Monday, November 25, 2019

क्या अदालत राज्यपाल के फैसले को गलत ठहराएगी?

अदालतों में होने वाली बहसें कई बार सियासी दलों के असल ख़यालात से पर्दा हटाती हैं. क्योंकि वो हलफ़नामे या दूसरे दस्तावेज़ों में तो दूसरी बातें कहते हैं. मगर, हक़ीक़त में उनकी नीयत कुछ अलग ही होती है.
ये बात सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान साफ़ तौर पर दिखी. जब बीजेपी की तरफ़ से वक़ीलों ने अपना पक्ष अदालत के सामने रखा.
इस दौरान, एक तरफ़ तो, राज्यपाल, महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार की तरफ़ से वक़ीलों ने तमाम दलीलें दीं.
वहीं दूसरी तरफ़, शिवसेना और कांग्रेस के वक़ीलों ने भी अपना पक्ष सर्वोच्च अदालत के सामने प्रस्तुत किया. मैंने पिछले वाक्य में जान बूझकर एनसीपी का ज़िक्र नहीं किया. क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट और बाक़ी लोगों की तरह ही मुझे भी इस बात का यक़ीन नहीं है कि आख़िर वो हैं किस की तरफ़.
सुनवाई शुरू होते ही ये साफ़ था कि दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट से चाहते क्या हैं. कांग्रेस और शिवसेना चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट देवेंद्र फड़णवीस की अगुवाई वाली बीजेपी-एनसीपी गठबंधन सरकार को जल्द से जल्द विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहे.
वहीं, बीजेपी की ख़्वाहिश है कि सर्वोच्च न्यायालय बहुमत साबित करने के लिए उन्हें राज्यपाल के तय की हुई मियाद यानी 30 नवंबर या उससे भी आगे का वक़्त दे, तो बेहतर हो. कांग्रेस और शिवसेना चाहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट कर्नाटक के मामले में अपने रुख़ की ही तरह महाराष्ट्र में भी सरकार को अगले 24 घंटे में बहुमत साबित करने का आदेश दे. वहीं, बीजेपी ये सवाल उठा रही है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को संविधान के तहत ये अधिकार है कि वो बहुमत परीक्षण का अंतरिम आदेश दे सके?
कांग्रेस और शिवसेना के पक्ष में पहले के कई उदाहरण मौजूद हैं. 1998 से लेकर अब तक कम से कम चार बार ऐसा हो चुका है. फिर चाहे 1998 में उत्तर प्रदेश का जगदंबिका पाल बनाम भारत सरकार का मामला हो या फिर बाद में गोवा और झारखंड के मामले हों.
सबसे हालिया मिसाल कर्नाटक की है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधानसभा का विश्वास किस दल या नेता में है, ये जानने के लिए तुरंत विधानसभा में बहुमत परीक्षण कराया जाए. ऐसे आदेशों की बुनियाद सुप्रीम कोर्ट का 1994 का एस आर बोम्मई बनाम भारत सरकार का केस है. जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार बनाने का प्रयास कर रहे एक या दूसरे दल के प्रति राज्यपालों के पक्षपात पर पूर्ण विराम लगाने की कोशिश की थी.
तब सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में साफ़ तौर से कहा था कि अगर इस बात पर ज़रा भी संशय है कि जनता ने चुनाव में किस पार्टी को सरकार बनाने का जनादेश दिया है, तो इसका फ़ैसला विधानसभा में बहुमत परीक्षण के माध्यम से विधानसभा के अंदर होना चाहिए. बीजेपी का तर्क ये है कि संविधान के तहत अदालत को ऐसा आदेश देने का अधिकार ही नहीं है. क्योंकि, संविधान का अनुच्छेद 212 ये कहता है कि विधानसभा की कार्यवाही को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है.
साथ ही कोई अदालत इसलिए भी ऐसा आदेश नहीं दे सकती क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 361 ये कहता है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति अपने किसी फ़ैसले के लिए अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे. इन सवालों के जवाब बेहद आसान हैं.
अनुच्छेद 212 के तहत विधानसभा की कार्यवाही को तब कोई संरक्षण नहीं मिल सकता अगर ये कार्यवाही ही असंवैधानिक हो. और, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के मामले में ख़ुद ही स्पष्ट किया था, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का राज्यपाल का फ़ैसला, संविधान के इस अनुच्छेद के तहत अदालत की समीक्षा के दायरे बाहर नहीं है. इसी तरह, अनुच्छेद 361 के तहत राज्यपाल या राष्ट्रपति भले ही अपने फ़ैसले के लिए अदालत के प्रति जवाबदेह न हों. लेकिन, अदालतें इस बात की समीक्षा तो कर ही सकती हैं कि राज्यपाल का कोई फ़ैसला संविधान सम्मत है या नहीं. क्योंकि सरकार तो राज्यपाल या राष्ट्रपति के हर फ़ैसले का बचाव ही करेगी. इसलिए, उनके फ़ैसलों की समीक्षा तो अदालतों का काम है ही.
बीजेपी के तर्क ठीक वैसे ही हैं, जैसी चिंता जस्टिस के रामास्वामी ने सुप्रीम कोर्ट के बोम्मई बनाम केंद्र सरकार के फ़ैसले में जताई थी. जब उन्होंने अदालत के बहुमत के फ़ैसले से अलग अपना विचार रखा था.
विधानसभा में बहुमत परीक्षण का आदेश देकर अदालत सिर्फ़ ये सुनिश्चित करती है कि जनता ने चुनाव के माध्यम से अपनी राय जिस भी पार्टी या नेता के पक्ष में दी है, वो संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से स्पष्ट हों. और राज्यपाल, जनादेश के साथ खिलवाड़ न कर सकें.
इस नज़रिए से देखें, तो, कर्नाटक और महाराष्ट्र के हालात में कोई ख़ास फ़र्क़ नज़र नहीं आता है. ऊपरी तौर पर देखें, तो राज्यपाल ने राज्य के सबसे बड़े दल को विधानसभा के भीतर बहुमत साबित करने का आदेश देकर कुछ ग़लत नहीं किया है. लेकिन, कर्नाटक का मामला हो, या फिर महाराष्ट्र का, राज्यपाल ने ऐसा करने के लिए जो तरीक़ा अपनाया, सवाल उस पर उठे हैं. दोनों ही मामलों में संबंधित राज्यपालों ने एक पार्टी के नेता को आनन फानन में शपथ दिला दी और फिर उन्हें बहुमत साबित करने के लंबा समय दे दिया.
दोनों ही मामलों में ऐसा दिखता है कि राज्यपाल का एक ही लक्ष्य था कि उनकी पसंद की पार्टी (और जिस ने उन्हें राज्यपाल नियुक्त किया), वो उनके माध्यम से फ़ायदा उठा कर सरकार बना ले. ऐसे हालात में ये तर्क गले नहीं उतरता है कि अदालतें अपने उन नियम क़ायदों को भी लागू कराना न सुनिश्चित करें, जो ख़ुद न्यायालय ने ही दिए हैं. और इसकी जगह अदालतें ख़ामोश बैठी रहें और सिर्फ़ एक पवित्र उम्मीद जताने को ही अपना कर्तव्य मान लें.

महाराष्ट्र का सियासी भूचाल

इस समय महाराष्ट्र की राजनीति में बडा भूचाल मचा हुआ है, ये एकदम यूपी बिहार स्टाइल वाली राजनीति है शायद इसलिए ही हमारे जैसे कानून और राजनीति के स्टूडेंट को इसमें इतनी दिलचस्पी है। शुक्रवार शाम को शिवसेना के उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की बातें हुईं और  सुबह-सुबह भाजपा के देवेंद्र फणनवीस मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नज़र आए. और ये सब किया शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने। महाराष्ट्र की राजनीति की बिसात पर अजित पवार की इस चाल ने सबको चौंका दिया. उन लोगों को भी, जो उन्हें बेहद क़रीब से जानते हैं. शाम होते-होते राजनीति की ये बाज़ी पूरी तरह बदली हुई नज़र आई. अजित पवार को राजभवन में भाजपा की सरकार बना रहे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ लेते देखने वाले एनसीपी के कई विधायक शाम होते-होते पार्टी नेता शरद पवार के पास पहुंच गए और सत्ता के खेल के समीकरण फिर बदल गए. हिसाब लगाने वाले हिसाब लगाते रह गए कि कौन फ़ायदे में रहा और कौन नुक़सान में. लेकिन अभी के समीकरणों को देखते हुए लगता है कि सबसे बड़े लूज़र देवेंद्र फडणवीस ही रहेंगे क्योंकि शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने अपने विधायकों को अपने पास रखा है और उनके लिए बहुमत साबित करना मुश्किल होगा. दूसरे लूज़र होंगे अजित पवार. उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के साथ बग़ावत की और एनसीपी के विश्वास को ठेस पहुंचाई है. इससे उनकी साख़ को बहुत नुक़सान हुआ है. उन्हें शरद पवार के वारिस के तौर पर भी देखा जाता था. उन्होंने उनके साथ भी गद्दारी की है. देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली है लेकिन उनके कई इम्तिहान अभी बाक़ी है. ताज़ा आंकड़ें देखें जो बीजेपी के पास 105 के विधायक, निर्दलीय और छोटे दलों के 14 विधायकों को मिलाकर कुल 119 विधायक हो गए. कल सुबह अजित पवार के साथ एनसीपी के 11 विधायक गए थे. अब इनमें से छह शरद पवार के पास वापस आ गए हैं और उन्होंने कहा कि हमें तो कुछ पता ही नहीं था हमें तो अचानक पकड़ कर राजभवन ले गए. ऐसे में अजित पवार के पास अब बच गए पांच विधायक. इन पांच को अगर 119 के साथ जोड़ दें तो संख्या होती है 124 और बहुमत का आंकड़ा है 145. ऐसे में भाजपा को 20 विधायकों की जरूरत है और वह कहां से लाएगी शायद किसी को नहीं पता.
थोड़ी देर पहले नारायण राणे ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि बाजार में बहुत सारे विधायक बाकी हैं. इसका मतलब यह है कि बीजेपी यह सोच रही है कि वो बहुमत के लिए एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के अलावा और कहां-कहां से विधायक ला सकती है.
ऐसा लग रहा है कि जैसे कर्नाटक में 'ऑपरेशन कमल' कई चरण में हुआ था, वैसे ही महाराष्ट्र मे भी 'ऑपरेशन कमल' अभी बाकी है. देवेंद्र फडणवीस आगे क्या रणनीति अपनाएंगे, इस बारे में अभी कोई अंदाज़ा लगाना मुश्किल है क्योंकि उन्होंने शपथ तो ले ली लेकिन उनके पास उतने विधायक नहीं है. फ़िलहाल कोई नहीं जानता कि फडणवीस 145 विधायक कहां से लाएंगे.
उन्हें 30 नवंबर को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना है. 
दूसरी ओर शनिवार तड़के देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथ लेने के बाद कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. तीनों पार्टियों का कहना है कि राज्य में जो कुछ भी हुआ है, असंवैधानिक है. कांग्रेस ने इसे विशेष रूप से चुनौती दी है. अतीत में पिछले राज्यों में पैदा हुई ऐसी ही परिस्थितियों पर वापस नज़र डालें तो ऐसे में विधानसभा में शक्ति परीक्षण सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ है. महाराष्ट्र में शक्ति परीक्षण 30 नवंबर को होगा जिसमें अभी छह दिन-छह रातें बाकी हैं. ये रातें ही नहीं बल्कि अगली कई रातें भी महाराष्ट्र पर भारी पड़ने वाली हैं और ऐसा पिछले एक महीने से चलता रहा है. ईमानदारी से कहें तो जो कुछ हो रहा है, उसकी ठीक-ठीक जानकारी नेताओं और पत्रकारों को भी नहीं है. सारे सूत्र फ़ेल हो गए हैं.
अब बात अगर पवार फैमिली की राजनीति की करें तो एक ज़माने में अजित पवार एनसीपी के बहुत बड़े नेता हुए करते थे. जब से शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले राजनीति में आईं, तब से अजित पवार ने कई  बार अपनी नाराज़गी जताई. धीरे-धीरे पार्टी में उनका कद छोटा होता गया और ऐसा शरद पवार ने जानबूझकर भी किया. चाचा-भतीजे की आपस में नहीं बनती है लेकिन कोई इस बारे में खुलकर बात नहीं करता. बात तब भी ऐसी ही अदावत की हुई जब अजित पवार के बेटे पार्थ पवार को लोकसभा की टिकट मिली और वो हार गये, जबकि शरद पवार के बडे भाई अन्ना साहब पवार के पोते रोहित पवार को विधायकी  का टिकट मिला और वो जीत गये। पार्टी में उनको तरजीह अधिक मिल रही थी। अब अजित पवार ने शपथ तो ले ली है लेकिन उनके पास सिर्फ़ पांच विधायक ही बचे हैं. ऐसे में वो एनसीपी में अलगाव पैदा करके विधायकों को अपने साथ ला पाएंगे, ये मुश्किल लगता है. देवेंद्र फडणवीस के शपथ लेने के बावजूद अगर आज महाराष्ट्र में अगर किसी के पास ताकत है तो शरद पवार के पास है. फिर चाहे वो अलग-अलग पार्टियों के साथ रिश्तों के मामले में हो या फिर संख्याबल के बारे में.
मिशन नाकाम रहा तो क्या होगा? अगले कुछ दिनों में क्या होगा, अभी इस बारे में ज़्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता. यह भी ठीक-ठीक नहीं मालूम कि किस पार्टी के विधायक किसके संपर्क में हैं। राजनीति और क्रिकेट में कभी भी कुछ भी हो सकता है.'' यह बयान नितिन गडकरी ने कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के राजनीतिक हालात पर दिया था. उनके ये शब्द तब सच साबित हो गए जब महाराष्ट्र सहित देश की अधिकांश जनता शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनने की ख़बरें सुनते हुए सोने के लिए गई लेकिन सुबह उठी तो बीजेपी के नेता देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके थे और उनके साथ एनसीपी के प्रमुख नेता अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.
कुछ पल के लिए आम जनता ही क्या राजनीतिक जगत की हर ख़बर सूंघने का दम भरने वाले बड़े पत्रकार और कई नेता अचंभे में थे. धीरे-धीरे ख़बरें खुलने लगीं और मालूम चला कि रात ही रात में बीजेपी ने अजित पवार के समर्थन से सरकार बनाने की पेशकश की.
इसके बाद राज्यपाल ने प्रदेश में जारी राष्ट्रपति शासन को हटाने की प्रक्रिया प्रारंभ की और सुबह तड़के देवेंद्र फडणवीस को राज्य की कमान सौंप दी गई. महाराष्ट्र के इतिहास में 22 नवंबर की रात हमेशा के लिए दर्ज हो गई. पूरी रात महाराष्ट्र की सत्ता की चाभी एक गठबंधन से दूसरे गठबंधन में किस तरह निकली या निकाली गई, यह अपने-आप में बेहद दिलचस्प है.
मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक ये पूरा खेल 22 नवंबर को देर शाम शुरू हुआ जब एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार करीब 54 विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी लेकर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास पहुंचे. इसके बाद देर रात देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल से मुलाक़ात की और सरकार बनाने का दावा पेश किया. उन्होंने अपने साथ एनसीपी के विधायकों के समर्थन की बात बताई.
इसके बाद मामला पूरी तरह राजधानी दिल्ली शिफ्ट हो गया. राज्यपाल कोश्यारी ने केंद्र को इस पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया, इसके बाद राष्ट्रपति भवन तक जानकारी भेजी गई. शनिवार यानी 23 नवंबर की सुबह 5.47 मिनट पर केंद्र ने महाराष्ट्र में जारी राष्ट्रपति शासन को हटाने की बात कही. महाराष्ट्र में राज्यपाल ने 12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन लगा दिया था.
राष्ट्रपति शासन हटते ही महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया और फिर सुबह करीब 7.30 बजे देवेंद्र फडणवीस ने राजभवन में शपथ ग्रहण कर ली. जिस तरह से बीजेपी ने अजित पवार के समर्थन से रात ही रात में सरकार बनाई उसे विपक्षी दल असंवैधानिक बता रहे हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस मामले पर अपनी मंजूरी पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए लिखा, ''संविधान के आर्टिकल 356 के खण्ड दो में दिए गए अधिकारों के तहत, मैं राम नाथ कोविंद, भारत का राष्ट्रपति, मेरे द्वारा 12 नवंबर 2019 को महाराष्ट्र में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को, 23 नवंबर 2019 को हटाए जाने का आदेश देता हूं.''
अगर संविधान के नियमों के हिसाब से देखें तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं हुआ है, लेकिन नैतिकता के आधार पर यह कोई अच्छा उदाहरण नहीं है. राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए बुला सकते हैं, उन्हें अगर लगता है कि कोई दल सरकार बनाने के लिए बहुमत साबित कर सकता है तो वह उसे निमंत्रण भेज सकते हैं. लेकिन बीजेपी पहले ही राज्यपाल के सामने सरकार ना बनाने की बात कह चुकी थी ऐसे में उन्हें दोबारा सरकार बनाने का मौका देना नैतिकता के आधार पर सही नहीं है. महाराष्ट्र में 12 नवंबर से राष्ट्रपति शासन जारी था. 23 नवंबर की रात इसे हटाया गया और उसके बाद सरकार का गठन हुआ.
सवाल उठाया जा रहा है कि राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए कैबिनेट की मंजूरी की ज़रूरत होती है, ऐसे में रात भर में कैबिनेट की मंजूरी कैसे ली गई?
इस सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि यह 'एलोकेशन ऑफ़ बिज़नेस रूल्स' के रूल नंबर 12 के तहत लिया गया फ़ैसला है और वैधानिक नज़रिए से बिल्कुल ठीक है.
रूल नंबर 12 कहता है कि प्रधानमंत्री को अधिकार है कि वे एक्सट्रीम अर्जेंसी (अत्यावश्यक) और अनफ़ोरसीन कंटिजेंसी (ऐसी संकट की अवस्था जिसकी कल्पना न की जा सके) में अपने-आप निर्णय ले सकते हैं. संविधान में यह बताया गया है कि जब भी राष्ट्रपति कोई निर्णय लेते हैं तो वह इसके लिए कैबिनेट की मंजूरी लेते हैं. अब इस मामले में कैबिनेट की बैठक कब हुई यह साफ़ नहीं है. फिर भी नियमों के अनुसार अगर प्रधानमंत्री अकेले भी राष्ट्रपति के फै़सले पर मंजूरी देते हैं तो वह भी कैबिनेट की ही मंजूरी मानी जाती है.'
इस बीच एक बार फिर संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल की भूमिका सवालों के घेरे आ गई है. सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर उन्होंने एनसीपी के किन विधायकों के समर्थन की चिट्ठी प्राप्त की और अगर उनके पास देवेंद्र फडणवीस सरकार बनाने के लिए आए भी तो उन्होंने सुबह तक का इंतज़ार क्यों नहीं किया? कांग्रेस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर अमित शाह के हित के लिए काम करने का आरोप लगाया. यह बातें निश्चित तौर पर राज्यपाल पर सवाल उठाने का काम करती हैं. उन्हें देवेंद्र फडणवीस से पूछना चाहिए था कि सरकार बनाने के लिए जो विधायक उनके साथ हैं उनके सिर्फ हस्ताक्षर ही नहीं चाहिए वो खुद भी राजभवन में मौजूद होने चाहिए. 
ख़ैर फडणवीस के शपथ ग्रहण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. शिव सेना ने देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथ ग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका दायर की. अब देश की सर्वोच्च अदालत ही यह फ़ैसला करेगी कि रात में बनी इस सरकार में कितने नियमों को ताक रखा गया.
अब चर्चा में है दल बदल कानून। आइए हम आपको समझाते हैं इस कानून के बारे में। दल-बदल क़ानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके. 1985 से पहले दल-बदल के ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं था. उस समय 'आया राम गया राम' मुहावरा ख़ूब प्रचलित था. दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद आया राम गया राम प्रचलित हो गया.
लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इसके ख़िलाफ़ विधेयक लेकर आई. संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. ये संविधान में 52वें संशोधन था. इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई. इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी ख़त्म हो सकती है.
कब-कब लागू होगा दल-बदल क़ानून
1. अगर कोई विधायक या सांसद ख़ुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है.
2. अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ जाता है.
3. अगर कोई सदस्य पार्टी ह्विप के बावजूद वोट नहीं करता.
4. अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है.
विधायक या सांसद बनने के बाद ख़ुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल क़ानून में आता है.
लेकिन इसमें अपवाद भी है......
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं होगी. वर्ष 2003 में इस क़ानून में संशोधन भी किया गया. जब ये क़ानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी भूल पार्टी में बँटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है. इसलिए ये प्रावधान ख़त्म कर दिया गया. इसके बाद संविधान में 91वाँ संशोधन जोड़ा गया. जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया. विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गँवाने से बच सकते हैं. अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं.
तो इन परिस्थितियों में नहीं लागू होगा दल बदल क़ानून:
1. जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मिल जाती है.
2. अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं.
3. अगर किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते है.
4. जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं.
स्पीकर के फ़ैसले की हो सकती है समीक्षा
10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक़ स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आख़िरी होगा. पैराग्राफ़ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता. लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया लेकिन पैराग्राफ़ 7 को असंवेधानिक क़रार दे दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फ़ैसले की क़ानूनी समीक्षा हो सकती है.
एनसीपी के 54 विधायक हैं, अगर अजित पवार 36 विधायकों का समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो दल-बदल क़ानून उन पर लागू नहीं होगा। अगर वो इतने नंबर नहीं ला पाते, तो उनकी सदस्यता जा सकती है.
अब मुझे कुछ और संदेह है कि इसमें एक बहुत बारीक चीज आप लोगों ने देखी हो तो ये कि अजीत पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली लेकिन ये भी कह रहे हैं कि हम एनसीपी में हैं और हमारे नेता भी शरद पवार हैं। एनसीपी ने अपना विधायक दल का नेता तो बदला लेकिन कानूनी तौर पर इसके बदलने का क्या प्रावधान है नहीं पता। क्या अजीत पवार का रोल नहीं है उसमें? एनसीपी ने अभी तक आधिकारिक तौर पर अपना चीफ व्हिप किसी को नहीं बनाया है तो हो सकता है कि राज्यपाल या सुप्रीम कोर्ट व्हिप जारी करने का अधिकार अजीत पवार को दे दें? और याद रहे कि वो पार्टी के महासचिव भी हैं।
और फ्लोर टेस्ट के दिन अजीत पवार बीजेपी के समर्थन में व्हिप जारी कर दें और एनसीपी विधायक विरोध में अपना वोट दे दें तो उनकी सदस्यता चली जाए। और बहुमत का आकडा ही खिसक कर 215/20 तक आ जाए? आप बीजेपी की खामोशी और आज उसके मुम्बई अध्यक्ष आशीष सेलार के बयान (अभी भी संवैधानिक तौर पर एनसीपी के विधायक दल के नेता अजीत पवार ही हैं,) से अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी रणनीति क्या हो सकती है।
एक दोस्त ने इसके जवाब में बताया कि महाराष्ट्र में एनसीपी विधानमंडल दल के नेता को लेकर तमाम मित्रों में संदेह है, विधानमंडल दल का नेता चुनने का अधिकार विधायकों (या बहुमत से विधायकों को) को है उन्होंने पहले अजित पवार को चुना लेकिन अगले दिन 41 विधायकों ने जयंत पाटिल को विधानमंडल दल का नेता चुन लिया। जो विधानमंडल दल का नेता होगा उसे व्हिप चुनने का अधिकार है अगर वो ऐसा नहीं करता है तो व्हिप की पावर विधानमंडल दल के नेता के पास ही रहेगी। यहां तक की अगर कल फिर एनसीपी अपना विधानमंडल दल का नेता बदलना चाहती है तो विधायक बहुमत से ऐसा फिर कर सकते हैं और स्पीकर से लेकर राज्यपाल दोनों के पास ये अधिकार नहीं है कि विधायकों के चुने हुए नेता के चुनाव को खारिज कर दे। बस इस परिवर्तन की सूचना पार्टी को राज्यपाल को देनी होती है जो जयंत पाटिल राजभवन जाकर दे चुके हैं और एहतियातन कल सभी विधायकों का साइन किया हुआ एफिडेविट भी सुप्रीम कोर्ट में जमा करेगी।

Saturday, October 12, 2019

सीरियन कुर्दों पर टर्की के हमले

उत्तरी सीरिया का इलाका है जहाँ कुर्दों का कब्ज़ा हुआ करता था. 2012 के आसपास जब आईएसआईएस ने अपना विस्तार किया तो ये इलाके भी उसके कब्जे में आ गए. फिर आती हैं अमेरिकी सेनाएं. वो पहले तो अकेले लड़ते रहे फिर कुर्द लड़ाकों को अपने साथ मिलकर इस्लामिक स्टेट मतलब ISIS के खिलाफ युद्ध छेड़ा।
एक अहम बात ये कि टर्की कुर्दों को बहुत पहले से आतंकवादी संगठन मानता था. लेकिन अमेरिकी सेना द्वारा दिए जा रहे संरक्षण की वजह से कुछ कर नहीं पा रहा था. अब कुछ समय से जब से इस्लामिक स्टेट कमजोर या उनके दावे के अनुसार ख़त्म हुआ तब से अमेरिका धीरे धीरे अपनी सेना वहां से हटाने लगा है.
अब फिर से एंट्री हुई टर्की की. तुर्की ने उत्तर-पूर्वी सीरिया में कुर्द लड़ाकों के क़ब्ज़े वाले इलाकों में हवाई हमले करना शुरू कर दिया है. कुर्दों के नेतृत्व वाले सुरक्षाबलों ने तुर्की के हमलों का जवाब दिया है और दोनों पक्षों के सैनिकों में संघर्ष हुआ है. जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इस्लामिक स्टेट को सीरिया से खदेड़ने में कुर्दों का बड़ा अमेरिकी और सीरियन सेना को बड़ा सहयोग रहा है. अब कुर्द अपने क़ाबू वाले इलाक़ों की जेलों में बंद हज़ारों इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों और शिविरों में रह रहे उनके रिश्तेदारों की सुरक्षा करते हैं. अगर टर्की से युद्ध हुआ तो वो आगे भी ऐसा ही करेंगे कह नहीं सकते, हो सकता है जरुरत पड़े तो उनको जेलों से निकलकर अपने साथ शामिल करके लड़ने का भी मौका दे दें. या फिर हो सकता है कि टर्की की सीमा से लगी जेलों में रह रहे आतंकियों को टर्की ही छोड़ दे, तो वो फिर से तैयार हो जाएं. इनकी संख्या लगभग 12 से 15 हजार के करीब बताई जाती है.
कुछ लोगों का कहना है कि अब अमेरिकी सेना इराक, अफगानिस्तान और सीरिया से धीरे धीरे अपनी सेना निकल रही है उसकी के चलते अब एक तरफ तो अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत की कोशिश जारी है. इसलिए ही वहां तालिबान की गतिविधियां फिर से शुरू हो गई हैं, दूसरी तरफ टर्की और ईरान जैसे देशों ने फिर से अपना दबाव बनाना चालू कर दिया है. कुछ लोग तो यहाँ तक बताते हैं कि इस्लामिक स्टेट के हारने के बाद अब अमेरिका को कुर्दों की जरुरत नहीं इसलिए उसने ही टर्की को ग्रीन सिग्नल दिया हमले करने के लिए. ट्रैम्प केवल बाहर से दिखावे के लिए कहते हैं कि अगर टर्की ने हद पार की तो उसकी अर्थव्यवस्था बर्बाद कर देंगे. अमेरिकी मीडिया में ही बहुत लोगों का कहना है कि ट्रम्प से खुद तुर्की के राष्ट्रपति  रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इस मुद्दे पर बात की थी. इसलिए उन्होंने अचानक ये फैसला लिया जबकि पेंटागन के अधिकारी तो इसके उलट ये चाहते थे कि फ़िलहाल अमेरिकी सेना की छोटी संख्या वहां रहनी चाहिए.
हमले के बीच हज़ारों लोगों का पलायन हो रहा है और कुर्दों का दावा है कि कई आम नागिरक मारे गए हैं. तुर्की का कहना है कि वो कुर्द लड़ाकों को हटाकर एक 'सेफ़-ज़ोन' तैयार करना चाहता है, जहां लाखों सीरियाई शरणार्थी भी रहते हैं. युद्ध कोई भी हो उसका सबसे बड़ा असर वहां औरतों को झेलना पड़ता है. अपना घर छोड़कर बच्चों को लिए सुरक्षित ठिकाने तलाशती कुर्द औरतों की कहानी आज बीबीसी ने एक रिपोर्ट में छापी थी जिसे सबको देखना चाहिए. आपको उससे शायद कश्मीर की स्थिति का भी थोड़ा बहुत अंदाजा हो जायेगा. तुर्की साथ साथ ये भी धमकी दे रहा है कि ये करवाई हमने अपनी सिमा सुरक्षा के लिए की है, अगर किसी ने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कब्जे की करवाई कही तो हम अपने यहाँ से सभी सीरियाई शरणार्थियों को यूरोप भेज देंगे. अब इसके बाद ईरान और रूस का भी दखल सीरिया में बढ़ जाएगा. और ये भी तय माना जा रहा है कि अब अमेरिका इस लड़ाई से दूर ही रहेगा. क्योंकि टर्की भी नाटो का बड़ा देश है.
इनके इतिहास की बात करें तो एक समय उस्मानी साम्राज्य के केंद्र रहे तुर्की में 20 फ़ीसदी आबादी कुर्दों की है. कुर्द संगठन आरोप लगाते हैं कि उनकी सांस्कृति पहचान को तुर्की में दबाया जा रहा है. ऐसे में कुछ संगठन 1980 के दशक से ही छापामार संघर्ष कर रहे हैं. कई सालों से वे आज़ादी की मांग कर रहे हैं. वे कुर्दिस्तान बनाना चाहते हैं. मध्य-पूर्व के नक्शे में नज़र डालें तो तुर्की के दक्षिण-पूर्व, सीरिया के उत्तर-पूर्व, इराक़ के उत्तर-पश्चिम और ईरान के उत्तर पश्चिम में ऐसा हिस्सा है, जहां कुर्द बसते हैं. कुर्द हैं तो सुन्नी मुस्लिम, मगर उनकी भाषा और संस्कृति अलग है. तुर्की इस बात से डरा हुआ है कि कुर्दों का एक राष्ट्र सा लगभग बना हुआ है, ऊपर से कुर्द लड़ाकों को आईएस के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अमरीका से हथियार भी मिले हैं. हो सकता है कि वे इतने शक्तिशाली हो जाएं कि सीरिया में आईएस से जीते हिस्से को इराक़ के कुर्दिस्तान से जोड़कर बड़ा सा कुर्द राष्ट्र बना लें. ऐसा हुआ तो तुर्की के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा. तुर्की को यह चिंता पहले भी थी. शुरू में जब आईएस के ख़िलाफ़ अमरीका ने क़ुर्दों से सहयोग लेना चाहा था, तब भी तुर्की ने इसका विरोध किया था. ऐसे में यह आशंका बनी हुई है कि जैसे ही अमरीका सीरिया से अपनी सेनाएं हटाएगा, तुर्की वहां पर कार्रवाई करके कुर्द इलाक़ों को ख़त्म कर देगा और उनके नियंत्रण वाली ज़मीन छीन लेगा.

Saturday, August 24, 2019

अमेजन के जंगलों में आग

अमेजन के जंगलों को दुनिया का फेफड़ा कहा जाता है, 20% आक्सिजन यहीं से मिलता है। अमेजन के जंगलों में 39000 करोड़ पेड़ हैं और 16,000 से अधिक जीव प्रजाति भी यहां रहती हैं। विश्व के कुल रेनफॉरेस्ट क्षेत्र का आधे से अधिक हिस्सा अकेले अमेजन के जंगल हैं। अमेजन के जंगलों का क्षेत्र 55 मिलियन स्क्वॉयर किमी। है जो भारत के कुल क्षेत्रफल से अधिक है। यह पूरी पृथ्वी के करीब 4% क्षेत्र में फैला हुआ है। विश्व के करीब 60% रेनफॉरेस्ट हिस्सा अकेले अमेजन जंगलों में है।
अमेजन जीव पारिस्थितिकी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। पृथ्वी के 30% से अधिक पेड़-पौधों और कीटों का निवास स्थान है।अमेजन में विश्व का 10% बायोमास (जीव ईंधन) है। इस कारण इन जंगलों में बड़ी मात्रा में पूरे विश्व का कॉर्बन रहता है। जंगल में लगी आग के कारण बड़े पैमाने पर जंगल से कॉर्बन उत्सर्जित होगा और यह ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ने का भी कारण है। इन जंगलों में लगी आग को लेकर देश के दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो आलोचकों के निशाने पर हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की पर्यावरण विरोधी बयानबाज़ियों के चलते जंगल साफ़ करने की गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हुई है। दूसरी तरफ राष्ट्रपति बोल्सोनारो का दावा है कि उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए एक एनजीओ ने जान-बूझकर आग लगाई है। बोल्सोनारो खास तौर पर पश्चिमी देशों पर निशाना साध रहे हैं और उनका कहना है कि आग को जबरन मुद्दा बनाया जा रहा है ताकि ब्राजील के आर्थिक विकास की गति को बाधित किया जा सके।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल के शुरुआती आठ महीने में ब्राज़ील के जंगलों में आग की 75,000 घटनाएं हुईं। साल 2013 के बाद ये रिकॉर्ड है। साल 2018 में आग की कुल 39,759 घटनाएं हुई थीं। आग से बड़े पैमाने पर कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा हो रहा है और कैम्स के अनुसार, इस साल अभी तक 228 मेगाटन के बराबर कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा हुई, जोकि 2010 के बाद सर्वाधिक है। इसके अलावा कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस भी पैदा हो रही है, जोकि ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में लकड़ी के जलने से पैदा होती है। कैस्म के नक्शे में दिख रहा है कि बहुत ही ज़हरीली कार्बन मोनो ऑक्साइड दक्षिणी अमरीका के तटीय इलाकों से आगे जा रही है। वनस्पति और जीव जंतुओं की 30 लाख प्रजातियों और 10 लाख मूलनिवासियों के आवास वाले अमेज़न बेसिन जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, क्योंकि इसके जंगल हर साल लाखों टन कार्बन उत्सर्जन को सोख लेते हैं। लेकिन जब पेड़ काटे या जलाए जाते हैं, उनके अंदर जमा हुआ कार्बन वायुमंडल में चला जाता है और वर्षावन की कार्बन अवशोषण की क्षमता भी जाती रहती है।
राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो ने एक आदेश जारी करते हुए प्रशासन को सीमाई, आदिवासी और संरक्षित इलाक़ों में सेना तैनात करने को कहा है। ब्राज़ील के राष्ट्रपति ने यह घोषणा यूरोपीय नेताओं के दबाव के बाद की है। दरअसल, फ़्रांस और आयरलैंड ने कहा था कि वह ब्राज़ील के साथ तब तक व्यापार सौदे को मंज़ूरी नहीं देंगे जब तक कि वह अमेज़न के जंगलों में लगी आग के लिए कुछ नहीं करता है।

Thursday, August 15, 2019

नो वन किल्ड पहलू खान?

अप्रैल 2017 में राजस्थान के अलवर में एक पिक अप वैन रोक कर पहलू ख़ान को उतारा जाता है, कुछ लोग मिलकर उसे मारते हैं, उस घटना का वीडियो भी बनता है लेकिन दो साल बाद 14 अगस्त 2019  को जब अलवर ज़िला न्यायालय का फैसला आता है, हत्या के मामले में गिरफ्तार लोगों को बरी कर दिया जाता है. फैसला आते ही अदालत के बाहर भारत माता की जय के नारे लगते हैं मगर इस बात को लेकर पराजय का अहसास नहीं है कि किसी को सरेआम मार कर भी हत्यारे बच सकते हैं. अदालत ने यह नहीं कहा कि हत्या ही नहीं हुई या जो मारा गया वो पहलू ख़ान नहीं था, यही कहा कि जो उसके सामने आरोपी लाए गए हैं वो बरी किए जाते हैं. भारत माता की जय करने वालों ने आरोपी का ख़्याल रखा, रखना भी चाहिए लेकिन जो मारा गया वो उनके जय के उद्घोष से बाहर कर दिया गया. आरोपी बरी हुए हैं, पहलू ख़ान को इंसाफ़ नहीं मिला है. हमारी पब्लिक ओपिनियन में इंसाफ़ की ये जगह है. जिसकी हत्या होगी उस पर चुप रहा जाएगा, आरोपी बरी होंगे तो भारत माता की जय कहा जाएगा. सब कुछ कितना बदल गया है. भारत माता की जय. भारत माता ने जयकारा सुनकर ज़रूर उस पुलिस की तरफ देखा होगा जो दो साल की तफ्तीश के बाद इंसाफ नहीं दिला सकी. पुलिस ने किस तरफ देखा होगा, ये बताने की ज़रूरत नहीं है. इसी वीडियो के सहारे पहलू ख़ान की घटना सामने आई थी. कोई भी देख सकता है कि कुछ लोग पहलू ख़ान और उसके बेटे को पिक अप वैन से उतार कर मार रहे हैं. इसी वीडियो के आधार पर राजस्थान की क्राइम ब्रांच और सीआईडी ने 9 आरोपियों को नामित किया और गिरफ्तार किया. इसमें दो नाबालिग थे. इस पूरे मामले में ट्रायल भी चला और इन सभी को राजस्थान हाईकोर्ट से ज़मानत मिल गई. हाईकोर्ट में सबने अपने बयान में कहा था कि ये मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद नहीं थे. पुलिस ने इस पूरे मामले में पहलू ख़ान के दोनों बेटों को गवाह बनाया था जो उस वक्त मौक़ा ए वारदात पर मौजूद थे. पुलिस की असफलता रही कि जिस व्यक्ति ने वीडियो शूट किया था वो कभी भी बयान देने नहीं आया. गवाह मुकर गया लेकिन वीडियो तो अब भी है. पुलिस ने यह नहीं कहा है कि वीडियो झूठा है. आरोपियों के वकील ने कहा कि वीडियो में जो लोग हैं उनके चेहरे आरोपी से नहीं मिलते हैं. अदालत ने अपने फैसले में यही कहा कि वीडियो में आरोपियों की शक्ल साफ-साफ नहीं है और वीडियो बनाने वाले ने कोर्ट में गवाही नहीं दी. एक तरफ ट्रायल चल रहा था दूसरी तरफ पहलू ख़ान के बेटे इरशाद को जान से मारने की धमकियां मिलती रहीं. विपिन यादव, रवींद कुमार, कालू राम, दयानंद, योगेश, भीमराठी. आज के फैसले में ये लोग बरी हो गए. जो नाबालिग हैं उनका मुकदमा अलग कोर्ट में चल रहा है. पहलू ख़ान ने मरने से पहले जिन छह लोगों के नाम लिये थे उन्हें सीबीसीआईडी ने पहली ही बरी कर दिया था यानि चार्जशीट ही नहीं किया. इनके नाम हैं, ओम यादव, हुकूम चंद यादव, सुधीर यादव, जगमल यादव, नवीन शर्मा, राहुल सैनी. यह सब बता रहा है कि पुलिस की जांच में कितनी खामियां हैं. पुलिस पर भरोसा नहीं रहा होगा या फिर किसी तरह मैनेज हो गया होगा, कोई वजह रही होगी जिसके कारण वीडियो बनाने वाला गवाही से मुकर गया. उसका मुकरना हमारी न्याय व्यवस्था पर भी टिप्पणी करता है. जिस वीडियो के आधार पर गिरफ्तारी हुई उसी वीडियो के आधार पर आरोपी बरी हो गए. लेकिन एक वीडियो और था, हमारे सहयोगी सौरव शुक्ला ने विपिन यादव का स्टिंग किया था जिसमें वह ट्रक रोकने से लेकर पहलू ख़ान को मारने की बात स्वीकार कर रहा है लेकिन अदालत ने इस वीडियो का भी संज्ञान नहीं लिया. सौरव ने यह स्टिंग पिछले साल अगस्त में दिखाया था.
इस घटना को लेकर मीडिया में पुलिस की जांच रिपोर्ट पर कई सवाल उठाए गए. एक रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि पुलिस ने अपनी एफआईआर में हत्या के प्रयास सेक्शन 307 की धारा ही नहीं लगाया. सेक्शन 308 लगा दिया यानि ग़ैर इरादतन हत्या का प्रयास. पहलू ख़ान की हत्या मॉब लिचिंग की शुरूआती घटनाओं में से थी. उसके बाद कई लोगों की भीड़ ने हत्या की. ज़्यादातर मामले पुलिस की जांच के कारण दम तोड़ गए.

हांगकांग आंदोलन

हांगकांग आंदोलन की चर्चाएं तो हम अपने फेसबुक फ्रेंड समर अनार्य से सुनते आ रहे थे लेकिन ठीक से पता तब चला जब  रवीश कुमार ने इस आंदोलन को टेक्निकली बताया। असल में 150 साल तक हांग कांग ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था. 1984 में ब्रिटेन और चीन के बीच एक डील हुई कि 1997 से हांग कांग चीन का हिस्सा बनेगा लेकिन उससे पहले 50 साल तक वहां एक मुल्क, दो सिस्टम लागू होगा. 2047 में हांगकांग का चीन में पूर्ण विलय हो जाएगा. तब तक के लिए हांग कांग के पास रक्षा और विदेश मामलों को छोड़ सारे अधिकार रहने थे.
हांगकांग में चीन के हस्तक्षेप के कारण कई कानून ऐसे बन गए जो वहां के लोगों को पसंद नहीं आए. उनका कहना है कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों  का हनन होता जा रहा है. इसके खिलाफ भी हमेशा प्रदर्शन हुए मगर उन्हें दबाया जाता रहा. हांगकांग के पास अभिव्यक्ति की आज़ादी है, जमा होने की आज़ादी है, अपना लीगल सिस्टम है. आर्थिक नीति भी अपनी है. मगर पिछले दिनों यहां एक कानून बनता है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे अपराध में पकड़ा जाता है जिस पर हांग कांग के कानून के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती तो उन्हें चीन भेज दिया जाएगा. जून से ही इस कानून के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे. लोगों का कहना था कि अगर यह क़ानून बन गया तो चीन इसे विरोधियों और आलोचकों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकता है. रवीश कुमार ने बताया कि हांगकांग के आंदोलनकारियों ने आंदोलन  का तरीका ही  बदल कर रख दिया है. उनकी तैयारी, उनके कपड़े और टेक्नालजी का इस्तमाल बता रहा है कि भविष्य का आंदोलन कितना मुश्किल हो जाएगा. हांग कांग के आंदोलनकारियों ने जो तरीका निकाला है क्या वो आज की सरकारों पर दबाव डालने के लिए पर्याप्त है, याद रखिए, सरकारों के पास टेक्नालजी के कारण लाखों की भीड़ पर नियंत्रण करने का तरीका है. वो चाहे तो लाखों लोगों का नेटवर्क गायब कर सकती है, कुछ हज़ार का और किसी एक का भी नेटवर्क समाप्त कर सकती है. आप अचानक दुनिया से लेकर अपने आस पास से कट जाएंगे. इसलिए कहा कि लोकतंत्र के हर छात्र को हांग कांग के प्रदर्शन का अध्ययन करना चाहिए, हांग कांग के लिए नहीं, अपने भविष्य के लिए. जैसे वहां की पुलिस जब आंदोलनकारियों से मुकाबला करने आती है तो उसके पास एक हाई डेफिनिशन कैमरा होता है जो झट से चेहरे की तस्वीर लेता है और सारा रिकॉर्ड बाहर कर देता है. इसकी मदद से लोगों की पहचान कर उनको पकड़कर जेल में डाला जा सकता है या प्रताड़ित कर तोड़ दिया जायेगा. मगर प्रदर्शनकारियों ने इसका भी जवाब निकाला है. जब वे पुलिस के करीब जाते हैं तो लेज़र चलाते रहते हैं. हरे और नीले रंग के लेज़र की किरणें कैमरे को कंफ्यूज़ कर देती हैं. कैमरे का लेंस ख़राब हो जाता है. तस्वीर साफ नहीं होती है. यहाँ के प्रदर्शन में एक वीडियो ने खूब चर्चा हासिल की जब लाखों की भीड़ के बीच से एक एम्बुलेंस बहुत आसानी से निकल गई. प्रदर्शनकारियों की इस तैयारी से दुनिया हैरान हो गई है कि यह कैसे संभव हो सकता है. पुलिस की नज़र से बचने के लिए प्रदर्शनकारी टेलीग्राम का इस्तमाल कर रहे हैं जिसमें सुरक्षा एजेंसिया हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं. इनकी तैयारी इतनी बढ़िया है कि भीड़ की वजह से आम लोगों को कोई असुविधा नहीं हो सकती है. अगर किसी को कोई सामान चाहिए तो वो हाथ के इशारे से बता दे तुरंत उसको वो सामान मिल जायेगा. पैलेट गन और रबर बुलेट से बचाने के लिए कचरे के टिन या घरेलू सामान से ढाल बना लेते हैं. तो अब पुलिस के पास ही कांच की ढाल नहीं है बल्कि प्रदर्शनकारियों के पास भी है. प्रदर्शनकारी भी पुलिस की तरह सभी लिबास से सुसज्जित हैं ताकि चोट कम से कम लगे. आंसू गैस बुझाने की भी कई लोगों को ट्रेनिंग दी गई है. आंसू गैस गिरता है और फिर उसे ट्रैफिक कोन से ढंक दिया जाता है या उसके फटने से पहले पानी डाल देते हैं. यह भी नियम है कि किसी जगह पर ज़्यादा देर तक नहीं रहना है. उसके लिए भी अलग से निर्देश हैं. जिसका इशारा होते ही भीड़ पल भर में छंट जाती है. पानी की तरह आना है और गुज़र जाना है. चेहरा पहचान में न आए इसलिए प्रदर्शनकारियों ने अपना चेहरा ढंक लिया है. ऑटोमेटिक इंटेलिजेंस के इस्तमाल से चेहरे की पहचान हो जाती है इसलिए बचने के लिए चेहरे पर मास्क लगा लेते हैं. यहां तक कि सीसीटीवी कैमरे को पेंट से पोत दिया गया है. दर्शनकारी अपना नाम नहीं बताते हैं. इनका कोई नेता नहीं जिसे पुलिस गिरफ्तार कर आंदोलन को बेकार कर दे. लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले मेट्रो ट्रेन में एक ही तरफ का टोकन लेते हैं. ताकि पता न चले कि कहां से कौन कहां गया था. ये लोग क्रेडिट कार्ड का भी इस्तमाल नहीं करते हैं. जहां प्रदर्शन करते हैं वहां न तो सेल्फी लेते हैं और न फोटो लेते हैं. ऐसे सिम का इस्तमाल करते हैं जिसे एक बार इस्तमाल करने के बाद फेंका जा सकता है. आंदोलन में शामिल लोगों ने अपने स्मार्टफोन से सभी प्रकार के ऐप डिलिट कर दिए हैं. चीनी सोशल मीडिया वीबो और वी चैट का इस्तमाल नहीं कर रहे हैं. आपस में बातचीत के लिए नए कोड का इस्तमाल हो रहा है. रैली की जगह पिकनिक का इस्तमाल करते हैं. मोबाइल सर्विस बंद हो जाने के कारण अपना एक ऐप बनाया है जिसके ज़रिए लोकल लेवल पर बातचीत हो जाती है.
चीन की सरकार ने प्रदर्शनकारियों की निंदा की है और यह भी कहा है कि वह चुप नहीं बैठेगा. ऐसे में इस बात को लेकर चर्चा होने लगी है कि क्या चीन अपना धैर्य खोकर सीधे हॉन्ग कॉन्ग में दख़ल दे सकता है? सवाल ये भी हैं कि हॉन्ग कॉन्ग में हस्तक्षेप करने के लिए चीन के पास क्या विकल्प हैं और क्या वो वहां अपनी सेना भेज सकता है? साल 1997 में जब हॉन्ग कॉन्ग को चीन के हवाले किया गया था तब से हॉन्ग कॉन्ग का संविधान इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट है कि चीन की सेना कब यहां हस्तक्षेप कर सकती है. 'एक देश-दो प्रणालियां' के तहत विशेष दर्जा रखने वाले हॉन्ग कॉन्ग में चीनी सेना सिर्फ़ तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब हॉन्ग कॉन्ग की सरकार इसके लिए अनुरोध करे या फिर क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए और आपदा के समय सेना की ज़रूरत हो. मगर विश्लेषकों का मानना है कि यह बात कल्पना से भी परे है कि चीन की सेना हॉन्ग कॉन्ग में देखने को मिलेगी. अगर चीनी सेना हॉन्ग कॉन्ग में विरोध कर रहे लोगों को रोकने के लिए आती है तो यह हॉन्ग कॉन्ग के लिए विनाशकारी होगा. भले ही सेना घातक बल प्रयोग न करे मगर उसके आने के कारण अर्थव्यवस्था के अस्थिर होने का ख़तरा पैदा हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय नाराज़गी भी बढ़ेगी. चीन को सौंपे जाने के बाद से ही हॉन्ग कॉन्ग आर्थिक रूप से काफ़ी मज़बूत रहा है. मगर अब चीन के शंघाई और शेनज़ेन जैसे शहरों ने भी तेज़ी से तरक्की की है. अगर हॉन्ग कॉन्ग चीनी शासन को चुनौती देता रहेगा तो सरकार निवेश और व्यापार का रुख़ हॉन्ग कॉन्ग के बजाय अपने अन्य हिस्सों की ओर मोड़ सकती है.इससे हॉन्ग कॉन्ग की अर्थव्यवस्था कमज़ोर होगी जिससे बिजिंग पर उसकी निर्भरता बढ़ेगी.

कश्मीर मुद्दे पर कानूनी पेंच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में जम्मू एवं कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश (UT) के दर्जे को अल्पकालिक कदम बताते हुए, भविष्य में वहां पूर्ण राज्य की बहाली का भरोसा जताया है. संविधान में अनुच्छेद 370 का प्रावधान भी अल्पकालिक था, जिसे ख़त्म करने में 70 वर्ष लग गए, तो अब UT से पूर्ण राज्य का दर्ज़ा कब और कैसे मिलेगा...? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार शांति बहाली के बाद पूर्ण राज्य के दर्जे की वापसी हो सकती है, परंतु मणिशंकर अय्यर और वाइको जैसे नेता कश्मीर घाटी में फिलस्तीन जैसी अराजक स्थिति और अलगाव का अंदेशा जताने से बाज़ नहीं आ रहे. नए केंद्रशासित प्रदेशों का जन्म 31 अक्टूबर को होगा, लेकिन उससे पहले नए कानून पर सरकार को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती का सामना करना पड़ेगा. 
 विभाजन के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसे पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) कहा जाता है. जम्मू एवं कश्मीर का लगभग 35 फीसदी हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है, जहां से पाकिस्तान दिवस पर इमरान खान अपने भारत विरोध का बिगुल फूक रहे हैं. दूसरी ओर, भारत की संसद द्वारा पारित जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन कानून में जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा क्षेत्र के लिए 90 सीटों के अलावा PoK क्षेत्र के लिए 24 सीटों का विशेष प्रावधान किया गया है. PoK के नाम पर ही कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता संसद में UN का अजब सुर अलाप रहे थे. मणिशंकर अय्यर और अधीर रंजन को संसद में सन 1964 के रिकॉर्ड का अध्ययन करना चाहिए, जब अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिए संसद में पेश प्राइवेट बिल को कांग्रेस के सात सांसदों का समर्थन मिला था. उसके बाद कांग्रेस की पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार के समय भारत की संसद ने प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान से PoK वापस लेने की मांग भी की थी. अब गृहमंत्री अमित शाह ने PoK को वापस लेने की मांग को संसद में दोहराया है. तो क्या पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के बाद ही जम्मू एवं कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा?
चीन और पाकिस्तान ने मिलकर भारत के उत्तरी भाग के सामरिक महत्व के इलाकों में अवैध कब्जा कर रखा है और भारत के पास जम्मू एवं कश्मीर का सिर्फ 45 फीसदी हिस्सा ही बचा है. जम्मू एवं कश्मीर के 20 फीसदी इलाके वाले अक्साई चिन और ट्रांस–कराकोरम ट्रैक्ट पर चीन ने 70 वर्ष से कब्जा जमा रखा है. विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने चीन यात्रा के दौरान सफाई देते हुए कहा है कि भारत ने चीन के क्षेत्र और सीमा में कोई दखलअंदाज़ी नहीं की है, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा है कि केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख में अक्साई चिन एवं ट्रांस का हिस्सा भी समाहित होगा. सन '47 में मिली आज़ादी के बाद से ही लद्दाख में अलग दर्जे की मांग उठने लगी थी. 70 साल बाद अलग केंद्रशासित प्रदेश बनने से अब वहां उल्लास का माहौल है.
जम्मू एवं कश्मीर में विशिष्ट संवैधानिक दर्जे के खात्मे के बावजूद पूर्वोत्तर राज्यों की तर्ज़ पर विशेष अनुदान की वित्तीय व्यवस्था बनी रहेगी. इसके तहत केंद्र सरकार द्वारा दी गई राशि में 90 फीसदी अनुदान और 10 फीसदी रकम बिना ब्याज के कर्ज के तौर पर मिलेगी. 14वें वित्त आयोग के सिफारिश के अनुसार, दोंनों नए केंद्रशासित प्रदेशों को स्पेशल फंड भी मिलेगा. हिमाचल प्रदेश की तर्ज़ पर जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के केंद्रशासित प्रदेशों में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने पर भी सशर्त प्रतिबंध जारी रह सकता है. स्वतंत्रता दिवस, यानी 15 अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश के लिए विशेष ग्रांट और विकास पैकेज का भी ऐलान कर सकते हैं. तो क्या विकास की मुख्यधारा में आने के बाद जम्मू एवं कश्मीर के पूर्ण राज्य में लद्दाख को फिर शामिल किया जाएगा?
अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी होने के बाद संविधान के सभी प्रावधान अब जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के नए UT में लागू होंगे. पुरानी व्यवस्था में कुल विधायकों के 15 फीसदी लोगों को मंत्री बनाया जा सकता था, परंतु अब केंद्रशासित प्रदेश में सिर्फ 10 फीसदी विधायकों को मंत्री बनने का मौका मिलेगा. नई व्यवस्था के तहत अब जम्मू एवं कश्मीर की विधान परिषद भी ख़त्म हो जाएगी. दोनों केंद्रशासित प्रदेशों के लिए एक ही हाईकोर्ट की व्यवस्था होगी. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद बनी नई संवैधानिक व्यवस्था में दोनों नए प्रदेशों में 113 केंद्रीय कानून भी लागू हो जाएंगे. अब इन राज्यों में RTI, IPC, CrPC, PC Act, आधार, मुस्लिम महिलाओं के लिए केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए अखिल भारतीय कानून लागू होंगे. सुरक्षाबलों को AFSPA कानून के तहत विशेष छूट और पुराने जनसुरक्षा कानून बरकरार रहने के साथ केंद्रीय राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) भी अब जम्मू एवं कश्मीर में लागू हो जाएगा.
जम्मू एवं कश्मीर राज्य पुनर्गठन कानून की धारा 13 के अनुसार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 239ए और 7वीं अनुसूची की व्यवस्था अब इस UT में लागू होगी. दोनों नए केंद्रशासित प्रदेशों में कानून व्यवस्था और पुलिस का नियंत्रण उपराज्यपाल के माध्यम से सीधे केंद्र सरकार के अधीन होगा. केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली की तर्ज पर लद्दाख में भूमि के मामलों का नियंत्रण केंद्र सरकार के अधीन होगा. जबकि जम्मू एवं कश्मीर में भूमि का नियंत्रण, वहां की नई निर्वाचित सरकार के अधीन हो सकता है. दोनों नए केंद्रशासित प्रदेशों की IAS और IPS जैसी अखिल भारतीय सेवाओं और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के अधिकारियों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण होगा. केंद्रशासित प्रदेशों में संपत्ति और संसाधनों के बंटवारे, प्रशासन के पुनर्गठन और विधानसभा की सीटों के परिसीमन में साल भर तो लगेगा ही. लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा का प्रावधान नहीं नहीं है. राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एक समाचारपत्र को दिए इंटरव्यू में कहा है कि जम्मू एवं कश्मीर में विधानसभा चुनाव में एक साल का समय लग सकता है. कानूनी चुनौतियों से पार पाने के बाद, अलगावाद पर लगाम लगे और पुनर्गठित राज्य में निर्वाचित सरकार का केंद्र सरकार से टकराव ख़त्म हो, तभी UT से पूर्ण राज्य के बहाली की उम्मीद करनी चाहिए.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...