पिछले आम चुनाव प्रचार में भाजपा और सहयोगी दलों ने देशवासियों को कांग्रेस की खामियों के बारे में इस तरह और इतना बताया और जनता से इतने वादे किये कि जनता ने भाजपा से बहुत सी उम्मीदें पाल लिया. जनता को लगा कि अब राम-राज्य आ ही जायेगा, उसकी हर परेशानी हल हो जाएगी और जीवन सुगम हो जायेगा.
फलस्वरूप जनता ने कांग्रेस को नकार दिया. चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला. भाजपा ने सरकार बनाया. पर सत्ताशीन पार्टी का जो गुण होना चाहिए वो भाजपा में कहीं नहीं दिखा. सत्ता में होते हुए भी भाजपा ने इस तरह राजनीति किया जैसे वो विपक्ष हो. आज तक कांग्रेस के बिना भाजपा की कोई भी बात नहीं हुई. कांग्रेस कमजोर होते हुए भी भाजपा के दिलोदिमाग पर छाई रही. इसका मतलब यह कि भाजपा के अन्दर कांग्रेस को लेकर हमेशा एक अज्ञात भय बना रहा. फलस्वरूप सरकार के नियमित कार्यक्रमों को भी भाजपा सरकार की उपलब्धि बनाकर जनता के सामने लाती रही और यह साबित करती रही कि 60 सालों से सत्ता में रही कांग्रेस ने कुछ नहीं किया.
कुछ भाजपाइयों ने तो शीर्ष नेताओं का चरित्रहनन तक किया, यहाँ तक कि स्वर्गवासी कांग्रेस नेताओं तक को आज की राजनीति में सम्मिलित कर दिया. कुल मिलाकर इनका उद्देश्य यही था कि येन केन प्रकारेंण जनता के मन में कांग्रेस के प्रति घृणा उत्पन्न करा दी जाये.
नोटबंदी से जनता को अपार कष्ट हुआ पर भाजपा का प्रचार तंत्र इतना प्रबल था कि जनता अपना कष्ट और नोटबंदी के दुष्परिणामों को भूल गयी. सरकार ने अपनी उपलब्धियों के वो आंकड़े पेश किये जो गलत नहीं थे पर पूर्ण रूपेण सही भी नहीं थे. जैसे भारत की आर्थिक स्थिति से सम्बंधित वर्ल्ड बैंक के आंकड़े. नोटबंदी के बाद विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा सरकार के पक्ष में अचानक आर्थिक डाटा विश्लेषण का मतलब जनता भले न समझ पाए पर भाजपा स्वयं अपने लिए गए निर्णयों के दूरगामी परिणामों से अन्दर ही अन्दर डरती रही. और इसीलिए हमेशा कांग्रेस पर हमलावर रही.
राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा का राजनैतिक आचरण सभी ने देखा. जनता अन्दर से भाजपा के प्रति असहज होते हुए भी, भाजपा प्रचार से इस तरह प्रभावित हो गयी थी कि, सही गलत का फैसला नहीं कर पायी. साथ ही यह भी सत्य है कि आज की तारीख़ तक जनता के पास भाजपा के अलावा कोई दूसरा प्रभावशाली और सशक्त विकल्प नहीं था. अतः भाजपा को चुनना जनता की मजबूरी थी.
हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष ने सरकार की नीतियों के खिलाफ राजघाट पर एक दिन का उपवास किया. भाजपा के कुछ लोगों ने उपवास पूर्व अल्पाहार कर रहे कुछ नेताओं की तस्वीरें सोशल मिडिया पर वायरल कर यह बताने की कोशिश किया कि कांग्रेसी उपवास का ढोंग कर रहे हैं. पहली बात तो यह कि जनता को ये समझना चाहिए कि इसको भाजपा प्रचारित क्यूँ कर रही है? दूसरा यह कि उपवास राहुल गाँधी कर रहे थे न कि शेष नेतागण ! तीसरा यह कि उपवास का सही अर्थ क्या है संभवतः आरोप लगाने वाले नेताओं को पता नहीं है . मतलब भाजपा हमेशा इस जुगत में लगी रहती है कि राजनैतिक विमर्श की दिशा ही बदल जाये और सरकार के खिलाफ कोई चर्चा ही न होने पाए. ऐसा सिर्फ कमजोर लोग ही करते हैं. आज संख्या बल में भाजपा निस्संदेह बहुत मजबूत है पर सद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से उतनी ही कमजोर.
विजय किसी व्यक्ति या संगठन कि नहीं उसके विचारों की होती है. आज भाजपा कांग्रेस की तर्ज पर देशव्यापी उपवास राजनीति करके यह सिद्ध कर रही है कि कांग्रेस अभी भी उससे आगे है. कांग्रेस आज भी भारतीय राजनीति की धुरी है.
Friday, April 13, 2018
उपवास की राजनीति
Tuesday, April 10, 2018
SC/ST Act पर सुप्रीम कोर्ट और सरकार का गलत रुख
एससी/एसटी एक्ट के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों से पल्ला झाड़ने की कोशिश में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अजब बयान दिया, कि केन्द्र सरकार इस मामले में औपचारिक पक्षकार ही नहीं थी. सच यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अटार्नी जनरल को इस मामले पर नोटिस जारी किया, जिसके बाद एडिशनल सोलिसिटर जनरल (एएसजी) ने मामले पर केन्द्र सरकार की ओर से पक्ष रखा. केन्द्र सरकार की तरफ से मामले में बहस की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले में एएसजी का नाम शामिल है, फिर तकनीकी पेंच से केन्द्र सरकार इस मामले से क्यों बचना चाह रही है. फैसले में अनेक कानूनी विसंगतियों पर केन्द्र सरकार द्वारा यदि मुख्य मुक़दमे में सुप्रीम कोर्ट का ध्यान दिलाया जाता तो इस रिव्यू की नौबत क्यों आती?
क्रिमिनल मैटर में पीआईएल जैसा फैसला क्यों- सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख महाराष्ट्र में एससी/एसटी कानून के दुरुपयोग का मामला था. इस मामले में गुण-दोष के आधार पर दोषी आरोपियों को मुक्त करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने कानून में बदलाव की सिफारिश किया और आदेश की अवहेलना पर अवमानना कानून के तहत कारवाई की बात भी कही. संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को ऐसे आदेश जारी करने के लिए विशेष शक्तियाँ मिली हैं और इसीलिये सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश का कानून माना जाता है. यह पीआईएल का मामला नहीं था और व्यक्तिगत क्रिमिनल मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देश न्यायिक अनुशासन के अनुरुप भी नहीं है. व्यवहारिक स्थिति यह है कि जब तक कि संसद द्वारा कानून नहीं बनाया जाये तब तक दिशा-निर्देशों की कानूनी अहमियत नहीं है तो फिर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का सवाल क्यों?
दहेज उत्पीड़न के दिशा- निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच द्वारा विचार- देश में अनेक कानूनों के दुरुपयोग की वजह से हो रही बेवजह गिरफ्तारियों पर सभी की चिंता जायज़ है. एससी/एसटी कानून पर फैसला देने वाली बेंच ने ही दहेज उत्पीड़न के मामलों पर बेवजह गिरफ्तारियाँ रोकने के लिए जुलाई 2017 में दिशा-निर्देश जारी किये थे. उस फैसले पर महिला संगठनों के विरोध के बाद चीफ जस्टिस ने पूरे मामले पर विचार के लिए तीन सदस्यों की बेंच का गठन कर दिया. पुराने दिशा-निर्देशों पर जब तीन जजों की बड़ी बेंच द्वारा पुर्नविचार किया जा रहा हो, तब नये दिशा-निर्देशों को दो जजों की बेंच द्वारा जारी करना कैसे न्यायोचित हो सकता है ?
संसदीय कार्यक्षेत्र में अदालती दखल क्यों- संसद में कोई कामकाज नहीं हो रहा, इसके बावजूद संविधान के अनुसार संसद की सर्वोच्चता बरकरार है. दहेज मामलों में जारी दिशा-निर्देशों को चीफ जस्टिस की बेंच ने अक्टूबर 2017 में पुर्नविचार के लिए स्वीकार करते हुए यह कहा कि ऐसे मामलों पर नियम और कानून बनाने का अधिकार संसद को है. अक्टूबर में जारी इस आदेश को यदि केन्द्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख मुख्य मुक़दमे पर सुनवाई के दौरान यदि प्रस्तुत किया जाता तो शायद एसएसटी कानून पर देशव्यापी हिंसा और नुकसान की नौबत ही नहीं आती.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों का पक्ष क्यों नहीं सुना- केन्द्र सरकार द्वारा दायर रिव्यू पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्होंने एससी/एसटी कानून में कोई बदलाव नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार गिरफ्तारी के बारे में सीआरपीसी की धारा-41 में व्यवस्था है जिसे कोर्ट ने अपने दिशा-निर्देशों में दोहराया है. सुप्रीम कोर्ट ने अटार्नी जनरल से पूछा कि यदि कोई उनके खिलाफ झूठी शिकायत करे तो क्या होगा और फिर वे कैसे काम कर पायेंगे ? सुप्रीम कोर्ट की मंशा और सारे तर्क सही हैं. संविधान की व्यवस्था के अनुसार सीआरपीसी कानून में सभी राज्यों ने अपने अनुसार प्रावधान और संशोधन भी किये हैं. सभी राज्यों को प्रभावित करने वाले फैसले को देने से पहले क्या सुप्रीम कोर्ट को राज्यों का पक्ष नहीं सुनना चाहिए था ?
सभी गिरफ्तारियों के दुरुपयोग पर रोक क्यों नहीं- एफआईआर दर्ज करने के बाद पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का ब्रिटिश कालीन रिवाज आजाद भारत में बदस्तूर जारी है. रिव्यू पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अटार्नी जनरल से पूछा कि किस कानून के तहत मामला दर्ज होते ही तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान है ? गिरफ्तारी के बाद अदालतों द्वारा बेल नहीं मिलने से लाखों बेगुनाह लोग जेलों में बन्द हैं, जिनमें अधिकांश एससी/एसटी, गरीब और कमजोर वर्ग के लोग हैं. सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू पर सुनवाई के दौरान यह सही कहा कि झूठी शिकायत पर कोई बेगुनाह जेल नहीं जाना चाहिए. एससी/एसटी कानून के साथ सभी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा यदि ये दिशा-निर्देश जारी किये जाते तो सामाजिक विद्वेष से उपजी देशव्यापी हिंसा को शायद रोका जा सकता था.
Tuesday, March 27, 2018
फेसबुक डेटा चोरी क्या है?
दिसंबर 2016 में अमरीका की डिज़ाइन की प्रोफेसर ने अपने रिसर्च के दौरान पाया कि अमरीकी चुनाव में कैंब्रिंज एनालिटा की भूमिका है और उसका संबंध यूरोपीयन यूनियन से ब्रिटेन को अलग करने के अभियान में भी है. कैंब्रिज एनालिटिका को 5 करोड़ से अधिक अमरीकी नागरिकों का डेटा एक रिसर्चर से मिला. इस रिसर्चर ने एक ऐप बनाया था, जिससे लोग अपनी सहमति से जुड़े थे. जैसे फेसबुक पर बहुत से एप आते हैं, आप क्लिक कर जुड़ने लग जाते हैं और आई एग्री का बटन दबा देते हैं. या तो आप समझ नहीं पाते या लापरवाह हो जाते हैं, उधर वह एप आपकी सारी जानकारी लेकर किसी तीसरी पार्टी को बेच देते हैं. वह कंपनी उस डेटा का इस्तेमाल राजनीतिक की हवा बदलने में करती है या किसी प्रोडक्ट को बेचने में करती है. यही हुआ है इस विवाद में. अब पांच दिनों तक फेसबुक के मार्क ज़ुकरबर्ग ने माना कि बहुत बड़ी ग़लती हो गई है. आगे से नहीं हो इसके लिए व्यवस्था की जाएगी. डेटा और प्राइवेसी से जुड़े लोग कहते हैं कि यह काफी नहीं है. ज़ुकरबर्ग यह बतायें कि 2014 से पहले जिन जिन एप ने डेटा चुराया है, उसका वे क्या कर रहे हैं इसकी जांच संभव नहीं है, क्योंकि एप की संख्या तो कई हज़ार में है. हम और आप फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं. एक भरोसा होता है मगर उसी से जानकारी किसी और के पास चली जाए तो फिर भरोसा टूटता है. और उस जानकारी का इस्तेमाल आपके राजनीतिक मत को प्रभावित करने में रूस या अमरीका में बैठी कोई कंपनी कर ले तो सीधा मतलब यह हुआ कि लोकतंत्र टेक्नॉलजी के कारण कभी भी खतरे में पड़ सकता है. आप देखिए कि कई जगहों पर ऐसा हो रहा है. एक बार जो सत्ता में आ रहा है, वो हार ही नहीं रहा है. रूस के राष्ट्रपति पुतिन को देखिए, चीन के राष्ट्रपति तो आजीवन ही गद्दी पर बैठ गए हैं. भारत में कोई इस तरह का सपना न देखे इसलिए जनता को इस विषय को लेकर सतर्क हो जाना चाहिए. यह मसला फेसबुक का है मगर आपको सोचना चाहिए कि कहीं आधार नंबर के कारण यह खतरा करीब तो नहीं है. अमरीका, इटली, फ्रांस और जर्मनी में आधार नंबर नहीं है, भारत में आधार नंबर है. कहीं ऐसा न हो कि सब्सिडी बचाने के नाम पर लोकतंत्र ही हाथ से चला जाए. ब्रिटेन में मामला उठा तो वहां का चुनाव आयोग तुरंत जांच करने लगा, भारत में कांग्रेस बीजेपी आरोप लगा रहे हैं, खुलेआम कह रहे हैं कि आपने ऐसा किया तो आपने ऐसा किया. मगर चुनाव आयोग का पता नहीं. क्या पता उसके अधिकार क्षेत्र में ही यह न आता हो. भारत में जब भी ईवीएम के हैक किए जाने का सवाल उठता है तो हम मज़ाक उड़ाते हैं. सबसे बड़ी दलील है कि चुनाव आयोग पर शक कैसे कर सकते हैं. हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी चुनाव आयोग के रहते दशकों बूथ लूटे जाते रहे. आयोग ने नहीं, एक व्यक्ति ने आयोग को भरोसे लायक बनाया था. क्या आपको यह लगता है कि अमरीका, फ्रांस, इटली, जर्मनी के चुनाव आयोग में लोगों का विश्वास ही नहीं हैं. फिर भी वहां बहस हो रही है कि टेक्नालजी से कहीं रिज़ल्ट या चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित तो नहीं किया जा रहा है. जर्मनी में आम चुनाव के पहले वहां खूब चर्चा हुई. वहां के फेडरल ऑफिस फार दि प्रोटेक्शन ऑफ दि कांस्टिट्यूशन के प्रमुख ने कहा था कि चुनाव को हैक करना, बाहर से प्रभावित करना बिल्कुल संभव है. एक रिपोर्ट पढ़ रहा था जिसमें कहा गया कि जर्मनी में एक काउंटिंग सॉफ्टवेयर है जिसे .-. है, इसे हैक किया जा सकता है. इसके डेटा को छेड़ कर रिज़ल्ट बदला जा सकता है. उन देशों में ऐसे सवालों को गंभीरता से लिया जाता है, हमारे यहां ऐसे सारे सवाल का यही जवाब है कि हम चुनाव आयोग पर शक कैसे कर सकते हैं. यही पूछ लीजिए कि चुनाव आयोग के पास ऐसी संभावना को रोकने के लिए सिस्टम ही क्या है. बैलेटबॉक्स इंडिया के राकेश ने हाल ही में एक लंबा पत्र लिखकर इन खतरों के प्रति आगाह किया था मगर वही जवाब मिला, बल्कि अब तो जवाब न मिलना ही जवाब समझा जाने लगा है.
Friday, March 16, 2018
गेस्ट हाउस कांड की कहानी
Thursday, March 15, 2018
सफल हुई बुआ भतीजे की जोड़ी
पूर्वोत्तर से ख़त्म होती लेफ्ट
त्रिपुरा की जीत में देवधर के इन गुणों ने बड़ी भूमिका निभाई है. सुनील देवधर उत्तर पूर्व के लोगों की सहायता के लिए माई होम इंडिया नाम से संस्था और हेल्पलाइन सालों से चला रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आदि शहरों में उत्तर पूर्व को लोगों को जब भी परेशानी होती है, उनके कार्यकर्ता मदद करते हैं...त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की पैठ बढ़ाने में सुनील के इस नेटवर्क ने भी योगदान दिया है.”
वैसे भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आक्रामक प्रचार की शैली को भी जीत का श्रेय जाता है. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का दावा है कि उत्तर पूर्व में लोगों को पिछले चार साल मे पहली बार अहसास हो रहा है कि उनका विकास हो रहा है. इसलिए वह भारतीय जनता पार्टी में भरोसा जता रहा है.
त्रिपुरा की जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के एक और नेता का कद कुछ और बढ़ जाएगा. गुजरात के बाद त्रिपुरा में भी भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना चेहरा बनाया था. त्रिपुरा के एक-तिहाई मतदाता उस नाथ संप्रदाय के अनुयायी हैं, योगी जिनकी गुरुगद्दी के महंत हैं. त्रिपुरा की जीत के बाद अब पार्टी उनका इस्तेमाल कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में भी जरूर करेगी. वैसे योगी आदित्यनाथ वहां के कई दौरे कर भी चुके हैं. त्रिपुरा में बीजेपी की जीत को केरल की हार का बदला भी कहा जा सकता है. केरल में पंद्रह परसेंट वोट पाने वाली बीजेपी एक ही विधायक विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो पाई थी. हालांकि छह सीटों पर एक से लेकर पांच सौ वोटों से उसके प्रत्याशी पराजित हुए थे. अब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को सोचना होगा कि पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा का उसका गढ़ क्यों ढह गया? पश्चिम बंगाल में तो वो अब तीसरे स्थान की तरफ खिसकती नजर आ रही है. इसलिए उसके लिए बड़े चिंतन का वक्त है. उसे विचार करना होगा कि आखिर उसकी सोच में कहां खामी है कि विरोधाभाषी आर्थिक आधार के बावजूद वह लगातार अपनी प्रासंगिकता खोते जा रही है. अब एक नजर बीजेपी को मिले वोटों पर भी डाल लेते हैं. पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की मौजूदगी शून्य से कुछ ही ज्यादा यानी करीब डेढ़ परसेंट थी. यह बात और है कि लोकसभा चुनाव आते-आते पार्टी का राज्य में वोट शेयर बढ़कर 5.7 परसेंट हो गया था.
सिंधिया बनाम शिवराज
इसके जवाब में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्थानीय मुद्दों को उठाने के साथ जातीय समीकरण को साधने में पूरी ताकत झोंकी. सिंधिया की रणनीति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुंगावली क्षेत्र में पड़ने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी शासकीय महाविद्यालय के प्रिंसिपल के सस्पेंड किए जाने की घटना को भी उन्होंने राजनीतिक रंग दे दिया था. दरअसल, प्रिंसिपल बीएल अहिरवार के सस्पेंड किए जाने से वहां का युवा नाराज था. ज्योतिरादित्य ने इसे भांपते हुए युवाओं के साथ धरने पर बैठ गए थे, जिसके बाद सरकार को अपना फैसला पलटना पड़ा था. इसके अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अशोक नगर जिले की मुंगावली और शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा सीट पर यहां जाति आधारित समूहों के साथ कई बार सीधा संवाद किया. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सिंधिया सकारात्मक एजेंडा रखा.
शिवराज जहां सिंधिया पर पर्सनल अटैक करने में लगे थे, वहीं सिंधिया लगातार ये कहते रहे कि वे राज्य में बदलाव के लिए आए हैं. वे चाहते हैं कि कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में आए ताकि गांव के लोगों की हर इच्छा को पूरा किया जाएगा. मैंने ये चुनाव पर कडी नजर रखी स्थानीय मीडिया के माध्यम से। ऐसे भाषण होते कि जिस जगह पहले सिंधिया सवाल करते तो 20 मिनट बाद शिवराज सिंह चौहान आकर एक एक वाक्य का जवाब देते। कभी कभी तो एक दीवार के फासले पर ही दोनों की जुबानी जंग एक साथ शुरू हो जाती थी। खूब तंज शायरी सब प्रयोग हुआ। कांग्रेस में भितरघात हो सकता था। क्योंकि ये उनके क्षेत्र के चुनाव थे और अगर कांग्रेस हार जाती तो विधानसभा चुनाव में उनके मुख्यमंत्री पद का दावा कमजोर होता। ये बात राहुल गांधी को भी पता है कि सिंधिया को कमान देने से राहुल को भी कम मेहनत करनी पडेगी वो खुद जोरदार चुनाव लडेंगे। लेकिन सोनिया गांधी कमलनाथ को नकारने से कतरा रही हैं इसीलिये अभी कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने दोनों से जीत के फार्मूले मांगे थे। सिंधिया को घेरकर अभिमन्यु बनाने की भरपूर कोशिश की गई लेकिन वो बच निकले।
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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बडा अशोभनीय सा है किसी लडकी के लिए ऐसे लिखना या बोलना। लेकिन ट्विटर पर देखते हुए पक गया था। सो आज इसकी खोज करते करते एक मित्र ने ये कहान...
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