Thursday, November 29, 2018

चुनाव के समय ही भगवान राम क्यों याद आते हैं?

एक बार अयोध्या फिर से युद्ध भूमि बनने जा रही है. मर्यादा पुरुषोत्तम माने जाने वाले श्री राम ने अपने जीवन में तो अयोध्या में कोई युद्ध नहीं लड़ा, लेकिन उनके नाम का यशोगान करने वाले भक्तों ने इतनी हुंकारें भरीं कि अयोध्या भयभीत लगने लगी. सरकार को कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए बड़ी तादाद में सुरक्षा कर्मी तैनात करने पड़े. शहर में धारा 144 के अलावा पीएसी की 48 कंपनियां, एक एडीजी, एक डीआईजी, तीन एसएसपी, 10 एसपी, 21 डीएसपी, 160 इंस्पेक्टर, 1000 कांस्टेबल, रैपिड एक्शन फोर्स की पांच कंपनियां और एटीएस के कमांडो तैनात किए गए. हालात पर निगरानी के लिए एक दर्जन ड्रोन भी लगाए गए थे. इसके अलावा जिले की पुलस तो थी ही.
इस बात की भी आशंका जाहिर की गई थी कि भीड़ का फायदा उठा कर किसी तरह की आतंकवादी वारदात करने का प्रयास किया जा सकता है. इस वजह से भी सुरक्षा जांच और बैरीकेडिंग की व्यवस्था को सतर्क किया गया था. भीड़ के दावे और तेवरों से आशंकित होकर कुछ परिवारों ने अयोध्या में अपने घर भी छोड़ दिए थे और बहुत से लोगों ने घरों में 10-15 दिन तक खाने पीने का पक्का इंतजाम भी कर लिया था. आशंकाएं इतनी बढ़ गई थीं कि पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को अयोध्या में फौज की तैनाती की जरूरत तक महसूस होने लगी थी. उन्होंने अयोध्या में संभावित अनहोनी को टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट को स्थिति का स्वतः संज्ञान लेने तक की बात कह डाली थी.
शुक्र है अयोध्या ने यह सब आशंकाएं निर्मूल कर दीं. वहां अब जीवन फिर से सामान्य हो गया है. लेकिन सवाल अभी वही है कि अयोध्या में जो कुछ हुआ उसका हासिल क्या है. क्या इस सब की कोई जरूरत थी भी? क्या इस तरह के आयोजन राम मंदिर विवाद का कोई स्थायी समाधान सुझा सकते हैं, या फिर यह सब अयोध्या को लेकर बरसों से खेले जा रहे राजनीतिक खेल का ही हिस्सा है?
‘जा की रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’. रामचरितमानस की ये पंक्तियां अयोध्या में हुई ताजा हलचलों पर बहुत सटीक बैठती हैं. अयोध्या में मुख्य रूप से दो कार्यक्रम आयोजित हुए. एक शिव सेना का ‘आशीर्वाद समारोह’ और दूसरा विश्व हिन्दू परिषद की ‘धर्मसभा’ शिव सेना का कार्यक्रम एक दिन पहले हुआ और इसके लिए पहली बार चार्टेड प्लेन से अयोध्या पहुंचे शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राम की मूरत के बहाने महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी ढीली पड़ती पकड़ को मजबूत करने की भरपूर कोशिश की.
उद्धव ने शिव सेना को राम मंदिर आंदोलन का अगुवा बताया. केंद्र सरकार को चार वर्ष से सोता हुआ कुंभकर्ण कहा और यह भी कहा कि अगर राम मंदिर के लिए कानून याअध्यादेश लाया जाता है तो शिव सेना उसका खुला समर्थन करेगी. लेकिन जब राम लला के दर्शन करते वक्त मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास ने उनसे कहा कि ‘आप तोड़े हो तो मंदिर बनवाओ’ तो बगलें झांकते हुए उद्धव ठाकरे इतना ही कह पाये ‘जल्दी हो जाएगा, बिल्कुल बनेगा.’ 
केंद्र सरकार को कुंभकर्ण कहने के बावजूद उद्धव ठाकरे के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं था कि इतने समय तक उन्होंने क्या किया और वे अदालती फैसले पर भरोसा क्यों नहीं कर रहे. बहरहाल मुंबई से आये हजारों शिवसैनिकों को अयोध्या लाकर उद्धव ने खुद को कट्टर हिंदूवादी छवि में पुर्नस्थापित करने का प्रयास करते हुए ‘पहले मंदिर फिर सरकार’ के नारे के साथ अयोध्या से विदाई ली. बाकी हुंकार अब वे मुंबई में छोड़ेंगे.
इसके बाद बारी विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की थी जिसे परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी का पूरा सहयोग मिल रहा था. शिव सेना आक्रामक रुख दिखा कर चली गई तो विहिप की मजबूरी हो गई थी कि उसका रुख और अधिक आक्रामक दिखे. पांच घंटे के उसके कार्यक्रम में 80-90 हजार की भीड़ जुट भी गई हालांकि दावा साढ़े तीन लाख का था. इस धर्म सभा में अपनी-अपनी भावना के मुताबिक सबने अपनी अपनी मूरत गढ़ी. विश्व हिंदू परिषद की ध्वनि थी कि मुस्लिम पक्ष अपना दावा छोड़ दे नहीं तो काशी व मथुरा के लिए भी रण होगा. अध्यादेश पर तो कोई स्पष्ट नहीं हुआ, लेकिन चित्रकूट के स्वामी रामभद्राचार्य ने दावा किया कि दिसंबर के बाद केंद्र सरकार मंदिर निर्माण का रास्ता देने जा रही है और यह बात उन्हें एक केंद्रीय मंत्री ने स्वयं बताई है. लेकिन जब इस पर विवाद हुआ तो रामभद्राचार्य मंच छोड़ कर ही चले गए.
विहिप ने मंदिर मुद्दे को 2019 के लोकसभा चुनाव की प्रस्तावना बनाने की कोशिश में बड़े-बड़े दावे किए. लेकिन उनकी हवा राम जन्म भूमि मामले में पक्षकार निर्माेही अखाड़े के महंत दिनेंद्र दास ने यह कहकर निकाल दी कि ‘विहिप होती कौन है, इस मामले में पक्षकार हम हैं और हमने सुप्रीम कोर्ट में पूरी भूमि पर दावा किया है.’ ऐसा ही कुछ एक अन्य पक्षकार महंत धर्मदास का कहना है. वे कहते हैं, ‘पार्टी नहीं हैं तो किस हैसियत से जमीन मांग रहे हैं. जब चुनाव आते हैं तो शिगूफा छोड़ने अयोध्या आ जाते हैं.’
पूरी जमीन के विश्व हिंदू परिषद के दावे पर प्रतिक्रिया में मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी कहते हैं, ‘विहिप न तो देश की सरकार है, न पक्षकार. सबसे बड़ा सुप्रीम कोर्ट है’. अयोध्या में कई बरस तक राम लला की पोशाक सिलने वाले सादिक कहते हैं, ‘बाहरी भीड़ यहां हमेशा दहशत लाती है. रामलला तो हमारे भी प्यारे हैं, इमामे हिंद हैं. मगर समाजवादी पार्टी के आजम खान चाहते हैं कि अयोध्या में हालात पर यूएनओ नजर रखे. उन्हें अपने लोकतंत्र पर यकीन नहीं है.
आजम खान पहले भी इस तरह का एक पत्र लिख चुके हैं. उन जैसे लोग यूएनओ जाने जैसी हरकतें तो कर सकते हैं, लेकिन विवाद के समाधान के लिए पहल करते कभी नहीं दिखाई देते. मूरत उन्हें भी अपनी भावना की तरह ही दिखती है और वह भावना सत्ता की देहरी तक ही जाती दिखती है. ठीक आजम खान की ही तरह बीजेपी के विधायक सुरेंद्र सिंह भी मंदिर के लिए संविधान को ही हाथ में लेने की धमकी देते हुए कोई संकोच नहीं करते. उनकी मूरत भी उन्हीं की भावना की तरह है जिसमें संविधान या लोकतंत्र के लिए जगह नहीं दिखती.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर निर्माण में कांग्रेस को बाधा बताते हुए पार्टी पर सुप्रीम कोर्ट के जजों को डराने का आरोप लगाते हैं तो कांग्रेस वोट साधने के लिए मंदिर और मूरत पर कुछ भी बोलने से डर रही है. उत्तर प्रदेश सरकार की भावना में मूरत 151 मीटर ऊंची होनी है. इसके ऊपर 20 मीटर का छत्र और 50 मीटर का आधार होना है. यानी उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की मूरत सारी मूरतों से ऊंची होने वाली है. हालांकि योगी सरकार की इस घोषणा के अगले ही दिन वाराणसी में हुए एक कथित धर्मसंसद में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मौजूदगी में अयोध्या में सबसे ऊंची राम प्रतिमा के प्रस्ताव की निंदा कर दी गयी. यानी योगी सरकार वाली मूरत भी सबकी भावनाओं की मूरत बन पायेगी इसमें संदेह है.
भावनाओं के इस खेल में मूरतें तो सब अपनी अपनी तरह गढ़ रहे हैं, लेकिन राजवंशों की तरह कई पार्टियों को सत्ता तक पहुंचाने वाली अयोध्या आज भी किसी अभिशप्त नगरी की तरह अपनी सूरत बदलने का इंतजार कर रही है. सरयू में पानी भी उसी तरह बह रहा है और अयोध्या का जीवन भी यथावत है. अयोध्या का एक और बुरा स्वप्न बीत गया, लेकिन छह दिसंबर की आहट उसे फिर डराने लगी है.

मध्य प्रदेश में बीजेपी या काँग्रेस

मध्यप्रदेश में तय हो गया कि अगले पांच साल किसका राज रहेगा- महाराज का या फिर शिवराज का. लोगों की पसंद ईवीएम में कैद हो गई है. पूरे राज्य में लोगों में मतदान के प्रति खासा उत्साह देखने को मिला. हालांकि सुबह मतदान की रफ्तार धीमी थी लेकिन दोपहर होते होते लोगों में जोश आया. कई जगहों से ईवीएम और वीवीपैट मशीनें खराब होने की शिकायतें आईं. चुनाव आयोग के मुताबिक मध्यप्रदेश में रिकॉर्ड 75% मतदान हुआ है. यह आंकड़ा बढ़ भी सकता है. 2013 के विधानसभा चुनाव में 72.13 फीसदी मतदान हुआ था जबकि 2008 में 69.52 प्रतिशत, 2003 में 67.41 प्रतिशत, 1998 में 60.21 प्रतिशत, 1993 में 60.17 प्रतिशत वोट डाले गए थे. यानी करीब सात फीसदी अधिक मतदान ने बीजेपी को तीन चौथाई बहुमत दिलाया था. इसके बाद क्रमश करीब दो और तीन फीसदी की मामूली बढ़ोतरी हुई और बीजेपी भारी बहुमत से चुनाव जीत कर सरकार बचाने में कामयाबी रही. इतने भारी मतदान के बाद विश्लेषण शुरू हो गया है कि इसका फायदा किसे मिलेगा? बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही अपनी-अपनी जीत का दावा कर रही हैं. वैसे आज सुबह ही बीजेपी ने राज्य के तमाम अखबारों में विज्ञापन देकर 90 प्रतिशत मतदान करने की अपील की थी. यह जानबूझ कर किया गया ताकि कमलनाथ के उस बयान की लोगों को याद दिलाई जा सके जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर मुस्लिम 90 फीसदी मतदान नहीं करेंगे तो कांग्रेस को नुकसान होगा. हालांकि मध्य प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं होता है फिर भी बीजेपी को लगता है कि कमलनाथ का यह बयान हिंदुओं को एकजुट कर अपने घरों से निकल कर वोट डालने के लिए काफी है. इसीलिए ये विज्ञापन छपवाए गए.
अधिक मतदान एक नमूना 2003 में देखने को मिला था जब 1998 की तुलना में सात फीसदी से भी अधिक मतदान हुआ था और दस साल की दिग्विजय सिंह सरकार को बीजेपी ने तीन-चौथाई बहुमत पाकर उखाड़ फेंका था. अधिक मतदान सत्ता विरोधी लहर की पहचान बन गया था. बाद के दो चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ा लेकिन इसका अनुपात राज्य में मतदाताओं की बढ़ती संख्या के हिसाब से ही रहा. इन दोनों ही चुनावों में भी बीजेपी ने जबर्दस्त बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की. इस बार पिछली बार की तुलना में 6 से आठ प्रतिशत तक अधिक मतदान का अंदाज़ा है. बीजेपी का दावा है कि यह सरकार विरोधी मतदान नहीं है क्योंकि 2003 में जहां दिग्विजय बेहद अलोकप्रिय थे, वहीं शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है. उधर, कांग्रेस का कहना है कि यह भारी मतदान साफ दिखाता है कि राज्य में बीजेपी विरोधी लहर चल रही है जो शिवराज सरकार को कुर्सी से उतार देगी.

इस बार कांग्रेस बीजेपी को कड़ी टक्कर देती दिख रही है. शिवराज सिंह चौहान के पक्ष में कई बातें हैं तो कुछ उनके खिलाफ भी जा रही हैं.

जो बातें उनके पक्ष में जाती हैं...
- लोगों में बेहद लोकप्रिय
- बिजली, सड़क, पानी, सिंचाई, लोक कल्याण के मुद्दों पर बेहतरीन प्रदर्शन
- बीजेपी का संगठन, आरएसएस का साथ
- कृषि विकास दर में वृद्धि और उपज में बढ़ोतरी
- महिलाओं का साथ

लेकिन कई बातें उनके खिलाफ भी हैं, मसलन...
- लोगों में ऊब, परिवर्तन की चाह
- उपज का सही मूल्य न मिलने से किसानों में नाराजगी
- किसानों की कर्ज माफी का कांग्रेस का वादा
- बेरोजगारी से युवाओं में गुस्सा
- बढ़ता भ्रष्टाचार, ध्वस्त व्यवस्था

कांग्रेस यह चुनाव अब नहीं तो कभी नहीं के अंदाज में लड़ी है. हालांकि गुटबाजी और टिकटों के गलत बंटवारे की वजह से कांग्रेस को नुकसान भी उठाना पड़ रहा है. शिवराज के मुकाबले कोई मुख्यमंत्री चेहरा न देना भी कांग्रेस की रणनीतिक भूल बताया जा रहा है. कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच प्रतिस्पर्धा और दिग्विजय सिंह की मौन भूमिका भी कांग्रेस के पक्ष में नहीं है. इस चुनाव में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों ही खुल कर सामने नहीं आए हैं और चुनावों में राष्ट्रीय स्तर के बजाय राज्य स्तर या स्थानीय मुद्दे ही छाए रहे हैं. आज के मतदान में लोकतंत्र के कई रंग भी देखने को मिले हैं. अपने अलग अंदाज के लिए चर्चा में रहने वाले बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय बग्घी में बैठ कर वोट डालने गए तो वहीं शिवराज सिंह चौहान ने भी अपने परिवार के साथ वोट डाला. कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी अपने अपने इलाकों में वोट डाला है. युवाओं और बुजुर्गों में समान रूप से मतदान के लिए उत्साह देखने को मिला. तो ऊंट किस करवट बैठेगा? इसका जवाब 11 दिसंबर को मिलेगा.

Monday, November 19, 2018

मराठा आरक्षण

महाराष्ट्र सरकार ने नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मराठा समुदाय के लोगों को आरक्षण देने की घोषणा की है. रविवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है. मराठा समुदाय आरक्षण को लेकर दो दशकों से आंदोलन कर रहा था और लगभग महाराष्ट्र भर में 58 रैली की गई थी. मुख्यमंत्री फड़नवीस ने कहा कि मराठा समुदाय को एसईबीसी (सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग) के तहत अलग से आरक्षण दिया जायेगा. हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि मराठा समुदाय को कितने प्रतिशत आरक्षण मिलेगा. सोमवार को विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले रविवार को हुई कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री फडणवीस ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, ‘हमने नवनिर्मित श्रेणी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग के तहत मराठा समुदाय आरक्षण देने का निर्णय लिया है. भारतीय संविधान में किसी समुदाय के लिए आरक्षण को बढ़ाने के लिए पर्याप्त प्रावधान है, बशर्ते इसका सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ापन स्थापित हो.’
उन्होंने यह भी कहा कि मराठा समुदाय को अलग से आरक्षण देने का निर्णय इसलिए भी लिया गया ताकि इसका प्रभाव अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के कोटे पर न पड़े और इसके अलावा संवैधानिक और क़ानूनी बाधा न उत्पन्न हो. ‘मराठा समुदाय को स्वतंत्र श्रेणी यानी अलग से आरक्षण देने का सरकार का निर्णय है और इसका ओबीसी आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है. ये आरक्षण किसी और के हिस्से से काटकर नहीं दिया जा रहा है.’
यह बताया जा रहा है कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र में फड़नवीस सरकार इस जुड़े बिल को सदन में पेश करेगी. वर्तमान में महाराष्ट्र में कुल आरक्षण 52 प्रतिशत है. अनुसूचित जातियों के लिए 13 प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियों के लिए 7 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए 19 प्रतिशत, विशेष पिछड़ा वर्गों के लिए 2 प्रतिशत, विमुक्ता जाति के लिए 3 प्रतिशत, घुमंतू जनजाति-बी के लिए 2.5 प्रतिशत, घुमंतू जनजाति-सी (धनगर) के लिए 3.5 प्रतिशत और घुमंतू जनजाति-डी (वंजारी) के लिए 2 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है. अब तक मराठा समुदाय की तरफ से 16 प्रतिशत आरक्षण की मांग की गई है, सरकार की ओर से एक कैबिनेट स्तरीय  उप-समिति का गठन किया है, जो इस बारे में निर्णय लेगी. 50 प्रतिशत तक आरक्षण सीमित करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बारे में पूछे जाने पर फडणवीस ने कहा, ‘भारतीय संविधान में आरक्षण कोटा को सीमित रखने के लिए कोई प्रावधान नहीं है. इसके उलट, जब किसी समुदाय को दस्तावेजों के आधार पर सामने रखा जाता है, तब संविधान उन्हें अलग से अपवाद स्वरूप कोटा देता है.’ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने तमिलनाडु, जहां 69 प्रतिशत आरक्षण है, की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वहां इस आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, लेकिन शीर्ष अदालत ने आरक्षण पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई है. महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की जनसंख्या लगभग 33 प्रतिशत है और महाराष्ट्र की राजनीति में इस समुदाय का दबदबा है. बीते गुरुवार दी गयी राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 37.28 मराठा गरीबी रेखा के नीचे हैं, जबकि आरक्षण के लिए न्यूनतम आधार 25 प्रतिशत को माना जाता है. यदि किसी समुदाय के 30 प्रतिशत से ज़्यादा लोग कच्चे मकान में रहते हैं, तो उसे सामाजिक पिछड़ा माना जाता है, मराठा समुदाय के मामले में ये आंकड़ा 60 से 65 प्रतिशत है. शिक्षा में भी मराठा समुदाय राष्ट्रीय साक्षरता सूचकांक में काफ़ी पीछे है. इस समुदाय में आत्महत्या का आंकड़ा, विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में सबसे ज्यादा है. मराठों ने दो दशक तक कोटा की मांग की है, लेकिन मार्च 2016 से मराठा क्रांति मोर्चा द्वारा 58 शांत रैलियों के माध्यम से सड़क पर जाने के बाद उनके अभियान को गति मिली. आंदोलन के दूसरे चरण में पूरे राज्य में हिंसा और आठ आत्महत्याएं हुई थी. मराठा क्रांति मोर्चा के समन्वयक, राजेंद्र कोंडेन ने सरकार के निर्णय की तारीफ करते हुए कहा, ‘यह एक ऐतिहासिक निर्णय है. मराठा आरक्षण मांग कई दशकों तक लंबित था. सरकार को अब इस प्रक्रिया को आगे ले जाना चाहिए और कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया पूरा करने के बाद जल्द से जल्द इस लागू करना चाहिए.’ वहीं ओबीसी क्रांति परिषद के प्रमुख अनिल महाजन ने कहा, ‘चूंकि सरकार ने एक अलग श्रेणी के तहत मराठा को आरक्षण देने का फैसला किया है, हमारी सरकार से कोई शिकायत नहीं है. हमारी चिंता बस यह थी कि ओबीसी कोटा बरकरार रहना चाहिए.’ सदन में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस नेता राधाकृष्ण विखे-पाटिल ने कहा, ‘हम कमीशन की रिपोर्ट का समर्थन करने और मराठों को एक विशेष श्रेणी के तहत आरक्षण देने के सरकार के फैसले का स्वागत करते हैं. लेकिन यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसे किसी भी कानूनी चुनौती के बिना लागू किया जाए.’ 

क्या अजीत जोगी कांग्रेस को नुकसान पहुँचा पाएँगे?

छत्तीसगढ़ में दूसरे चरण के मतदान से पहले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और बसपा प्रमुख मायावती ने बड़ा बयान दिया है. एक ओर, अजीत जोगी ने सूबे में नई सरकार बनाने के लिए भाजपा के साथ गठबंधन के लिए तैयार होने की बात कही है. वहीं, मायावती का कहना है कि वे विपक्ष में बैठना पसंद करेगी लेकिन, भाजपा या कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगी.
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ प्रमुख अजीत जोगी और मायावती ने चुनाव से पहले जब एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था तो माना गया कि इससे कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है. इसकी वजह उनका सतनामी संप्रदाय से आना बताया गया. इस संप्रदाय की राज्य की आबादी में करीब 12 फीसदी की हिस्सेदारी है. अजित जोगी का बिलासपुर, जांजगीर-चांपा और दुर्ग के इलाके में प्रभाव माना जाता है. साथ ही, यह भी माना गया कि पूर्व कांग्रेसी होने की वजह से वे अपनी पुरानी पार्टी के लिए ‘वोट कटुआ’ साबित होंगे. वहीं, पिछले चुनावों में बसपा का वोट शेयर चार से सात फीसदी रहा है. सो ये सभी समीकरण मिलकर कांग्रेस का खेल बिगाड़ और भाजपा का बना सकते हैं.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी इस बात को कई बार दुहरा चुके हैं कि अजीत जोगी और मायावती के गठबंधन का असर कम से कम 30 सीटों पर होगा. साथ ही, उनका कहना था कि इसकी वजह से भाजपा को जहां 20 फीसदी मतों का नुकसान हो सकता है. वहीं, कांग्रेस को अपने 40 फीसदी वोट गंवाने पड़ सकते हैं. उनकी इन बातों से ये संकेत मिलते हैं कि वे राज्य में सत्ता विरोधी लहर के बीच ‘जोगी फैक्टर’ के सहारे चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का रास्ता तलाश रहे हैं. हालांकि, अनुमानों से इतर जमीनी पड़ताल की बात करें तो इस गठबंधन की वजह से कांग्रेस से अधिक भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है.
अजीत जोगी का प्रभाव जिस बिलासपुर, जांजगीर-चांपा और दुर्ग इलाके में माना जाता है उसमें विधानसभा की कुल 19 सीटें हैं. इनमें से 11 पर भाजपा का कब्जा है. वहीं, कांग्रेस ने सात सीटों पर जीत दर्ज की है. हालांकि, इनमें से दो विधायक - अमित जोगी और रेणु जोगी - कांग्रेस से बाहर हो चुके हैं और इस चुनाव में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की ओर से चुनावी दंगल में हैं. साल 2013 के चुनाव में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित 10 में से नौ सीटों पर भाजपा ने कब्जा किया था. अब अगर इन सीटों पर अजीत जोगी या मायावती फैक्टर काम करता है तो कांग्रेस की तुलना में भाजपा को अधिक नुकसान पहुंचा सकता है. इसके अलावा एक फैक्टर सत्ता विरोधी रुझान का भी है. राज्य में उच्च वर्ग और मध्यम तबके को छोड़कर अलग-अलग मुद्दों पर रमन सिंह की सरकार के खिलाफ लोगों में काफी नाराजगी दिखती है. राज्य में कई लोगों का मानना है कि यह नाराजगी पिछले चुनाव में भी थी लेकिन इसके बावजूद अगर कांग्रेस अब तक अपनी चुनी हुई सरकार यहां नहीं बना पाई है तो इसकी बड़ी वजह अजीत जोगी है. इस बारे में रायगढ़ इलाके में पैकर्स का काम करने वाले रवीन्द्र यादव का कहना है, ‘अजीते जोगी जी दे दिए जो भाजपा आ गई. छत्तीसगढ़ में किसी और को लोग जानते भी नहीं थे.’ हमने जब उनसे पूछा कि क्या केवल लोग अजीत जोगी को ही जानते थे. इस पर संयुक्त मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह से लेकर रमन सिंह तक की सरकार को देखने वाले रवीन्द्र का कहना था, ‘जोगी को नहीं, पंजा को केवल जानते थे. अजीत जोगी जी आए और ऐसा उल्टा-सीधा काम किए कि भाजपा को चांस मिल गया.’ रवीन्द्र यादव की तरह कइयों का मानना है कि चुनाव में अगर कांग्रेस अजीत जोगी के साथ होती तो इससे भाजपा को ही फायदा पहुंचता.
अजीत जोगी ने चुनावी नतीजे आने से पहले ही खुद को राज्य का भावी मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है. लेकिन इस चुनाव में उनके फैसलों और बयानों से उनकी विश्वसनीयता लगातार कम होती दिख रही है. कुछ महीने पहले उन्होंने ऐलान किया कि वे विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ राजनांदगांव से ताल ठोकेंगे. इसके बाद उन्होंने कहा कि वे चुनाव नहीं लडेंगे. आखिर में कार्यकर्ताओं की इच्छा का हवाला देकर उन्होंने अपने बेटे अमित जोगी की सुरक्षित सीट मारवाही से उतरना सही समझा. और अब सत्ता विरोधी माहौल में वे भाजपा के साथ जाने की बात कहकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए दिख रहे हैं. ऐसा कहके उन्होंने भाजपा के साथ अपनी मिलीभगत के आरोपों को भी मजबूत कर दिया है. रायपुर के कारोबारी दिलीप सर्राफ का कहना है, ‘जोगी को तो भाजपा ने ही खड़ा किया है. और अगर भाजपा को बहुमत से कुछ सीटें मिलती हैं तो वह उन्हें अपने साथ ले जा सकती हैं.’ ऐसे में कई मतदाताओं का मानना है कि अजीत जोगी के साथ जाने का मतलब सत्ता विरोधी रूझान को कमजोर करना होगा. अजीत जोगी को न केवल विश्वसनीयता बल्कि अपनी पहचान के संकट से भी जूझना पड़ रहा है. करीब तीन दशक तक कांग्रेसी नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने के बाद अब उनके लिए इससे पीछा छुड़ाना भी मुश्किल हो रहा है. सूबे के गांव-देहात में मतदाताओं की बड़ी संख्या उन्हें ‘पंजा छाप वाले नेता’ के तौर पर ही जानते हैं. ऐसे में उनके कई समर्थक उन्हें पंजा छाप वाला समझकर ही कांग्रेस के मतों की संख्या में बढ़ोतरी कर सकती है. कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर वाली सीटों पर यह वोट भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है.
अजीत जोगी पर अपने फायदे के लिए पार्टी उम्मीदवारों को ही चुनाव में मात देने के लिए हर तरह की तिकड़मबाजी करवाने के आरोप लगते रहे हैं. 2013 में एक माओवादी हमले में जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं - महेंद्र कर्मा, विद्याचरण शुक्ल और नंद कुमार पटेल - की मौत हुई थी तो इसके पीछे भी अजीत जोगी का नाम होने की बात कही गई थी. ‘जोगी परिवार को लेकर कांग्रेसियों के मन में भी बहुत डर भरा रहता है कि पता नहीं वे क्या कर दें.’

इंदिरा गाँधी की मौत के दिन

30 अक्तूबर 1984 की दोपहर इंदिरा गांधी ने जो चुनावी भाषण दिया, उसे हमेशा की तरह उनके सूचना सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद ने तैयार किया था. लेकिन अचानक उन्होंने तैयार आलेख से अलग होकर बोलना शुरू कर दिया. उनके बोलने का तेवर भी बदल गया. इंदिरा गांधी बोलीं, "मैं आज यहाँ हूँ. कल शायद यहाँ न रहूँ. मुझे चिंता नहीं मैं रहूँ या न रहूँ. मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है. मैं अपनी आख़िरी सांस तक ऐसा करती रहूँगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मज़बूत करने में लगेगा." कभी-कभी नियति शब्दों में ढलकर आने वाले दिनों की तरफ़ इशारा करती है. भाषण के बाद जब वो राजभवन लौटीं तो राज्यपाल बिशंभरनाथ पांडे ने कहा कि आपने हिंसक मौत का ज़िक्र कर मुझे हिलाकर रख दिया. इंदिरा गाँधी ने जवाब दिया कि वो ईमानदार और तथ्यपरक बात कह रही थीं. उस रात इंदिरा जब दिल्ली वापस लौटीं तो काफ़ी थक गई थीं. उस रात वो बहुत कम सो पाईं. सामने के कमरे में सो रहीं सोनिया गाँधी जब सुबह चार बजे अपनी दमे की दवाई लेने के लिए उठकर बाथरूम गईं तो इंदिरा उस समय जाग रही थीं. सोनिया गांधी अपनी किताब 'राजीव' में लिखती हैं कि इंदिरा भी उनके पीछे-पीछे बाथरूम में आ गईं और दवा खोजने में उनकी मदद करने लगीं. वो ये भी बोलीं कि अगर तुम्हारी तबीयत फिर बिगड़े तो मुझे आवाज़ दे देना. मैं जाग रही हूँ. सुबह साढ़े सात बजे तक इंदिरा गांधी तैयार हो चुकी थीं. उस दिन उन्होंने केसरिया रंग की साड़ी पहनी थी जिसका बॉर्डर काला था. इस दिन उनका पहला अपॉएंटमेंट पीटर उस्तीनोव के साथ था जो इंदिरा गांधी पर एक डॉक्युमेंट्री बना रहे थे और एक दिन पहले उड़ीसा दौरे के दौरान भी उनको शूट कर रहे थे. दोपहर में उन्हें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री जेम्स कैलेघन और मिज़ोरम के एक नेता से मिलना था. शाम को वो ब्रिटेन की राजकुमारी ऐन को भोज देने वाली थीं. उस दिन नाश्ते में उन्होंने दो टोस्ट, सीरियल्स, संतरे का ताज़ा जूस और अंडे लिए. नाश्ते के बाद जब मेकअप-मेन उनके चेहरे पर पाउडर और ब्लशर लगा रहे थे तो उनके डॉक्टर केपी माथुर वहाँ पहुंच गए. वो रोज़ इसी समय उन्हें देखने पहुंचते थे. उन्होंने डॉक्टर माथुर को भी अंदर बुला लिया और दोनों बातें करने लगे.
उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन के ज़रूरत से ज़्यादा मेकअप करने और उनके 80 साल की उम्र में भी काले बाल होने के बारे में मज़ाक़ भी किया. नौ बजकर 10 मिनट पर जब इंदिरा गांधी बाहर आईं तो ख़ुशनुमा धूप खिली हुई थी. उन्हें धूप से बचाने के लिए सिपाही नारायण सिंह काला छाता लिए हुए उनके बग़ल में चल रहे थे. उनसे कुछ क़दम पीछे थे आरके धवन और उनके भी पीछे थे इंदिरा गाँधी के निजी सेवक नाथू राम. सबसे पीछे थे उनके निजी सुरक्षा अधिकारी सब इंस्पेक्टर रामेश्वर दयाल. इस बीच एक कर्मचारी एक टी-सेट लेकर सामने से गुज़रा जिसमें उस्तीनोव को चाय सर्व की जानी थी. इंदिरा ने उसे बुलाकर कहा कि उस्तीनोव के लिए दूसरा टी-सेट निकाला जाए. जब इंदिरा गांधी एक अकबर रोड को जोड़ने वाले विकेट गेट पर पहुंची तो वो धवन से बात कर रही थीं. धवन उन्हें बता रहे थे कि उन्होंने उनके निर्देशानुसार, यमन के दौरे पर गए राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को संदेश भिजवा दिया है कि वो सात बजे तक दिल्ली लैंड कर जाएं ताकि उनको पालम हवाई अड्डे पर रिसीव करने के बाद इंदिरा, ब्रिटेन की राजकुमारी एन को दिए जाने वाले भोज में शामिल हो सकें. अचानक वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी बेअंत सिंह ने अपनी रिवॉल्वर निकालकर इंदिरा गांधी पर फ़ायर किया. गोली उनके पेट में लगी. इंदिरा ने चेहरा बचाने के लिए अपना दाहिना हाथ उठाया लेकिन तभी बेअंत ने बिल्कुल प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से दो और फ़ायर किए. ये गोलियाँ उनकी बग़ल, सीने और कमर में घुस गईं.वहाँ से पाँच फुट की दूरी पर सतवंत सिंह अपनी टॉमसन ऑटोमैटिक कारबाइन के साथ खड़ा था. इंदिरा गाँधी को गिरते हुए देख वो इतनी दहशत में आ गया कि अपनी जगह से हिला तक नहीं. तभी बेअंत ने उसे चिल्लाकर कहा गोली चलाओ. सतवंत ने तुरंत अपनी ऑटोमैटिक कारबाइन की सभी पच्चीस गोलियां इंदिरा गाँधी के शरीर के अंदर डाल दीं. बेअंत सिंह का पहला फ़ायर हुए पच्चीस सेकेंड बीत चुके थे और वहाँ तैनात सुरक्षा बलों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी. अभी सतवंत फ़ायर कर ही रहा था कि सबसे पहले सबसे पीछे चल रहे रामेश्वर दयाल ने आगे दौड़ना शुरू किया. लेकिन वो इंदिरा गांधी तक पहुंच पाते कि सतवंत की चलाई गोलियाँ उनकी जांघ और पैर में लगीं और वो वहीं ढेर हो गए. इंदिरा गांधी के सहायकों ने उनके क्षत-विक्षत शरीर को देखा और एक दूसरे को आदेश देने लगे. एक अकबर रोड से एक पुलिस अफ़सर दिनेश कुमार भट्ट ये देखने के लिए बाहर आए कि ये कैसा शोर मच रहा है.उसी समय बेअंत सिंह और सतवंत सिंह दोनों ने अपने हथियार नीचे डाल दिए. बेअंत सिंह ने कहा, "हमें जो कुछ करना था हमने कर दिया. अब तुम्हें जो कुछ करना हो तुम करो." तभी नारायण सिंह ने आगे कूदकर बेअंत सिंह को ज़मीन पर पटक दिया. पास के गार्ड रूम से आईटीबीपी के जवान दौड़ते हुए आए और उन्होंने सतवंत सिंह को भी अपने घेरे में ले लिया. हालांकि, वहाँ हर समय एक एंबुलेंस खड़ी रहती थी. लेकिन उस दिन उसका ड्राइवर वहाँ से नदारद था. इतने में इंदिरा के राजनीतिक सलाहकार माखनलाल फ़ोतेदार ने चिल्लाकर कार निकालने के लिए कहा. इंदिरा गाँधी को ज़मीन से आरके धवन और सुरक्षाकर्मी दिनेश भट्ट ने उठाकर सफ़ेद एंबेसडर कार की पिछली सीट पर रखा. आगे की सीट पर धवन, फ़ोतेदार और ड्राइवर बैठे. जैसे ही कार चलने लगी सोनिया गांधी नंगे पांव, अपने ड्रेसिंग गाउन में मम्मी-मम्मी चिल्लाते हुए भागती हुई आईं. इंदिरा गांधी की हालत देखकर वो उसी हाल में कार की पीछे की सीट पर बैठ गईं. उन्होंने ख़ून से लथपथ इंदिरा गांधी का सिर अपनी गोद में ले लिया.कार बहुत तेज़ी से एम्स की तरफ़ बढ़ी. चार किलोमीटर के सफ़र के दौरान कोई भी कुछ नहीं बोला. सोनिया का गाउन इंदिरा के ख़ून से भीग चुका था.कार नौ बजकर 32 मिनट पर एम्स पहुंची. वहाँ इंदिरा के रक्त ग्रुप ओ आरएच निगेटिव का पर्याप्त स्टॉक था. लेकिन एक सफ़दरजंग रोड से किसी ने भी एम्स को फ़ोन कर नहीं बताया था कि इंदिरा गांधी को गंभीर रूप से घायल अवस्था में वहाँ लाया जा रहा है. इमरजेंसी वार्ड का गेट खोलने और इंदिरा को कार से उतारने में तीन मिनट लग गए. वहाँ पर एक स्ट्रेचर तक मौजूद नहीं था. किसी तरह एक पहिए वाली स्ट्रेचर का इंतेज़ाम किया गया. जब उनको कार से उतारा गया तो इंदिरा को इस हालत में देखकर वहाँ तैनात डॉक्टर घबरा गए. उन्होंने तुरंत फ़ोन कर एम्स के वरिष्ठ कार्डियॉलॉजिस्ट को इसकी सूचना दी. मिनटों में वहाँ डॉक्टर गुलेरिया, डॉक्टर एमएम कपूर और डॉक्टर एस बालाराम पहुंच गए. 
एलेक्ट्रोकार्डियाग्राम में इंदिरा के दिल की मामूली गतिविधि दिखाई दे रही थीं लेकिन नाड़ी में कोई धड़कन नहीं मिल रही थी. उनकी आँखों की पुतलियां फैली हुई थीं, जो संकेत था कि उनके दिमाग़ को क्षति पहुंची है. एक डॉक्टर ने उनके मुंह के ज़रिए उनकी साँस की नली में एक ट्यूब घुसाई ताकि फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुंच सके और दिमाग़ को ज़िंदा रखा जा सके. इंदिरा को 80 बोतल ख़ून चढ़ाया गया जो उनके शरीर की सामान्य ख़ून मात्रा का पांच गुना था. डॉक्टर गुलेरिया बताते हैं, "मुझे तो देखते ही लग गया था कि वो इस दुनिया से जा चुकी हैं. उसके बाद हमने इसकी पुष्टि के लिए ईसीजी किया. फिर मैंने वहाँ मौजूद स्वास्थ्य मंत्री शंकरानंद से पूछा कि अब क्या करना है? क्या हम उन्हें मृत घोषित कर दें? उन्होंने कहा नहीं. फिर हम उन्हें ऑपरेशन थियेटर में ले गए." डॉक्टरों ने उनके शरीर को हार्ट एंड लंग मशीन से जोड़ दिया जो उनके रक्त को साफ़ करने का काम करने लगी और जिसकी वजह से उनके रक्त का तापमान सामान्य 37 डिग्री से घटकर 31 डिग्री हो गया. ये साफ़ था कि इंदिरा इस दुनिया से जा चुकी थीं लेकिन तब भी उन्हें एम्स की आठवीं मंज़िल स्थित ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया. डॉक्टरों ने देखा कि गोलियों ने उनके लीवर के दाहिने हिस्से को छलनी कर दिया था, उनकी बड़ी आंत में कम से कम बारह छेद हो गए थे और छोटी आंत को भी काफ़ी क्षति पहुंची थी. उनके एक फेफड़े में भी गोली लगी थी और रीढ़ की हड्डी भी गोलियों के असर से टूट गई थी. सिर्फ़ उनका हृदय सही सलामत था.अपने अंगरक्षकों द्वारा गोली मारे जाने के लगभग चार घंटे बाद दो बजकर 23 मिनट पर इंदिरा गांधी को मृत घोषित किया गया. लेकिन सरकारी प्रचार माध्यमों ने इसकी घोषणा शाम छह बजे तक नहीं की.
इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाले इंदर मल्होत्रा बताते थे कि ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आशंका प्रकट की थी कि इंदिरा गाँधी पर इस तरह का हमला हो सकता है. उन्होंने सिफ़ारिश की थी कि सभी सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके निवास स्थान से हटा लिया जाए. लेकिन जब ये फ़ाइल इंदिरा के पास पहुंची तो उन्होंने बहुत ग़ुस्से में उस पर तीन शब्द लिखे, "आरंट वी सेकुलर? (क्या हम धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं?)" उसके बाद ये तय किया गया कि एक साथ दो सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके नज़दीक ड्यूटी पर नहीं लगाया जाएगा. 31 अक्तूबर के दिन सतवंत सिंह ने बहाना किया कि उनका पेट ख़राब है. इसलिए उसे शौचालय के नज़दीक तैनात किया जाए. इस तरह बेअंत और सतवंत एक साथ तैनात हुए और उन्होंने इंदिरा गाँधी से ऑपरेशन ब्लूस्टार का बदला ले लिया.

Sunday, November 18, 2018

क्यों नहीं थम रहा सबरीमाला विवाद

कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद भी केरल के सबरीमला मंदिर के बाहर विरोध प्रदर्शन जारी हैं. शुक्रवार और शनिवार को सबरीमला मंदिर के बाहर तनाव की स्थिति रही. यहाँ वो महिलाएं पहुंचने की कोशिश कर रही हैं जिन्होंने ये दृढ़ संकल्प किया है कि वो सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद मंदिर परिसर में दाखिल होकर रहेंगी. जबकि दूसरी तरफ़ श्रद्धालुओं का एक बड़ा समूह है. इसमें महिलाएं भी शामिल हैं. वो हर संभव कोशिश कर रही हैं कि उनके भगवान से जुड़ी पुरानी परंपराओं की अखंडता बनी रहे. ये सारा विवाद सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले से शुरू हुआ है जिसमें कोर्ट ने 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने की बात कही है. जबकि मंदिर के जो नियम हैं वो इसके विपरीत हैं. मंदिर के संचालक भगवान अयप्पा का हवाला देकर कहते हैं कि वो ब्रह्मचारी थे, इसलिए जिन महिलाओं को मासिक धर्म होता है, वो मंदिर में दाखिल नहीं हो सकतीं. जब सुप्रीम कोर्ट ये कह रहा है कि महिलाओं को सबरीमला मंदिर में दाख़िल होने का पूरा अधिकार है, तो क्यों शहरी महिलाओं का एक बड़ा समूह कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ भी खड़ा है? दक्षिण भारत में सबरीमला मंदिर की बड़ी मान्यता है. लोग जाति, लिंग और भाषा का विचार किये बिना सबरीमला मंदिर के दर्शन करने पहुँचते हैं. हर साल लाखों की संख्या में आदिवासी समूह के लोग, मुसलमान और ईसाई भी इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं. मंदिर में दाखिल होने से 41 दिन पहले से खाने-पीने से जुड़े तमाम सख़्त नियमों का श्रद्धालुओं को पालन करना पड़ता है. इसके बाद पश्चिमी घाट के घने जंगल से गुज़रने वाले कठिन रास्ते से होकर श्रद्धालु नंगे पाँव सबरीमला मंदिर तक पहुँचते हैं. सबरीमला मंदिर के दर्शन करने के लिए जो नियम बनाये गए हैं वो वाक़ई बहुत कठिन हैं. इसलिए बहुत से श्रद्धालु कहते भी हैं कि ये पूरी प्रक्रिया महिलाओं के लिए बहुत ज़्यादा मुश्किल है. शायद यही वजह भी रही है कि श्रद्धालु परिवारों में से घर के मर्द इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं. लेकिन मासिक धर्म जिन महिलाओं को होता है वो महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं, इसे लेकर सबसे ज़्यादा विवाद था. सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने इस बंदिश को भी ख़त्म कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये भेदभाव है इसलिए उम्र और लिंग के आधार पर किसी को मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता. सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच में इंदू मल्होत्रा अकेली ऐसी जज थीं जिन्होंने कहा कि सबरीमला पर बहुमत के फ़ैसले से वो सहमत नहीं हैं. उनकी राय थी कि ये एक धार्मिक मामला है. इससे लोगों की धार्मिक भावना जुड़ी है. इसलिए कोर्ट को इसमें दख़ल नहीं देना चाहिए. जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर अपनी राय पेश करते हुए कहा था कि धर्म के मामलों में तर्कसंगतता के विचारों को शामिल नहीं किया जा सकता. उनका तो ये भी कहना था कि जब तक भगवान अयप्पा को मानने वाले समुदाय में से कोई पीड़ित आकर न कहे, कोर्ट को इसपर सुनवाई नहीं करनी चाहिए. बहरहाल, सबरीमला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को एक प्रगतिशील क़दम के रूप में सेलिब्रेट किया गया. केरल के लगभग सभी कस्बों में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आये. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिये. इसके बाद दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई समेत यूके, अमरीका और कनाडा में भी सबरीमला मंदिर को लेकर प्रदर्शन हुए. भारत के अग्रणी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने नब्ज़ को एकदम सही वक़्त पर पकड़ा. पहले तो वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के पक्ष में ही थे. लेकिन अचानक उन्होंने अपनी राय बदल ली और कोर्ट के फ़ैसले के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के समर्थन में खड़े होने को उत्सुक दिखे. केरल में ऐसे कई विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं जिनमें स्थानीय लोगों के साथ न सिर्फ़ भाजपा, बल्कि कांग्रेस के नेता भी दिखाई दिये. लेकिन इस बात को समझना होगा कि केरल ऐसा राज्य नहीं है जहाँ महिलाओं के पास अपनी बात रखने का अधिकार न हो. इतिहास इस बात का गवाह है कि केरल के समाज का एक बड़ा हिस्सा मातृप्रधान है जहाँ महिलाओं ने सदियों तक विरासत में मिलने वाली संपत्ति पर नियंत्रण रखा. केरल भारत में 'सर्वोच्च साक्षरता दर' वाला राज्य भी है और केरल के सामाजिक संकेतक विकसित देशों के समान हैं. विरोध प्रदर्शन कर रही केरल की महिलाओं का मानना है कि किसी ने भी उनके नज़रिये की परवाह नहीं की. ये महिलाएं महसूस करती हैं कि जो महिलाएं कथित तौर पर महिलावादी हैं और जिन महिलाओं के पास असामान्य अधिकार हैं, वो उनपर 'आज़ादी' का विचार थोप रही हैं जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं है. अंजलि जॉर्ज नाम की एक महिला ने ही सबरीमला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया कैंपेन शुरू किया है और महिलाओं पर लगे बैन को सही माना है. उनका कहना है कि स्थानीय प्रशासन का नज़रिया औपनिवेशिक था, इसीलिए वो सबरीमला मंदिर पर बन रही स्थिति का सही जायज़ा नहीं ले पाये. वो कहती हैं, "प्रशासन ने ये बहुत बड़ी ग़लती की है. मैं ऐसा इसलिए कह सकती हूँ क्योंकि लोगों के मन में सबरीमला मामले के बाद ये बात घर कर जाएगी कि सिस्टम उनकी धार्मिक आस्था और परंपराओं की सुरक्षा करने में अक्षम है." हिंदू धर्म सांस्कृतिक प्रथाओं, परंपराओं और पूजा की विभिन्न प्रणालियों का समावेश है. इसमें भारी विविधता है. मसलन, जिस भगवान अयप्पा के मंदिर में महिलाओं का जाना वर्जित है. जो भगवान महिला श्रद्धालुओं को अपने पास नहीं देखना चाहते, उनका विवाहित रूप एक अन्य मंदिर में महिलाओं और पुरुषों, दोनों के द्वारा पूजा जाता है. और ऐसा भी नहीं है कि मंदिरों में सिर्फ़ महिलाओं के प्रवेश पर शर्तें लगाई गई हैं. पूर्वोत्तर राज्य असम में भी कामाख्या देवी के मंदिर में पुरुषों का प्रवेश कुछ वक़्त के लिए बंद कर दिया जाता है. वहाँ स्थानीय मान्यता है कि देवी कामाख्या उन दिनों मासिक धर्म में होती हैं इसलिए पुरुषों को उनके मंदिर में नहीं जाने दिया जाता. कहा जाता है कि भारत में करोड़ों देवी-देवता हैं. देश में लाखों मंदिर हैं और शायद दर्जन भर मंदिरों में ही लिंग-आधारित प्रवेश प्रतिबंधित है. ऐसे में समानता को आधार बनाकर इस समाज में एक तरह से कृत्रिम एकरूपता नहीं बनाई जा सकती. इससे हमारे समाज की विविधता और कई पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का नुकसान होगा. सच्चाई ये भी है कि किसी भी वास्तविक हितधारक से ये समझने की ईमानदार कोशिश ही नहीं की गई कि असल में मंदिर की परंपराएं क्या हैं. सुधार के नाम पर स्थानीय परंपराओं को दबाकर आधुनिकता को लोगों पर थोपा जा रहा है. इसके लिए चाहे वो लोग अब कोर्ट के आदेश का हवाला दें या राज्य की पुलिस की मदद लें. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से एक और परेशान करने वाला सवाल खड़ा होता है और वो सवाल ये है कि धर्म और भारत देश के बीच रिश्ता क्या है? धार्मिक संस्थानों को व्यवस्थित करने में सरकार अब ज़्यादा लिप्त है और देश की न्यायपालिका ये बताने में जुटी है कि सही धार्मिक परंपरा क्या होनी चाहिए. नामी वकील फ़ली नरीमन और राजीव धवन इस मामले में कुछ गंभीर आरोप लगा चुके हैं कि न्यायाधीशों ने ये निर्धारित करना अपना अधिकार मान लिया है कि कौन से धार्मिक विश्वास और सिद्धांत 'आवश्यक' हैं. सबरीमला मंदिर का विवाद इन्हीं सबके बीच खड़ा किया गया एक विवाद है जो हमारे समाज के कठोर विरोधाभासों को सामने लाता है. इसमें एक तरफ हैं महानगरीय अभिजात्य वर्ग के लोग जो महिलाओं की कथित आज़ादी का जश्न मना रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ हैं ज़मीन से जुड़ी लाखों महिला श्रद्धालु जिन्हें महसूस हो रहा है कि उनकी आवाज़ की आज के भारत में कोई सुनवाई नहीं हो रही.

मध्यप्रदेश में चल रही सियासत

जिन पांच राज्यों (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिज़ोरम) में महीनेभर के भीतर चुनाव हो रहे हैं उनमें मध्य प्रदेश की स्थिति सबसे दिलचस्प है. चार-पांच महीनों पहले तक यहां सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सामने कोई चुनौती नज़र नहीं आ रही थी. कांग्रेस का संगठन जीर्ण-शीर्ण था और माली हालत ख़स्ता. फिर हालात बदले. कांग्रेस का नेतृत्व बदला. मंदसौर में किसानों का आंदोलन हिंसक हुआ और पुलिस की गोलियों से छह किसानों की मौत भी. कर्मचारियों की नाराज़गी बढ़ने की ख़बरें लगातार आने लगीं. अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर किए जाने और फिर बाद में उसे उसके पुराने स्वरूप में लाने की दिल्ली की दिग्भ्रमित सी कोशिशों ने जातीय बुखार का पारा चढ़ाया. तब भाजपा की हालत कमजोर लगने लगी. उस वक़्त तो बातें यहां तक होने लगीं कि कांग्रेस इस बार बड़े बहुमत के साथ राज्य की सत्ता में लौट सकती है.
लेकिन दोनों पार्टियाें के प्रत्याशियों की घोषणा होते-होते हालात फिर बदल गए. प्रदेश की राजनीति समझने वालों की मानें तो अब हालात 19-20 के हो गए हैं. पलड़ा किसी भी तरफ झुक सकता है. और इस नज़दीकी संघर्ष की स्थिति निर्मित करने में भाजपा के साथ कांग्रेस भी बराबर भी ज़िम्मेदार है. कैसे? यही जानने की कोशिश करते हैं. राज्य चुनाव के मुहाने पर है. मतदान की तारीख़ नज़दीक है. लेकिन 15 साल से राज्य की सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस अब तक अपने अंतर्विरोधों में उलझी दिख रही है. इसके कई उदाहरण हैं. मसलन एक नवंबर को ही ख़बर आई कि पार्टी प्रत्याशी तय करने के लिए दिल्ली में हुई बैठक के दौरान प्रदेश में कांग्रेस की समन्वय समिति के मुखिया दिग्विजय सिंह और चुनाव अभियान समिति के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया आपस में उलझ गए. वह भी पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने. बाद में अशोक गहलोत, वीरप्पा मोइली और अहमद पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं की पहल पर मामला सुलटा. दो दिन बाद मालूम हुआ कि मालवा और ग्वालियर-चंबल की क़रीब एक दर्ज़न सीटों पर प्रत्याशियों के नामों को लेकर दोनों में मतभेद थे. वैसे बताया जाता है कि राहुल गांधी ने अपने स्तर पर दोनों को समझाया और बात आगे बढ़ी.
लेकिन बढ़ी कैसे, वह देखिए. कांग्रेस हमेशा से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके परिवार के ख़िलाफ़ मुखर रही है. उनके कथित भ्रष्टाचार के मामले उठाती रही है. इस क्रम में शिवराज के साले संजय सिंह मसानी को भी कई बार कांग्रेस ने निशाना बनाया. लेकिन इन्हीं संजय सिंह को तीन नवंबर को कांग्रेस में शामिल कर लिया गया. संजय मूल रूप से गोंदिया, महाराष्ट्र के कारोबारी हैं. इस हिसाब से कमलनाथ के छिंदवाड़ा के नज़दीकी हुए. लेकिन बताया जाता है कि वे एक-डेढ़ साल से बारासिवनी में सक्रिय थे. यहां से भाजपा का टिकट मांग रहे थे. पार्टी ने उनकी बात नहीं सुनी तो उन्होंने कांग्रेस का रुख़ कर लिया. उनका यह क़दम बनता भी है. लेकिन कांग्रेस की क्या मज़बूरी या ज़रूरत थी कि उन्हें न सिर्फ शामिल किया बल्कि बारासिवनी से ही टिकट भी दिया? इस सवाल का ज़वाब अब तक कांग्रेस के रणनीतिकार दिग्विजय सिंह भी नहीं ढूंढ पाए हैं. होशंगाबाद से भाजपा के पूर्व दिग्गज सरताज सिंह भी कांग्रेस का टिकट पाने में सफल रहे. ऐसे ही जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के प्रमुख हीरालाल अलावा को भी पार्टी ने मनावर ने अपना प्रत्याशी बना दिया. इस तरह के तमाम फैसलों पर कांग्रेस के भीतर से असंतोष की आवाज़ें उठ रही हैं.
यही आलम मुद्दों के मोर्चे पर है. सत्ताधारी भाजपा और मीडिया ने कांग्रेस को थाली में सजाकर मुद्दे दिए हैं. फिर चाहे वह व्यापम और ई-टेंडरिंग जैसे बड़े घोटालों का मामला हो या रेत के अवैध खनन का. किसान अांदोलनों के हिंसक दमन से उपजा असंतोष हो या आर्थिक मोर्चे और आधारभूत ढांचा (ख़ासतौर पर सड़कों के मामले में) क्षेत्र में कमतर प्रदर्शन का. कांग्रेस किसी भी मसले पर कोई लहर नहीं खड़ी कर पाई. उल्टा कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ में भी जो मुद्दे शामिल किए गए वे ‘राम वन गमन पथ’, ‘गौशाला निर्माण’, ‘गौमूत्र के कारोबार’, ‘आध्यात्मिक विभाग’ स्थापित करने आदि के थे. कांग्रेस के 112 पेज के इस ‘वचन पत्र’ में और भी तमाम बातें थीं. लेकिन चर्चा इन्हीं सब चीजों की ज़्यादा होनी थी, जो हुई भी. इसके बाद भाजपा को यह कहने का मौका भी मिल गया कि विपक्ष मुद्दाविहीन है इसलिए उसने ‘80 फ़ीसदी तक हमारे मुद्दों और नीतियों की नक़ल कर ली.’
इतना ही नहीं कांग्रेस की ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध का शग़ूफ़ा भी छोड़ा गया. और अगले ही दिन स्पष्टीकरण आ गया कि ऐसी कोई बात कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ में नहीं है. शायद कांग्रेस के रणनीतिकारों को जल्द यह अहसास हो गया कि आरएसएस पर प्रतिबंध की बात से भाजपा का जो कार्यकर्ता अपनी ही सरकार से नाराज़ है, वह वापस अपनी पार्टी के पक्ष में गोलबंद हो सकता है. ऐसे और भी अंतर्विरोध हैं, जो कांग्रेस पर भारी पड़ सकते हैं.
दूसरी तरफ भाजपा है जो शिवराज पर ‘विश्वास की अति’ पर खड़ी दिखती है. और ख़ुद शिवराज ‘आत्मविश्वास के अतिरेक’ पर सवार नज़र आते हैं. इसकी भी मिसालें देखिए. भाजपा ने एक नवंबर को मध्य प्रदेश के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी. इसमें 177 नाम थे. बाद में एक एक हटा लिया और रह गए 176. इनमें 70 फ़ीसदी तक वही चेहरे थे जो 2013 में चुनाव लड़े थे. यह सूची देखने के बाद सत्याग्रह ने प्रदेश भाजपा के एक पुराने पदाधिकारी से प्रतिक्रिया ली. उनका ज़वाब था, ‘लगता है अब चलाचली की बेला है.’
रदेश की राजनीति के जानकार भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं. मध्य प्रदेश में लंबे समय से भाजपा की राजनीति पर नजर रखने वाले एक पत्रकार ने सत्याग्रह से बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘पार्टी ने बड़ा जोख़िम लिया है. इस सूची से एक बात और साफ है कि भाजपा में प्रदेश से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित नहीं हो पा रहा है.’ यह बात भाजपा प्रत्याशियों की बाद में आई सूचियों से भी साबित हुई. इन सभी में एक बड़ा संकेत यह था कि पार्टी ने शिवराज पर लगभग आंख बंद कर भरोसा किया है, इसलिए उनके सुझाए नामों को ही बिना किसी हीला-हवाली के हरी झंडी दे दी गई है.
ज़ाहिर तौर पर इससे शिवराज का मनोबल भी सातवें आसमान पर है. उन्होंने इस बार एक-एक कर अपने लगभग सभी प्रतिस्पर्धियाें को जगह दिखा दी. उदाहरण इसके भी हैं. राज्य में शिवराज के सबसे बड़े दो प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं- केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय. शिवराज के सामने इन दोनों की ही नहीं चली. तोमर के बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे को तो टिकट ही नहीं दिया गया. विजयवर्गीय के पुत्र आकाश को टिकट मिला लेकिन इंदौर-3 से जो लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के असर वाला क्षेत्र है. यहां से सुमित्रा महाजन ख़ुद अपने बेटे मंदार के लिए टिकट मांग रही थीं. लेकिन मंदार को भी टिकट नहीं मिला. जबकि कैलाश अपने बेटे के लिए इंदौर-2 से टिकट चाहते थे. साथ ही अपने लिए भी महू से. लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के विश्वस्त होने के बावज़ूद कैलाश सिर्फ़ आकाश को टिकट दिला पाए. वह भी जहां से शिवराज की मंशा के अनुरूप पार्टी ने दिया.
बात इतनी ही नहीं थी. थावरचंद गहलोत प्रदेश में अनुसूचित जाति वर्ग का जाना-माना चेहरा हैं. उनके बेटे जीतेंद्र को टिकट मिला, लेकिन निकट सहयोगी सतीश मालवीय का पत्ता कट गया. पत्ता पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का भी कटा, तमाम दबाव बनाने के बावज़ूद. बाबूलाल की जगह उनकी बहू कृष्णा गौर को भोपाल की गोविंदपुरा सीट से टिकट दिया गया. वह भी आख़िरी मौके पर, जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी. कभी मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे गौरीशंकर शेजवार को भी सिर्फ़ बेटे के टिकट से ही संतोष करना पड़ा. उनकी सांची विधानसभा सीट से अब उनके पुत्र मुदित शेजवार पार्टी उम्मीदवार हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री और शिवराज के मुखर आलोचक रहे सरताज सिंह को तो टिकट के लिए पार्टी ही छोड़नी पड़ी. वे आंसू बहाते हुए कांग्रेस में शामिल हो गए.
कमाल की बात है कि शिवराज पर पार्टी के ‘विश्वास की अति’ और शिवराज के ‘आत्मविश्वास का अतिरेक’ तब दिख रहा है जब लगातार उल्टी ख़बरें भी आ रही हैं. मसलन- अपने गृहनगर बुधनी की जो सुरक्षित शिवराज ने इस बार अपने लिए तलाशी है उस पर प्रचार की शुरूआत में ही उनकी पत्नी साधना सिंह को जनता के तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है. इस पूरे इलाके में सड़कों की स्थिति जर्जर है जबकि शिवराज प्रदेश में ‘अमेरिका से बेहतर’ सड़कें होने का दावा करते हैं. वे 13 साल से और उनकी पार्टी 15 सालाें से राज्य की सत्ता में है, लेकिन बुधनी के लोग पीने के पानी के संकट से जूझ रहे हैं. ऐसे में उनकी नाराज़गी स्वाभाविक है.

Friday, November 16, 2018

राजस्थान में सचिन या गहलोत?

राजस्थान में खुद को सत्ता के करीब पा रही कांग्रेस किसी तरह का जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं. सचिन पायलट और अशोक गहलोत की महत्वाकांक्षाओं से जूझ रही पार्टी ने अब बीच का रास्ता निकाला है. मध्य प्रदेश के उलट राजस्थान में इन दोनों ही नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए कह दिया गया है. जल्दी ही उनके चुनाव क्षेत्रों का ऐलान भी कर दिया जाएगा. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो ये दोनों ही नेता मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में रहेंगे. यानी जो भी घमासान होना है वो चुनाव नतीजे आने के बाद ही होगा. पर एक कोशिश उम्मीदवारों की सूची को लेकर चल रहे घमासान को रोकने की भी दिखती है जो अलग-अलग गुटों के दावेदारों के बीच कुछ इस तरह फंसी है कि अभी तक बाहर ही नहीं आ सकी है. माना जा रहा है कि प्रदेश के सभी ताकतवर नेता अपने-अपने समर्थकों को अधिक से अधिक टिकट दिलवाने में लगे हैं ताकि चुनाव बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी करते समय अपने पक्ष में अधिक विधायकों का समर्थन दिखाया जा सके. इसीलिए बड़ा सवाल यही है कि गहलोत और पायलट को चुनाव लड़ाने से कांग्रेस के लिए राजस्थान में बात सुलझी है या फिर उलझी है? पायलट की सीट पर कौन रहेगा और को पायलट कौन होगा? यह सवाल पूछने पर गहलोत झल्ला जाते हैं. वे कहते हैं कि मीडिया बार-बार यह सवाल पूछती है. लेकिन इंदिरा गांधी के जमाने से ही और आजादी के बाद से ही आज तक कभी भी राजस्थान में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का नाम घोषित नहीं किया गया.
लेकिन और दिनों के मुकाबले आज गहलोत अधिक आत्मविश्वास से भरे नज़र आए. उनकी बॉडी लैंग्वेज और बगल में बैठे सचिन पायलट से उनकी गर्मजोशी यह दिखा रही है कि शायद फिलहाल दावेदारी के मुद्दे को किनारे कर चुनाव जीतने पर फोकस लगाने का फैसला किया गया है. उन्हें इस बात का एहसास है कि मीडिया के एक हिस्से में बार-बार उनके और सचिन के बीच टकराव को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता रहा है. इसे राजस्थान कांग्रेस में फूट और गुटबाजी के तौर पर भी पेश किया जाता है. वैसे राहुल गांधी ने ये कोशिश की है कि दोनों को एक साथ रखा और दिखाया जाए. इसीलिए उनके हर राजस्थान दौरे में ये दोनों नेता एक साथ दिखते हैं. अलग से भी उनकी कुछ तस्वीरें बार-बार सामने आती हैं यह दिखाने के लिए कि सब साथ-साथ हैं. आज दोनों नेताओं के चुनाव लड़ने का ऐलान भी हो गया. दोनों नेताओं के चुनाव लड़ने का यह फैसला उस दिन घोषित हुआ जिस दिन कांग्रेस ने राजस्थान में बीजेपी का एक बड़ा विकेट गिराया है. दौसा से बीजेपी के सांसद और पूर्व पुलिस महानिदेशक हरीश मीणा आज बीजेपी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हो गए. यह किरोड़ीमल मीणा के बीजेपी के दोबारा साथ आने और उन्हें राज्यसभा भेजने की बीजेपी की रणनीति का जवाब है. हरीश मीणा के भाई और पूर्व केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा कांग्रेस में ताकतवर नेता हैं. हरीश मीणा पिछले लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी में आए थे और अब विधानसभा चुनाव से पहले घर वापसी कर गए.
बीजेपी के मौजूदा सांसद को तोड़ लेने की खुशी छुपाए नहीं छुपी. गहलोत ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से पूछा कि राजस्थान में मिशन 180 का क्या हुआ? ऐसा क्या हुआ कि अब बीजेपी का कोई नेता इस मिशन की बात नहीं कर रहा है? उन्होंने कहा कि इनका ग्राफ नीचे आ रहा है. एनडीए और मोदी का ग्राफ नीचे आ रहा है. दो लोग राज कर रहे हैं. शाह ने कहा था कि मिशन 180. अब क्या हुआ. अब कोई बीजेपी नेता राजस्थान में मिशन 180 की बात क्यों नहीं कर रहा. राजस्थान में कांग्रेस वसुंधरा सरकार की नाकामियों को मुद्दा बना रही है. उसकी कोशिश रोजगार, महंगाई, किसानों की आत्महत्या, रफाल, सीबीआई का दुरुपयोग जैसे मुद्दों को तूल देने की है. उसका आरोप है कि अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए ही बीजेपी और संघ परिवार राम मंदिर का मुद्दा उठा रहे हैं. गहलोत का कहना है कि अचानक राम मंदिर का मुद्दा छेड़ दिया गया है. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में कहा ये आरएसएस का नहीं बल्कि वीएचपी का मुद्दा है. फिर 15 दिन बाद कहा कानून बनाओ, फिर 15 दिन बाद कहा आंदोलन करेंगे. पूरा देश देख रहा है कि ये क्या हो रहा है. चुनाव आते ही राम मंदिर पर आ गए. तो साफ है कि राजस्थान में कांग्रेस के तेवर न सिर्फ आक्रामक हैं बल्कि वो एकजुट दिखने की कोशिश भी कर रही है. पर क्या वाकई ऐसा है? इसके जवाब के लिए 11 दिसंबर तक इंतजार करना होगा.

छत्तीसगढ़ चुनाव

छत्तीसगढ़ में एक चरण के चुनाव के बाद बसपा नेता मायावती ने यह साफ किया है कि उनकी पार्टी चुनाव के बाद बीजेपी और कांग्रेस से समान दूरी बनाकर रखेगी. हालांकि उनके ही सहयोगी अजीत जोगी ने एक दिन पहले यह पूछे जाने पर कि क्या जरूरत पड़ी जो बीजेपी को अपना सर्मथन दे सकते हैं. इस पर उन्होंने कहा था कि राजनीति में कुछ भी संभव है मगर बाद में वे अपने बयान से पलट गए. जाहिर है मायावती चुनाव परिणाम से पहले अपने पत्ते नहीं खोलना चाहती है. जाहिर है इन चुनावों का 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी काफी असर पड़ने वाला है. सभी पार्टियों को पता है कि अभी तक छत्तीसगढ में बीजेपी और कांग्रेस के बीच जीत का अंतर एक फीसदी से भी कम होता है. ऐसे में यहां एक-एक वोट कीमती होता है.
ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में बसपा पहली बार लड़ रही हो. वहां उसके पास 4 से 5 फीसदी वोट है और एक दो विधायक भी चुने जाते रहे हैं. मगर इस बार अजित जोगी से गठबंधन करके मायावती ने एक बड़ा दांव खेला है. जानकार मानते हैं कि मायावती और अजित जोगी की जोड़ी एक तीसरी शक्ति के रूप में उभरी है जो एक दोधारी तलवार की तरह है, जिससे कांग्रेस और बीजेपी दोनों को नुकसान पहुंचेगा. ऐसा नहीं है कि मायावती और जोगी की जोड़ी केवल कांग्रेस का वोट काटेगी, बल्कि यह भी कहा जा रहा है कि वह उन हिस्सों में ज्यादा मजबूत दिख रही है जहां बीजेपी मजबूत है. मगर यह भी तय है कि कांग्रेस को अधिक नुकसान हो सकता है. अजित जोगी कांग्रेस की तरफ से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उनकी पत्नी रेणु जोगी ने चुनाव घोषणा के बाद कांग्रेस विधायक पद से इस्तीफा दिया है और अब बसपा जोगी  गठबंधन की उम्मीदवार हैं. यानि बसपा के 4 फीसदी वोट और जोगी का अपना व्यक्तित्व जितना अधिक वोट खींचेगा कांग्रेस बीजेपी उतनी ही मुश्किल में रहेगी. कांग्रेस के कई नेता मानते हैं कि पार्टी को बसपा के साथ गठबंधन कर लेना चाहिए था, क्योंकि गठबंधन ना करने से भी पार्टी सरकार बनाने नहीं जा रही थी और यदि कांग्रेस-बसपा गठबंधन हो जाता तो बसपा के 4 फीसदी वोट के साथ कांग्रेस के पास बीजेपी से ज्यादा वोट होते. छत्तीसगढ़ में बीजेपी के पास 41.04 फीसदी, कांग्रेस के पास 40.04 और बीएसपी के पास 4.27 फीसदी वोट है. इस गणित के आधार पर यदि मायावती को कुछ सीटें यदि अधिक देना भी पड़ता तो कांग्रेस को वह करना चाहिए था मगर कहते हैं ना गठबंधन करना कांग्रेस के डीएनए में नहीं है और इसी का फायदा बीजेपी लगातार उठा रही है. दूसरा इन राज्यों में बसपा से गठबंधन करने का फायदा कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में भी होता. यदि बसपा इन विधानसभा में अच्छा नहीं करती तो वह लोकसभा चुनाव में भी अधिक सीट मांगने की हालत में नहीं होती. ऐसे में लगता है कांग्रेस का अति आत्मविश्वास कहीं उसे भारी न पड़ जाए या फिर रमन सिंह के इतने सालों के शासन के बाद जो ऊब पैदा होती है जनता में उस पर कांग्रेस को भरोसा है. नतीजा चाहे जो भी हो बसपा जोगी ने एक साथ आकर छत्तीसगढ़ चुनाव को त्रिकोणीय और दिलचस्प बना दिया है.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...