Saturday, August 24, 2019

अमेजन के जंगलों में आग

अमेजन के जंगलों को दुनिया का फेफड़ा कहा जाता है, 20% आक्सिजन यहीं से मिलता है। अमेजन के जंगलों में 39000 करोड़ पेड़ हैं और 16,000 से अधिक जीव प्रजाति भी यहां रहती हैं। विश्व के कुल रेनफॉरेस्ट क्षेत्र का आधे से अधिक हिस्सा अकेले अमेजन के जंगल हैं। अमेजन के जंगलों का क्षेत्र 55 मिलियन स्क्वॉयर किमी। है जो भारत के कुल क्षेत्रफल से अधिक है। यह पूरी पृथ्वी के करीब 4% क्षेत्र में फैला हुआ है। विश्व के करीब 60% रेनफॉरेस्ट हिस्सा अकेले अमेजन जंगलों में है।
अमेजन जीव पारिस्थितिकी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। पृथ्वी के 30% से अधिक पेड़-पौधों और कीटों का निवास स्थान है।अमेजन में विश्व का 10% बायोमास (जीव ईंधन) है। इस कारण इन जंगलों में बड़ी मात्रा में पूरे विश्व का कॉर्बन रहता है। जंगल में लगी आग के कारण बड़े पैमाने पर जंगल से कॉर्बन उत्सर्जित होगा और यह ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ने का भी कारण है। इन जंगलों में लगी आग को लेकर देश के दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो आलोचकों के निशाने पर हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की पर्यावरण विरोधी बयानबाज़ियों के चलते जंगल साफ़ करने की गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हुई है। दूसरी तरफ राष्ट्रपति बोल्सोनारो का दावा है कि उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए एक एनजीओ ने जान-बूझकर आग लगाई है। बोल्सोनारो खास तौर पर पश्चिमी देशों पर निशाना साध रहे हैं और उनका कहना है कि आग को जबरन मुद्दा बनाया जा रहा है ताकि ब्राजील के आर्थिक विकास की गति को बाधित किया जा सके।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल के शुरुआती आठ महीने में ब्राज़ील के जंगलों में आग की 75,000 घटनाएं हुईं। साल 2013 के बाद ये रिकॉर्ड है। साल 2018 में आग की कुल 39,759 घटनाएं हुई थीं। आग से बड़े पैमाने पर कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा हो रहा है और कैम्स के अनुसार, इस साल अभी तक 228 मेगाटन के बराबर कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा हुई, जोकि 2010 के बाद सर्वाधिक है। इसके अलावा कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस भी पैदा हो रही है, जोकि ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में लकड़ी के जलने से पैदा होती है। कैस्म के नक्शे में दिख रहा है कि बहुत ही ज़हरीली कार्बन मोनो ऑक्साइड दक्षिणी अमरीका के तटीय इलाकों से आगे जा रही है। वनस्पति और जीव जंतुओं की 30 लाख प्रजातियों और 10 लाख मूलनिवासियों के आवास वाले अमेज़न बेसिन जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, क्योंकि इसके जंगल हर साल लाखों टन कार्बन उत्सर्जन को सोख लेते हैं। लेकिन जब पेड़ काटे या जलाए जाते हैं, उनके अंदर जमा हुआ कार्बन वायुमंडल में चला जाता है और वर्षावन की कार्बन अवशोषण की क्षमता भी जाती रहती है।
राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो ने एक आदेश जारी करते हुए प्रशासन को सीमाई, आदिवासी और संरक्षित इलाक़ों में सेना तैनात करने को कहा है। ब्राज़ील के राष्ट्रपति ने यह घोषणा यूरोपीय नेताओं के दबाव के बाद की है। दरअसल, फ़्रांस और आयरलैंड ने कहा था कि वह ब्राज़ील के साथ तब तक व्यापार सौदे को मंज़ूरी नहीं देंगे जब तक कि वह अमेज़न के जंगलों में लगी आग के लिए कुछ नहीं करता है।

Thursday, August 15, 2019

नो वन किल्ड पहलू खान?

अप्रैल 2017 में राजस्थान के अलवर में एक पिक अप वैन रोक कर पहलू ख़ान को उतारा जाता है, कुछ लोग मिलकर उसे मारते हैं, उस घटना का वीडियो भी बनता है लेकिन दो साल बाद 14 अगस्त 2019  को जब अलवर ज़िला न्यायालय का फैसला आता है, हत्या के मामले में गिरफ्तार लोगों को बरी कर दिया जाता है. फैसला आते ही अदालत के बाहर भारत माता की जय के नारे लगते हैं मगर इस बात को लेकर पराजय का अहसास नहीं है कि किसी को सरेआम मार कर भी हत्यारे बच सकते हैं. अदालत ने यह नहीं कहा कि हत्या ही नहीं हुई या जो मारा गया वो पहलू ख़ान नहीं था, यही कहा कि जो उसके सामने आरोपी लाए गए हैं वो बरी किए जाते हैं. भारत माता की जय करने वालों ने आरोपी का ख़्याल रखा, रखना भी चाहिए लेकिन जो मारा गया वो उनके जय के उद्घोष से बाहर कर दिया गया. आरोपी बरी हुए हैं, पहलू ख़ान को इंसाफ़ नहीं मिला है. हमारी पब्लिक ओपिनियन में इंसाफ़ की ये जगह है. जिसकी हत्या होगी उस पर चुप रहा जाएगा, आरोपी बरी होंगे तो भारत माता की जय कहा जाएगा. सब कुछ कितना बदल गया है. भारत माता की जय. भारत माता ने जयकारा सुनकर ज़रूर उस पुलिस की तरफ देखा होगा जो दो साल की तफ्तीश के बाद इंसाफ नहीं दिला सकी. पुलिस ने किस तरफ देखा होगा, ये बताने की ज़रूरत नहीं है. इसी वीडियो के सहारे पहलू ख़ान की घटना सामने आई थी. कोई भी देख सकता है कि कुछ लोग पहलू ख़ान और उसके बेटे को पिक अप वैन से उतार कर मार रहे हैं. इसी वीडियो के आधार पर राजस्थान की क्राइम ब्रांच और सीआईडी ने 9 आरोपियों को नामित किया और गिरफ्तार किया. इसमें दो नाबालिग थे. इस पूरे मामले में ट्रायल भी चला और इन सभी को राजस्थान हाईकोर्ट से ज़मानत मिल गई. हाईकोर्ट में सबने अपने बयान में कहा था कि ये मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद नहीं थे. पुलिस ने इस पूरे मामले में पहलू ख़ान के दोनों बेटों को गवाह बनाया था जो उस वक्त मौक़ा ए वारदात पर मौजूद थे. पुलिस की असफलता रही कि जिस व्यक्ति ने वीडियो शूट किया था वो कभी भी बयान देने नहीं आया. गवाह मुकर गया लेकिन वीडियो तो अब भी है. पुलिस ने यह नहीं कहा है कि वीडियो झूठा है. आरोपियों के वकील ने कहा कि वीडियो में जो लोग हैं उनके चेहरे आरोपी से नहीं मिलते हैं. अदालत ने अपने फैसले में यही कहा कि वीडियो में आरोपियों की शक्ल साफ-साफ नहीं है और वीडियो बनाने वाले ने कोर्ट में गवाही नहीं दी. एक तरफ ट्रायल चल रहा था दूसरी तरफ पहलू ख़ान के बेटे इरशाद को जान से मारने की धमकियां मिलती रहीं. विपिन यादव, रवींद कुमार, कालू राम, दयानंद, योगेश, भीमराठी. आज के फैसले में ये लोग बरी हो गए. जो नाबालिग हैं उनका मुकदमा अलग कोर्ट में चल रहा है. पहलू ख़ान ने मरने से पहले जिन छह लोगों के नाम लिये थे उन्हें सीबीसीआईडी ने पहली ही बरी कर दिया था यानि चार्जशीट ही नहीं किया. इनके नाम हैं, ओम यादव, हुकूम चंद यादव, सुधीर यादव, जगमल यादव, नवीन शर्मा, राहुल सैनी. यह सब बता रहा है कि पुलिस की जांच में कितनी खामियां हैं. पुलिस पर भरोसा नहीं रहा होगा या फिर किसी तरह मैनेज हो गया होगा, कोई वजह रही होगी जिसके कारण वीडियो बनाने वाला गवाही से मुकर गया. उसका मुकरना हमारी न्याय व्यवस्था पर भी टिप्पणी करता है. जिस वीडियो के आधार पर गिरफ्तारी हुई उसी वीडियो के आधार पर आरोपी बरी हो गए. लेकिन एक वीडियो और था, हमारे सहयोगी सौरव शुक्ला ने विपिन यादव का स्टिंग किया था जिसमें वह ट्रक रोकने से लेकर पहलू ख़ान को मारने की बात स्वीकार कर रहा है लेकिन अदालत ने इस वीडियो का भी संज्ञान नहीं लिया. सौरव ने यह स्टिंग पिछले साल अगस्त में दिखाया था.
इस घटना को लेकर मीडिया में पुलिस की जांच रिपोर्ट पर कई सवाल उठाए गए. एक रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि पुलिस ने अपनी एफआईआर में हत्या के प्रयास सेक्शन 307 की धारा ही नहीं लगाया. सेक्शन 308 लगा दिया यानि ग़ैर इरादतन हत्या का प्रयास. पहलू ख़ान की हत्या मॉब लिचिंग की शुरूआती घटनाओं में से थी. उसके बाद कई लोगों की भीड़ ने हत्या की. ज़्यादातर मामले पुलिस की जांच के कारण दम तोड़ गए.

हांगकांग आंदोलन

हांगकांग आंदोलन की चर्चाएं तो हम अपने फेसबुक फ्रेंड समर अनार्य से सुनते आ रहे थे लेकिन ठीक से पता तब चला जब  रवीश कुमार ने इस आंदोलन को टेक्निकली बताया। असल में 150 साल तक हांग कांग ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था. 1984 में ब्रिटेन और चीन के बीच एक डील हुई कि 1997 से हांग कांग चीन का हिस्सा बनेगा लेकिन उससे पहले 50 साल तक वहां एक मुल्क, दो सिस्टम लागू होगा. 2047 में हांगकांग का चीन में पूर्ण विलय हो जाएगा. तब तक के लिए हांग कांग के पास रक्षा और विदेश मामलों को छोड़ सारे अधिकार रहने थे.
हांगकांग में चीन के हस्तक्षेप के कारण कई कानून ऐसे बन गए जो वहां के लोगों को पसंद नहीं आए. उनका कहना है कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों  का हनन होता जा रहा है. इसके खिलाफ भी हमेशा प्रदर्शन हुए मगर उन्हें दबाया जाता रहा. हांगकांग के पास अभिव्यक्ति की आज़ादी है, जमा होने की आज़ादी है, अपना लीगल सिस्टम है. आर्थिक नीति भी अपनी है. मगर पिछले दिनों यहां एक कानून बनता है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे अपराध में पकड़ा जाता है जिस पर हांग कांग के कानून के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती तो उन्हें चीन भेज दिया जाएगा. जून से ही इस कानून के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे. लोगों का कहना था कि अगर यह क़ानून बन गया तो चीन इसे विरोधियों और आलोचकों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकता है. रवीश कुमार ने बताया कि हांगकांग के आंदोलनकारियों ने आंदोलन  का तरीका ही  बदल कर रख दिया है. उनकी तैयारी, उनके कपड़े और टेक्नालजी का इस्तमाल बता रहा है कि भविष्य का आंदोलन कितना मुश्किल हो जाएगा. हांग कांग के आंदोलनकारियों ने जो तरीका निकाला है क्या वो आज की सरकारों पर दबाव डालने के लिए पर्याप्त है, याद रखिए, सरकारों के पास टेक्नालजी के कारण लाखों की भीड़ पर नियंत्रण करने का तरीका है. वो चाहे तो लाखों लोगों का नेटवर्क गायब कर सकती है, कुछ हज़ार का और किसी एक का भी नेटवर्क समाप्त कर सकती है. आप अचानक दुनिया से लेकर अपने आस पास से कट जाएंगे. इसलिए कहा कि लोकतंत्र के हर छात्र को हांग कांग के प्रदर्शन का अध्ययन करना चाहिए, हांग कांग के लिए नहीं, अपने भविष्य के लिए. जैसे वहां की पुलिस जब आंदोलनकारियों से मुकाबला करने आती है तो उसके पास एक हाई डेफिनिशन कैमरा होता है जो झट से चेहरे की तस्वीर लेता है और सारा रिकॉर्ड बाहर कर देता है. इसकी मदद से लोगों की पहचान कर उनको पकड़कर जेल में डाला जा सकता है या प्रताड़ित कर तोड़ दिया जायेगा. मगर प्रदर्शनकारियों ने इसका भी जवाब निकाला है. जब वे पुलिस के करीब जाते हैं तो लेज़र चलाते रहते हैं. हरे और नीले रंग के लेज़र की किरणें कैमरे को कंफ्यूज़ कर देती हैं. कैमरे का लेंस ख़राब हो जाता है. तस्वीर साफ नहीं होती है. यहाँ के प्रदर्शन में एक वीडियो ने खूब चर्चा हासिल की जब लाखों की भीड़ के बीच से एक एम्बुलेंस बहुत आसानी से निकल गई. प्रदर्शनकारियों की इस तैयारी से दुनिया हैरान हो गई है कि यह कैसे संभव हो सकता है. पुलिस की नज़र से बचने के लिए प्रदर्शनकारी टेलीग्राम का इस्तमाल कर रहे हैं जिसमें सुरक्षा एजेंसिया हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं. इनकी तैयारी इतनी बढ़िया है कि भीड़ की वजह से आम लोगों को कोई असुविधा नहीं हो सकती है. अगर किसी को कोई सामान चाहिए तो वो हाथ के इशारे से बता दे तुरंत उसको वो सामान मिल जायेगा. पैलेट गन और रबर बुलेट से बचाने के लिए कचरे के टिन या घरेलू सामान से ढाल बना लेते हैं. तो अब पुलिस के पास ही कांच की ढाल नहीं है बल्कि प्रदर्शनकारियों के पास भी है. प्रदर्शनकारी भी पुलिस की तरह सभी लिबास से सुसज्जित हैं ताकि चोट कम से कम लगे. आंसू गैस बुझाने की भी कई लोगों को ट्रेनिंग दी गई है. आंसू गैस गिरता है और फिर उसे ट्रैफिक कोन से ढंक दिया जाता है या उसके फटने से पहले पानी डाल देते हैं. यह भी नियम है कि किसी जगह पर ज़्यादा देर तक नहीं रहना है. उसके लिए भी अलग से निर्देश हैं. जिसका इशारा होते ही भीड़ पल भर में छंट जाती है. पानी की तरह आना है और गुज़र जाना है. चेहरा पहचान में न आए इसलिए प्रदर्शनकारियों ने अपना चेहरा ढंक लिया है. ऑटोमेटिक इंटेलिजेंस के इस्तमाल से चेहरे की पहचान हो जाती है इसलिए बचने के लिए चेहरे पर मास्क लगा लेते हैं. यहां तक कि सीसीटीवी कैमरे को पेंट से पोत दिया गया है. दर्शनकारी अपना नाम नहीं बताते हैं. इनका कोई नेता नहीं जिसे पुलिस गिरफ्तार कर आंदोलन को बेकार कर दे. लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले मेट्रो ट्रेन में एक ही तरफ का टोकन लेते हैं. ताकि पता न चले कि कहां से कौन कहां गया था. ये लोग क्रेडिट कार्ड का भी इस्तमाल नहीं करते हैं. जहां प्रदर्शन करते हैं वहां न तो सेल्फी लेते हैं और न फोटो लेते हैं. ऐसे सिम का इस्तमाल करते हैं जिसे एक बार इस्तमाल करने के बाद फेंका जा सकता है. आंदोलन में शामिल लोगों ने अपने स्मार्टफोन से सभी प्रकार के ऐप डिलिट कर दिए हैं. चीनी सोशल मीडिया वीबो और वी चैट का इस्तमाल नहीं कर रहे हैं. आपस में बातचीत के लिए नए कोड का इस्तमाल हो रहा है. रैली की जगह पिकनिक का इस्तमाल करते हैं. मोबाइल सर्विस बंद हो जाने के कारण अपना एक ऐप बनाया है जिसके ज़रिए लोकल लेवल पर बातचीत हो जाती है.
चीन की सरकार ने प्रदर्शनकारियों की निंदा की है और यह भी कहा है कि वह चुप नहीं बैठेगा. ऐसे में इस बात को लेकर चर्चा होने लगी है कि क्या चीन अपना धैर्य खोकर सीधे हॉन्ग कॉन्ग में दख़ल दे सकता है? सवाल ये भी हैं कि हॉन्ग कॉन्ग में हस्तक्षेप करने के लिए चीन के पास क्या विकल्प हैं और क्या वो वहां अपनी सेना भेज सकता है? साल 1997 में जब हॉन्ग कॉन्ग को चीन के हवाले किया गया था तब से हॉन्ग कॉन्ग का संविधान इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट है कि चीन की सेना कब यहां हस्तक्षेप कर सकती है. 'एक देश-दो प्रणालियां' के तहत विशेष दर्जा रखने वाले हॉन्ग कॉन्ग में चीनी सेना सिर्फ़ तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब हॉन्ग कॉन्ग की सरकार इसके लिए अनुरोध करे या फिर क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए और आपदा के समय सेना की ज़रूरत हो. मगर विश्लेषकों का मानना है कि यह बात कल्पना से भी परे है कि चीन की सेना हॉन्ग कॉन्ग में देखने को मिलेगी. अगर चीनी सेना हॉन्ग कॉन्ग में विरोध कर रहे लोगों को रोकने के लिए आती है तो यह हॉन्ग कॉन्ग के लिए विनाशकारी होगा. भले ही सेना घातक बल प्रयोग न करे मगर उसके आने के कारण अर्थव्यवस्था के अस्थिर होने का ख़तरा पैदा हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय नाराज़गी भी बढ़ेगी. चीन को सौंपे जाने के बाद से ही हॉन्ग कॉन्ग आर्थिक रूप से काफ़ी मज़बूत रहा है. मगर अब चीन के शंघाई और शेनज़ेन जैसे शहरों ने भी तेज़ी से तरक्की की है. अगर हॉन्ग कॉन्ग चीनी शासन को चुनौती देता रहेगा तो सरकार निवेश और व्यापार का रुख़ हॉन्ग कॉन्ग के बजाय अपने अन्य हिस्सों की ओर मोड़ सकती है.इससे हॉन्ग कॉन्ग की अर्थव्यवस्था कमज़ोर होगी जिससे बिजिंग पर उसकी निर्भरता बढ़ेगी.

कश्मीर मुद्दे पर कानूनी पेंच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में जम्मू एवं कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश (UT) के दर्जे को अल्पकालिक कदम बताते हुए, भविष्य में वहां पूर्ण राज्य की बहाली का भरोसा जताया है. संविधान में अनुच्छेद 370 का प्रावधान भी अल्पकालिक था, जिसे ख़त्म करने में 70 वर्ष लग गए, तो अब UT से पूर्ण राज्य का दर्ज़ा कब और कैसे मिलेगा...? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार शांति बहाली के बाद पूर्ण राज्य के दर्जे की वापसी हो सकती है, परंतु मणिशंकर अय्यर और वाइको जैसे नेता कश्मीर घाटी में फिलस्तीन जैसी अराजक स्थिति और अलगाव का अंदेशा जताने से बाज़ नहीं आ रहे. नए केंद्रशासित प्रदेशों का जन्म 31 अक्टूबर को होगा, लेकिन उससे पहले नए कानून पर सरकार को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती का सामना करना पड़ेगा. 
 विभाजन के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसे पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) कहा जाता है. जम्मू एवं कश्मीर का लगभग 35 फीसदी हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है, जहां से पाकिस्तान दिवस पर इमरान खान अपने भारत विरोध का बिगुल फूक रहे हैं. दूसरी ओर, भारत की संसद द्वारा पारित जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन कानून में जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा क्षेत्र के लिए 90 सीटों के अलावा PoK क्षेत्र के लिए 24 सीटों का विशेष प्रावधान किया गया है. PoK के नाम पर ही कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता संसद में UN का अजब सुर अलाप रहे थे. मणिशंकर अय्यर और अधीर रंजन को संसद में सन 1964 के रिकॉर्ड का अध्ययन करना चाहिए, जब अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिए संसद में पेश प्राइवेट बिल को कांग्रेस के सात सांसदों का समर्थन मिला था. उसके बाद कांग्रेस की पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार के समय भारत की संसद ने प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान से PoK वापस लेने की मांग भी की थी. अब गृहमंत्री अमित शाह ने PoK को वापस लेने की मांग को संसद में दोहराया है. तो क्या पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के बाद ही जम्मू एवं कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा?
चीन और पाकिस्तान ने मिलकर भारत के उत्तरी भाग के सामरिक महत्व के इलाकों में अवैध कब्जा कर रखा है और भारत के पास जम्मू एवं कश्मीर का सिर्फ 45 फीसदी हिस्सा ही बचा है. जम्मू एवं कश्मीर के 20 फीसदी इलाके वाले अक्साई चिन और ट्रांस–कराकोरम ट्रैक्ट पर चीन ने 70 वर्ष से कब्जा जमा रखा है. विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने चीन यात्रा के दौरान सफाई देते हुए कहा है कि भारत ने चीन के क्षेत्र और सीमा में कोई दखलअंदाज़ी नहीं की है, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा है कि केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख में अक्साई चिन एवं ट्रांस का हिस्सा भी समाहित होगा. सन '47 में मिली आज़ादी के बाद से ही लद्दाख में अलग दर्जे की मांग उठने लगी थी. 70 साल बाद अलग केंद्रशासित प्रदेश बनने से अब वहां उल्लास का माहौल है.
जम्मू एवं कश्मीर में विशिष्ट संवैधानिक दर्जे के खात्मे के बावजूद पूर्वोत्तर राज्यों की तर्ज़ पर विशेष अनुदान की वित्तीय व्यवस्था बनी रहेगी. इसके तहत केंद्र सरकार द्वारा दी गई राशि में 90 फीसदी अनुदान और 10 फीसदी रकम बिना ब्याज के कर्ज के तौर पर मिलेगी. 14वें वित्त आयोग के सिफारिश के अनुसार, दोंनों नए केंद्रशासित प्रदेशों को स्पेशल फंड भी मिलेगा. हिमाचल प्रदेश की तर्ज़ पर जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के केंद्रशासित प्रदेशों में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने पर भी सशर्त प्रतिबंध जारी रह सकता है. स्वतंत्रता दिवस, यानी 15 अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश के लिए विशेष ग्रांट और विकास पैकेज का भी ऐलान कर सकते हैं. तो क्या विकास की मुख्यधारा में आने के बाद जम्मू एवं कश्मीर के पूर्ण राज्य में लद्दाख को फिर शामिल किया जाएगा?
अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी होने के बाद संविधान के सभी प्रावधान अब जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के नए UT में लागू होंगे. पुरानी व्यवस्था में कुल विधायकों के 15 फीसदी लोगों को मंत्री बनाया जा सकता था, परंतु अब केंद्रशासित प्रदेश में सिर्फ 10 फीसदी विधायकों को मंत्री बनने का मौका मिलेगा. नई व्यवस्था के तहत अब जम्मू एवं कश्मीर की विधान परिषद भी ख़त्म हो जाएगी. दोनों केंद्रशासित प्रदेशों के लिए एक ही हाईकोर्ट की व्यवस्था होगी. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद बनी नई संवैधानिक व्यवस्था में दोनों नए प्रदेशों में 113 केंद्रीय कानून भी लागू हो जाएंगे. अब इन राज्यों में RTI, IPC, CrPC, PC Act, आधार, मुस्लिम महिलाओं के लिए केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए अखिल भारतीय कानून लागू होंगे. सुरक्षाबलों को AFSPA कानून के तहत विशेष छूट और पुराने जनसुरक्षा कानून बरकरार रहने के साथ केंद्रीय राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) भी अब जम्मू एवं कश्मीर में लागू हो जाएगा.
जम्मू एवं कश्मीर राज्य पुनर्गठन कानून की धारा 13 के अनुसार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 239ए और 7वीं अनुसूची की व्यवस्था अब इस UT में लागू होगी. दोनों नए केंद्रशासित प्रदेशों में कानून व्यवस्था और पुलिस का नियंत्रण उपराज्यपाल के माध्यम से सीधे केंद्र सरकार के अधीन होगा. केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली की तर्ज पर लद्दाख में भूमि के मामलों का नियंत्रण केंद्र सरकार के अधीन होगा. जबकि जम्मू एवं कश्मीर में भूमि का नियंत्रण, वहां की नई निर्वाचित सरकार के अधीन हो सकता है. दोनों नए केंद्रशासित प्रदेशों की IAS और IPS जैसी अखिल भारतीय सेवाओं और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के अधिकारियों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण होगा. केंद्रशासित प्रदेशों में संपत्ति और संसाधनों के बंटवारे, प्रशासन के पुनर्गठन और विधानसभा की सीटों के परिसीमन में साल भर तो लगेगा ही. लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा का प्रावधान नहीं नहीं है. राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एक समाचारपत्र को दिए इंटरव्यू में कहा है कि जम्मू एवं कश्मीर में विधानसभा चुनाव में एक साल का समय लग सकता है. कानूनी चुनौतियों से पार पाने के बाद, अलगावाद पर लगाम लगे और पुनर्गठित राज्य में निर्वाचित सरकार का केंद्र सरकार से टकराव ख़त्म हो, तभी UT से पूर्ण राज्य के बहाली की उम्मीद करनी चाहिए.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...