Sunday, October 7, 2018

गाँधी के कुछ अनकहे पहलू

महात्मा गांधी का देहावसान होने पर अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जनरल सी मार्शल ने कहा था - 'महात्मा गांधी आज सारी मानवता के प्रतिनिधि बन गए हैं. यह वह व्यक्तित्व है जिसने सत्य और विनम्रता को साम्राज्यों से भी ज्यादा शक्तिशाली बनाया.'  वास्तव में आज जब महात्मा गांधी के जन्म के डेढ़ सौ साल पूरे हो रहे हैं, तब भी क्या उनके बाद कोई ऐसा इंसान हुआ जिसे समूची मानवता का प्रतिनिधि समझा जा सके? गांधीवाद की राह पर चलने वाले, गांधी के आदर्शों का अनुसरण करने वाले तो बहुत हैं लेकिन कोई गांधी नहीं हुआ. वह गांधी जो समाज के लिए अपना जीवन दांव पर लगाने में भी कतई संकोच नहीं करता था. जो विदेशी हुकूमत के खिलाफ अपने नैतिक बल, अकाट्य तर्कों के आधार पर ताजिंदगी संघर्ष करता रहा और इसके साथ भेदभाव, जात-पात, सामाजिक वैमनस्यता, साम्प्रदायिकता, कुरूढ़ियों आदि के खिलाफ भी अलख जगाता रहा.     
उच्च आदर्श स्थापित करने वाले महात्मा गांधी को विस्मृत नहीं किया जा सकता. भारतीय जनमानस के अहसास गांधी के साथ काफी गहरे जुड़े हैं. गांधी वास्तव में सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, एक जीवन दर्शन है जो भारतीय समाज की जीवन शैली में रच-बस गया है. इसके पीछे सहिष्णुता को लेकर वह सामाजिक स्वीकार्यता है जिसका दायरा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहता बल्कि वैश्विक हो जाता है. गांधी दर्शन ने समूचे विश्व को प्रभावित किया है. गांधी का चिंतन किसी क्षेत्रीय सीमा से नहीं बंधा क्योंकि वह मानव मात्र के लिए है, वह मानव जो दुनिया के किसी भी कोने का हो सकता है.
गांधी एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिसके प्रभाव से कोई जुदा नहीं हो सका, यहां तक कि गांधी की आलोचना करने वाले भी. गांधी प्रतीकों में सामने आए हैं और समाज के अंतर्मन में बैठे हैं. गांधी की टोपी आजादी के आंदोलन में भारतीय अस्मिता की प्रतीक बनी. यह वह टोपी है जो कभी खत्म नहीं होती, जिसका असर खत्म नहीं होता. गांधी के प्रबल आलोचक भी, जिन पर गांधी की हत्या का दाग है, गांधी टोपी को अपनाए हैं, भले ही टोपी को बदले हुए रंग में अपनाया गया. आखिर कैसे अनदेखा कर दें वे गांधी को, गांधी उस व्यक्तित्व का नाम है जो उच्च आदर्शों के साथ अडिग है. गांधी उस पुरातन भारतीय परंपरा के ध्वजवाहक हैं जिसकी आत्मा में सामाजिक समरसता कूट-कूटकर भरी है. समय गुजर गया है, गांधी की कांग्रेस अब नहीं है लेकिन टोपी मौजूद है. यह टोपी फिर-फिर अपना असर दिखाती है. यह बात अलग है कि इस टोपी को धारण कर लेने वाले न तो गांधी हो जाते हैं न ही ऐसे अधिकतर लोग उन आदर्शों को अंगीकार करते हैं, जो गांधी ने दिए हैं. इसका उपयोग अस्त्र की तरह भी हुआ क्योंकि इस प्रतीक के आगे सब बौने हो जाते हैं. अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन में गांधी टोपी ने ऐसा असर दिखाया कि आगे जाकर एक राजनीतिक पार्टी और फिर पूरी सरकार ही टोपी वाली बन गई. 
खादी को आप सिर्फ कपड़ा नहीं कह सकते, यह भारतीय अस्मिता की प्रतीक है. खादी वास्तव में हमारी खुद्दारी है. यह ऐसा प्रतीक है जो भारत को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करता है. गांधी के सिद्धांतों के अनुसार पराधीनता में वह सब कुछ शामिल है जिसके लिए हम विदेशों पर निर्भर हों. विदेशी वस्तुओं को अपनाने का अर्थ अपने देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है. गांधी ने हमेशा बकरी का दूध पिया. वे हमेशा गौ-पालन को प्रोत्साहित करते रहे. गांधी की ग्राम स्वराज्य की अवधारणा में खेती-बाड़ी से साथ-साथ मवेशी पालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष माना गया है. कहने को भले ही खादी को सिर्फ एक कपड़ा मान लें या बकरी को सिर्फ एक मवेशी, लेकिन यह वे प्रतीक हैं जो संदेश देते हैं कि जब गांव आत्मनिर्भर होंगे तभी सही मायने में देश का विकास हो सकेगा.   
गांधी के आदर्श प्रतीकों के जरिए हमारे समाज में अनजाने ही कैसे पीढ़ियों में हस्तांतरित होते रहते हैं इसका एक उदाहरण देता हूं. कुछ साल पहले मैं महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में था. मेरा छोटा बेटा उस समय करीब छह साल का था. एक दिन वह स्कूल से लौटा और अपनी यूनिफार्म उतारी. इसके बाद उसने बजाय दूसरे कपड़े पहनने के वहां रखी एक सफेद चादर आधी नीचे लपेटी और बाकी ऊपर से कंधे पर डाल ली. मैंने पूछा यह क्या हो रहा है? वह पहले कुछ नहीं बोला. मैंने फिर पूछा कि यह चादर ऐसी क्यों लपेट ली. उसने कहा, गांधी जी ऐसे ही पहनते हैं. मैंने पूछा तुमने कहां देखा? उसने कहा स्कूल में लगी तस्वीर में...मैंने पूछा इससे क्या होता है? उसने कहा एक ही कपड़ा पहनना पड़ता है. फिर मैंने पूछा कि इससे क्या फायदा, क्यों एक ही कपड़ा पहना जाए? उसने ऐसी बात कही कि मैं हतप्रभ रह गया. उसने कहा- एक ही कपड़े से काम चलता है तो दूसरे की क्या जरूरत? मैंने पूछा कि क्या यह तुम्हें तुम्हारी टीचर ने बताया...उसने कहा नहीं. मैं सोच में पड़ गया कि पहली कक्षा में तो गांधी जी के बारे में शायद कुछ पढ़ाया भी नहीं जाता, फिर कैसे यह ऐसी बात कर रहा है? जब मैंने फिर पूछा तो उसने कहा...वह तो गांधी जी की फोटो में ही दिख रहा है कि वे एक ही कपड़ा पहने हैं. गांधी के आदर्श प्रतीक रूप में कुछ इसी तरह आ जाते हैं. गांधी बिना कुछ कहे बहुत कुछ कहते हैं. 
गांधी को अपना समझना आसान है क्योंकि वे हमेशा हमारे आसपास के आम इंसान बने रहे हैं. अपनी जरूरतें न्यूनतम करके जीवन यापन का उनका सिद्धांत आडंबरों से दूर सात्विक जीवन की ओर ले जाता है. वास्तव में सत्य की कसौटी पर परखें तो आडंबरों को हमेशा निरर्थक ही पाएंगे. 
गांधी ने कहा था किसी के साथ ऐसा व्यवहार न करें जैसे व्यवहार की आप किसी से अपेक्षा नहीं करते. किसी को कष्ट पहुंचाने से पहले सोच लें, कोई आपको भी चोट पहुंचा सकता है. गांधी के विचारों को जरूर ही पढ़ा जाना चाहिए लेकिन गांधी के बारे में सिर्फ पढ़-लिख लेने से वे हमारे जीवन में नहीं आ जाते, उन्हें महसूस करना होता है. गांधी के आदर्शों को पहनने, ओढ़ने और बिछाने की जरूरत है.  महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था - 'आने वाली पीढ़ियों को यह मुश्किल से विश्वास होगा कि हाड़-मांस का कोई ऐसा भी मानव धरती पर जन्मा था.' वास्तव में जिस तरह जाति-धर्म को लेकर विद्वेष का माहौल बनता जा रहा है, जिस तरह से जाति और धर्म आधारित वोटों की राजनीति होने लगी है.. जिस तरह समाज में विदेशी वस्तुओं और विदेशी संस्कृति के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है... तो क्या कुछ और साल बाद इसी देश में गांधी के जन्म लेने पर कोई विश्वास कर पाएगा?

Sunday, September 30, 2018

497 खत्म होने पर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने  158 साल पुराना क़ानून रद्द करके महिलाओं की यौनिक आज़ादी का रास्ता खोल दिया है. दरअसल इसकी व्याख्या ही ग़लत की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला बस इतना नहीं है कि स्त्री और पुरुष के विवाहेतर संबंधों को अब जुर्म नहीं माना जाएगा. और कुछ लोगों को ये फ़ैसला केवल पति पत्नी के संबंधों के खुलेपन पर कुछ जोक्स बनाने भर का अवसर भर लग सकता है. लेकिन यह एक ऐतिहासिक फैसला है. क्योंकि इस फैसले का वास्ता स्त्री की आजादी और उसकी यौनिक आज़ादी से भी है. सुप्रीम कोर्ट ने संभवतः पहली बार इतने स्पष्ट ढंग से रेखांकित किया है कि देह स्त्री की संपत्ति है और उसे इसके बारे में फैसला करने का अधिकार है. हालांकि स्त्री की यौनिक आजादी का जिक्र छिड़ते ही कुछ लोग इस तरह बोल पड़ते हैं जैसे यह विमर्श चलाने वाले या स्त्री के लिए यौनिक आजादी की मांग करने वाले लोग विवाहेतर संबंधों का लाइसेंस मांग रहे हैं. जबकि बात बात ये है कि पुरुष की तरह स्त्री भी स्वाधीन है, शादी उसे सामाजिक और नैतिक बंधन में बांधती जरूर है, लेकिन दोनों का एक स्वायत्त व्यक्तित्व भी है. पहले यह स्वायत्तता सिर्फ़ पुरुष को हासिल थी.
अब तो नहीं, लेकिन अतीत में विवाहित पुरुषों का वेश्यागमन भी सामाजिक तौर पर स्वीकृत था, बल्कि जिन जमींदार घरों में पुरुष इससे बचते थे, वहां उनकी मर्दानगी पर सवाल उठते थे. सुप्रीम कोर्ट ने दरअसल इस मर्दानगी की अवधारणा को भी झटका दिया है. क्योंकि इसी अवधारणा के तहत मर्द औरत को अपनी संपत्ति समझता रहा है. वह चाहे तो औरत घर में रहेगी, वह चाहे तो दफ़्तर जाएगी- वह उसकी दी हुई आज़ादी का उपभोग करेगी और उसके लिए उसकी कृतज्ञ होगी.
वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने अपने लेख में एक बहुत बढ़िया उदाहरण देकर बताया है, जिसका ज़िक्र मैं भी करना चाहूँगा, " कुछ दिन पहले आई एक फिल्म 'दिल धड़कने दो' में प्रियंका चोपड़ा शादी के बावजूद बच्चा नहीं चाहती, वह उस शादी से अलग होना चाहती है- उसका यह फ़ैसला किसी को समझ में नहीं आता- उसके मां-पिता को भी नहीं. इसके ठीक पहले प्रियंका चोपड़ा का पति राहुल बोस बहुत गरूर से बताता है कि उसने प्रियंका को काम करने की पूरी आज़ादी दी है. इस पर प्रियंका का दोस्त फ़रहान अख्तर सवाल उठाता है कि उसे अपनी आज़ादी के लिए तुम्हारे आदेश की ज़रूरत क्या है."
कहने का मतलब यह कि सुप्रीम कोर्ट ने स्त्री की आज़ादी के कई रूपों पर पहले से बहस चलती रही है. लैंगिक समानता और यौनिक आज़ादी के जिन दो मोर्चों पर स्त्री लगातार संघर्षरत रही है और जिसकी वजह से लगातार पिटती रही है, उसमें धीरे-धीरे उसे जीत मिलती दिख रही है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले स्त्री को पारिवारिक संपत्ति का अधिकार देकर उसकी लैंगिक बराबरी का रास्ता बनाया और अब डेढ़ सौ साल पुराना क़ानून रद्द  करके उसकी यौनिक आज़ादी का रास्ता खोल दिया है. क्या तमाम क़ानूनी व्यवस्थाओं और अधिकारों के बावजूद स्त्री को वो आज़ादी और समानता मिल पाई है, जो सरकारी एडवरटाइजिंग में दिखाई देती है? भले शत प्रतिशत सच न हो लेकिन कह सकते हैं पहले के मुक़ाबले बहुत अधिक बदलाव हुए हैं, पढ़ाई में, नौकरियों में, खेलों और तमाम क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी भी बढ़ी है और स्वीकृति भी.
लेकिन कुछ कड़वी सच्चाइयां इन सारे प्रयासों पर पानी फेर देती हैं.  एक तो यह कि सारे कानून मिलकर भी स्त्री को उसकी संवैधानिक हैसियत नहीं दिला पाए हैं. बहुत सख्त दहेज कानून के बावजूद दहेज के मामलों में कमी नहीं आई. घरेलू हिंसा विरोधी कानून के बावजूद घरों में औरतों की पिटाई नहीं रुकी है. ओफिसेज में यौन उत्पीड़न रोकने का कानून बना, लेकिन वो सब बहुत जगहों पर हो रहा है. बलात्कार पर फांसी तक की सज़ा  होने लदी लेकिन दिल दहला देने वाली बलात्कार या छेड़खानी की वारदाते आय दिन होती रहती हैं.  इस सबमें क़ानून के डर से अगर कुछ नहीं बदल रहा तो इसका मतलब है हमारा समाज इस बदलाव को लेकर तैयार नहीं है? अभी भी अधिकतम प्रगतिशाली लोग भी बाहर तो बड़े भाषण देते हैं लेकिन निजी जीवन में महिलाओं को बराबरी पर खड़ा करने में असुविधाजनक महसूस करते हैं. बेटी, पत्नी या बहन के पुरुष दोस्तों पर संदेह की नज़र लगाकर रखते हैं. किसी भी आदमी की अगर प्रगतिशाली सोच देखनी है तो खुद ही विचार करके देख ले क़ि मान लो कल को हमारी बेटी प्रेम विवाह करना चाहे तो आप क्या करोगे? बस ईमानदारी से खुद के ही दिल को जवाब दे लो, और जो सच है उस हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कीजिए. असल में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से एक ग़लत संदेश भी समाज में बड़ी आसानी से भेजा जा सकता है क़ि अदालत ने विवाहेतर संबंधों की छूट दी है. जबकि अदालत ने ऐसा कुछ नहीं किया है. अदालत ने बस ऐसे किसी संबंध को जुर्म माने जाने से इनकार किया है. उसने वह धारा 497 हटा दी है जिसके तहत कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ किसी और के संबंध को लेकर उस पुरुष पर मुकदमा कर सकता था. जबकि इस फ़ैसले के पहले भी ऐसे मामले तो सामने आते ही थे, और ना इस फ़ैसले के बाद सब ऐसा करने को उत्साहित घूमेंगे. बस इस फ़ैसले से ये साफ हो गया है कि महिला का शरीर उसके पति की संपत्ति नहीं है. जो लोग इस फ़ैसले को वेस्टर्न कल्चर का असर बताते हुए विवाह संस्था के लिए खतरनाक मान रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि विवाह संबंध को सबसे ज्यादा खतरा रिश्तों की असमानता से है. अगर विवाह संस्था में दोनों बराबर न हों और स्त्री को पुरुष की संपत्ति बने रहना है तो फिर इस संस्था के होने का मतलब नहीं है. दो बालिग लोगों का विवाह तभी सार्थक है जब दोनों के भीतर आपसी बराबरी और भरोसे का रिश्ता हो. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बस इस बात को सुनिश्चित करता है.

Wednesday, September 26, 2018

आधार हो गया निराधार

शीर्ष अदालत की संवैधानिक बेंच ने बहुमत से कहा कि आधार नंबर संवैधानिक रूप से वैध है. लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने इससे अलग राय जताते हुए आधार को असंवैधानिक क़रार दिया. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार एक्ट को धन विधेयक की तरह पास करना संविधान के साथ धोखा है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि वो जस्टिस सीकरी के सुनाए फ़ैसले से अलग राय रखते हैं. उन्होंने कहा कि आधार एक्ट को राज्यसभा से बचने के लिए धन विधेयक की तरह पास करना संविधान से धोखा है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 110 का उल्लंघन है. अनुच्छेद 110 ख़ास तौर पर धन विधेयक के संबंध में ही है और आधार क़ानून को भी इसी तर्ज़ पर पास किया गया था. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि वर्तमान रूप में आधार एक्ट संवैधानिक नहीं हो सकता. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि मोबाइल हमारे वक़्त में जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया है और इसे आधार से जोड़ दिया गया. ऐसा करने से निजता, स्वतंत्रता और स्वायत्तता को ख़तरा है. उन्होंने कहा कि वो मोबाइल से आधार नंबर को डीलिंक करने के पक्ष में हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्डरिंग एक्ट के संबंध में कहा कि यह क़ानून मानकर क्यों चल रहा है कि सभी बैंक खाताधारक धांधली करने वाले हैं. उन्होंने कहा कि यह मानकर चलना कि बैंक में खाता खोलने वाला हर व्यक्ति संभावित आतंकी या धांधली करने वाला है, यह अपने आप में क्रूरता है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि डेटा के संग्रह से नागरिकों की व्यक्तिगत प्रोफ़ाइलिंग का भी ख़तरा है. इसके ज़रिए किसी को भी निशाना बनाया जा सकता है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार नंबर सूचना की निजता, स्वाधीनता और डेटा सुरक्षा के ख़िलाफ़ है. इस तरह के उल्लंघन यूआईडीएआई स्टोर से भी सामने आए हैं. उन्होंने इसे निजता के अधिकार के ख़िलाफ़ भी बताया. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि इससे संवेदनशील डेटा के दुरुपयोग होने की आशंका है और थर्ड पार्टी के लिए यह आसान है. उन्होंने कहा कि निजी कारोबारी भी बिना सहमति या अनुमति के व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग कर सकते हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार प्रोग्राम समाधान तलाशने में नाकाम रहा है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने ये भी कहा कि आधार के बिना कल्याणकारी योजनाओं से महरूम करना नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि यूआईडीएआई के पास लोगों के डेटा की सुरक्षा के लिए कोई जवाबदेही नहीं है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि डेटा की सुरक्षा के लिए किसी भी तरह की मशीनरी का न होना ख़तरनाक है. उन्होंने कहा कि अभी तक आधार के बिना भारत में रहना असंभव था, लेकिन यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन था.

Monday, September 24, 2018

मोदी जी को मँहगा न पड़ जाए राफ़ेल

पूर्व फ़्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का चौंकाने वाला बयान आया है. ओलांद ने कहा और दोहराया भी है कि करोड़ों के रफ़ाएल सौदे में अनिल अंबानी को भारत सरकार ने ऑफ़सेट पार्टनर के तौर पर फ्रांस पर 'थोपा' था. इससे मोदी सरकार के उस दावे की हवा निकल गई जिसमें कहा गया था कि 'इस समझौते में पार्टनर चुनने में सरकार का कोई हाथ नहीं था और इसे विमान बनाने वाली कंपनी दसो एविएशन ने ही चुना था.' सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) में शामिल मोदी सरकार के शीर्ष मंत्रियों जैसे कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस बात को दोहराया था. सीतारमण ने तो यहां तक कह दिया था कि भारत सरकार को यह तक पता नहीं था कि दसो ने किस कंपनी को पार्टनर चुना है. यह दावा अविश्वसनीय है क्योंकि कैबिनेट में उनके सहयोगी नितिन गडकरी ने ही नागपुर में अंबानी की फ़ैक्ट्री का उद्घाटन किया था. मगर फिर भी मोदी सरकार की ओर से अविश्वसनीय दावे और 'जुमले' पेश किए जाते रहे. पिछले हफ़्ते ही वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा किया कि अरबों खरबों के बक़ायेदार विजय माल्या का यह कहना 'तथ्यात्मक रूप से' ग़लत है कि वह भागने से पहले उनसे मिले थे क्योंकि उन्होंने कभी माल्या को अपॉइंटमेंट नहीं दिया था. मगर मीटिंग हुई, माल्या भागे भी लेकिन हमारे वित्त मंत्री बचने के लिए बेहद कमज़ोर क़ानूनी तर्क दे रहे थे. इस स्कैंडल की जड़ में मोदी द्वारा करोड़ों डॉलर के जेटों की ख़रीद है, जिसके लिए स्पष्ट तौर पर ज़रूरी मंज़ूरी नहीं थी और ऊपर से अनिल अंबानी उनके साथ थे, जिन्होंने कुछ ही दिन पहले रक्षा निर्माण की कंपनी का पंजीकरण करवाया था. मोदी ने पेरिस में इस समझौते का एलान किया था और उस समय के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर तक इससे हैरान रह गए थे.
भारतीय सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी रक्षा कंपनियों में गिनी जाने वाली दसो को हाल ही में पैदा हुई एक कंपनी से हाथ मिलाने को कहा, जो अभी तक कुछ साबित नहीं कर पाई है. इस काम के लिए हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. दसो ने भी बिना कोई सवाल पूछे ऐसा ही किया. अक्सर मुदों पर डटे नहीं रहने वाले कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी इस बार अपने दावे पर डटे हुए हैं कि रफ़ाएल सौदे में पार्टनर चुना जाना घोटाला है. मोदी सरकार बिना किसी दमदार बचाव के घोटाले के आरोपों से इनकार कर रही है. सीतारमण ने पहले दावा किया कि वह जेट विमानों की क़ीमत बताएंगी मगर बाद में रहस्यमय 'गोपनीयता की शर्त' का हवाला देते हुए मुकर गईं. इस बीच मोदी सरकार  ने मीडिया में बिना जांच के ही मोदी सरकार को यह तक कहते हुए क्लीन चिट दे दी कि 'इस समझौते में भ्रष्टाचार नहीं बल्कि बेवकूफ़ी है.' वर्तमान सरकार का महिमामंडन करने में लगे भारतीय मीडिया के एक धड़े द्वारा नज़रअंदाज करने के बावजूद इस घोटाले ने मोदी सरकार को ज़ोरदार झटका दिया है. मोदी की चुप्पी से उनको कोई फ़ायदा नहीं मिलने वाला. अनिल अंबानी विपक्ष के नेताओं और मीडिया के उन लोगों के ख़िलाफ़ मानहानि का मामला दर्ज कर रहे हैं जो यह सवाल उठा रहे हैं कि यह डील उन्हें सौंप दी गई जिनके पास रक्षा के क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं है. अंबानी ने स्वतंत्र मीडिया से इस तरह के 'आरोप लगाना बंद करने और इससे बचने' को भी कहा है.
इस बात पर ग़ौर करें कि केंद्र तो पहले ही सरकारी स्वामित्व वाले हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के दावों को दरकिनार कर चुका है, जो इस तरह के ऑफ़सेट एग्रीमेंट के लिए उच्चस्तरीय रक्षा निर्माण में एक ट्रैक रिकॉर्ड रखता है. ख़ुद ही मनमाने तरीके से निर्णय लिया है तो इससे होने वाला नुक़सान भी उनके अपने व्यक्तित्व पर भी असर डालेगा. विपक्ष  का कहना है कि रफ़ाएल डील आने वाले आम चुनावों में बड़ा मुद्दा होगा. राहुल गांधी ने भी अपने संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही है. उन्होंने कहा कि 'मोदी और अनिल अंबानी ने साथ मिलकर भारतीय सुरक्षाबलों पर 130 हज़ार करोड़ रुपये की सर्जिकल स्ट्राइक की है. मोदी जी आपने हमारे शहीद सैनिकों के ख़ून का अपमान किया है. आपको शर्म आनी चाहिए. आपने भारत की आत्मा के साथ धोखा किया है.' इससे ये भी संकेत मिलता है कि विपक्ष किस तरह पीएम मोदी पर आरोप लगाएगा. उम्मीद है कि जल्द ही ओलांद के बयान की ख़बर पर फ़्रांसीसी मीडिया में फ़ॉलोअप आएगा. अब तक तो यही लग रहा है कि बोफ़ोर्स के पुराने भूत की तरह ही एक बार फिर एक रक्षा सौदा एक और प्रधानमंत्री का खेल बिगाड़ सकता है.

Wednesday, August 29, 2018

राहुल के विदेश में हमले से क्यों बिलबिलाई भाजपा?

जर्मनी के हैम्बर्ग में और लंदन के स्कूल आफ इकोनोमिक्स में राहुल गांधी के भाषणों ने भाजपाई हलके में कुछ ऐसी हड़कंप पैदा कर दी है जिसे राजनीति के साधारण मानदंडों से समझना कठिन है. वैसे ही एक अर्से से राहुल ने आत्ममुग्ध मोदी की नींद उड़ा रखी है. हाल में लोकसभा के मानसून अधिवेशन में राहुल की बार-बार की चुनौती के बावजूद मोदी उनसे आंख मिलाने के हिम्मत नहीं कर पा रहे थे क्योंकि राफेल सौदे में हजारों करोड़ की दलाली का उनके पास इसके अलावा कोई जवाब नहीं था कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं, उन्हें इतना तो हक बनता ही है कि अपने संकट में पड़े एक मित्र को चालीस हजार करोड़ का लाभ दिला दे. बहरहाल, जर्मनी और लंदन में राहुल के भाषण तो लगता है मोदी कंपनी को और भी नागवार गुजर रहे हैं. मोदी में इतनी भी जवाबदेही नहीं है कि वे देश के अंदर या बाहर, कहीं भी एक प्रेस कांफ्रेंस कर लें. इसके अतिरिक्त किसी भी जगह बुद्धिजीवियों से खुला संवाद तो उनके संघी प्रशिक्षण में एक असंभव चीज है. उनका प्रशिक्षण सिर्फ आम लोगों के बीच झूठी बातों को रटने, सांप्रदायिक बटवारे के लिये हुआ है, जो वे बखूबी करते हैं. भेड़-बकरियों की तरह जुटा कर लाये गये लोगों से जयकारा लगवाते हैं.
लेकिन राहुल ने पूरी जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मसलों पर इन दोनों जगहों पर जिस गंभीरता से भारत की राजनीति को आज के विश्व पटल पर समझने की कोशिश की, उसने उनमें एक बड़े राजनेता के उभरने के साफ संकेत दिये हैं.
सर्वप्रथम तो भाजपाई संबित पात्रा टाइप मोदी काल के प्रवक्ताओं को राहुल का विदेश में मुंह खोलना ही मोदी के विशेषाधिकार के हनन की तरह लगा था. इसके अलावा वे और दो बातों पर बेजा ही उखड़ गये थे, इनमें पहली बात थी भारत में बढ़ती हुई बेरोजगारी की. राहुल ने इसकी विदेश में चर्चा क्यों कर दी? कौन नहीं जानता कि बेरोजगारी कितने प्रकार की सामाजिक समस्याओं का कारण बनती है. इनमें आज की दुनिया की एक सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद भी है. सभी आतंकवादी संगठन बेरोजगार युवकों को ही आम तौर पर अपनी गतिविधियों के मोहरों के रूप में इस्तेमाल करते हैं.
राहुल ने विदेश में भारत में बेरोजगारी की समस्या को उठा कर लगता है मोदी कंपनी की इस सबसे अधिक दुखती हुई रग पर हाथ रख दिया था. उस पर राहुल ने मोदी के नोटबंदी के पागलपन और जीएसटी की बदइंतजामी का जिक्र करके तो जैसे उनके जख्मों पर नमक छिड़कने के काम कर दिया. राहुल ने कहा कि मोदी ने आर्थिक विकास की दिशा में सकारात्मक तो एक भी कदम नहीं उठाया, लेकिन इन दो नकारात्मक कदमों से पूरी अर्थ-व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है. और इसके साथ ही यह बिल्कुल सही कहा कि यही परिस्थिति तत्ववादी ताकतों के लिये जमीन तैयार करती है ।
राजनीतिक-प्रशासनिक अराजकता से कैसे आतंकवादी ताकतें लाभ उठाती हैं, इसी संदर्भ में राहुल ने अमेरिका की इराक नीति का भी जिक्र किया और कहा कि वहां सद्दाम हुसैन के शासन को खत्म करने में ज्यादा समय नहीं लगा था, लेकिन बाद में नई प्रशासनिक व्यवस्था में जिन लोगों को भी वंचित किया गया, उनसे ही आगे चल कर इराक से लेकर सीरिया तक में आइसिस की तरह के संगठन को अपनी जमीन तैयार करने की रसद मिली.
राहुल का बेरोजगारी और तत्ववाद, इन दो विषयों पर बात करना संघी तत्वों के लिये निषिद्ध विषयों पर बात करने के अपराध के समान था. इसीलिये राहुल के हैम्बर्ग के भाषण से ही उनके प्रवक्ता और चैनलों में बैठे मूर्ख ऐंकर और लगभग उसी स्तर के दूसरे भागीदारों ने चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया. चैनलों पर राहुल को बचकाना कहने की एक होड़ शुरू हो गई. जो खुद पशुओं की तरह अपनी नाक के आगे नहीं देख पाते हैं, सोचते हैं ओसामा बिन लादेन आया और अल कायदा या आइसिस बन गया, उनके लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद और सामाजिक विषमताओं को दुनिया में आतंकवाद के उत्स के रूप में देखने की बात एक भारी रहस्य की तरह थी. और जो उन्हें समझ में न आए, उनकी नजर में वही बचकाना होता है. लेकिन सच यही है कि इन चैनलों की बहसें पशुओं के बाड़ों के निरर्थक शोर से अधिक कोई मायने नहीं रखती हैं.
इसके बाद लंदन में राहुल ने और एक सबसे महत्वपूर्ण बात कह दी कि भारत में आरएसएस मिस्र के 'मुस्लिम ब्रदरहुड' का ही हिंदू प्रतिरूप है. आरएसएस की तुलना हम हिटलर की नाजी पार्टी से लेकर अफगानिस्तान के तालिबान तक से हमेशा करते रहे हैं. लेकिन इस संदर्भ में 'मुस्लिम ब्रदरहुड' का जिक्र करके राहुल ने आज के संदर्भ में आरएसएस के और भी सटीक समानार्थी संगठन की शिनाख्त की है.
यह 'मुस्लिम ब्रदरहुड' क्या है ? इसकी ओर सारी दुनिया का ध्यान 2012 में खास तौर पर गया था जब 2011 की जनवरी में अरब बसंत क्रांति के बाद इसके राजनीतिक संगठन ने मिस्र का चुनाव जीत लिया था । लेकिन बहुत जल्द ही मिस्र में उसकी आतंकवादी गतिविधियां दुनिया के सामने आने लगी और 2015 में ही उसकी सरकार को खत्म करके उसके सारे नेताओं को जेलों में बंद कर दिया गया और दुनिया के बहुत सारे देश उसे एक आतंकवादी संगठन मानते हैं.
'सोसाइटी आफ द मुस्लिम ब्रदर्स' (अल-लखवॉन अल-मुसलिमुन) के नाम से सन् 1928 में मिस्र में एक अखिल इस्लामिक संगठन के रूप में इसका निर्माण हुआ था. यह अस्पतालों और नाना प्रकार के धर्मादा कामों के जरिये पूरे इस्लामिक जगत में अपनी जड़ें फैला रहा था. कुरान और सुन्ना के आदर्शों पर यह पूरे समाज, परिवार और व्यक्ति को ढालने के प्रचारमूलक काम में मुख्यतः लगा रहता था और पूरी अरब दुनिया में इसके अनेक समर्थक हो गये थे. धर्मादा कामों के जरिये अपने राजनीतिक उद्देश्यों को साधना ही इसका प्रमुख चरित्र रहा है और इसे एक समय में सऊदी अरब सहित कई इस्लामिक देशों का समर्थन मिला हुआ था. लेकिन आज सऊदी अरब में भी यह एक प्रतिबंधित संगठन है.
कहना न होगा, तथाकथित सेवामूलक कामों के जरिये राजनीतिक उद्देश्यों को साधने वाला इस्लामिक दुनिया का यह एक ऐसा कट्टरपंथी और तत्ववादी संगठन है जिसकी भारत में सबसे उपयुक्त मिसाल हिंदू तत्ववादी आरएसएस ही हो सकती है. इसीलिये राहुल ने आरएसएस की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करके बिल्कुल सही जगह पर उंगली रखी है.
जर्मनी और ब्रिटेन में राहुल के भाषणों पर भाजपाई प्रवक्ताओं के उन्माद के रूप को देख कर हम यह सोचने के लिये मजबूर हो रहे हैं कि आखिर उसमें ऐसा क्या था जिसने इन सबकों इस प्रकार से आपे के बाहर कर दिया है? सचमुच, राहुल के इस राजनीतिक विश्लेषण को हमें फ्रायडीय सिद्धांतों पर समझने की जरूरत महसूस होने लगी है जिसमें किसी भी स्वप्न का विश्लेषण (आरएसएस के मामले में उसके रहस्यमय रूप का विश्लेषण) उस स्वप्न के पीछे छिपे हुए मूल विचार के रहस्य बजाय उसकी संरचना के पूरे स्वरूप के ही रहस्य को उजागर करके किया जाता है.
लगता है, राहुल ने कुछ इसी प्रकार से, संघ संसार की पूरी स्वप्निल संरचना की रहस्यात्मकता को उन्मोचित करने का काम किया है और इसीलिये चैनलों में उनके भाषणों को लेकर इतनी भारी चीख-चिल्लाहट मची हुई है. राहुल ने लंदन में अपने भाषण में 1984 के सिख-विरोधी दंगों और डोकलाम प्रसंग पर भी कुछ इतनी महत्वपूर्ण बातें कही हैं जिनसे भाजपाई और भी तिलमिला गये हैं. उन्होंने साफ कहा है कि कांग्रेस कोई कॉडर आधारित पार्टी नहीं है. उसने 1984 के दंगों में कोई बाकायदा हिस्सा नहीं लिया था.दंगों के एफआईआर में जिन लोगों के नाम हैं उनमें भाजपा के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हैं. और, हाल के डोकलाम की सीमा पर हुए नाटक के बारे में भी उनकी टिप्पणी उतनी ही तीखी थी जिसमें उन्होंने कहा कि बिना किसी तैयारी और तयशुदा एजेंडा के राजनयिक वार्ताओं के नाटक किसी से करवाना हो तो उसमें नरेंद्र मोदी आपको सबसे आगे मिलेंगे. जब उन्होंने चीन के राष्ट्रपति के साथ झूला झूला उसके चंद रोज बाद ही डोकलाम में चीनी सेना पहुंच गई.

Thursday, August 9, 2018

एन आर सी हिन्दू मुस्लिम नहीं दूसरा खेल है.

जब असम में एनआरसी आई तो, खूब हो हल्ला मचा, लेकिन मुझे बिना जानकारी के उसपर कुछ लिखना बिल्कुल सही नहीं लगा. अब यहाँ सबसे बुनियादी सवाल है, कि क्या भारत में ऐसे लोग हैं जो नागरिक नहीं हैं और अवैध रूप से देश में दाखिल हो गए हैं? हां, ऐसे लोग हैं. तो, ये पता लगाने के लिए कौन देश का नागरिक नहीं है, पहले हमें ये पता लगाना होगा कि आख़िर नागरिक कौन है? भारत में सक्रिय कोई भी क़ानूनी राजनैतिक दल इसके ख़िलाफ़ नहीं है. अब सवाल ये पैदा होता है कि ये कैसे तय होगा कि कोई भारत का नागरिक है या नहीं? आप इस बात को किसी भी तरह से निर्धारित करें, इसके लिए निष्पक्षता और क़ानून के सामने बराबरी जैसी बुनियादी शर्तें पूरी करना ज़रूरी होगा. इसका ये मतलब है कि नागरिकता तय करने के लिए निष्पक्ष सबूतों की ज़रूरत होगी. सबूतों का मतलब है दस्तावेज़ी सबूत, जिनकी प्रतिलिपि, नागरिकता तय करने वाली एजेंसी को सुरक्षित रखनी होगी, जिसकी जनता पड़ताल कर सके. इसका ये मतलब है कि नागरिकता की पड़ताल के दायरे में वो सभी लोग आएंगे, जो भारत गणराज्य के परिक्षेत्र में रहते हैं. इसका ये मतलब है कि नागरिकता की जांच करने वाली एजेंसी भारत की सरकार या इसके नागरिक के हाथ में नहीं हो सकती. इसका ये भी मतलब है कि नागरिकता की जांच का काम सरकार की निगरानी में नहीं हो सकता. एनआरसी के रजिस्ट्रेशन के दौरान इनमें से किसी भी शर्त को पूरा नहीं किया गया. तो, कुल मिलाकर असम में एनआरसी तैयार करने की प्रक्रिया वही बन गई, जिस मक़सद से इसे शुरू किया गया था. यानी बंगालियों और कुछ दूसरे समुदायों को नागरिकता के दायरे से क़ानूनी तरीक़े से बाहर करना. ताकि, दिल्ली, नागपुर और गुवाहाटी में बीजेपी की नस्लवादी प्यास को बुझाया जा सके. शुरुआत में तो बीजेपी ने एनआरसी ड्राफ्ट प्रकाशित होने पर ख़ूब जश्न मनाया. लेकिन अब पार्टी को लग रहा है कि वो इसके ज़रिए जो सियासी फ़सल काटना चाहती थी, उसके ख़िलाफ़ बंगालियों ने सांप्रदायिक रूप से एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया. बंगाल में पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है कि सत्ताधारी टीएमसी और प्रमुख विपक्षी दल सीपीएम किसी मुद्दे पर एकजुट हो गए हैं. बीजेपी के ख़िलाफ़ ये मोर्चेबंदी असम से लेकर बंगाल तक फैल गई है. दिल्ली के मीडिया ने एनआरसी के विरोध को हिंदू-मुसलमान का सवाल बना दिया. जबकि हक़ीकत कुछ और ही है. बीजेपी के ही असम में कट्टरहिंदू बंगाली विधायक शिलादित्य देब ने माना कि एनआरसी से बाहर रह गए ज़्यादातर लोग हिंदू बंगाली हैं. असम में आसू और उल्फा जैसे संगठनों में बंगाली विरोधी सोच पहले से ही थी. जब इसका मेल बीजेपी की मुस्लिम विरोधी विचारधारा से हुआ, तो उसका नतीजा एनआरसी की प्रक्रिया के दौरान सामने आया. हिंदू बंगालियों को सब्ज़बाग़ दिखाए गए, ताकि आसू के पूर्व अध्यक्ष सर्बानंद सोनोवाल असम के मुख्यमंत्री बन जाएं. उन्हें हिंदू बंगालियों के वोट इसलिए मिले, क्योंकि बीजेपी ने उन्हें ये भरोसा दिया था कि वो हिंदू बंगालियों को मुस्लिम बंगालियों से अलग करके देखेगी. बीजेपी असल में असमिया और बंगालियों के बीच फंस गई थी. तो, पार्टी ने पहले बंगालियों के वोट हासिल किए, फिर उन्हें उठाकर फेंक दिया. भारत में बांग्लादेशी का मतलब बांग्लादेश के वो नागरिक होने चाहिए, जो ग़ैरक़ानूनी रूप से भारत में हैं. लेकिन बीजेपी की सांप्रदायिक सियासत में बांग्लादेशी का मतलब सारे मुस्लिम बंगाली हैं. जब बात असम और आस-पड़ोस के बीजेपी प्रशासित राज्यों की आती है, तो बांग्लादेशी का दायरा और बढ़ जाता है. तब बांग्लादेशी का मतलब सारे बंगाली हो जाते हैं. फिर वो हिंदू हों या मुसलमान, भारतीय हों या ग़ैर-भारतीय. असम में लंबे समय से 'असम केवल असमियों का' जैसे नारे दिए जाते रहे हैं. इस तरह के नारों का नतीजा 1961 में सिल्चर के बंगाली विरोधी हत्याकांड के तौर पर सामने आया. असम की नस्लवादी राजनीति के चलते वहां की बराक घाटी में रहने वाले बंगाली भाषी मूल निवासियों की हत्याएं हुईं. उन पर अपनी मातृभाषा बांग्ला छोड़ने का दबाव पड़ा. असम में उग्र जातीयता के निशाने पर नेल्ली और सिलापाथोर के गैर-असमिया निवासी भी आए. बाद में गैर-असमिया लोगों के ख़िलाफ़ मुहिम उल्फ़ा के उग्र हिंसक अलगाववादी आंदोलन के तौर पर सामने आई. अब यहाँ पर वही असमिया माने गए जिनको इन संगठनों ने चाहा, क्योंकि भारत के खिलाफ बंदूक लेकर लड़ने वाले ये संगठन अब सरकार के साथ आ चुके हैं, इसलिए राष्ट्रवादी हो गए, और अपनी लड़ाई को गैर असमिया के बदले गैर भारतीय या बांग्लादेशी घुसपैठिए कर दिया, जबकि असल में उसका अर्थ वही था. 

क्या है राफेल घोटाला?

राफेल लड़ाकू विमान फ्रांस की कंपनी डास्सों एविएशन बनाती है. 2007 से भारत इसे ख़रीदने का सपना देख रहा है. उस साल भारतीय वायुसेना ने सरकार को अपनी ज़रूरत बताई थी और यूपीए सरकार ने रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोज़ल तैयार किया था कि वह 167 मीडियम मल्टी रोल कंबैट एयरक्राफ्ट खरीदेगा. इसमें साफ साफ कहा गया था कि जो भी टेंडर जारी होगा उसमें यह बात शामिल होगी कि शुरुआती ख़रीद की लागत क्या होगी, विमान कंपनी भारत को टेक्नॉलजी देगी और भारत में उत्पादन के लाइसेंस देगी.
इस आधार पर टेंडर जारी होता है जिसमें 6 लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनियां हिस्सा लेती हैं. जिनमें से एक डास्सो एविएशन भी है. 2011 तक बातचीत और परीक्षण की प्रक्रिया चलने के बाद वायु सेना अपनी राय रखती है कि उसकी ज़रूरत के अनुसार डास्सो एविशन और एक दूसरी कंपनी यूरोफाइटर्स के विमान सही लगते है. 2012 के टेंडर में डास्सो एविएशन ने सबसे कम पैसे में विमान आपूर्ति की बात की. इसके आधार पर भारत सरकार और डास्सो कंपनी के बीच बातचीत शुरू होती है. इसके बीच बहुत कुछ होता है. जब प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस की यात्रा पर जाते हैं, अप्रैल 2015 में तो इस खरीद की प्रक्रिया से संबंधित कई बातें बदल जाती हैं.
रशांत भूषण के मूल सवाल हैं कि राफेल विमान की खरीद की बातचीत की प्रक्रिया में कई साल तक पब्लिक सेक्टर की कंपनी हिन्दुस्तान एरोनोटिक्स लिमिटेड शामिल होती है, 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री के डील साइन करने के 16 दिन पहले डास्सो एविशन जो राफेल बनाती है, उसके सीईओ के बयान के अनुसार हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड कंपनी से बातचीत हो रही है, मार्च 2014 में दोनों के बीच एक करार भी हुआ था कि भारत में 108 राफेल लड़ाकू विमान बनेगा और इसका 70 फीसदी काम एचएएल को मिलेगा और बाकी काम डास्सो एविएशन करेगी. लेकिन प्रधानमंत्री के डील साइन करने से दो दिन पहले हिस्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड का नाम कट जाता है. यह खेल कैसे हुआ किसी को पता नहीं, इस सवाल का जवाब कोई दे नहीं रहा है.
प्रशांत भूषण का कहना है कि 60 साल से जो कंपनी विमान बना रही है वो बाहर कर दी जाती है और एक ऐसी कंपनी आ जाती है जिसका कोई अनुभव नहीं है. जिसे भारतीय नौ सेना को खास तरह का जहाज़ बनाकर देना था मगर वो नहीं दे पा रही है. यह सब रिलायंस डिफेंस के बारे में कहा जा रहा है कि इस कंपनी पर 8000 करोड़ का कर्ज़ा भी है भारतीय बैंकों का. यशवंत सिन्हा प्रशांत भूषण और अरुण शौरी के अनुसार इस मामले में बड़ा घपला हुआ है. सरकार सीक्रेसी यानी गोपनीयता के करार का बहाना बना रही है. प्रशांत भूषण का कहना है कि अप्रैल 2015 में जो डील हुई वो 2012 से लेकर 2015 के बीच चली प्रक्रिया से बिल्कुल अलग है. अचानक तीन साल की सारी बातचीत कैसे पलट गई. किसके फायदे के लिए पलटी गई. 2007 में 126 जहाज़ की कुल लागत 42,000 करोड़ थी. वैसे अंतिम कीमत क्या थी, इसकी जानकारी पब्लिक में मौजूद नहीं है. लेकिन 13 अप्रैल 2015 को दूरदर्शन को इंटरव्यू देते हुए रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि 126 एयरक्राफ्ट की कीमत 90,000 करोड़ होगी. तो अब सरकार दाम क्यों नहीं बता रही है.
विदेश सचिव की बातचीत के अनुसार यूपीए के समय की बातचीत के हिसाब से ही डील हो रही थी. मगर जब डील साइन होती है तब पहले की बातचीत की कई बातें बदल चुकी थीं. पहले डील थी कि 18 फाइटर प्लेन मिलेगा, लेकिन 36 फाइटर प्लेन की बात कहां से आ गई. क्या इसके लिए वायु सेना ने अपनी तरफ से कुछ प्रस्ताव किया था. क्या नई डील को रक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी ने मंज़ूरी दी थी. नई डील के अनुसार नया टेंडर क्यों नहीं जारी किया गया. 4 जुलाई 2014 को यूरोफाइटर ने रक्षा मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखा था कि वह अपनी लागत में 20 फीसदी कमी करने के लिए तैयार है. तो फिर नया टेंडर क्यों नहीं जारी हुआ. मार्च 2014 में एचएएल और डास्सों के बीच एक करार हुआ था, जिसके अनुसार 108 विमान भारत में बनेंगे और 70 फीसदी काम एचएएल में होगा. बाकी का काम डास्सों एविशन कंपनी करेगी.
डील के दो दिन पहले नई कंपनी का नाम सामने आता है. 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस में इसकी घोषणा करते हैं. काम एक नई कंपनी को मिल जाता है. अनिल अबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को. एचएएल को बाहर कर दिया जाता है, जबकि 25 मार्च को डास्सो एविएशन के सीईओ एक प्रेस कांफ्रेंस करते हैं जिसमें वे एचएएल का नाम लेते हैं और बताते हैं कि उनके साथ बातचीत हो रही है. एचएएल चेयरमैन से सुनकर आप सुनकर मेरे संतोष की कल्पना कर सकते हैं कि हमने ज़िम्मेदारियों के साझा करने से सहमत हैं. हम रिक्वेस्ट फ़ॉर प्रोजेक्ट में तय की गई प्रक्रिया को लेकर प्रतिबद्द हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि कांट्रेक्ट को पूरा करने और और उस पर हस्ताक्षर करने का काम जल्दी हो जाएगा.

यहां आपको यह समझना है कि रफाएल कंपनी के सीईओ एचएएल के चेयरमैन की बात कर रहे हैं साथ ही वे रिक्वेस्ट फार प्रपोज़ल की बात कर रहे हैं जो यूपीए के समय से चल रहा था. फिर अचानक सब कैसे बदल गया. हमारे सहयोगी उमाशंकर सिंह ने प्रशांत भूषण से बात की है. 36 विमानों की तैयार अवस्था में तुरंत आपूर्ति होनी थी. तीन साल बीत गए मगर एक भी विमान भारत की सरज़मी पर नहीं उतरा है. यह इस प्रेस कांफ्रेंस में कहा गया है. संसद में बताया गया कि पहली खेप अप्रैल 2019 में आएगी. यानी डील साइन के चार साल बाद. 2022 के मध्य तक 36 एयरक्राफ्ट की पूरी खेप नहीं आ सकेगी.
यह कैसी डील है कि अप्रैल 2015 से अगस्त 2018 आ गया अभी तक रक्षा मंत्रालय को जानकारी ही नहीं है, डास्सो एविएशन ने जानकारी ही नहीं दी है, रिलायंस के इस जवाब के बाद कम से कम रक्षा मंत्रालय को तो जवाब देना ही चाहिए. अब एक सवाल के जवाब में रिलायंस डिफेंस कहती है कि उसे 30,000 करोड़ का ठेका नहीं मिला है. डास्सो एविएशन किस ऑफसेट पार्टनर को कितना काम देगी, यह अभी तय नहीं हुआ है. डास्सो एविएशन ने इसके लिए 100 से अधिक भारतीय कंपनियों को इशारा किया है. इसमें से दो सरकारी कंपनियां हैं एचएएल और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड. एक तो इशारा करने का क्या मतलब होता है हम नहीं समझे, अभी रिलायंस कह रही है कि रक्षा मंत्रालय को हो सकता है कि ऑफसेट पार्टनर के बारे में जानकारी न हो मगर रिलायंस को पता है कि 100 से अधिक ऑफसेट पार्टनर्स हो सकते हैं. इसमें दो सरकारी कंपनियां भी हैं. क्या यह मुमकिन हो सकता है कि रक्षा मंत्रालय को इतना भी पता न हो. क्या आप इस जवाब से संतुष्ट हुए. खैर आगे बढ़ते हैं. रिलायंस डिफेंस ने उस सवाल का जवाब दिया है कि एक ऐसी कंपनी को ठेका कैसे मिल गया जिसके पास कोई अनुभव नहीं है.
     

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...