Monday, June 25, 2018

महाराष्ट्र में प्लास्टिक बैन

महाराष्ट्र में प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिए गए हैं, और उससे आम जनमानस में काफ़ी समस्याएँ हैं. अच्छी बात है अगर इसको पर्यावरण बचाने के उद्देश्य से किया जाए. लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनको रखने से आप मुझे कम्युनिस्ट कहेंगे. लेकिन आप सोचकर देखिए क्या ये सही है?
1- आपके बच्चे बारिश से बचाने के लिए प्लास्टिक की थैली में अपनी किताबें नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन वे प्लास्टिक कवर में सील किए गए चिप्स को खा सकते हैं।
2- आप स्थानीय स्टोर से खुली दाल, चावल या आंटा नहीं खरीद कर प्लास्टिक बैग में नहीं पैक कर सकते हैं, लेकिन आप एक बड़े बिग बाजार टाइप डिपार्टमेंटल स्टोर से प्लास्टिक बैग में पैक अदानी विल्मार दाल खरीद सकते हैं।
3- छोटे चाय वाले आपको थर्मोकॉल या प्लास्टिक कप में चाय नहीं दे सकते हैं लेकिन आपका नया LED टीवी अभी भी थर्मोकॉल सिक्योरिटी में पैक हो सकता है।
4- आप प्लास्टिक के थैले या कंटेनर में अपने स्थानीय डेयरी से खुला दूध नहीं खरीद सकते हैं, लेकिन आप अमूल जैसे ब्रांड के दूध के पैकेट खरीद सकते हैं.
5- आप बारिस में अपना पर्स बचाने के लिए प्लास्टिक में रखकर उसे नहीं घूम सकते हैं लेकिन आपकी कार में अभी भी लगभग 150 किलो प्लास्टिक लगाया जा सकता है.
इसलिए उन सभी लोगों के लिए दो मिनट की मौन, जो सोचते हैं कि महाराष्ट्र में प्लास्टिक प्रतिबंध पर्यावरणीय कारणों से है, न कि गरीब असंगठित व्यापारी को मारने और कॉर्पोरेट बिक्री को बढ़ावा देने के लिए। अगर इतना ही पर्यावरण की चिंता है तो कुछ वैकल्पिक थैली पहले से निर्धारित करते थे. पर्यावरण खराब करने वाले कुछ और प्रयास भी करते थे. सड़क से निजी वाहन कम करते थे. किसी फैक्ट्री के धुएँ, और निकालने वाले केमिकल्स को  बंद करवाते थे. ज़मीन और जंगल ख़त्म करने वाले किसी काम को बंद करवाते थे. इन सरकारों ने ज़मीन के ऊपर, नीचे, बाहर, नदियों, समंदर, आसमान जहाँ से कुछ निकल सकता है सब निकाल के बर्बाद कर दिया, और आज नाटक कर रहे हैं. अगर यही प्लास्टिक बैन ही ढंग से कर दें तो बड़ी बात है. ये थोड़े दिन बाद फिर से कुछ ना कुछ नाटक करके चुप बैठेंगे नोटाबंदी की तरह. उससे कितना काला धन कम हुआ, आतंकवाद ख़त्म हुआ? वैसे ही ये होगा.
और ऊपर से 5000 रुपए जुर्माना? मज़ाक बना रखा है. कोई आदमी 1000-2000 का समान थैली सहित छोड़ देगा. और आम आदमी 5000 देगा कैसे? कहीं ऐसा ना हो क़ि ये भी अधिकारियों की कमाई का ज़रिया हो जाए. ठीक ट्रैफिक नियमों की तरह. उसमें भी नागरिक की सुरक्षा या ट्रैफिक जाम की चिंता नहीं पुलिस को बस कैसे भी बिना हेल्मेट और लाइसेंस के मिल जाए कोई और अपना टारगेट पूरा करें.

Wednesday, June 20, 2018

केजरीवाल की धारणा पॉलिटिक्स

जो लोग दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों पर अहंकारी और अराजक होने की तोहमत लगाते हैं, उन्हें दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल का रवैया देखना चाहिए. उनके गेस्ट रूम में आठ दिन से राज्य के मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री धरने पर बैठे हैं, उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्यमंत्री अनशन की वजह से अस्पताल तक पहुंच चुके, लेकिन उपराज्यपाल ने जैसे तय कर रखा है कि जब तक केंद्र सरकार से हरी झंडी नहीं मिलेगी, वह इन आंदोलनकारियों से बात तक नहीं करेंगे. उनके लिए मुख्यमंत्री के ट्वीट और उनकी ओर से आ रहे अनुरोध भी बेमानी हैं.
केजरीवाल की मुख्य शिकायत क्या है? यही कि अफसर हड़ताल कर रहे हैं, उन्हें काम पर लौटने के लिए कहना चाहिए. अफसरों का कहना है कि वे हड़ताल पर नहीं हैं, लेकिन वे किस तरह काम कर रहे हैं? क्या उन्हें अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों की ऐसी अवहेलना करने का हक है? अगर उन्हें ल्ग की शह न हो, तो क्या वे मंत्रियों की बुलाई बैठक का बहिष्कार कर सकते हैं? क्या यही अफसर दूसरे राज्यों और नेताओं के कहीं ज़्यादा अवमाननापूर्ण व्यवहार के आदी नहीं रहे हैं? क्या वे नेताओं के जूते उठाने से लेकर उनकी गालियां तक सुनते-खाते नहीं देखे गए हैं? कहीं और तो अफसरों के इस रवैये की शिकायत नहीं है?
कहने का मतलब यह नहीं कि अफसरों से ऐसा व्यवहार होना चाहिए. किसी लोकतंत्र में सबको सम्मान और गरिमा के साथ जीने का हक है और अगर हम यह सुनिश्चित नहीं कर पाते, तो हमें इस पर शर्मिन्दा होना चाहिए. आम आदमी पार्टी के प्रसंग में बताया जा रहा है कि उसके नेताओं ने मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मारपीट की. मारपीट की यह बात भरोसे लायक नहीं लगती. बहुत संभव है, धक्कामुक्की जैसा कुछ हुआ हो, जिसे मुख्य सचिव मारपीट बता रहे हैं. जिस मेडिकल रिपोर्ट के सहारे यह केस बनाया जा रहा है, वह हादसे के 24 घंटे बाद की है. फिर भी मुख्य सचिव की शिकायत वैध है. उनके साथ भी किसी सरकार को हिंसक अहंकार के साथ पेश आने का हक नहीं है. लेकिन क्या इसी बिना पर किसी लोकतांत्रिक सरकार को आप काम करने नहीं देंगे? आप उसको सबक सिखाने के लिए अफसरों को प्रोत्साहित करेंगे कि वे मंत्रियों द्वारा बुलाई गई बैठकों में न जाएं? आप काम न करने के लिए उनकी तरफ़दारी करेंगे?
यह सच है कि अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के तौर-तरीके कई बार एक तरह की अराजकता का एहसास कराते हैं. कई बार उनकी वैचारिक दिशा से गहरी असहमति का अनुभव होता है. शासन-प्रशासन के खुर्राट लोगों को आम आदमी पार्टी के तौर-तरीके कई बार गैरपेशेवर लगते हैं. उन्हें लगता है कि यह पार्टी नियम-कायदों पर अमल नहीं करती. लेकिन इसके बावजूद इसमें शक नहीं कि भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में जो सबसे उजली धारा देखी है, वह आम आदमी पार्टी की है. यही वजह है कि दिल्ली के लोगों ने उन पर भरोसा जताया है. शिक्षा और सेहत जैसे बुनियादी सवालों पर आम आदमी पार्टी की पहल प्रशंसनीय रही है. लेकिन माहौल कुछ ऐसा बनाया जा रहा है जैसे केजरीवाल और सिसोदिया को धरनों के अलावा कुछ नहीं आता, कि उन्हें दिल्ली का नहीं, अपनी राजनीति का ही ख़याल है. और यह माहौल सिर्फ ब्ज्प-कांग्रेस जैसी पार्टियां ही नहीं बना रहीं, वह अफसरशाही बना रही है, जो दरअसल अपने-आप को बचाए रखने के बाद ही कोई दूसरे काम करती है. राजनीतिक दल और नेता भले बदनाम रहे हों, लेकिन सत्ता का सुख और उसका बेजा लाभ लेने में अफसरशाह उनसे कहीं ज़्यादा आगे रहे हैं. भारत में भ्रष्टाचार की मूल वजह नेता नहीं, अफसर ही हैं.
दरअसल यह पूरी अफसरशाही - खासकर ईयेज़ संवर्ग - इस देश का वह श्रेष्ठिवर्ग है, जिसे अंग्रेज़ों ने अपनी सहूलियत के लिए बनाया था. यह देशसेवा के लिए नहीं, अंग्रेजों की सुविधा के लिए बनाया गया. लेकिन इस गलती के बहाने यह अफसरशाही जिस तरह की मांग कर रही है, वह ख़तरनाक है. वह एक तरह से राजनीतिक नेतृत्व को बेमानी बनाने पर तुली हुई है. सवाल है, इस पर कौन कार्रवाई करेगा? बस एक घटना को लेकर महीनों तक खिंचे इस टकराव का असली मकसद दरअसल अपनी बादशाहत कायम रखना है.

कश्मीर में क्यों पीछे हटी बीजेपी?

जम्मू एवं कश्मीर में ऐसा होने की भनक किसी को नहीं लगी. मीडिया को अचानक बताया गया कि ब्ज्प वहां महबूबा मुफ्ती सरकार से अलग होने जा रही है, और दो घंटे के भीतर ही नाकामियों का ठीकरा महबूबा पर फोड़ते हुए ब्ज्प ने सरकार गिराने का ऐलान कर दिया. मसला एक विशेष राज्य में सरकार गिराए जाने का है. सब कुछ फटाफट हुआ, लिहाज़ा जम्मू एवं कश्मीर जैसे खास प्रदेश में इतनी बड़ी राजनीतिक घटना का विश्लेषण ढंग से नहीं हो पा रहा है. फैसला BJP का था, सो, कारण बताने की ज़िम्मेदारी उसी की थी, लेकिन उसने जो कारण गिनाए, उनमें एक भी ऐसा नहीं था, जिसे तात्कालिक कारण माना जा सके. एक ही बात प्रमुखता से कही गई कि कश्मीर में आतंकवाद काबू में नहीं आ रहा था. यानी इसी नाकामी की ज़िम्मेदारी महबूबा के मत्थे मढ़कर सरकार से अलग होने का बहाना समझ में आता है. अब यह अलग सवाल है कि यह बात जनता के गले उतरेगी या नहीं. खासतौर पर इसलिए कि जम्मू एवं कश्मीर सरकार में शामिल यही BJP तीन साल से कहती आ रही थी कि वहां के हालात सुधारने में उसने कमाल कर दिया है. भले ही कश्मीर और साथ ही साथ पूरे देश की जनता का अनुभव इस दावे से उलट रहा हो, लेकिन यह तो जगज़ाहिर है कि नोटबंदी करते समय भी काले धन को आतंकवाद से जोड़ने का प्रचार हुआ था. पत्थरबाजी के खिलाफ मुहिम के तौर पर केंद्र सरकार ने उस नारे का इस्तेमाल किया था. बहुत ही मुश्किल दौर में सर्जिकल स्ट्राइक को प्रचारित करना पड़ा था. लेकिन सामान्य अनुभव यह था कि आए दिन अपने जवानों की शहादत की खबरें रुक नहीं रही थीं. इन हालात में ब्ज्प वहां अपनी छवि बचाने का कोई तरीका नहीं ढूंढती तो और क्या करती?
पिछले तीन साल में कश्मीर को लेकर जो हताशा और निराशा का माहौल बनता चला आया, उसका फायदा कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस को खुद-ब-खुद मिल ही रहा था. यही कारण है कि सरकार गिराने के ऐलान के लिए BJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस के फौरन बाद ही कांग्रेस की तरफ से गुलाम नबी आज़ाद  और नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से उमर अब्दुल्ला सबसे पहले मीडिया के सामने आए. यहां तक कि महबूबा मुफ्ती ने इन दोनों नेताओं के दो घंटे बाद मीडिया से बात की.
महबूबा मुफ्ती की प्रेस कॉन्फ्रेंस की एक बात बहुत ही गौरतलब थी. वह यह कि उन्होंने BJP से नाराज़गी बिल्कुल भी नहीं दिखाई. वह अपनी पार्टी (और गठबंधन) की सरकार के तीन साल के कामकाज का ब्योरा ही देती रहीं. वह बताती रहीं कि जम्मू एवं कश्मीर के लोगों के हित में उन्होंने क्या किया. सभी को लग रहा था कि महबूबा भी BJP जैसे तेवरों में ही BJP के खिलाफ बोलेंगी, लेकिन उन्होंने ऐसा एक भी शब्द न बोलकर मीडिया को चक्कर में डाल दिया. उनके इस अंदाज़ का विश्लेषण अभी हो नहीं पाया है, लेकिन एक अटकल लगाई जा सकती है कि शायद वह अब घाटी की बजाय जम्मू और लद्दाख में जनाधार बढ़ाने की बात सोच रही हों. उनका संयत रहना इस मकसद को हासिल करने में कुछ काम का हो सकता है. आखिरकार वह लम्बे अरसे तक जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री रही हैं.
BJP-PDP की गठबंधन सरकार तीन साल से ऊपर चल चुकी थी. राजनीतिक विचारधारा में भारी भेद के बावजूद इतने समय तक ऐसी सरकार का चलना आश्चर्य ही माना जाना चाहिए. और फिर अगले साल लोकसभा चुनाव में गठबंधन को भारी दिक्कत आना तय था. सो, आम चुनाव से 10 महीने पहले के वक्त से ज़्यादा माकूल मौका और कौन सा होता. BJP और PDP दोनों के लिए अपने-अपने जनाधारों के पास लौटने के लिए कम से कम इतना वक्त तो चाहिए ही. किसी बात को भुलाने के लिए इतना समय तो लगता ही है. वैसे तो BJP के बड़े नेताओं ने अच्छी तरह सोच लिया होगा कि सरकार गिराकर वहां राष्ट्रपति शासन लगने से उसका झंझट कम नहीं हो जाएगा. राज्यपाल का शासन केंद्र सरकार के शासन जैसा ही माना जाता है, और फिर जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्यपाल के सामने हर दिन ही एक चुनौती बनकर खड़ा होगा. ऊपर से राज्यपाल शासन हटाकर जल्दी चुनाव कराने का दबाव भी बना रहेगा. अगर बीच में कोई नया समीकरण नहीं बना, तो ज़्यादा आसार यही हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव अब लोकसभा चुनाव के साथ ही करवाने पड़ेंगे, और अगर ऐसा हुआ, तो BJP के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती साबित होगी.

Wednesday, May 23, 2018

कर्नाटक से बनेगा महागठबंधन?

अब तक समझ में नहीं आ रहा था कि कर्नाटक में BJP ने अपना इतना कुछ दांव पर क्यों लगा दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ लगभग पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल तक. कर्नाटक के स्तर पर हर किस्म के BJP नेताओं को एक साथ बांधकर झोंका गया. उधर, राहुल गांधी ने भी निसंकोच खुद को कर्नाटक में उतार दिया था. यानी कांग्रेस और BJP दोनों ने भांप लिया था कि कर्नाटक सिर्फ कर्नाटक नहीं, बहुत आगे की चीज़ है. लगता है, जनता भी यह भांप गई थी. उसने भी कर्नाटक को इतनी कांटे की टक्कर बनाकर छोड़ा कि बड़ी मुश्किल से पता चल पाया कि जनता ने अपने आदेश में लिखा क्या था. आज ज़रूर हम कहने लायक हैं कि बुधवार को जब कुमारस्वामी का शपथ ग्रहण समारोह हो रहा होगा, वहां कर्नाटक से ज्यादा देश दिख रहा होगा. वैसे कर्नाटक चुनाव से पहले BJP को भी विपक्षी ध्रुवीकरण होने का अंदेशा रहा ज़रूर होगा. चुनाव के नतीजों के बाद वहां जो नज़ारा है, उसके बाद तो कोई भी कह सकता है कि BJP का अंदेशा सही था.  ज़रा गौर करें तो गुजरात चुनाव भी इतना ही सनसनीखेज़ बन गया था. कांग्रेस की मौजूदगी देश में सबसे कम अगर किसी प्रदेश में थी, तो वह गुजरात में ही थी. फिर भी कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व वहां दिन-रात जूझ रहा था, ताकि BJP के अभेद्य किले को भेद सके, और चुनाव नतीजों में जब कांग्रेस वहां कांटे की टक्कर में दिखाई दी, तो कांग्रेस का उत्साह बढ़ना स्वाभाविक था. वैसे गुजरात के चुनाव मोदी सरकार के कार्यकाल के चौथे साल में हो रहे थे, यानी 2019 के एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में कांग्रेस को वहां शिद्दत से लगने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था. बहरहाल कांग्रेस ने गुजरात का चुनाव 2019 की तैयारियों के तौर पर ही लड़ा था, और उसके बाद कर्नाटक चुनाव तो मोदी सरकार के कार्यकाल के आखिरी साल में हुआ है, सो, इसका सीधा असर अगले लोकसभा चुनाव पर पड़ना ही पड़ना है.  कर्नाटक चुनाव के दौरान तीनों मुख्य दल कुछ भी दावे करते रहे हों, लेकिन उसी दौरान यह अटकल लगाई जा चुकी थी कि वहां त्रिशंकु विधानसभा के आसार हैं. यानी खंडित जनादेश का ऐलानिया पूर्वानुमान था. लेकिन इस संभावना को वहां के चुनावी मैदान में उतरे तीनों राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से कतई स्वीकार नहीं कर सकते थे. हां, JDS के बारे में ज़रूर यह अटकल थी कि वह 'किंगमेकर' की भूमिका में रह सकती है. शायद इसी आधार पर उत्तर प्रदेश से मायावती JDS का समर्थन करने कर्नाटक पहुंची थीं. यह एक ऐसा संकेत था, जिसे जो समझ सका हो, वह यह अनुमान भी लगा सकता था कि एक क्षेत्रीय दल के रूप में JDS बड़ी चीज़ है. इतना ही नहीं, कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार में JDS को BJP की 'बी टीम' जैसे हल्के हमलों तक ही सीमित रखा. कांग्रेस का सारा ज़ोर BJP से निपटने में ही लगा. यानी कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस, खुद JDS और मायावती के व्यवहार को गौर से देखें, तो देश में विपक्षी ध्रुवीकरण के परोक्ष लक्षण देखे जा सकते थे. और आज तो ऐसे हालात बन गए हैं कि कुमारस्वामी का शपथग्रहण समारोह निकट भविष्य के विपक्षी ध्रुवीकरण का प्रस्थान बिंदु बनता दिख रहा है.  यह कहना गलत होगा कि बुधवार को बेंगलुरू का नज़ारा पहले से सोचा या रचा गया मंच है. इसे परिस्थितिवश बना एक सुयोग मानना चाहिए, और यह विपक्षी ध्रुवीकरण का कोई घोषित अवसर भी नहीं है. यहां तक कि उस मौके पर मीडिया अगर किसी से विपक्षी एकता को लेकर सवाल पूछेगा, तो बहुत संभावना इसी बात की है कि सभी नेता आगे आकर बोलने में संकोच करेंगे. सभी कहेंगे कि कुमारस्वामी ने खुशी के मौके पर आमंत्रित किया था, सो बस, बधाई देने आए हैं. लेकिन यह सभी समझ रहे होंगे कि विपक्षी ध्रुवीकरण के लिए इससे बड़ा और इससे अच्छा निमित्त और कोई नहीं बन सकता था. खासतौर पर अपने-अपने आग्रहों के कड़कपन के दौर में बड़ा मुश्किल काम यही है कि कोई बिना बहाने किसी को आमंत्रित करने की पहल करे. अपने भीतर ही बात दबाकर रखने वाले ऐसे विचित्र दौर में आमंत्रित करने और आमंत्रित होने की चाह रखने वालों के लिए यह शपथ समारोह वाकई विलक्षण अवसर है.
अटकल लगाने का भी रोमांच होता है. बहुत से लोगों की रुचि किसी नज़ारे की पहले से कल्पना करने में होती है. ऐसे लोग ज़रूर सोच रहे होंगे कि कुमारस्वामी के इस समारोह में राहुल गांधी और सोनिया गांधी की तत्परता और देहभाषा कैसी होगी. खासतौर पर मीडिया ने राहुल गांधी को जिस तरह प्रधानमंत्री पद के एक उम्मीदवार के तौर पर चर्चा में ला दिया है, उसके बाद उनकी भाव-भंगिमाएं बारीकी से देखी जानी शुरू हो गई हैं. सोनिया गांधी UPA की अध्यक्ष के तौर पर सबकी नज़रों में होंगी. विपक्षी एकता की धुरी बनने की संभावनाएं कहीं हैं, तो वे सोनिया गांधी के पास ही सबसे ज़्यादा दिखाई देती हैं. इस समारोह में दोनों प्रकार के दृश्य बन सकते हैं, सोनिया और राहुल भी उठकर दूसरों से बात करने जाते देखे जा सकते हैं और दूसरे नेता उठकर उनके पास आते हुए भी दिख सकते हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अलग-अलग खयालों के बड़े-बड़े नेताओं के बीच ये दो नेता आकर्षण के केंद्र होंगे.
यह अवसर सबसे ज्यादा आनंदकारी जनता के लिए ही होगा. वोट देने के अलावा कुछ भी न कर पाने वाली जनता यही तो चाहती है कि उसके दुःख-दर्द से सरोकार रखने वाले नेता कभी तो आपस का छोटा-बड़ा भूलकर एक साथ बैठे दिखें. जनता तो फोटो में ही उन नेताओं को अगल-बगल बैठे देखकर खुश हो जाती है, जिनमें आपस में अनबोला हो. वैसे 'मुंडे मुंडे मतिभिन्ना' सिर्फ नेताओं में थोड़े ही है, कनार्टक की जनता ने जिस तरह का जनादेश दिया है, उससे तो यह बात खुद जनता पर भी लागू होती है. यानी बेंगलुरू पहुंचे नेता अपने व्यवहार से देश की मतिभिन्न जनता को संदेश दे सकते हैं कि अब आप लोग भी आपस में मेल-मिलाप करने लगिए.

Saturday, May 19, 2018

अबकी फंसे जस्टिस

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव खारिज होने के बाद कांग्रेस ने अलग प्रकार की रणनीति तैयार की है। सात दलों के 71 सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें सात रिटायर्ड सदस्यों के हस्ताक्षर थे। तकनीकी दृष्टि से प्रस्ताव इसी बिना पर खारिज होना चाहिए था। इसके बाद भी राज्यसभा के सभापति व उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इस मामले में संविधान विशेषज्ञों व पूर्व न्यायाधीशों की राय लेने के बाद यह फैसला किया। इसके लिए उन्होंने अपने दौरे को रद्द कर पहले मामले को सुलझाने पर जोर दिया, ताकि किसी प्रकार का संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न न हो और सुप्रीम कोर्ट में कामकाज किसी प्रकार से प्रभावित न हो।
कांग्रेस पार्टी ने जिस प्रकार महाभियोग प्रस्ताव लाने के तुरंत बाद प्रेस कांफ्रेंस किया था, उसी समय उन्हें आभास हो गया था कि उनके प्रस्ताव को राज्यसभा के सभापति खारिज कर सकते हैं। नियम कहता है कि राज्यसभा में दिए गए नोटिस या प्रस्ताव के स्वीकृत होने तक उसे पब्लिक डोमेन में लेकर नहीं जाना है। कांग्रेस इतने लंबे समय तक सत्ता में रही है, इसलिए इस प्रकार के नियमों की जानकारी उनके नेताओं को नहीं होगी, ऐसा नहीं है। महाभियोग प्रस्ताव पर जिस प्रकार से आम लोगों के बीच बहस शुरू कराई गई, वह भी इस प्रस्ताव के खिलाफ गया। सभापति ने अपने फैसले में भी इसका जिक्र किया है। इसके बाद सवाल उठता है कि क्या सभापति महाभियोग प्रस्ताव के मेरिट की जांच कर सकते हैं या नहीं?
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी कहते हैं कि इस प्रकार का संवैधानिक अधिकार राज्यसभा के सभापति के पास है। हालांकि, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर उठाए जा रहे सवालों को गैर-जरूरी बताया और कहा कि इससे संवैधानिक संस्था की गरिमा को ठेस पहुंच रही है। संविधान के तमाम जानकार कहते हैं कि राज्यसभा के सभापति तमाम प्रस्ताव या नोटिस को स्वीकार कर सकते हैं या भी रद्द कर सकते हैं। संविधान उन्हें इसकी शक्ति देता है। मामला चूंकि चीफ जस्टिस के खिलाफ था और वेंकैया नायडू जानते थे कि इस मामले को बाद में सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने इस पर संविधान विशेषज्ञों से राय ली। आखिर में जो फैसला उन्होंने दिया है, उसे तमाम लोग स्वीकार कर रहे हैं।
कांग्रेस पार्टी इस मामले में अड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर जस्टिस दीपक मिश्रा रिटायरमेंट तक पद पर बने रहते हैं तो वे उनकी कोर्ट में पेश नहीं होंगे। उन्होंने तो राज्यसभा के सभापति के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया और कहा कि किसी भी प्रस्ताव को रद्द करने का अधिकार उन्हें नहीं है। 50 से अधिक सदस्यों के हस्ताक्षर वाले प्रस्ताव या नोटिस को सभापति को स्वीकार करना ही होगा। सिब्बल ने कहा कि मैं सोमवार से सीजेआई दीपक मिश्रा की कोर्ट में नहीं जाऊंगा। अब जब तक चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रिटायर नहीं हो जाते, वे तब तक उनकी कोर्ट में नहीं उपस्थित होंगे।
कांग्रेस का यह रवैया पूरे मामले के राजनीतिक होने की गवाही दे रहा है। भाजपा ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि न्याय प्रक्रिया को अपने हिसाब से कांग्रेस चलाना चाहती है, जबकि देश में स्वतंत्र न्यायपालिका है। राज्यसभा सभापति का निर्णय आने के बाद से अब कांग्रेस पर सवाल खड़े हो गए हैं। सबका एक ही सवाल है कि क्या वे न्यायपालिका को अपने तरीके से चलाना चाहते हैं? अगर न्यायपालिका उनके मनमुताबिक निर्णय नहीं देगी तो वे महाभियोग लाकर जजों को डराएंगे? राज्यसभा के सभापति ने जब कहा है कि उनके आरोपों में दम नहीं है, तो वे किस आधार पर इस मामले को आगे ले जाने की मांग कर रहे हैं? ये कुछ सवाल हैं, जिनके जवाब अब आने वाले दिनों में कांग्रेस को देने होंगे।

Friday, May 18, 2018

कर्नाटक में चल रहा नाटक

यह सच है कि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर, यानी JDS के बीच तीखा टकराव रहा. कांग्रेस आरोप लगाती रही कि JDS दरअसल BJP की 'बी टीम' है. इस लिहाज़ से BJP की यह शिकायत जायज़ है कि अब चुनाव के बाद कांग्रेस और JDS का गठबंधन 'अपवित्र' और जनादेश-विरोधी है. इस 'अपवित्र' को इस बिना पर सही नहीं ठहराया जा सकता है कि ठीक यही काम BJP ने हाल ही के दिनों में गोवा सहित तीन राज्यों में किया है और आज जो लोग कर्नाटक में कांग्रेस की कोशिश को 'लोकतंत्र के साथ खिलवाड़' बता रहे हैं, वही BJP के कृत्य को अमित शाह का रणनीतिक पौरुष बताकर ताली बजा रहे थे. 
दरअसल गठजोड़ की राजनीति की संभावनाएं और विडम्बनाएं दोनों भारतीय लोकतंत्र में अब बहुत करीने से पहचानी जाने लगी हैं. इसे पवित्र-अपवित्र की मासूम शैली से नहीं समझा जा सकता और न ही व्यावहारिक-सैद्धांतिक की चालाक और अवसरवादी शब्दावली से. इसी कर्नाटक में एसआर बोम्मई का मामला हो चुका है, जहां केंद्र के दखल को सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी करार दिया था और जिसके बाद तय हुआ था कि किसी भी सरकार के बहुमत का फैसला अंततः विधानसभा के भीतर हो सकता है, बाहर नहीं. इसी कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा हुए हैं, जो 1996 की लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी BJP की 13 दिन की सरकार गिरने के बाद गठबंधन की मजबूरियों की वजह से प्रधानमंत्री बने थे. आज कर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला ने दरअसल तोड़-फोड़ और गठजोड़ का खेल दो दशक पहले गुजरात में देखा था. तब वह गुजरात BJP के अध्यक्ष हुआ करते थे और BJP के बाग़ी विधायकों को पार्टी से बाहर करवाने की मुहिम में लगे हुए थे. दरअसल, विधायकों को टूट से बचाने के लिए रिसॉर्ट ले जाने का जो खेल आज कांग्रेस खेल रही है, वह गुजरात में BJP के टकराव से ही शुरू हुआ था. तब बाग़ी शंकर सिंह वाघेला अपने साथ के बाग़ियों को खजुराहो ले गए थे और गुजरात की राजनीति में खजूरिया और हजूरिया शब्द प्रचलित हुए थे. आज शंकर सिंह वाघेला भले BJP से अलग हों, लेकिन BJP में आते-जाते रहे हैं.
'90 के दशक में ही BJP ने ऐसे कई 'अपवित्र' गठजोड़ किए. उत्तर प्रदेश में 1993 का चुनाव सपा और बसपा ने मिलकर लड़ा, लेकिन जब दोनों की टूट हुई, तो 1995 में BJP को बसपा के साथ तालमेल में गुरेज़ नहीं हुआ - तब भी नहीं, जब बसपा अध्यक्ष कांशीराम BJP और कांग्रेस को खुलकर 'नागनाथ और सांपनाथ' कहा करते थे. जब कल्याण सिंह और मायावती में नहीं पटी, तो BJP ने एक और कमाल किया. 1998 में निर्दलीय के तौर पर जीते कई बाहुबली विधायकों को सीधे मंत्री बनाकर उनका समर्थन हासिल किया और सरकार बचाई. तब BJP में आज के अमित शाह और नरेंद्र मोदी की ही तरह कद्दावर लगते नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि इन बाहुबली नेताओं का भविष्य देखिए, अतीत नहीं. 
ऐसे 'अपवित्र' गठबंधनों और मजबूरी भरे समर्थनों का सिलसिला इसके आगे-पीछे पसरा पड़ा है. 1989 के चुनावों में राजीव गांधी की कांग्रेस सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी, लेकिन सरकार जनता दल ने बनाई, जिसका किसी ने बुरा नहीं माना - तब भी हैरानी नहीं जताई, जब उस सरकार की पालकी एक तरफ BJP और दूसरी तरफ लेफ्ट फ्रंट ढोते रहे. 1993 में पीवी नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार का दोनों धड़े अरसे तक परोक्ष साथ देते रहे. जब BJP अविश्वास प्रस्ताव लाई, तो लेफ्ट उसके साथ खड़ा नहीं हुआ, जब लेफ्ट अविश्वास प्रस्ताव लेकर आया, तो BJP उसके साथ खड़ी नहीं हुई. तीसरे अविश्वास प्रस्ताव के समय कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को ख़रीदकर अपना संकट हल कर लिया.
ऐसे उदाहरणों की भरमार है. कह सकते हैं कि इन सबमें भारतीय लोकतंत्र की कुछ सीमाएं झांकती हैं, लेकिन यह भी सच है कि गठबंधन की इस राजनीति ने हाशिये पर खड़े दलों और समुदायों को ताकत और आवाज़ दी है. अगर गठबंधन राजनीति की यह मजबूरी नहीं होती, तो क्या रांची में बैठा कोई आदिवासी सोरेन परिवार यह कल्पना कर सकता था कि वह सोनिया और राहुल गांधी से संवाद कर पाएगा...? अगर यह राजनीति नहीं होती, तो क्या कोई मुसहर जीतनराम मांझी बिहार का मुख्यमंत्री होने का सपना देख पाता...? आपकी नज़र में चाहे जितना दुर्भाग्यपूर्ण हो, इसी गठजोड़ के ज़रिये सत्ता अपनी संभावनाओं और विरूपताओं के साथ निचले तबकों तक छलकती हुई पहुंची है. बिहार की बात चली है, तो नीतीश कुमार का भी उदाहरण याद कर लें. वह बड़ी सुविधा से एक ही कार्यकाल में मोदी से लेकर राष्ट्रीय जनता दल, यानी RJD तक से दोस्ती करते रहे हैं. चुनाव उन्होंने RJD के साथ मिलकर लड़ा, और तब लालू प्रसाद यादव का जातिवाद और भ्रष्टाचार भूल गए. इसके बाद BJP के साथ मिलकर सरकार बचाई, तो उसकी सांप्रदायिकता भूल गए. जबकि एक समय ऐसा था, जब नरेंद्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर छापे जाने पर आगबबूला होकर उन्होंने बाढ़ के दौरान बिहार को गुजरात से मिली मदद तक वापस कर दी थी. 
जम्मू-कश्मीर में PDP और BJP का गठबंधन भी इसी बेतुकेपन का एक और उदाहरण है. दोनों पार्टियां एक-दूसरे के ख़िलाफ़ जैसे बंदूक ताने हुए हैं, लेकिन दोनों ने एक-दूसरे की कुर्सी को सहारा दे रखा है.तो सवाल गठबंधनों के पवित्र या अपवित्र होने का नहीं है, भारतीय राजनीति और लोकतंत्र की तय कसौटियों पर खरे उतरने का है. यह अलग बात है कि यहां तक आने के लिए राजनीतिक दल जो धत्तकरम करते हैं, उनमें वे एक-दूसरे को जैसे टक्कर देते हैं. जिस येदियुरप्पा को BJP आज मुख्यमंत्री बना रही है, वह भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जा चुके हैं और एक बार पार्टी छोड़कर अपनी अलग पार्टी भी बना चुके हैं - यह तथ्य BJP को परेशान नहीं करता, क्योंकि उनके ज़रिये वह सरकार बना सकती है. जिन बेल्लारी बंधुओं को भ्रष्टाचार का पर्याय मान लिया गया, उन्हें BJP ने साथ रखा - ज़ाहिर है, ऐसे ही अवसरों के लिए जब त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में घोड़ामंडी लगे तो वह ख़रीद-फरोख़्त कर सकने लायक साधन जुटा सके.
अब कांग्रेस-JDS गठबंधन पर आएं. अगर दोनों दल आपसी समर्थन के लिए पैसे के लेनदेन को दूर रखते हैं, अगर पिछली कटुताएं भूलकर आपसी सहयोग को तैयार हो जाते हैं, और अंततः मिलकर सरकार बनाने को तैयार हो जाते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र की जटिलता का एक नया पन्ना भर है. अंततः कर्नाटक की जनता ने ही यह फैसला किया है. दोनों को 56 फीसदी वोट दिए हैं. यह वोट प्रतिशत किसी भी सरकार की लोकतांत्रिक वैधता के लिए काफ़ी है. कम से कम जिस तेज़ी से कांग्रेस और JDS ने साथ आने का फैसला किया है, उसमें BJP को सत्ता से दूर रखने की राजनीति भले हो, ख़रीद-फ़रोख़्त की रणनीति नज़र नहीं आती. लेकिन अगर येदियुरप्पा 104 विधायकों के समर्थन के आगे कुछ और विधायकों को जुटाने या पार्टियों में सेंधमारी करने या फिर कुछ को अनुपस्थित रखने का लालच देने की कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं, तो बेशक वह अनैतिक होगा. विडम्बना यह होगी कि इसे ही BJP नैतिकता और लोकतंत्र की जीत बताएगी. 

Sunday, April 15, 2018

अंबेडकर पर सामान्य ज्ञान

भारत में जातिवाद आज नहीं हजारों साल से है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। मतलब उनकी जाति के आधार पर उनके काम मिलना। ब्राह्मणों का काम पढने पढ़ाने, क्षत्रिय का लड़ने, वैश्य मतलब बनिया जो बिजनेस मैन थे। बाकी सब शूद्र। ये तो बडा गलत था क्योकि अगर कोई टैलेंटेड आदमी शूद्र जाति में पैदा हुआ तो वो पढ लिख नहीं सकता था। यहाँ तक कि ये नियम था कि अगर वो पढते लिखते मिल जाए तो उसके कानों गरम तेल डलवा दो। रामायण में एक कहानी छुपाई गई जब शंभूक नाम का एक शूद्र आदमी वेद पढ रहा था और उसकी शिकायत किसी ब्राह्मण ने भगवान राम से कर दी  और राम ने उसे मार दिया। तुमने एकलव्य की कहानी सुनी होगी जिसमे शूद्र धनुषधारी को शिक्षा न देकर अन्याय किया गया जबकि उसमें इतना टैलेंट था कि मूर्ति देखकर अभ्यास करते हुए अर्जुन को पीछे छोड़ दिया था। शिवाजी महाराज का राजतिलक करने से पूना के ब्राह्मणों ने क्यों मना कर दिया था? क्योंकि वो मराठी (ओबीसी) थे जिन्हे ब्राह्मण शूद्र कहते थे। नीची जाति के लोगों पर बडी जाति जैसे ठाकुर और पापियों ने खूब अन्याय किए। ये नियम थे कि उनकी परछाई तक बडी जाति के इलाके में न पडे। जब वो रास्ते पर चलेंगे तो अपनी कमर में एक झाडू बांध लेंगे क्योंकि उनके चलने से अछूत हुई जगह साफ करते जाएँ। यहाँ तक कि तालाब से जानवर पानी पी सकते थे लेकिन नीची जाति का इंसान नहीं।
उसी समय पैदा हुए अंबेडकर ये सब झेल रहे थे। उसको तांगे वाला नहीं बिठाता था, नाई बाल नहीं काटता था क्योंकि वो शूद्र था। न स्कूल में पढ़ने देते थे। फिर भी वो अपमान सहकर जैसे तैसे ग्रेजुएट हुआ। जो सबसे पहला किसी दलित न किया। स्काॅलरशिप मिली तो लंदन जाकर पढने लगे। फिर उन्होंने जितनी मेहनत की शायद ही इतिहास में किसी ने की। एक छात्र के संघर्ष के लिए उनको अपना आदर्श मानना चाहिए। क्योंकि वो बेचारा लडका जिसके पास पैसे नहीं है वो सडक पर लाइट में पढकर, मजदूरी करके विदेश में पढा। जितनी डिग्री उसके पास हैं एमफिल, लाॅ, पीएचडी लगभग 26-27 डिग्री। आज तक किसी के पास नहीं है।  इकोनोमिक्स पर उनकी रिसर्च और लिखी किताबें आज भी ऑक्सफोर्ड में पढाई जाती हैं।फिर एकदम से उनका मन जगा कि चलो अपने देश के लिए कुछ करते  हैं, और जब यहाँ आकर देखा तो जातिवाद से बेहाल। इतने पढे लिखे आदमी को चपरासी पानी और फाइल हाथ में नहीं देता था। तो उन्होंने जातिवाद खतम करने के लिए और उनके हक के लिए कई आंदोलन किए। ब्राह्मण मानने को नहीं तैयार थे कि वो खतम हो। क्योंकि ये खत्म तो वो अपना राज किस पर करेंगे? इस कारण दुखी होकर अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोडकर बौद्ध अपना लिया। क्योंकि गौतम बुद्ध के धर्म में सबकी बराबरी थी पुरूष हो या महिला। छोटा हो या बडा।
फिर जब इतने बडे देश का कानून लिखने की बारी आई तो सबसे पढे लिखे अंबेडकर ही मिले। अब वो इस मौके को कैसे छोड देते? उन्होने कानून में एक नियम रखा कि आप नीची जाति के लोगों पर भेदभाव करते हैं तो ये क्राइम होगा। ये अमेरीका और अफ्रीका के ब्लैक लोगों के साथ भी होता था। फिर एक नियम रखा कि जो शूद्र लोग हैं उनकी क्या गलती है कि वो वहाँ पैदा हुए? तो उन्होंने उनके लिए जगह रिजर्व कर दी। मतलब 100 टीचर चाहिए तो सब ब्राह्मण वो भी पुरुष होते थे। अंबेडकर ने 18 दलित, 27 ओबीसी और 33 महिलाओं के आरक्षित कर दिया। अगर ऐसा न होता तो सब ब्राह्मण ही टीचर होते न ओबीसी होता न महिला। ये नैचुरल नियम है कि जिस समाज की जितनी आबादी हो उसका रिप्रजेंटेशन उसी रेशियो में होना चाहिए। दूसरा राज कयो करे?
दलित की डिफिनेशन है समाज के दबे हुए लोग। जिसमे महिला भी है। उसके साथ हमेशा अन्याय हुआ है। पहले महिलाओं को तलाक लेने का अधिकार नहीं था। आदमी ले तो तलाक। उनको न वोट देने का अधिकार, न पढने लिखने और न शादी के बाद सेक्सुअल रिलेशन में अपनी मर्जी या अधिकार दिखाने का। वो किसी भी समस्या और दर्द में हो पति अपने मन की करता था। उसे बिस्तर तक ही समझते थे। आदमी जितनी मन हो शादी करे। न नौकरी का अधिकार न पारलियामेंट जाने का। अंबेडकर ने हर जगह महिलाओं को कानूनी हक दिला रहे थे। उनकी अंतिम इच्छा थी हिंदू कोड बिल जो पास हो जाता तो आज यहाँ की महिलाओं को अमेरिका जैसे शक्तिशाली बना देते। लेकिन ब्राह्मणों ने कहा कि उनको घर में ही खाना बनाने दो। और पास नहीं हुआ वो बिल। नेहरू गांधी पटेल सब विरोध में आ गए तो इस बात से दुखी होकर अंबेडकर ने अपने मंत्री पद और पारलियामेंट की मेंबरशिप से रिजाइन कर दिया। आज भी जो आरक्षण है वो समानता के लिए है। अगर हटा दिया जाए तो बैंक में निकलने वाली सब नौकरी बडे लोग ले जाएगे। न लड़कियों को मौका मिलेगा न गरीबों को। यही हाल स्कूल, काॅलेज, पारलियामेंट में होगा। कोई महिला या शूद्र न जा सकता। अगर बस या ट्रेन से महिला आरक्षण हटा दिया जाए तो लड़कियों को चढने भी न मिलेगा मजबूत लोग (पुरुषों) के आगे। इसलिए आरक्षण न्याय है कि सबको हिस्सा मिले केवल ताकतवर को नहीं। हालांकि मैं ओबीसी में भी नहीं आता फिर भी कानूनी हकीकत समझता हूँ। सच को सच कहता हूँ। शायद सबको इतनी जानकारी नहीं क्योकि जिन बडी जाति के लोगों की सत्ता चली गई है उनको डर लगता है और अफवाह फैलाने लगते हैं। आरक्षण खतम होगा तो केवल जाति के आधार पर क्यो? महिलाओं का भी करेंगे क्योंकि कुछ लोग तो कहते हैं कि इससे जेंडर डिस्क्रिमनेशन  होता है।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...