मैं 2012 तक एक साधारण सा सिम्पल सोचने वाला लड़का हुआ करता था। जो गर्व से कहो हम हिंदू हैं लिखता और आरक्षण के खिलाफ बोला करता था।
एक बार कहीं से प्रवासियों पर बनाई गई "रवीश की रिपोर्ट देख ली", तो एक प्रवासी होने के नाते आपकी बात अच्छी लग गई। दिलचस्पी बढ़ी तो फॉलो करने लगा। फिर कस्बा (आपका ब्लॉग) पढ़ने लगा, उससे मेरी राजनीतिक, साहित्यिक और वैचारिक सोच थोड़ी बढ़ने लगी।
और कहते हैं कि अगर आप पढ़ाई ना करो तो कोई दिक्कत ही नहीं है सब ठीक ठाक चलता रहता है। दिक्कत शुरू होती है जब आप किताबें पढ़ कर सोचना और तर्क देना शुरू कर दें। आपसे आदत पड़ी तो उसके बाद तो अपने स्तर से खूब पढ़ा और लड़ा।
10 साल तक आपका प्राइम टाइम लगातार देखा। जब सरकार ने एनडीटीवी पर एक दिन का बैन लगाया तब से लेकर जब आपको नोटिस भेजे जाते थे, या सोसल मीडिया पर गालियां मिलीं हर जगह आपके साथ स्टैंड किया।
ब्लॉग, पोस्ट, लप्रेक कुछ कविता या शायरी लिखना हुआ या किसी अनजान को ये खुले पत्र लिखना भी आपसे सीखा था तो वही पत्र आपके नाम लिख रहा हूं।
ये लिखते हुए थोड़ा इमोशनल हूं क्योंकि मैंने एक उम्र को आपको देखते, सुनते और पढ़ते हुए जिया है। जिंदगी के कई फैसले आपको सुन या पढकर बनी हुई सोच से लिए होंगे।
एक इंटरव्यू में आपसे किसी ने पूछा कि आपने कभी एनडीटीवी क्यों नहीं छोड़ा? पानी बहते रहना चाहिए नहीं तो दुर्गंध आने लगती है। तो आपने कहा कि जब भाग दौड़ भरी जिंदगी में आपको शांति चाहिए तो वो ठहरे हुए पानी के पास ही मिलेगी। इसलिए मैंने बड़े बड़े पैकेज पर भी एनडीटीवी नहीं छोड़ा। प्रणब राय ने आपको हर तरह की छूट दी। ये बात मुझे एनडीटीवी से जोड़े रखती थी। इंडियन मीडिया का एक मात्र एप है मेरे फोन में जिसके इरिटेटिंग एलर्ट रिंगटोन के बावजूद भी रखा था, आज वो भी डिलीट कर रहा हूं।
अब जब से अडानी ने एनडीटीवी के शेयर खरीदे थे तब से ही हमको आपके वहां से जाने का अंदाजा हम सबको था। हमारे लिए मीडिया मतलब एनडीटीवी और एनडीटीवी मतलब रवीश था, अब आप जा रहे हैं तो हमारा मीडिया को देखना भी लगभग खतम ही हो रहा है।
एक छोटी सी सलाह है कि आप अब एंकरिंग में ऊबे हुए से लगते हैं। और खूब तो पत्रकारिता से लड़ चुके हैं इसलिए अब राजनीति में आ जाइए क्योंकि कोई और चैनल तो आपको एफोर्ड नहीं कर सकता है।
भविष्य के लिए शुभकामनाएं।
आपका शिष्य:
कमलेश कुमार
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