Wednesday, November 30, 2022

रवीश कुमार के नाम पत्र

Dear Ravish Kumar जी,
मैं 2012 तक एक साधारण सा सिम्पल सोचने वाला लड़का हुआ करता था। जो गर्व से कहो हम हिंदू हैं लिखता और आरक्षण के खिलाफ बोला करता था।
एक बार कहीं से प्रवासियों पर बनाई गई "रवीश की रिपोर्ट देख ली", तो एक प्रवासी होने के नाते आपकी बात अच्छी लग गई। दिलचस्पी बढ़ी तो फॉलो करने लगा। फिर कस्बा (आपका ब्लॉग) पढ़ने लगा, उससे मेरी राजनीतिक, साहित्यिक और वैचारिक सोच थोड़ी बढ़ने लगी। 
और कहते हैं कि अगर आप पढ़ाई ना करो तो कोई दिक्कत ही नहीं है सब ठीक ठाक चलता रहता है। दिक्कत शुरू होती है जब आप किताबें पढ़ कर सोचना और तर्क देना शुरू कर दें। आपसे आदत पड़ी तो उसके बाद तो अपने स्तर से खूब पढ़ा और लड़ा।
10 साल तक आपका प्राइम टाइम लगातार देखा। जब सरकार ने एनडीटीवी पर एक दिन का बैन लगाया तब से लेकर जब आपको नोटिस भेजे जाते थे, या सोसल मीडिया पर गालियां मिलीं हर जगह आपके साथ स्टैंड किया।
ब्लॉग, पोस्ट, लप्रेक कुछ कविता या शायरी लिखना हुआ या किसी अनजान को ये खुले पत्र लिखना भी आपसे सीखा था तो वही पत्र आपके नाम लिख रहा हूं।
ये लिखते हुए थोड़ा इमोशनल हूं क्योंकि मैंने एक उम्र को आपको देखते, सुनते और पढ़ते हुए जिया है। जिंदगी के कई फैसले आपको सुन या पढकर बनी हुई सोच से लिए होंगे।

एक इंटरव्यू में आपसे किसी ने पूछा कि आपने कभी एनडीटीवी क्यों नहीं छोड़ा? पानी बहते रहना चाहिए नहीं तो दुर्गंध आने लगती है। तो आपने कहा कि जब भाग दौड़ भरी जिंदगी में आपको शांति चाहिए तो वो ठहरे हुए पानी के पास ही मिलेगी। इसलिए मैंने बड़े बड़े पैकेज पर भी एनडीटीवी नहीं छोड़ा। प्रणब राय ने आपको हर तरह की छूट दी। ये बात मुझे एनडीटीवी से जोड़े रखती थी। इंडियन मीडिया का एक मात्र एप है मेरे फोन में जिसके इरिटेटिंग एलर्ट रिंगटोन के बावजूद भी रखा था, आज वो भी डिलीट कर रहा हूं।
अब जब से अडानी ने एनडीटीवी के शेयर खरीदे थे तब से ही हमको आपके वहां से जाने का अंदाजा हम सबको था। हमारे लिए मीडिया मतलब एनडीटीवी और एनडीटीवी मतलब रवीश था, अब आप जा रहे हैं तो हमारा मीडिया को देखना भी लगभग खतम ही हो रहा है।
एक छोटी सी सलाह है कि आप अब एंकरिंग में ऊबे हुए से लगते हैं। और खूब तो पत्रकारिता से लड़ चुके हैं इसलिए अब राजनीति में आ जाइए क्योंकि कोई और चैनल तो आपको एफोर्ड नहीं कर सकता है।
भविष्य के लिए शुभकामनाएं।

आपका शिष्य:
कमलेश कुमार 

Sunday, November 20, 2022

आम आदमी पार्टी पर बहुत जरुरी टिप्पणी

आजकल बहुत से दोस्त पूछते हैं कि मेरा आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल से मन क्यों उचटता जा रहा है? 
क्या मैंने कांग्रेस को ही सबसे अच्छी पार्टी और राहुल गाँधी को सबसे बढ़िया नेता मान लिया है?
जवाब है बिलकुल नहीं. जरुरत पड़ने पर मैं अपने हिसाब से आलोचना भी कर लेता हूँ. बस गाली गलौच का मेरा नेचर नहीं तो वो नहीं देखने को मिलेगा. यहाँ तक कि केजरीवाल के बारे में एक भी भला बुरा शब्द नहीं कहा और न कभी कहना चाहूंगा क्योंकि उस आदमी को मैंने पसंद किया है और अपना नेता मानता था/शायद अभी मानता हूँ पता नहीं, क्योंकि अभी भी उनको सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
केवल बात ये बता रहा था कि अब मेरा मन क्यों हटने लगा? मेरी अपनी अपनी राजनितिक समझ के साथ साथ अर्थशास्त्र और कानून पर भी राय और जानकारी है, इसलिए राहुल गाँधी कभी नेशनल हेराल्ड केश और संजय राउत पात्र चॉल घोटाले में निराधार फंसाये गए, ये नहीं कह सकता. राहुल गाँधी वाले में कंपनी और डोनेशन/ट्रस्ट कानूनों की अनदेखी हुई और कई गड़बड़ किए गए जबकि संजय राउत ने तो सैकड़ों करोड़ सीधे तौर पर डकार लिए. ईडी, इन्कम टैक्स या कोई भी जांच एजेंसी बिना किसी गड़बड़ के किसी को नहीं फंसा सकती है. हाँ ये कह सकते हैं कि किसी ने थोड़ा किया होगा तो ज्यादा में फंसा दिया. या विपक्ष को पकड़ती है और बीजेपी वालों को नहीं छूती. मायावती, मुलायम सिंह, जयललिता या जगन रेड्डी पर कांग्रेस ने जब जांच बिठाई थी तो भी सब एकदम झूठ तो नहीं था न अब है.
अरविन्द केजरीवाल जी राजनीति बदलने आये थे. पहले उन पर राज्यसभा के टिकट बेचने के आरोप गुप्ता बंधुओं के बाद से ही लगने लगे थे, हालाँकि दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी ऐसे आरोप लगे, और अब MCD चुनावों में भी यही आरोप लग रहे हैं. एक एक पार्षद एक करोड़ की टिकट ले रहा, और ये बात मैं किसी टिकट न मिलने वाले के आरोप पर नहीं कह रहा मेरी अपनी पहचान के कुछ लोगों ने बताई है ये बात.
मनीष सिसोदिया या उनके करीबियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, सत्येंद्र जैन पर भ्रष्टाचार के आरोप आज से नहीं कई सालों से लग रहे, सुकेश चंद्रशेखर नाम का ठग केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को सैकड़ो करोड़ रूपये देने का आरोप लगातार लगा रहा है, मैं अमानतुल्लाह का नाम इसमें नहीं लूंगा क्योंकि उनके खिलाफ तो पुलिस ही लाइव झूठी साबित हो गई थी. और पंजाब में जिस मंत्री को हटाया भ्रष्टाचार को लेकर उसमें भगवंत मान की तारीफ भी करता हूँ. लेकिन दूसरी पार्टियों पर भी आरोप तो इसी तरह के लगते हैं न? अगर इसके बावजूद मैं आपको बाकी सबसे अलग मानता रहूं तो मतलब मैं भी भक्त ही हो जाऊँगा जो कहता है मेरे प्रभु पर लगा हर आरोप गलत है.
अभी मैं ना उनके हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की विचारधारा पर सवाल कर रहा और न ही उनके विकास मॉडल पर सवाल करूँगा कि कितना पैसा विकास में लगाया और कितना विज्ञापन में खर्च किया. मैंने जब देखा था दिल्ली में तब काफी काम हुए थे, उसके बाद से बहुत निजी अनुभव नहीं लेकिन फिर भी मानता हूं कि शिक्षा का एक मॉडल तैयार किया है, जो पंजाब में होना बाकी है. मैं कानून व्यवस्था पर आपसे सवाल नहीं करूँगा क्योंकि दिल्ली में पुलिस आपके पास नहीं है (हालाँकि आप प्राइवेट वालिंटियर लगाकर सुरक्षा के वादे करते थे) और पंजाब में आपको बहुत कम समय हुआ है, जहां कानून व्यवस्था बहुत खराब है। इसलिए अभी जल्दबाजी में नशे के कारोबार पर हुई कार्यवाही पर नहीं पूछ रहा।
मैं केवल वो सवाल उठा रहा हूँ कि जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ आप लोग राजनीति में आये, वही अब खुद करने लगे. अगर भ्रष्टाचार के इन सवालों को कोई ऐसे ही टाल देता और बेबुनियाद आरोप बता देता है तो भाई साहब आप क्या करते थे शुरू में? किसी की डायरी में किसी का नाम हो, किसी सोसल मीडिया की वायरल हुई लिस्ट को स्विस बैंक का खाता धारक बता देना, कितने ऐसे घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोप इन्होने लगाए और कोर्ट में माफ़ी मांगी? कितने घोटालों के केश बंद हुए और कितने नेताओं को इनके आरोपों पर सजा मिली या मुकदमें अदालत में टिके। अगर तब आप पर भरोसा किया लोगों ने तो जब आप पर वही आरोप लगेंगे तो कैसे झूठे आरोप मान लिए जाए?

Sunday, October 23, 2022

ऋषि सुनक V/S पेनी मॉर्डेन्ट/बोरिस जॉनसन?

गुरुवार को ब्रिटेन की प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस के इस्तीफ़ा देने के बाद दोबारा सुनक को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद की रेस में बताया जा रहा है. इस बीच वहां के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज़ है कि पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भी पद पर वापसी कर सकते हैं. हालांकि जेरेमी हंट का भी नाम सामने आया था, लेकिन उन्होंने लीडरशिप की दौड़ में शामिल होने से इनकार कर दिया.
इस बीच पेनी मॉरडॉन्ट ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद की रेस के लिए आधिकारिक तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर दी है. वो पिछली दौड़ में भी शामिल हुई थीं, लेकिन नाकाम रही थीं.
पार्टी में ऐसे सांसद हैं जो बोरिस जॉनसन को वापस लाना चाहते हैं, कुछ दूसरे सांसदों का कहना है कि अगर बोरिस लौटते हैं तो वो इस्तीफ़ा दे देंगे.
42 साल के ऋषि सुनक इस साल जुलाई तक देश के वित्त मंत्री थे. उनके इस्तीफ़े के बाद ही पार्टी में उस समय के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के ख़िलाफ़ पार्टी में विद्रोह शुरू हुआ था और कई मंत्रियों ने अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया था.
उनके इस्तीफे के बाद बोरिस जॉनसन को भी प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा था. कई हफ़्तों तक चले लीडरशिप की दौड़ में पार्टी सांसदों ने ऋषि सुनक और लीज़ ट्रस को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना.
पार्टी के 1 लाख 60 हज़ार से अधिक सदस्यों को इन दोनों में से एक को चुनना था. लिज़ ट्रस को ज़्यादा सदस्यों का समर्थन मिला और वो प्रधानमंत्री बन गईं, और सुनक हार गए.
लिज़ ट्रस ने टैक्स कम करने और गैस के दाम को स्थिर करने जैसे कई वादे किए थे जिनके बारे में ऋषि सुनक ने आगाह किया था कि ये क़दम देश को एक बड़े आर्थिक संकट में डाल देंगे.
लिज़ ट्रस और ऋषि सुनक के बीच मुक़ाबले में दो बातें खुलकर सामने आई थीं. ऋषि सुनक को पार्टी के अधिकतर सांसदों का समर्थन हासिल था और पार्टी सदस्यों की युवा पीढ़ी उनके साथ थी. लेकिन पार्टी के अंदर पुराने कंज़र्वेटिव विचारधारा के लोग बहुमत में हैं जिन्होंने ऋषि सुनक के ऊपर लीज़ ट्रस को तरजीह दी थी."
साउथम्पटन से ऋषि सुनक को जानने वाले नरेश सोनचटला कहते हैं कि उन्हें विश्वास है कि ऋषि सुनक इस बार फिर प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे.
जहाँ तक मुझे मालूम है ऋषि को कैबिनेट का पूरा समर्थन हासिल है, देश उनके साथ है. सट्टेबाज़ भी ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी कर रहे हैं.

बोरिस की वापसी मुमकिन?
हालांकि अभी तक किसी नेता ने प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने की घोषणा नहीं की है, लेकिन उम्मीदवारों को सोमवार दोपहर तक अपने नाम देने होंगे.
माना जा रहा है कि ऋषि सुनक और बोरिस जॉनसन मुख्य दावेदार बन कर उभरेंगे. ख़बरें ये आ रही हैं कि बोरिस जॉनसन, जो अपनी छुट्टी गुज़ारने के लिए विदेश में थे, अब ब्रिटेन वापस आ रहे हैं.
ब्रिटेन के राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि फ़िलहाल दोनों नेता इस बात का अंदाज़ा लगाने की कोशिश करेंगे कि उन्हें कितने सांसदों का समर्थन हासिल है.

लेकिन क्या उनके पास आम चुनाव जिताने की अपील है? उनके आलोचकों द्वारा हो सकता है एक बार फिर 'स्टॉप ऋषि' अभियान चलाया जाए".
पार्टी के नियमों के मुताबिक़, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के अगले उम्मीदवार को लीडरशिप की रेस में शामिल होने के लिए 357 में से कम से कम 100 सांसदों का समर्थन हासिल करने की ज़रूरत होगी.
इसका मतलब है कि अधिकतम तीन उम्मीदवार खड़े हो सकते हैं. सांसदों के बीच पहले मतदान होगा और तीन उम्मीदवारों के होने पर सबसे कम वोट वाले व्यक्ति को हटा दिया जाएगा.

इसके बाद अगर दो उम्मीदवार बच जाएं और किसी भी सूरत में दूसरे दौर के वोटिंग की ज़रूरत पड़ती है तो सांसद दोनों उम्मीदवार में अपनी वरीयता के ज़रिए अपना मत दे सकते हैं.
इस दौर के बाद भी अगर दोनों उम्मीदवार को एक समान मत मिलते हैं तो अंतिम निर्णय पार्टी के सभी सदस्यों के ऑनलाइन वोट के माध्यम से होगा. अगस्त और
सितंबर में कराई गई लीडरशिप पर वोटिंग कई हफ़्तों तक क्यों चली और इस बार एक हफ्ते में ही अगला प्रधानमंत्री कैसे चुन लिया जाएगा?
इस बार किसी भी उम्मीदवार को प्रधानमंत्री की रेस में शामिल होने के लिए कम से कम 100 सांसदों का समर्थन ज़रूरी है. पिछली बार ये पैमाना 30 सांसदों के समर्थन का था. ऐसे में ख़ुद ही उम्मीदवारों की संख्या तीन से ज़्यादा नहीं हो पाएगी और इसलिए अगला प्रधानमंत्री चुनने में वक़्त पिछली बार से कम लगेगा. यदि नामांकन बंद होने पर सोमवार को केवल एक उम्मीदवार बचता है, तो उसे विजेता और अगला प्रधान मंत्री घोषित किया जाएगा.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...