, क़ि राजकुमार हिरानी ने ऐसे विषय पर फिल्म बनाई जो उनकी पिछली फिल्मों के स्तर की नहीं थी, फिर भी स्क्रिप्ट लिखते समय ऐसी चतुराई दिखाई क़ि फिल्म में हक़ीकत और इमैजिनेशन का कॉकटेल कर दिया. कई सीन में इमोशन बहुत हैं, सीन ऐसे बनाए गए हैं कि हम तुरंत संजय दत्त को पसंद करने लगते हैं. इसके बाद सभी बातों में मजा आने लगता है और पूरी सहानुभूति संजय दत्त के साथ हो जाती है. जैसे वो अस्पताल वाला ही सीन है, जिसमें नरगिस कैंसर से जूझ रही हैं और बेटा ड्रग्स ले रहा है. लोग उसपर धिक्कारते थे उसे लेकिन सीन ऐसे फिल्माया कि अच्छा लगता है, और ग़लती उसकी नहीं उसको ड्रग्स के दलदल में घुसाने वाले की लगती है. मतलब संजय दत्त को पूरी तरह से मासूम दिखाने की कोशिश की है. विनी (राइटर) का उसपर बुक लिखने से मना करना और फिर लिखना एक हमदर्दी का ही सीक़वेंस है. उनके जीवन के कई ऐसे पहलू हैं जिनका फिल्म में ज़िक्र भी नहीं है. कई लोगों से उनके रिश्ते, चाहे वो हीरोइनों (माधुरी दीक्षित, रेखा और भी कई) के साथ रहे हों, या अंडरवर्ड के लोगों के साथ. किसी को धमकाना या घर के बाहर फायर करना, उनकी बेटी के साथ उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे, राजनीति में उनका करियर, बाला साहब ठाकरे से उनका और सुनील दत्त का मिलना. उन्होंने वहीं पहलू चुने जिससे यह लगे कि संजय दत्त मासूम थे और न चाहते हुए भी उलझते चले गए। कह सकते हैं क़ि 35-40 साल की जिंदगी 3 घंटे में समेटना था ड्रग्स और जेल वाले एपीसोड ने ही एक एक हाफ़ ख़त्म कर दिया है. लोग रणबीर कपूर की संजय दत्त की एक्टिंग की तारीफ कर रहे हैं. जो मुझे एवरेज ही लगी. ऐसे तो कपिल शर्मा के शो में कोई कर जाता था. आप बरफी जैसी फिल्म करने वाले रणबीर कपूर से और बेहतर की उम्मीद करते थे. एमएस धोनी में सुशांत सिंह राजपूत इससे बेहतर थे कॉपी करने में. लेकिन अंत में रणबीर कपूर को ठीक कह सकते हैं, लुक पर काफ़ी मेहनत की है उनके बुढ़ापे से लेकर जवानी तक और चरसी से लेकर वजन बढ़ने तक का रोल किया है.
इसके अलावा सुनील दत्त का रोल भी परेश रावल नहीं कर पाए, इमोशनल सीन और सब बेहतर था लेकिन बार बार लग रहा था क़ि ये सुनील दत्त नहीं परेश रावल हैं. अन्नू कपूर जैसा कोई दूसरा एक्टर और अच्छा होता. वहीं संजय दत्त को ड्रग्स देने वाले व्यक्ति का किरदार जिसने निभाया नाम नहीं पता लेकिन उसने इतने शानदार तरीके से किया है उससे आप नफरत करने लगते हैं. छोटे-छोटे रोल में अनुष्का शर्मा, दीया मिर्जा, सोनम कपूर, बोमन ईरानी, करिश्मा तन्ना, मनीषा कोइराला, ने अपना काम बढ़िया तरीके से किया है. सबसे अच्छा काम संजय दत्त के दोस्त का रोल करने वाले विकी कौशल ने किया है. फिल्म का एक गाना, कर हर मैदान फ़तेह अच्छा है. कुल मिलकर मैं 5 में से 3 स्टार ही दूँगा. अगर उनकी जिंदगी के कुछ हिस्से और दिखाए होते तो 1 स्टार और बढ़ जाता। क्योकि ये बायोपिक है। बाकी का आधा स्टार परेश रावल के हिस्से काट लिया.
इसे संजय दत्त का सफाइनामा कह सकते हैं. एक चीज़ इससे किसी भी लत में डूबे लोगों सीखने लायक है क़ि अगर आप ज़िद कर लें तो हर चीज़ छोड़ सकते हैं. केवल एक बार बात दिल को लग जाए. वहीं दूसरी तरफ इसमें एक पुरषवादी समाज की हक़ीकत भी नज़र आती है. कोई आदमी ये क़ुबूल करता है कि वो 308 लड़कियों के साथ सोया है, लेकिन हम सिर्फ़ हंस देते हैं. और अगर यही बात किसी महिला ने कही होती तो रंडी वैश्या ना जाने क्या क्या कहकर थूकने लगते उसपर. लेकिन यहाँ हंसकर आगे बढ़ गए. मैं ना इसे राजकुमार हिरानी की बेस्ट फिल्म कहूँगा, ना रणबीर कपूर की, और संजय दत्त का तो सवाल ही नहीं.
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