Tuesday, September 27, 2022

इटली के चुनाव पर एक नजर


जब कभी फासीवाद और तानाशाही के उदाहरण देने पड़ते हैं तो सबसे पहले हिटलर और मुसोलिनी का ही नाम आता है. जब से इन दोनों का अंत हुआ तब से कभी इनके देशों जर्मनी और इटली ने इस विचारधारा के नेता को पसंद नहीं किया.
लेकिन इस बार हो रहे चुनावों में वहां की एक राइट विंग ब्रेनितो मुसोलिनी को आदर्श मानने वाली ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी को एक्सिट पोल्स में बढ़त मिलती दिख रही है.
इटली में भी भारत की तरह ही राजनितिक सिस्टम है. इसकी संसद में दो सदन होते हैं, अपर हाउस सेनेट में 200 और लोअर हाउस चेम्बर ऑफ़ डेपुटीस में 400 संसद होते हैं, जो पांच साल के लिए चुने जाते हैं. इस बार दोनों सदनों के लिए चुनाव हुआ, वोटर्स ने दोनों के लिए एक साथ ही वोट किया. इसमें 35% संसद सीधे तौर पर और बाकी के मेंबर पार्टिस को मिले टोटल वोट % के हिसाब से नॉमिनेट करना होता है. किसी पार्टी को संसद में एंट्री के लिए कम से कम 3% और अलायन्स को 10% वोट मिलना जरुरी है. (यहाँ अभी तक बैलेट पेपर से चुनाव होते हैं, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन अभी तक नहीं आई है.)
पार्टियों की बात करें तो पहले यहाँ केवल दो पार्टियां क्रिश्चियन डेमोक्रेसी और इटालियन कम्युनिस्ट पार्टी थी, लेकिन एक समय कई बड़ी घटनाएं होने पर वहां की राजनीति बदली। बर्लिन की दीवार गिरी, यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारों के गिरने का सिलिसिला चालू हुआ तो सोवियत संघ तक टूट गया.
इसके बाद 1992 मिलान के कुछ अधिकारीयों ने कुछ घूसखोरी के कुछ स्कैंडल की जांच चालू हुई. यहाँ प्रधानमंत्री से लेकर उद्योगपति और 200 से अधिक सांसदों को सजा हुई. इसको ऑपरेशन क्लीन हंट कहा जाता है. इसके बाद राजनितिक सुधारों के तौर पर सभी राजनितिक पार्टियां ख़तम कर दी गई और फिर इटालियन कम्युनिस्ट पार्टी नए नाम डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ लेफ्ट फिर 2008 में डेमोक्रेटिक पार्टी नाम से आई, इसको सेन्ट्रल लेफ्ट से मिलाकर बनाया गया था. क्रिश्चियन डेमोक्रेसी कभी वापस नहीं हुई तो उसकी जगह कई पार्टियां आईं.
2017 में बनी लीग राइट विंग पार्टी जो पिछली सरकार में थी, ये पार्टी प्रवासियों का खुलकर विरोध करती है. दूसरी पार्टी फोर्जा इटालिया सिल्विओ बर्लुस्कोनी की पार्टी है जो चार बार इटली के प्रधानमंत्री रहे. 1993 में बनी, 2009 में इसको ख़तम कर दिया गया लेकिन 2013 में इसने फिर से काम करना चालू कर दिया.फिर एक पार्टी है फाइव स्टार मोमेंट। 2009 में इसको एक कॉमेडियन और और वेब डेवेलपर ने मिलकर चालू किया था. 2017 के चुनाव में ये सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, तब से ये राइट और लेफ्ट दोनों तरफ की पार्टियों के साथ मिलकर सरकार चला रही थी. पांचवी बड़ी पार्टी का नाम है ब्रदर्स ऑफ़ इटली। ये 2012 में बनी. अब इसका मुसोलिनी से सम्बन्ध बताता हूँ.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब मुसोलिनी की फासिस्ट पार्टी को बैन कर दिया गया तो इसके लोगों ने बनाई मोवीमेंटो सोसिओ इटालियना (MSI) पार्टी. इसने नेशनल अलायन्स के साथ में कई साल सरकार भी चलाई. 2009 में नेशनल अलायन्स ख़त्म हुआ तो पहले कुछ नेता बर्लुस्कोनी की पार्टी में गए फिर वहां भी झगड़ा हुआ तो नई पार्टी बनाई ब्रदर्स ऑफ़ इटली. इसका सिंबल, कलर और झंडे का निशान भी MSI से लिया गया है. 2014 में ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी की कमान जॉर्जिया मेलोनी के हाथ आई. इस पार्टी के सिद्धांतों में व्यक्तिगत आजादी का विरोध, समलैंगिकों के अधिकारों को ख़त्म करना, यूरोपियन यूनियन से इटली को बाहर निकलना मुख्य है. वैसे तो जॉर्जिया मिलोनी यंग लीडर हैं. वो शुरु से ही MSI के यूथ विंग में काम करती रही हैं. वो शुरू से ही मुसोलिनी की तारीफ़ करती रही हैं. इस चुनाव में भी जब कभी मीडिया ने उनसे मुसोलिनी के बारे में पूछा तो यही कहती हैं कि वो अच्छे नेता थे, हमारी पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी है लेकिन फासिज़्म तो बीते दिनों की बात हो गई है. मतलब खुलकर कभी नकारा नहीं। 
इनका गठबंधन बर्लुस्कोनी और प्रवासी विरोधी द लीग के साथ गठबंधन भी बनाया है. अब चुनाव के बाद इनकी जीत की सम्भावना है. अगर ऐसा हुआ तो जॉर्जिया मेलोनी इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं. ये एक इतिहास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि कोई पहली महिला प्रधानमंत्री बनेगी लेकिन मेलोनी की पार्टी की नीतिओं और विचारधारा की वजह से इटली ही नहीं पूरे यूरोप की लिबरल आबादी की चिंता बढ़ गई है. सबसे ज्यादा ये कि पूरा यूरोप बाढ़, भूकंप, आतंकवाद, युद्ध और भुखमरी से प्रभावित अफ़्रीकी, अफगानी, सीरियन या मिडल ईस्ट के प्रवासियों के लिए दरवाजे खोले रखता है, लेकिन ये पार्टी सत्ता में आई तो इटली में प्रवासियों पर रोक के साथ साथ उनको निकालने की भी प्रक्रिया चालू हो जाएगी. मेलोनी खुद सिविल और समलैंगिग अधिकारों के खिलाफ बात करती हैं, यहाँ तक की जनसँख्या बढ़ाने की भी बात करती हैं.
सबसे मुख्य बात है कि ब्रदर्स ऑफ़ इटली को पिछले चुनाव में सिर्फ 4% वोट मिले थे जो इसबार 26% हो गए हैं.

Sunday, June 26, 2022

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे का तख्तापलट


आजकल महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है. जिस शिवसेना को बालासाहेब ठाकरे ने बनाया और अपनी मेहनत से खड़ा किया वो अब शिंदेसेना में बदल गई है. उद्धव ठाकरे की विधायकों और राजनीतिक राजधानी पर पकड़ कमजोर होती जा रही है. इस पूरे तख़्तापलट की कहानी के अपने अपने मायने निकाले जा रहे हैं. लेकिन मुझे जो समझ में आया उसके दो कारण हैं. पहला कि जब 2014 में शिवसेना और भाजपा की सरकार बनी तब उस सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने जमकर लूट की. शिवसेना के विधायकों और उनके रिश्तेदारों ने भी अपनी जेबें भरने में कोई कमी नहीं रखी. उद्धव ठाकरे के करीबियों और रिश्तेदारों ने भी खूब पैसा जमा किया। यही कारण है कि 2019 में महाविकास अघाड़ी बनाने के बाद इनपर एकदम से इनकम टैक्स और ईडी के छापे चालू हो गए. क्योंकि अगर इन्होने इस सरकार में ही सब घपले किये होते तो उसकी तो ठीक से असेसमेंट भी नहीं हुई होगी. दूसरी बात अगर इसी सरकार में किये हुए घोटाले होते तो सबसे अधिक छापे तो एनसीपी और कांग्रेस के विधायक और मंत्रियों पर होती और वो पार्टी छोड़कर भाग जाते क्योंकि वो तो भ्रष्टाचार के लिए बदनाम हैं. इससे जाहिर है कि ये सब पहले का होगा.
आपको याद होगा कि जब अजित पवार ने सुबह 4 बजे फडणवीस को मुख्यमंत्री बनवाया था तब उनके 70000 करोड़ के घोटाले की फ़ाइल बंद कर दी गई थी. आज भी सभी मंत्री विधायक इसी उम्मीद में बीजेपी के पास गए हैं, क्योंकि जब उद्धव ठाकरे के पास ये सब जाते थे तो वो इसमें इनका बहुत साथ नहीं देते थे. इस वजह से इन विधायकों में नाराजगी बहुत थी.
इस एपिसोड का दूसरा कारण जो मुझे समझ में आया वो ये कि उद्धव ठाकरे की सरकार ने बहुत से कॉर्पोरेट्स को नाराज किया या फिर कहें कि उनको खुश नहीं किया. पहले आरे जंगल की कटाई को रोक दिया. फिर इसी साल मार्च के आसपास महाराष्ट्र के रूरल इलाकों में लोगों के बिजली के कनेक्शन अडानी पवार ने काटने शुरू कर दिए जिन्होंने बिल नहीं भरे थे. यहाँ बिजली मंत्री थे कांग्रस के नितिन राउत। उनके ऊपर राहुल गाँधी ने दबाव डाला तो ये कनेक्शन काटने बंद हुए. ऐसे ही बहुत से कॉर्पोरेट्स के हितों को उद्धव सरकार ने रोका. इन्ही कॉर्पोरेट्स ने इस पूरे दल बदल की फंडिंग की है. कोई पार्टी बनाएगा, किसी की सदस्यता जाएगी, अब इस सबके बाद जो कानूनी पेंच हैं, वकील सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे, नेता टीवी पर लड़ेंगे और फ्लोर टेस्ट होगा. राज्यपाल अपनी भूमिका निभाएंगे जिसमें ज्यादातर चांस यही हैं कि उद्धव ठाकरे की सरकार गिरेगी और फडवणीस साहब CM बनकर इन सभी बागियों को सर्फ़ एक्सल में धुलकर नीट एन्ड क्लीन कर देंगे. इसलिए इसपर ज्यादा बात करके कोई फायदा नहीं.अब सवाल ये कि इतना सब हो गया और उद्धव ठाकरे को खबर नहीं लगी? असल में इस बात का उनको एक महीने पहले ही पता चला था और उन्होंने एकनाथ शिंदे को घर बुलाकर पूछा भी था तो उन्होंने कहा कि विधायक तो मेरे पास वैसे भी आते जाते रहते हैं लेकिन आपको जो खबरें मिल रही हैं वो एकदम गलत हैं. मैं ठाकरे परिवार का सदस्य हूँ. पत्रकार अशोक वानखेड़े बताते हैं कि ये कहते हुए वो रोने लगे तो उद्धव ठाकरे को उनपर भरोसा हो गया. वो बोले कि चलो ठीक है जो भी ख़बरें आ रही हैं उनको ख़तम करो और राज्यसभा और विधान परिषद् के चुनावों में विधायकों के वोट कराने की जिम्मेदारी आपकी है. इसी बहाने उनको और मौका मिल गया इन सबसे मिलकर मीटिंग और डील करने की. फिर जब विधान परिषद् में क्रॉस वोटिंग हुई तो आदित्य ठाकरे और एकनाथ शिंदे में खूब बहस हुई जिसके बाद एकनाथ शिंदे को मौका मिल गया. बीजेपी की मदद से खेल करने का. क्योंकि एकनाथ शिंदे अकेले इतने विधायक साथ ले आएंगे ये कोई नहीं कह सकता। उनको ठाणे के बाहर अभी भी कोई बहुत वर्चस्व वाले नेता नहीं हैं. हाँ ये है कि उद्धव ठाकरे की तरफ से भी कुछ गलतियां हुईं जो विधायकों और नेताओं के बीच कम्युनिकेशन गैप रहा. वो लोगों से मिलने का ज्यादा समय नहीं देते थे, कई फैसले उनके किचेन कैबिनेट (पत्नी, बेटे और परिवार) में होते थे. उनके ज्यादा समय नहीं देने के दो कारण हो सकते हैं एक तो उनकी लगातार तबियत का ख़राब रहना और दूसरा एक ठाकरे ब्रांड का होना कि ऐसे ही सबको कैसे रोज रोज समय दिया जा सकता है.
अब सवाल ये कि अभी तक शिवसेना मतलब ठाकरे परिवार और ठाकरे मतलब शिवसेना समझा जाता था. पहली बार किसी ने हिम्मत की है ठाकरे परिवार को चुनौती देने की. तो क्या इससे ये समझा जाए कि मातोश्री का वर्चस्व शिवसेना से ख़तम हो जाएगा? क्या उद्धव ठाकरे की राजनीति अब ख़त्म हो जायेगी? तो इसकी संभावनाएं भी बहुत कम हैं. भारतीय राजनीती में खासकर क्षेत्रीय दलों में एक फर्स्ट फॅमिली के लोगों को लेकर कार्यकर्ताओं का बड़ा भरोसा होता है. बालासाहब ठाकरे से जुड़े लोगों को उद्धव ठाकरे ही पसंद आएंगे एकनाथ शिंदे नहीं. अगर शिंदे कोई पार्टी बना लें या शिवसेना पर कब्ज़ा कर लें और उद्धव कोई पार्टी बना लें तो भी उनके सफल होने की सम्भावना बहुत कम है. इसका रेकॉर्ड रहा है, पहले छगन भुजबल, राज ठाकरे, नारायण राणे जैसे बहुत से नेता जो शिवसेना से अलग होकर राजनीती करने निकले लेकिन पब्लिक ने उनको पसंद नहीं किया, इसलिए अगर ये सभी विधायक या एकनाथ शिंदे भाजपा में भी शामिल हो जाएँ तो बहुत कम सम्भावना है उनके सफल होने की. थोड़े दिन में ठाणे की सीट जीतना भी मुश्किल हो जायेगा.
शिवसेना की राजनीति को अबतक मैंने जितना समझा है वो किसी जातीय समीकरण से नहीं चलती है, उसके चलने का एक बेस है बालासाहब ठाकरे का चेहरा और मराठी मानुष या शिवाजी महाराज और उनके हिंदुत्व पर उनकी क्लियर विचारधारा. इसमें ओबीसी और सोसल रिफार्म को भी बहुत आसानी से मिक्स करके रखा है. वो जब किसी को टिकट देते हैं तो इस वजह से नहीं देते हैं कि उसकी जाति क्या है? वो टिकट देते हैं उस आदमी की क्रेडिबिलिटी पर और उसकी पार्टी या परिवार में आस्था पर. अधिकतर पब्लिक भी वोट उस आदमी को नहीं शिवसेना को देती है.
ये बात तो हुई जो साफ साफ नजर आ रही हैं. लेकिन इसकी और भी संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है. राजनीति में कई बार जो दिखता है वो होता नहीं है. कई लोगों का स्पेकुलेशन ये भी है हो सकता है ये सब उद्धव ठाकरे की जानकारी में हुआ होगा, लेकिन इसकी सम्भावना बहुत कम है. दूसरी सम्भावना ये है कि हो सकता है ये पूरा खेल एनसीपी से अजित दादा पवार की मदद हुआ हो. थोड़े दिन में जैसे जैसे परतें निकलेंगी वैसे वैसे चीजें सामने आएँगी.

Thursday, April 14, 2022

बाबा साहब की जिंदगी के कुछ अनकहे पहलू


बाबा साहब को इस देश के लोगों ने केवल दलित मसीहा बनाकर एक फ्रेम में सेट कर दिया है. मुझे इस चीज से बहुत दिक्कत है. वो दलितों के साथ साथ पिछड़े, अल्पसंख्यक, और महिलाओं के लिए मसीहा थे. उन्होंने मजदूरों कामगारों के लिए बहुत  काम किये। आप सब भूल जाये फिर भी उनको एक छात्र के तौर पर भारत के हर छात्र को फॉलो करना चाहिए. इतनी समस्याओं का सामना करते हुए अगर कोई आदमी देश का सबसे पढ़ा लिखा बन सकता है तो आप क्यों नहीं कर सकते कुछ? उनकी कानून और अर्थशास्त्र की किताबें दुनियां में पढ़ाई जाती हैं।
बाबा साहब को बचपन से ही अपनी जाति के कारण आंबेडकर को लोगों के भेदभाव का शिकार होना पड़ा. 1901 में जब वो अपने पिता से मिलने सतारा से कोरेगाँव गए तो स्टेशन से बैलगाड़ी वाले ने उन्हें ले जाने से इनकार कर दिया. दोगुने पैसे देने पर वो इस बात के लिए राज़ी हुआ कि नौ साल के आंबेडकर और उनके भाई बैलगाड़ी चलाएंगे और वो पैदल उनके साथ चलेगा.
1945 में वायसराय की काउंसिल के लेबर सदस्य के रूप में भीमराव आंबेडकर उड़ीसा (आज का ओडिशा) के पुरी में मौजूद जगन्नाथ मंदिर गए तो उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया.
उसी साल जब वो कलकत्ता (आज का कोलकाता) में मेहमान के तौर पर एक शख़्स के यहां गए तो उसके नौकरों ने ये कहते हुए उन्हें खाना परोसने से इंकार कर दिया कि वो महार जाति से हैं.
शायद यही सब कारण थे जिनकी वजह से आंबेडकर ने अपनी जवानी के दिनों में जाति व्यवस्था की वकालत करने वाली मनुस्मृति को जलाया था.
आंबेडकर अपने ज़माने में भारत के संभवत: सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे. उन्होंने मुंबई के मशहूर एलफ़िस्टन कॉलेज से बीए की डिग्री ली थी. बाद में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से उन्होंने पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. शुरू से ही वो पढ़ने, बागवानी करने और कुत्ते पालने के शौक़ीन थे. कहा जाता है कि उस ज़माने में उनके पास देश में क़िताबों बेहतरीन संग्रह था. उनके पास आठ हज़ार क़िताबें थीं. उनकी मौत के दिन तक ये संख्या बढ़ कर 35,000 हो चुकी थी.
उनके ऊपर सबसे अधिक असर हुआ था. पहली थी 'लाइफ़ ऑफ़ टॉलस्टाय', दूसरी विक्टर ह्यूगो की 'ले मिज़राब्ल' और तीसरी थॉमस हार्डी की 'फ़ार फ़्रॉम द मैडिंग क्राउड.' क़िताबों को लेकर उनका प्यार इस हद तक था कि वो सुबह होने तक क़िताबों में ही लीन रहते थे."
एक बार किसी ने उनसे पूछा था कि आप इतना लंबे समय तक पढ़ने के बाद अपना 'रिलैक्सेशन' यानि मनोरंजन किस तरह करते हैं. उनका जवाब था कि मेरे लिए 'रिलैक्सेशन' यानि मनोरंजन का मतलब एक विषय को छोड़ दूसरे विषय की क़िताब पढ़ना."
आंबेडकरअपने शयनकक्ष को अपनी समाधि समझते थे. बाबासाहेब अपने बिस्तर पर अख़बार पढ़ना पसंद करते थे. एक-दो अख़बारों को पढ़ने के बाद वो बाक़ी अख़बारों को अपने साथ टॉयलेट ले जाते थे. कभी-कभी वो अख़बार और क़िताबें टॉयलेट में छोड़ देते थे. मैं उनको वहाँ से उठा कर उनकी तय जगह पर रख देता था. आंबेडकर पूरी रात पढ़ने के बाद भोर के वक्त सोने के लिए जाते थे. सिर्फ़ दो घंटे सोने के बाद वो थोड़ी कसरत करते थे. उसके बाद वो नहाने के बाद नाश्ता किया करते थे.
अख़बार पढ़ने के बाद वो अपनी कार से कोर्ट जाते थे. इस दौरान वो उन क़िताबों को पलट रहे होते थे जो उस दिन उनके पास डाक से आई होती थीं. कोर्ट समाप्त होने के बाद वो क़िताब की दुकानों का चक्कर लगाया करते थे और जब वो शाम को घर लौटते थे तो उनके हाथ में नई क़िताबों का एक बंडल हुआ करता था.

जहाँ तक बागवानी का सवाल है दिल्ली में उनसे अच्छा और देखने वाला बगीचा किसी के पास नहीं था. एक बार ब्रिटिश अख़बार डेली मेल ने भी उनके गार्डन की तारीफ़ की थी.

वो अपने कुत्तों को भी बहुत पसंद करते थे. एक बार उन्होंने बताया था कि किस तरह उनके पालतू कुत्ते की मौत हो जाने के बाद वो फूट-फूट कर रोए थे.

कभी-कभी छुट्टियों में बाबासाहेब खुद खाना भी बनाते थे और लोगों को अपने साथ खाने के लिए आमंत्रित करते थे.
उनको न तो नशे की किसी चीज़ का शौक था और न ही वो धूम्रपान किया करते थे. एक बार जब उन्हें खाँसी हो रही थी तो किसी ने उन्हें पान खाने का सुझाव दिया. उन्होंने अनुरोध पर पान खाया ज़रूर लेकिन अगले ही सेकेंड उसे ये कहते हुए थूक दिया कि ये बहुत कड़वा है. वो बहुत साधारण खाना खाते थे जिसमें बाजरे की एक रोटी, थोड़ा चावल, दही और मछली के तीन टुकड़े हुआ करते थे.
घर पर काम में आंबेडकर की मदद करने के लिए सुदामा नाम के एक व्यक्ति रखा गया था. एक दिन सुदामा जब देर रात फ़िल्म देख कर लौटे तो उन्होंने सोचा कि उनके घर के अंदर घुसने से बाबासाहेब के काम में विघ्न पड़ेगा. उन्हें पता था कि बाबासाहेब क़िताब पढ़ने में तल्लीन होंगे.

वो दरवाज़े के बाहर ही ज़मीन पर सो गए. आधी रात के बाद जब आंबेडकर ताज़ी हवा लेने बाहर निकले तो उन्होंने दरवाज़े के बाहर सुदामा को सोते हुए पाया. वो बिना आवाज़ किए अंदर चले गए. जब अगले दिन सुबह सुदामा की नींद खुली तो उन्होंने पाया कि बाबासाहेब ने उनके ऊपर अपना ओवरकोट डाल दिया है.

31 मार्च 1950 को मशहूर उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला के बड़े भाई जुगल किशोर बिड़ला आंबेडकर से मिलने उनके निवासस्थान पर आए. कुछ दिनों पहले बाबासाहेब ने मद्रास में पेरियार की उपस्थिति में हज़ारों लोगों के सामने भगवतगीता की आलोचना की थी.
बिड़ला ने उनसे सवाल किया आपने गीता की आलोचना क्यों की जो कि हिंदुओं की सबसे जानीमानी धार्मिक क़िताब है? उनको इसकी आलोचना करने के बजाए हिंदू धर्म को मज़बूत करना चाहिए.

जहां तक छुआछूत को दूर करने की बात है तो वो इसके लिए दस लाख रुपए देने के लिए तैयार हैं. इसका जवाब देते हुए आंबेडकर ने कहा, मैं अपने आप को किसी को बेचने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ. मैंने गीता की इसलिए आलोचना की थी, क्योंकि इसमें समाज को बांटने की शिक्षा दी गई है.
बाबासाहेब अक्सर नीला सूट पहना करते थे लेकिन कुछ ख़ास मौकों पर वो अचकन, चूड़ीदार पजामा और काले जूते निकालते थे. लेकिन, जब भी वो वायसराय से मिले जाते थे, वो हमेशा भारतीय कपड़े ही पहनते थे. घर पर वो साधारण कपड़े पहना करते थे. गर्मी में वो चार हाथ की लुंगी कमर में लपेट लेते थे. उसके ऊपर वो घुटनों तक का कुर्ता पहनते थे. विदेश में रहने के दौरान से ही वो नाश्ते में दो टोस्ट, अंडे और चाय लिया करते थे. जब वो नाश्ता करते थे तो बाईं तरफ़ उनके अख़बार खुले रहते थे. उनके हाथ में एक लाल पेंसिल रहती थी जिससे वो अख़बारों की मुख्य ख़बरों पर निशान लगाया करते थे.
बाबासाहेब मौज-मस्ती के लिए कभी बाहर नहीं जाते थे. हाँलाकि, वो जिमखाना क्लब के सदस्य थे लेकिन वो शायद ही वहां गए हों. जब भी वो कार से अपने घर लौटते थे तो वो सीधे अपनी पढ़ने की मेज़ पर जाते थे. उनके पास अपने कपड़े बदलने का भी समय नहीं रहता था.
जब भी कोई उन्हें बाहर खाने पर ले जाना चाहता था, उनका जवाब होता था अगर तुम मुझे दावत ही देना चाहते हो, तो मेरे लिए घर पर ही खाना ले आओ. मैं घर से बाहर जाने वाला नहीं. बाहर जाने, वापस आने और व्यर्थ की बातों में मेरा कम से कम एक घंटा बरबाद होगा. इस समय का इस्तेमाल मैं कुछ बेहतर काम के लिए करना चाहूँगा.
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में बाबासाहेब ने वायलिन सीखना शुरू किया था. 


Wednesday, April 13, 2022

पाकिस्तान में डेमोक्रेसी क्यों नहीं सफल हुई?

आज मैं जिओ पोलिटिकल आर्टिकल्स की इस सीरीज में पाकिस्तान के वर्तमान सिचुएशन पर बात करना चाहता हूँ. पाकिस्तान की राजनीती का एक तथ्य है कि वहाँ कोई भी प्रधानमंत्री अपने 5 साल नहीं पूरे कर पाया है. इमरान खान की सरकार जिस तरह से चल रही थी उससे लगता था कि शायद ये अपना कार्यकाल पूरा करेंगे लेकिन पिछले एक महीने से वहाँ की राजनीति में जो हो रहा है वो बहुत दिलचस्प है. पहले इमरान खान की तीसरी पत्नी बुशरा बीवी की दोस्त पर करोडो रूपये उगाही का आरोप लगता है और वो देश के बहार चली जाती हैं, फिर इसी के खिलाफ विपक्ष इकठ्ठा होता है उनके खिलाफ. अविश्वाश प्रस्ताव लाया जाता है जिसको डिप्टी स्पीकर ने ख़ारिज कर नैशनल एसेम्बली को भी भांग कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसको गैर कानूनी बताया और कल फिर से अविश्वास प्रस्ताव आया जिसमें इमरान खान की हार हुई. शनिवार देर रात नेशनल असेंबली में उनकी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग हुई जिसमें 174 सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया.

इमरान ख़ान ने दावा किया है कि उन्हें सत्ता से बाहर निकालने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में साजिश रची गई थी. उन्होंने किसी भी नई सरकार को स्वीकार करने से इनकार किया है. पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार है कि किसी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव सफल रहा है. इसके बाद अब सोमवार को पाकिस्तान असेंबली का एक अहम सत्र होने वाला है जिसमें नया प्रधानमंत्री चुना जाना है. नए प्रधानमंत्री अगले चुनावों तक यानी अक्तूबर 2023 तक कार्यभार संभालेंगे. असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव के सफल होने के बाद सदन को संबोधित करते हुए पीएमएल-एन के अध्यक्ष शाहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि आज पाकिस्तान संविधान और क़ानून को फिर से स्थापित करना चाहता है.

पीएमएल-एन के अध्यक्ष शाहबाज़ शरीफ़ ने कहा है कि हम किसी से बदला नहीं लेंगे लेकिन क़ानून अपना काम करेगा. नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव के सफल होने के बाद सदन को संबोधित करते हुए पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा कि 10 अप्रैल का ऐतिहासिक महत्व है. उन्होंने सदन को याद दिलाया कि 10 अप्रैल को ही सदन ने 1973 का संविधान पारित किया था. उन्होंने कहा, "पुराने पाकिस्तान में आपका स्वागत है!" वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल ख़ालिद जावेद ख़ान ने इस्तीफ़ा दे दिया है.
वोटिंग से पहले नेशनल असेंबली के अध्यक्ष असद कैसर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.असद कैसर के बाद अब पीएमएल-एन नेता अयाज़ सादिक नेशनल असेंबली के सत्र की अध्यक्षता कर रहे हैं. इसी के साथ ही पीएमएल-एन के नेता शाहबाज़ शरीफ़ का पाकिस्तान का नया पीएम बनना तय माना जा रहा है. शाहबाज़ शरीफ़ अभी पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता हैं.
पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान रहे इमरान ख़ान 2018 में देश के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने भ्रष्टाचार से लड़ने और अर्थव्यवस्था में सुधार का वादा किया. लेकिन आर्थिक संकट में घिरे पाकिस्तान के लिए मुश्किलें बढ़ती गईं. बीते साल मार्च में उनकी पार्टी के कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी जिसके बाद उनके लिए एक नया राजनीतिक संघर्ष शुरू हो गया था.
माना जाता है कि इमरान ख़ान को पाक सेना का समर्थन हासिल था लेकिन अब पर्यवेक्षकों का कहना है कि सेना से उनकी दूरियां बढ़ी हैं. इमरान ख़ान बार-बार ये आरोप लगाते रहे हैं कि देश का विपक्ष विदेशी ताकतों के साथ मिल कर काम कर रहा है. उनका कहना है कि रूस और चीन के मामले में उन्होंने अमेरिका के साथ खड़े होने से इनकार कर दिया था जिसके बाद उन्हें सत्ता से निकालने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में साजिश रची जा रही थी. अमेरिका ने कहा है कि इमरान ख़ान के आरोपों में 'कोई सच्चाई' नहीं है और कहा है कि उन्होंने इसके पक्ष में कभी कोई सबूत नहीं दिया है.

ये तो हुई वहां की वर्तमान राजनीति की बात. अब हम बात करेंगे कि आखिर वहाँ लोकतंत्र होने के बावजूद कभी सेना कभी विपक्ष कभी कोई सत्ता पलट कर देता है. इसको दो तरीके से देखा जाना चाहिए। पाकिस्तान में दो तरह के प्रधानमंत्री आये, एक तो जो वोटिंग के जरिये इलेक्टेड थे दूसरे जिनको सेना ने बनाया. कुछ प्रधानमंत्री जो पार्टियों से आये वो उन पार्टियों के प्रमुख नहीं थे. उनके ऊपर कोई न कोई सुप्रीम होता था. इसलिए जब भी किसी प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र रुपए से काम करने की कोशिश की उसके काम में दखल किया गया.
इस दखल का मुख्य केंद्र होती है वहां की सेना. वहां के जानकार पत्रकार या अन्य लोग बताते हैं कि पाकिस्तानी सेना हमेशा से अमेरिका की तरफ झुकाव वाली रही है. इसका कारण है सेना को अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक, हथियारों और ट्रेनिंग की मदद. इसको इससे समझिये कि पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने पहली यात्रा ही अमेरिका में की थी. पकिस्तान का ज्यादातर बिजनेस वेस्टर्न देशों में होता है, वहाँ के पत्रकार नेता, सेना के लोग ज्यादातर वेस्टर्न से ही पढ़े लिखे हैं. हम आजादी के बाद 1960 के दशक में जाएँ तो देखेंगे कि वो दौर कोल्ड वार का था, और पकिस्तान मिडल ईस्ट में भौगोलिक तरीके से बहुत मुख्य जगह है. इसलिए वेस्टर्न के देशों ने उसकी मदद के बहाने प्रयोग भी किया.
अगर कोई देश पोलिटिकली स्टैब्लिश नहीं है तो आप वहां उद्योग, शिक्षा, सामाजिक माहौल ठीक रहेगा, ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं. और डेमोक्रेसी फेल होने का भी कारण है वहाँ सेना के सर्वोच्च होना. फिर मार्शल लॉ के आगे किसी संस्था का बैलेंस चेक नहीं होता है. सेना के बड़े बड़े लोग खूब पैसा कमा रहे, जमीनों पर कब्जा कर रहे, इससे वहाँ का विकास कैसे होगा?
पाकिस्तान में क्षेत्रवाद एक बड़ा मसला है। वहां पंजाबी आबादी बड़ी संख्या में है, जिनका आर्मी और ब्यूरोक्रेसी में 70% दबदबा है। दूसरी तरफ बलूचिस्तान हिस्टोरिकली बहुत महत्वपूर्ण है, जिसको पंजाबी डोमिनेंस का बड़ा नुकसान हुआ है। सिंध में पंजाबी सिंधी का बड़ा मसला रहा है, जिसमें भुट्टो परिवार को बहुत दबाया गया विभिन्न सरकारों द्वारा। इसी सिंध में कराची शहर में भारत से गए मुहाजिरों के साथ भी खूब अन्याय हुआ है। खैबरपख्तून में अफगानिस्तान जैसे मसलों के अलावा पेशावर में हथियारों की मंडी होना।
पीओके में भी पाकिस्तान अपनी अलग तरह की राजनीति में फंसा रहता है।
इमरान खान के आने से लोगों को लगा कि बदलाव होगा लेकिन उनकी सरकार में बैठे मंत्री ही तो नवाज शरीफ की सरकार में लूट कर रहे थे। यही लोग जो हमेशा से ईश निंदा जैसे कानूनों के आरोप में विरोधियों अल्पसंख्यकों को फंसाकर उनको चौराहों पर फांसी दिलाते थे, वही आज कर रहे हैं।
कुछ लोग वहां डेमोक्रेसी फेल होने का कारण समझते हैं कि पाकिस्तान वेस्टर्न डेमोक्रेसी और इस्लामिक स्टेट के बीच फंसा है, जबकि मुझे ऐसा लगता है कि तुर्की जैसे बहुत से देश हैं जो वेस्टर्न डेमोक्रेसी के साथ साथ इस्लामिक प्रभाव भी अच्छे से चला रहे हैं। पाकिस्तान में दिक्कत ये है कि इस्लाम में भी बहुसंख्यकवाद है। दो तरह के इस्लाम नहीं चल सकते फिर। मतलब पार्लियामेंट या इस्लाम दोनों ही ठीक से प्रैक्टिस में नहीं लाए जाते।
भारत और पाकिस्तान में एक बड़ा फर्क है। भारत अपनी आजादी के बाद से आजतक विदेशनीति पर अपनी स्वतंत्र रूप से चलने वाली नीति प्रयोग करता है। बीच बीच में कुछ गड़बड़ाते हैं लेकिन चीन, अमेरिका से लेकर रूस यूक्रेन तक पर अपने तरीके से बात करता है। 
पाकिस्तान में उसकी अंदरूनी राजनीति मतलब नेशन बिल्डिंग और विदेशनीति करने का एक ही समय आया। भारत में काश्मीर में सेख अब्दुल्ला, साउथ में द्रविड़ आंदोलन, पूर्वोत्तर में हुए आंदोलन हर जगह भारत ने सफलता पूर्वक इन सबको हैंडल किया और भारत में संप्रभुता को बनाए रखा। हमारे यहां कितनी भी राजनीति हो जाए, सरकारें बने बिगड़े लेकिन उसका स्तर इतना नहीं है कि रोजाना संसद में लात घूंसे चलने लगें। कभी किसी विधानसभा में कुछ होता है तो हमारे लिए बहुत शॉकिंग होता है जबकि पाकिस्तान में ये सब आम बातें हैं। पाकिस्तान के मुकाबले यहां आर्थिक तौर पर मजबूती है। भले यहां आर्थिक विसमता है लेकिन आर्थिक रिसोर्सेज बहुत सारे हैं जिससे सब ठीक ठाक चलता रहता है। मतलब भारत के पास विश्व को देने के लिए बहुत कुछ है। अभी एक दिन इमरान खान भी ये बात भारत के विषय में अपने भाषण में कह रहे थे।
दूसरी तरफ पाकिस्तान में रूलिंग एलीट मतलब पंजाबी सिंधी लोगों ने हर तरह से फायदा उठाया जिसकी वजह से मिलिट्री देश की सर्वोच्च संस्था बन गई। फिर उस आर्मी ने भारत, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के खिलाफ जिस आतंकवाद को फॉरेन पॉलिसी, इस्लाम, न्याय समझकर बढ़ाया उसकी सबसे बड़ा भुक्तभोगी है पाकिस्तान की जनता। जिस तरह पाकिस्तान टेरर फैक्ट्री और हथियारों की स्मगलिंग का अड्डा है, उसी तरह सबसे दुनियां का सबसे ज्यादा आतंक का शिकार देश भी है। और जो आतंकी लोग हैं वो बन गए वहां के बिजनेसमैन। अजहर मसूद जैसे लोगों को चीन की परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए पैसा मिलने लगा। तहरीक ए तालिबान लब्बैक जैसे संगठन आए जिनसे इमरान खान राजनीतिक समझौते करने लगे।
पाकिस्तान के लीडरशिप, आर्मी के लोगों और एलिट क्लास ने इसकी आड़ में खूब फायदा उठाया। वो अमेरिका के खिलाफ माहोल को भुनाते भी हैं और पैसा भी निकाल लेते हैं। जैसा फिलहाल इमरान खान कर रहे हैं। दूसरी तरफ अभी अमेरिका का स्टैंड इससे समझिए कि बराक ओबामा के समय जो बाइडन उप राष्ट्रपति थे वो आज राष्ट्रपति हैं। जो हमेशा से कहते आए हैं कि न्यूक्लियर हथियार आतंकी लोगों के हाथ नहीं लगने चाहिए।

Sunday, April 10, 2022

श्रीलंका का आर्थिक संकट

इस समय हमारे भारत देश में श्रीलंका की बहुत चर्चा हो रही है।  उसका कारण है वहां का आर्थिक संकट। उसकी आजादी (1948) के बाद से अबतक के सबसे बुरे आर्थिक हालत हैं।  वहां लोग बुनियादी चीजों को खरीदने के लिए भटक रहे लोगों को घंटों तक लाइन में लगना पड़ रहा है और वो भी उनको एक सीमित मात्रा में मिल रहा है।  इस कारण लोग सडकों पर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे, सरकार के मंत्री सामूहिक रूप से इस्तीफा दे रहे हैं।  पिछले हफ्ते के बाद दुकानों को बंद करना पड़ा है, क्योंकि फ्रिज, AC या पंखे नहीं चला सकते हैं।  लोगों को गैस स्टेशनों पर टैंक भरवाने के लिए घंटों गर्मी में खड़ा होना पड़ रहा है, इन लोगों को संभालने के लिए गैस स्टेशनों पर सैनिकों को तैनात किया गया है।  इंतज़ार करते-करते कुछ लोगों की जान भी चली गई।  ब्रेड के दाम दोगुने हो गए हैं।  कुछ लोगों के लिए हालात और बुरे हैं।  उन्हें अपने परिवार का पेट पालने के लिए काम भी करना है और सामान लेने के लिए लाइनों में भी लगना पड़ रहा है।  मिडल क्लास के जिन लोगों के पास अपनी सेविंग्स हैं वो भी परेशान हैं, उन्हें डर है कि उनकी दवाइयां या गैस ख़त्म हो सकती है। लगातार हो रहे पावर कट ने राजधानी कोलंबो को अंधेरे में धकेल दिया है।  अब सवाल उठता है कि आखिर ये सब हुआ क्यों? क्या ये अचानक से सब हो गया? तो उसका जवाब है नहीं।  ये सब अचानक से नहीं हुआ।  

इसका पहला कारण तो है वहां पूर्व में हुआ गृह युद्ध जो दशकों तक चला।  इस दौरान तत्कालीन सरकार ने बहुत से हथियार ख़रीदे। ये हथियार खरीदने में बहुत बड़ा कर्ज लेना पड़ा।  आज की तारीख में श्रीलंका के ऊपर विदेशों का 12 ट्रिलियन कर्ज हो गया है, जिसका बड़ा हिस्सा हथियार खरीदने में लिया गया था।  श्रीलंका में तब गृहयुद्ध हो रहा था।  उसमें एक तरफ़ वहाँ की बहुसंख्यक सिंहला आबादी थी, दूसरी ओर तमिल अल्पसंख्यक।  1983 में श्रीलंका के अलगाववादी संगठन एलटीटीई और श्रीलंका सरकार के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया जो 2009 में समाप्त हुआ।  तब महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति थे।

 2010 में हुए चुनाव में और भारी जीत के साथ दोबारा राष्ट्रपति चुने गए।  26 साल तक चले इस संघर्ष ने भी श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर किया।  बढ़ते कर्ज़ के अलावा कई दूसरी चीज़ों ने भी देश की अर्थव्यवस्था पर चोट की।  जिनमें भारी बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं से लेकर मानव निर्मित तबाही तक शामिल है।  इसमें रासायनिक उर्वरकों पर सरकार का प्रतिबंध शामिल है, जिसने किसानों की फसल को बर्बाद कर दिया।  हालत 2018 में तब और खराब हो गए, जब राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दिया और उसके बाद एक संवैधानिक संकट खड़ा हो गया।  इसके एक साल बाद 2019 के ईस्टर धमाकों में चर्चों और बड़े होटलों में सैंकड़ों लोग मारे गए।  और 2020 के बाद से कोविड-19 महामारी ने प्रकोप दिखाया।  इससे बचे खुचे टूरिज्म पर और संकट गया।

2019 के चुनाव में गोटाबाया राजपक्षे की पार्टी एसएलपीपी ने चुनाव में दो बड़े वादे किए थे, कि वो टैक्स में कटौती करेगी, और किसानों को राहत देगी।  फिर अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने टैक्स में कटौती की की, लेकिन ये कदम उल्टा पड़ गया और सरकार के रेवेन्यू पर बुरा असर पड़ा।  जब देश के पास पैसे का संकट है तब इस तरह के फैसले लेना अर्थव्यवस्था को और नीचे की तरफ ले गया।  उन्होंने एक फैसला लिया कि अब यहाँ केवल ऑर्गेनिक फार्मिंग ही होगी।  जबकि बिना तैयारी के ये फैसला उत्पादन को एकदम कम कर देगा।  फ़ूड क्राइसेस का इस फैसले का बड़ा कारण है।  

श्रीलंका मुख्य तौर पर चाय, रबड़ और कपड़ों जैसे उत्पादों का निर्यात करता है, जिससे उसे विदेशी मुद्रा की कमाई होती है।  इन पैसों से वो अपने ज़रूरत की चीज़ें आयात करता है जिनमें खाने-पीने के सामान शामिल हैं।  यहाँ की इकोनॉमी का सबसे मजबूत स्तम्भ है टूरिज्म। लेकिन आर्थिक संकटों के चलते रेटिंग एजेंसियों ने श्रीलंका को लगभग डिफ़ॉल्ट स्तर पर डाउनग्रेड कर दिया, जिसका मतलब कि देश ने विदेशी बाज़ारों तक पहुंच खो दी।  इसक बाद लोगों ने यहां आना बंद कर दिया।  देश के कर्ज को चुकाने के लिए सरकार ने विदेशी मुद्रा भण्डार को खर्चा करना चालू किया, जिसके बाद ये भण्डार घटकर 2 2 बिलियन डॉलर हो गया, जो 2018 में 6 9 बिलियन डॉलर था।  इससे ईंधन और अन्य ज़रूरी चीज़ों के आयात पर असर पड़ा और कीमतें बढ़ गईं।  

इन सब कारणों के आलावा सरकार ने मार्च में श्रीलंकाई रुपया को फ्लोट किया मतलब इसकी क़ीमत विदेशी मुद्रा बाज़ारों की मांग (डिमांड) और आपूर्ति (सप्लाई) के आधार पर तय की जाने लगी।  फिर अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले रुपये की गिरावट ने आम श्रीलंकाई लोगों के लिए हालात और ख़राब कर दिए।  परेशान लोग सड़कों पर उतर चुके हैं, वो राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे से गद्दी छोड़ने की माँग कर रहे हैं, वो नारे लगा रहे हैं - 'गो गोटाबाया गो'  पिछले सप्ताह प्रदर्शनकारियों ने कोलंबो में राष्ट्रपति के घर के बाहर धरना दिया, और इसके अगले ही दिन शुक्रवार की रात को राष्ट्रपति राजपक्षे ने देश में आपातकाल लगा दिया।  शनिवार को सरकार ने पूरे देश में सोमवार सुबह तक कर्फ़्यू लगा दिया, लेकिन इसके बाद भी रविवार को प्रदर्शन हुए, और इसके बाद वहाँ सरकार के सभी 26 मंत्रियों ने इस्तीफ़ा दे दिया - सिवाय प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और उनके भाई और राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के।

सरकार को लगे इस बड़े झटके के बाद सोमवार को राष्ट्रपति ने एक फेरबदल करने का प्रयास किया, उन्हें उम्मीद थी कि ये कदम विपक्ष को शांत कर देगा।  एक वित्त मंत्री समेत चार मंत्रियों को अस्थायी रूप से सरकार चलाने के लिए नियुक्त किया गया, जबकि "कैबिनेट की पूर्ण नियुक्त होने तक" देश को चलाने के लिए कई अन्य नियुक्तियां भी की गईं।  लेकिन एक दिन बाद ही, अस्थायी वित्त मंत्री ने पद छोड़ दिया।  ये फेरबदल पार्टी को आगे होने वाले नुक़सान से नहीं बचा सका।  कई सहयोगी दलों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिसके बाद सत्तारूढ़ श्रीलंका पीपुल्स फ्रंट गठबंधन को मंगलवार तक 41 सीटों का नुक़सान हुआ।  गठबंधन के पास सिर्फ 104 सीटें बची थीं, जिसके बाद उसने बहुमत खो दिया।

श्रीलंका अब आईएमएफ से वित्तीय सहायता मांग रहा है और मदद करने में सक्षम क्षेत्रीय शक्तियों का रुख कर रहा है।  श्रीलंका ने चीन और भारत से भी मदद मांगी है।  भारत पहले ही मार्च में 1 बिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन जारी कर चुका है - लेकिन कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी कि ये सहायता संकट को हल करने के बजाए इसे खींच सकती है।  श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के अनुसार, नेशनल कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन सितंबर में 6 2% से फरवरी में 17 5% यानी लगभग तीन गुना हो गई है।  और श्रीलंका को इस साल के बाक़ी वक़्त में लगभग 4 बिलियन डॉलर का कर्ज़ चुकाना है, जिसमें 1 बिलियन डॉलर का अंतरराष्ट्रीय सॉवरेन बॉन्ड भी शामिल है जो जुलाई में मैच्योर होता है।

अब बात अंदरूनी राजनीति पर, यहाँ पहले सिंघला बनाम तमिल लड़ाई थी, फिर सिंघला बनाम मुस्लिम हो गई।  वहां एक सेंट्रल Constitution सिस्टम है।  मतलब पूरे देश के फैसले सिंघला मैजोरिटी सरकार लेती है।  जिसमें बौद्ध साधु बहुत दखल रखते हैं।  राजनितिक परिवारों ने भी देश को बहुत बर्बाद किया है, पहले भण्डार नायके और अबराजपक्षे परिवार। और नए विकल्प आये नहीं हैं।  नार्थ श्रीलंका में तमिल/मुस्लिम इतने बड़े संख्या में हैं लेकिन इतने नहीं हैं जो कोई बदलाव ला सकते हैं।  उनके पोलिटिकल राइट्स से लेकर नागरिकता तक पर बहुत दबा कर रखा जाता है।  लेकिन अब जब बहुसंख्यक लोगों ने लोगों ने भी इस राजनीती को झेला है तो शायद कुछ समझ में आये।  ये हर जगह के बहुसंख्यक या अति राष्ट्रवादी लोगों को समझना चाहिए कि राष्ट्रवाद या अपने धर्म को महान बनाने की बातें करने वाले किसी भी नेता को इतना भी अँधा होकर सपोर्ट किया जाए कि हालत यहां तक जाएँ।

भारत के नजरिये से देखा जाए तो भारत ने मदद की है लेकिन वहां के तमिल श्रीलंकन जो भारत से जुड़ाव महसूस करते हैं वो भारत के रवैये पर ठगा सा महसूस करते हैं।  लेकिन भारत पिछले दो दशक से श्रीलंका के साथ अपने सम्बन्ध चीन को रोकने के नजरिये से ही रख रहा है।  भारत को पता है कि जो कर्ज दिया जा रहा है वो मिलने वाला नहीं है, ऐसा कई अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टें कहती हैं, लेकिन फिर भी रणनीतिक तौर पर करोडो डॉलर दिया जा रहा है।  श्रीलंका भी भारत की तरफ फिर से वापस रहा है।  पिछले प्रधानमंत्री भारत के पक्ष के थे लेकिन राजपक्षे खासकर गोटाबाया चीन की तरफ हाथ बढ़ाते दिखते थे लेकिन इस समय उनकी मजबूरी भी हो गई है भारत की तरफ बढ़ना।  इसके अलावा भारत के लिए रेफ्यूजी क्राइसिस भी बढ़ेगा।  भारत शायद आईएमएफ के आलावा अन्य संस्थाओं से कर्ज चुकाने की समय सीमा को बढ़ाने की भी मदद कर सकता है।  

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...