Saturday, May 30, 2020

अमेरिका में अश्वेत असमानता

मैंने पिछले दिनों वेस्टर्न देशों ब्लैक कम्युनिटी पर होने वाली हिंसा पर दस से अधिक फ़िल्में या डॉक्यूमेंट्री देखी हैं. असल कहानी पर बानी एक फिल्म blackkklansman का सीन मैंने आप सबको लिखकर समझाया था.
वो सीन एक बार फिर से असल में दोहराया गया है. "एक आदमी का नाम था जॉर्ज फ्लॉयड, ये अफ्रीकन समुदाय का आदमी अमेरिका के Michigan में बाउंसर की नौकरी करता था. किसी ने पुलिस को उसकी शिकायत कर दी कि उसपर जालसाजी करने का "शक" है. पुलिस ने जॉर्ज को पकड़ा, और गाडी के पिछले टायर के पास पटक दिया, और गर्दन पर घुटना रखकर दबा दिया. वो चिल्लाता रहा, " मैं मर रहा हूँ, मुझे छोड़ दो, मुझे पानी दे दो, मैंने कुछ नहीं किया है, सब आरोप झूठे हैं, मुझे मत मारो. और अंत में उसकी आवाज धीमी पड़ गई, वो केवल तीन शब्द ही बोल सका, " I CAN'T BREATH"
इस सबके लिए जिम्मेदार है एक मानसिकता जो खुद को काले लोगों से सुपीरियर समझती है. अब इस घटना ने अमेरिका में हंगामा खड़ा कर दिया है, लोग जुलूस निकाल रहे हैं, पुलिस से भिड़ रहे हैं और नारे लगा रहे हैं. पुलिस प्रदर्शनकारियों का दमन भी कर रही है लेकिन लोग हैं कि पीछे हटने को तैयार नहीं. लोगों ने पुलिस स्टेशन को भी फूंक दिया है.इस सबमें पुलिस के साथ साथ प्रेजिडेंट ट्रम्प की भी आलोचना हो रही है, उनकी ट्विटर से चल रही झड़प इसी सबके बीच हो रही है. वहां पत्रकार से लेकर सेलिब्रिटी सब अपने नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों को जानते हैं इसलिए फुटबॉल प्लेयर्स से लेकर हॉलीवुड के एक्टर्स भी लगातार इसके खिलाफ आवाज उठा रहे. दूसरी तरफ ट्रम्प प्रदर्शन कर रहे लोगों को धमकी दे रहे हैं गोली मरने की.
आइए अब आपको ले चलते हैं इतिहास में. 2019 में न्यूयार्क टाइम्स के गुलामी प्रथा के 400 साल पूरे होने पर एक रिपोर्ट छापी। जिसका नाम था, प्रोजेक्ट 1619. इसको पुलित्जर एवार्ड भी मिला था. इसके शुरुआती शब्द थे........., 
"साल 1619, अगस्त का महीना, जगह थी.... वर्जीनिया बंदरगाह के पास जगह प्वाइंट कम्फर्ट। यहाँ एक जहाज में 20 से अधिक अफ़्रीकी लोग थे, जिनको गुलाम बनाकर अमेरिकी जमीन पर लाया गया था. इस धरती पर आगे चलकर जो देश बना, बसा, या विकसित हुआ उसका कोई भी पहलू इस गुलामी प्रथा से अछूता नहीं रहा. वो प्रथा जो आगे आने वाले कई दशकों तक यहाँ काबिज रही, इस दिन के 400 साल पूरे होने पर अब समय है कि ये कहानी सबको सुना ही देनी चाहिए."
 इस कहानी में जिन 20 लोगों का जिक्र है इन्ही लोगों से अमेरिका में लम्बी गुलामी प्रथा की शुरुआत हुई थी. इन लोगों को अमेरिका के जेम्स टाउन के साम्राज्यवादियों ने समुद्री लुटेरों से ख़रीदा था. ये लुटेरे इन अफ्रीकियों को पुर्तगाल के एक जहाज से लूट कर लाये थे. ये 20 लोग अमेरिका में रह रहे सभी अफ़्रीकी लोगों के वंशज थे. जिन्हें उनके घरों से लूटकर, जहाज में भरकर, और जानवरों की तरह बेंचा जाना था. ताकि वो अपनी मेहनत सेे खेतों में फसल पैदा कर सकें. गुलामों ने अमेरिका में कारखानों में मजदूरी से लेकर खेतों में कपास उगाने और उसे रंगने वाले नील बनाने, चाय से लेकर उसमें पड़ने वाली शक्कर तक बनाने का काम किया.
फिर 1662 में वर्जीनिया लॉ ने गुलामी को Hereditary कर दिया. मतलब गुलाम माँ का बच्चा भी गुलाम माना जायेगा। इस कानून की एक लाइन थी, "इस देश में पैदा हुआ हर बच्चा, उसकी माँ के स्टेटस से तय होगा."
फिर सवाल ये कि दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश अमेरिका के क़ानून ने इनको कोई मदद की? जवाब है नहीं.
"Deceleration of Independence" जो 1773 में आया. जिसमें लिखा है कि दुनिया का  हर मनुष्य बराबर है, उन्हें बनाने वाले ईश्वर ने कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं जिनको छीना नहीं जा सकता। इसमें जीवन और आजादी का
अधिकार सबसे ऊपर है. लेकिन ये शब्द जिसपर ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़कर आजादी  हासिल करने वाले देश की नींव रखी गई, उसकी इस गारंटी से कुछ लोगों को बाहर रखा गया था, और ये वही गुलाम लोग थे. फिर लगभग 110 साल बाद संविधान में 13th amendment आया, इसे "Evolution of Slavery" कहते हैं. मलतब गुलामी की प्रथा का खात्मा. 
क्या इसके बाद सब बराबर हो गए? जवाब है नहीं. उनके बच्चो के स्कूल से लेकर बस्तियां तक अलग हो थी. फिर 2008 में इसी समुदाय के बराक ओबामा सबसे बड़े पद पर पहुंचे. मतलब बदलाव तो आया है लेकिन अभी भी एक धड़े में गोरे लोगों के श्रेष्ठ होने की मानसिकता घुसी हुई है. आज भी पुलिस अश्वेत लोगों को आसानी से अपराधी समझ लेती है. उनपर हिंसा होती है.
मैंने ऊपर जिस जॉर्ज की कहानी बताई उसी इलाके में कुछ दिन पहले कुछ लोग हाथ में मशीन गन लेकर लोकडाउन ख़तम करने की मांग करते हुए पुलिस स्टेशन पहुँच गए थे लेकिन पुलिस ने उनको समझा कर वापस भेज दिया। उनको मारा पीटा नहीं, क्योंकि वो गोरे थे. लेकिन इस आंदोलन में शामिल लोगों पर रबर बुलेट चलाई जा रहीं, जेल में डाला जा रहा. लेकिन इसके बीच सबसे बड़ी उम्मीद की किरण ये है कि ब्लैक लोगों के साथ अमेरिका के गोरे लोगों का एक बड़ा धड़ा है, जो इस मानसिकता का विरोध करता है.अब जब अमेरिका की बात हो चुकी तो हमारे देश में भी क्या अभी भी किसी की जाति के नाम पर, किसी के धर्म के नाम पर, किसी के रंग के नाम पर, किसी के कद के नाम पर, किसी की भाषा या किसी के प्रदेश के नाम पर भेदभाव होता है? क्या हमने भी ये किया है? ईमानदारी से पूछिए खुद से और जवाब दीजिये.

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