WHO से अमेरिका ने सारे संबंध तोड़ लिए है अमेरिका का यह कदम बिल्कुल ठीक है यह सच है कि कोरोना के मामले चीन पाकसाफ नही है ...........लेकिन जिस तरह से WHO व्यहवार कर रहा था यह साफ दिख रहा था कि वह चीन को लेकर अब भी सॉफ्ट कार्नर रख रहा है कल की खबर मीडिया खूब दिखा रहा है लेकिन 28 मई को ही WHO ने अप्रत्यक्ष रूप साफ कर दिया था कि उसे अमेरिका के फंड की कोई जरूरत भी नहीं है....दरअसल 1948 में स्थापित WHO को दो तरह से फंडिंग मिलती है।
पहला, संगठन का हिस्सा बनने के लिए हर सदस्य को एक खास राशि चुकानी पड़ती है जिसे असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन कहते हैं। यह राशि सदस्य देश की आबादी और विकास दर पर निर्भर करती है। अभी 148 देश इसके सदस्य है
दूसरा तरीका होता है वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन यानि कि चंदे की राशि का। यह राशि सरकारें और चैरिटी संस्थान दोनों दो सकते हैं।
70 के दशक तक डब्ल्यूएचओ को उसके बजट की करीब आधी रकम सदस्य देशों से असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन के तौर पर मिलती थी, लेकिन अब यह राशि केवल 20 प्रतिशत ही रह गई है। अब संगठन को वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन से ज्यादा धनराशि मिल रही है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन उन संस्थानों और देशों पर ज्यादा निर्भर होने लगा है जो ज्यादा योगदान करते हैं।
पिछले सालों में चीन का योगदान 52 फीसदी तक बढ़ गया है। चीन अब 8.6 करोड़ डॉलर दे रहा है। चीन की आबादी ज्यादा होने से असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन भी ज्यादा है, लेकिन इसी के साथ चीन ने वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन भी बढ़ाया है।
यह जानकारी हमे अब हमारा मीडिया दे रहा है पर वह आज भी हमे नही बता रहा है कि उसे सबसे अधिक वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन देने वाला सिर्फ एक ही व्यक्ति है ओर उसी के बैकअप के कारण WHO ट्रम्प से पंगा लेने को तैयार हो गया है और उस व्यक्ति का नाम है बिल गेट्स,
गेट्स की फाउंडेशन ओर उसके द्वारा फंडेड संस्थाएं WHO की इतनी फंडिंग करती है जितनी अमेरिका जैसा देश भी नही करता बिल गेट्स ने पिछले महीने ट्रंप द्वारा WHO के फंड रोके जाने पर कहा था, 'ये जितना सुनने में लगता है उतना ही खतरनाक है'. इतना ही नहीं बिल गेट्स ने हाल ही में एक ओपिनियन आर्टिकल में कोरोना वायरस को लेकर अमेरिकी ऐडमिनिस्ट्रेशन की आलोचना की थी
अब चीन के बारे में समझते हैं 2010 के दशक के आरंभ से ही संयुक्त राष्ट्र के कई संस्थानों में चीन के लोगों का प्रभाव बढ़ा है। इनमें से कई संस्थाओं के हेड चीन के हैं या फिर चीन के समर्थन से है
अंतरराष्ट्रीय संगठनों में चीन का बढ़ता दबदबा, विश्व राजनीति में संघर्ष के नए नए मोर्चे खोल रहा है. और इस संघर्ष में विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले मोर्चे पर ही शिकार बन गया है. याद कीजिए कि विश्व स्वास्थ्य संगठन, उन पहले अंतरराष्ट्रीय संगठनों में से एक था, जिसने चीन के साथ सहमति पत्र पर दस्तख़त किए थे. जिनके अंतर्गत विवादित बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव के दायरे में स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं को बढ़ावा देना था.
यानी WHO को यह दिन तो एक दिन देखना ही था अब wHO ने अपनी फंडिंग के लिए अलग व्यवस्था की है उसने डब्ल्यूएचओ फाउंडेशन के नाम से 27 मई को ही एक नयी संस्था का निर्माण किया है डब्ल्यूएचओ फाउंडेशन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (who) से अलग संस्था है जो स्विट्जरलैंड में पंजीकृत है। यहीं जिनेवा में डब्ल्यूएचओ का मुख्यालय भी है। वह डब्ल्यूएचओ के कामकाज के लिए गैर-पारंपरिक स्रोतों से पैसे (fund) जुटायेगा। ये पैसे आम लोगों और बड़े दानदाताओं से जुटाये जाएंगे। सहमति पत्र के जरिये दोनों संगठन एक-दूसरे से संबद्ध होंगे।
साफ है कि WHO तो सर्वाइव कर जाएगा बड़ा प्रश्न यह है कि भारत क्या WHO के मामले में ट्रम्प का साथ देगा?...मेरे ख्याल से नही!.......लेकिन हा यदि बिल गेट्स का बैकअप नही होता तो जरूर भारत ट्रम्प के निर्णय के साथ होता ........इसीलिए बिल गेट्स को संसार का सबसे बड़ा डॉक्टर कहा जाता है।
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