Saturday, May 30, 2020

WHO और ग्लोबल पाॅलिटिक्स

WHO से अमेरिका ने सारे संबंध तोड़ लिए है अमेरिका का यह कदम बिल्कुल ठीक है यह सच है कि कोरोना के मामले चीन पाकसाफ नही है ...........लेकिन जिस तरह से WHO व्यहवार कर रहा था यह साफ दिख रहा था कि वह चीन को लेकर अब भी सॉफ्ट कार्नर रख रहा है कल की खबर मीडिया खूब दिखा रहा है लेकिन 28 मई को ही WHO ने अप्रत्यक्ष रूप साफ कर दिया था कि उसे अमेरिका के फंड की कोई जरूरत भी नहीं है....दरअसल 1948 में स्थापित WHO को दो तरह से फंडिंग मिलती है। 

पहला, संगठन का हिस्सा बनने के लिए हर सदस्य को एक खास राशि चुकानी पड़ती है जिसे असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन कहते हैं। यह राशि सदस्य देश की आबादी और विकास दर पर निर्भर करती है। अभी 148 देश इसके सदस्य है

दूसरा तरीका होता है वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन यानि कि चंदे की राशि का। यह राशि सरकारें और चैरिटी संस्थान दोनों दो सकते हैं।

70 के दशक तक डब्ल्यूएचओ को  उसके बजट की करीब आधी रकम सदस्य देशों से असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन के तौर पर मिलती थी, लेकिन अब यह राशि केवल 20 प्रतिशत ही रह गई है। अब संगठन को वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन से ज्यादा धनराशि मिल रही है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन उन संस्थानों और देशों पर ज्यादा निर्भर होने लगा है जो ज्यादा योगदान करते हैं। 

पिछले सालों में चीन का योगदान 52 फीसदी तक बढ़ गया है। चीन अब 8.6 करोड़ डॉलर दे रहा है। चीन की आबादी ज्यादा होने से असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन भी ज्यादा है, लेकिन इसी के साथ चीन ने वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन भी बढ़ाया है।

यह जानकारी हमे अब हमारा मीडिया दे रहा है पर वह आज भी हमे नही बता रहा है कि उसे सबसे अधिक वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन देने वाला सिर्फ एक ही व्यक्ति है ओर उसी के बैकअप के कारण WHO ट्रम्प से पंगा लेने को तैयार हो गया है और उस व्यक्ति का नाम है बिल गेट्स, 
गेट्स की फाउंडेशन ओर उसके द्वारा फंडेड संस्थाएं WHO की इतनी फंडिंग करती है जितनी अमेरिका जैसा देश भी नही करता बिल गेट्स ने पिछले महीने ट्रंप द्वारा WHO के फंड रोके जाने पर कहा था, 'ये जितना सुनने में लगता है उतना ही खतरनाक है'. इतना ही नहीं बिल गेट्स ने हाल ही में एक ओपिनियन आर्टिकल में कोरोना वायरस को लेकर अमेरिकी ऐडमिनिस्ट्रेशन की आलोचना की थी

अब चीन के बारे में समझते हैं 2010 के दशक के आरंभ से ही संयुक्त राष्ट्र के कई संस्थानों में चीन के लोगों का प्रभाव बढ़ा है। इनमें से कई संस्थाओं के हेड चीन के हैं या फिर चीन के समर्थन से है

अंतरराष्ट्रीय संगठनों में चीन का बढ़ता दबदबा, विश्व राजनीति में संघर्ष के नए नए मोर्चे खोल रहा है. और इस संघर्ष में विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले मोर्चे पर ही शिकार बन गया है. याद कीजिए कि विश्व स्वास्थ्य संगठन, उन पहले अंतरराष्ट्रीय संगठनों में से एक था, जिसने चीन के साथ सहमति पत्र पर दस्तख़त किए थे. जिनके अंतर्गत विवादित बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव के दायरे में स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं को बढ़ावा देना था.

यानी WHO को यह दिन तो एक दिन देखना ही था अब wHO ने अपनी फंडिंग के लिए अलग व्यवस्था की है उसने डब्ल्यूएचओ फाउंडेशन के नाम से 27 मई को ही एक नयी संस्था का निर्माण किया है डब्ल्यूएचओ फाउंडेशन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (who) से अलग संस्था है जो स्विट्जरलैंड में पंजीकृत है। यहीं जिनेवा में डब्ल्यूएचओ का मुख्यालय भी है। वह डब्ल्यूएचओ के कामकाज के लिए गैर-पारंपरिक स्रोतों से पैसे (fund) जुटायेगा। ये पैसे आम लोगों और बड़े दानदाताओं से जुटाये जाएंगे। सहमति पत्र के जरिये दोनों संगठन एक-दूसरे से संबद्ध होंगे।

साफ है कि WHO तो सर्वाइव कर जाएगा बड़ा प्रश्न यह है कि भारत क्या WHO के मामले में ट्रम्प का साथ देगा?...मेरे ख्याल से नही!.......लेकिन हा यदि बिल गेट्स का बैकअप नही होता तो जरूर भारत ट्रम्प के निर्णय के साथ होता ........इसीलिए बिल गेट्स को संसार का सबसे बड़ा डॉक्टर कहा जाता है।

अमेरिका में अश्वेत असमानता

मैंने पिछले दिनों वेस्टर्न देशों ब्लैक कम्युनिटी पर होने वाली हिंसा पर दस से अधिक फ़िल्में या डॉक्यूमेंट्री देखी हैं. असल कहानी पर बानी एक फिल्म blackkklansman का सीन मैंने आप सबको लिखकर समझाया था.
वो सीन एक बार फिर से असल में दोहराया गया है. "एक आदमी का नाम था जॉर्ज फ्लॉयड, ये अफ्रीकन समुदाय का आदमी अमेरिका के Michigan में बाउंसर की नौकरी करता था. किसी ने पुलिस को उसकी शिकायत कर दी कि उसपर जालसाजी करने का "शक" है. पुलिस ने जॉर्ज को पकड़ा, और गाडी के पिछले टायर के पास पटक दिया, और गर्दन पर घुटना रखकर दबा दिया. वो चिल्लाता रहा, " मैं मर रहा हूँ, मुझे छोड़ दो, मुझे पानी दे दो, मैंने कुछ नहीं किया है, सब आरोप झूठे हैं, मुझे मत मारो. और अंत में उसकी आवाज धीमी पड़ गई, वो केवल तीन शब्द ही बोल सका, " I CAN'T BREATH"
इस सबके लिए जिम्मेदार है एक मानसिकता जो खुद को काले लोगों से सुपीरियर समझती है. अब इस घटना ने अमेरिका में हंगामा खड़ा कर दिया है, लोग जुलूस निकाल रहे हैं, पुलिस से भिड़ रहे हैं और नारे लगा रहे हैं. पुलिस प्रदर्शनकारियों का दमन भी कर रही है लेकिन लोग हैं कि पीछे हटने को तैयार नहीं. लोगों ने पुलिस स्टेशन को भी फूंक दिया है.इस सबमें पुलिस के साथ साथ प्रेजिडेंट ट्रम्प की भी आलोचना हो रही है, उनकी ट्विटर से चल रही झड़प इसी सबके बीच हो रही है. वहां पत्रकार से लेकर सेलिब्रिटी सब अपने नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों को जानते हैं इसलिए फुटबॉल प्लेयर्स से लेकर हॉलीवुड के एक्टर्स भी लगातार इसके खिलाफ आवाज उठा रहे. दूसरी तरफ ट्रम्प प्रदर्शन कर रहे लोगों को धमकी दे रहे हैं गोली मरने की.
आइए अब आपको ले चलते हैं इतिहास में. 2019 में न्यूयार्क टाइम्स के गुलामी प्रथा के 400 साल पूरे होने पर एक रिपोर्ट छापी। जिसका नाम था, प्रोजेक्ट 1619. इसको पुलित्जर एवार्ड भी मिला था. इसके शुरुआती शब्द थे........., 
"साल 1619, अगस्त का महीना, जगह थी.... वर्जीनिया बंदरगाह के पास जगह प्वाइंट कम्फर्ट। यहाँ एक जहाज में 20 से अधिक अफ़्रीकी लोग थे, जिनको गुलाम बनाकर अमेरिकी जमीन पर लाया गया था. इस धरती पर आगे चलकर जो देश बना, बसा, या विकसित हुआ उसका कोई भी पहलू इस गुलामी प्रथा से अछूता नहीं रहा. वो प्रथा जो आगे आने वाले कई दशकों तक यहाँ काबिज रही, इस दिन के 400 साल पूरे होने पर अब समय है कि ये कहानी सबको सुना ही देनी चाहिए."
 इस कहानी में जिन 20 लोगों का जिक्र है इन्ही लोगों से अमेरिका में लम्बी गुलामी प्रथा की शुरुआत हुई थी. इन लोगों को अमेरिका के जेम्स टाउन के साम्राज्यवादियों ने समुद्री लुटेरों से ख़रीदा था. ये लुटेरे इन अफ्रीकियों को पुर्तगाल के एक जहाज से लूट कर लाये थे. ये 20 लोग अमेरिका में रह रहे सभी अफ़्रीकी लोगों के वंशज थे. जिन्हें उनके घरों से लूटकर, जहाज में भरकर, और जानवरों की तरह बेंचा जाना था. ताकि वो अपनी मेहनत सेे खेतों में फसल पैदा कर सकें. गुलामों ने अमेरिका में कारखानों में मजदूरी से लेकर खेतों में कपास उगाने और उसे रंगने वाले नील बनाने, चाय से लेकर उसमें पड़ने वाली शक्कर तक बनाने का काम किया.
फिर 1662 में वर्जीनिया लॉ ने गुलामी को Hereditary कर दिया. मतलब गुलाम माँ का बच्चा भी गुलाम माना जायेगा। इस कानून की एक लाइन थी, "इस देश में पैदा हुआ हर बच्चा, उसकी माँ के स्टेटस से तय होगा."
फिर सवाल ये कि दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश अमेरिका के क़ानून ने इनको कोई मदद की? जवाब है नहीं.
"Deceleration of Independence" जो 1773 में आया. जिसमें लिखा है कि दुनिया का  हर मनुष्य बराबर है, उन्हें बनाने वाले ईश्वर ने कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं जिनको छीना नहीं जा सकता। इसमें जीवन और आजादी का
अधिकार सबसे ऊपर है. लेकिन ये शब्द जिसपर ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़कर आजादी  हासिल करने वाले देश की नींव रखी गई, उसकी इस गारंटी से कुछ लोगों को बाहर रखा गया था, और ये वही गुलाम लोग थे. फिर लगभग 110 साल बाद संविधान में 13th amendment आया, इसे "Evolution of Slavery" कहते हैं. मलतब गुलामी की प्रथा का खात्मा. 
क्या इसके बाद सब बराबर हो गए? जवाब है नहीं. उनके बच्चो के स्कूल से लेकर बस्तियां तक अलग हो थी. फिर 2008 में इसी समुदाय के बराक ओबामा सबसे बड़े पद पर पहुंचे. मतलब बदलाव तो आया है लेकिन अभी भी एक धड़े में गोरे लोगों के श्रेष्ठ होने की मानसिकता घुसी हुई है. आज भी पुलिस अश्वेत लोगों को आसानी से अपराधी समझ लेती है. उनपर हिंसा होती है.
मैंने ऊपर जिस जॉर्ज की कहानी बताई उसी इलाके में कुछ दिन पहले कुछ लोग हाथ में मशीन गन लेकर लोकडाउन ख़तम करने की मांग करते हुए पुलिस स्टेशन पहुँच गए थे लेकिन पुलिस ने उनको समझा कर वापस भेज दिया। उनको मारा पीटा नहीं, क्योंकि वो गोरे थे. लेकिन इस आंदोलन में शामिल लोगों पर रबर बुलेट चलाई जा रहीं, जेल में डाला जा रहा. लेकिन इसके बीच सबसे बड़ी उम्मीद की किरण ये है कि ब्लैक लोगों के साथ अमेरिका के गोरे लोगों का एक बड़ा धड़ा है, जो इस मानसिकता का विरोध करता है.अब जब अमेरिका की बात हो चुकी तो हमारे देश में भी क्या अभी भी किसी की जाति के नाम पर, किसी के धर्म के नाम पर, किसी के रंग के नाम पर, किसी के कद के नाम पर, किसी की भाषा या किसी के प्रदेश के नाम पर भेदभाव होता है? क्या हमने भी ये किया है? ईमानदारी से पूछिए खुद से और जवाब दीजिये.

Friday, May 1, 2020

इजरायल में कोरोना के पीछे नेतन्याहू सरकार

इजरायल में एक साल के भीतर तीन चुनाव (अप्रैल 2019, सितम्बर 2019 और मार्च 2020) हो चुके हैं। जिसमें 120 सीटों वाली संसद में अबतक किसी को बहुमत (61 सीटें) नहीं मिला है। पार्टियों में कभी गठबंधन का फैसला हो नहीं पाया। पिछले चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 36 और विपक्षी पार्टी ब्लू एंड व्हाइट को 33 सीटें मिलीं। नेतन्याहू ने कोशिश की सभी दक्षिणपंथी और धार्मिक पार्टियों से गठबंधन की लेकिन आकडा 58 ही पहुंच पाया। ब्लू एंड व्हाइट, लेबर पार्टी और विपक्षी दलों के पास मिलाकर 55 सीटें ही पहुंच पाईं। बाकी कुछ सीटें स्वतंत्रत लोगों के पास थीं।
अब नेतन्याहू ने विपक्षी दल के नेता बेनी गैंट के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बना ली है संविधान के इमरजेन्सी नियमों के आधार पर, क्योंकि वो एक साल से कार्यकारी प्रधानमंत्री थे। अब इस सरकार में पहले 18 महीने नेतन्याहू पीएम और बेनी रक्षामंत्री रहेंगे और अगले 18 महीने इसका उल्टा मतलब बेनी पीएम बनेंगे लेकिन नेतन्याहू के लिए एक अल्टरनेटिव पीएम का पद बनाया जाएगा। हलांकि दबाव में आकर सरकार बनाने की मंजूरी देने वाले विपक्षी नेता बेनी गैंट के सहयोगी उनका साथ छोड चुके हैं। नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। उनपर अपराध तय हो चुके थे, 17 मार्च से मुकदमा भी शुरू होना था, लेकिन उसके कुछ दिन पहले ही इजरायल के पूरे कोर्ट सिस्टम पर ही रोक लगा दी गई। अब ट्रायल की अगली तारीख 24 मई है। अब नेतन्याहू पूरी तरह से प्रंट फुट पर हैं। पूरे लीगल सिस्टम की आलोचना कर रहे हैं कि वो उनको काम नहीं करने दे रहा। वो इजरायल की जनता की भावनाओं को जानते हैं कि लोग आतंकवाद से कितना नफरत करते हैं इसलिए कोरोना को एक सुसाईड बमर की तरह बता रहे, जिसे केवल मैं ही हरा सकता हूँ। अब कोरोना इमरजेन्सी के बाद यहाँ बहुत कुछ दिलचस्प होगा। क्योंकि मुकदमा चलना है और अटार्नी जरनल भी नेतन्याहू की पसंद का होगा। लोगों का ये भी मानना है कि 18 महीने बाद वो बेनी के साथ डील तोड भी सकते हैं। लेकिन जनता अब भी लाॅकडाउन के नियमों का पालन करके विरोध प्रदर्शन करने लगी है कि तीन चुनाव हार चुका भ्रष्ट नेता फिर से देश कैसे चला सकता है?

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...