Thursday, January 16, 2014

"आप" की वैचारिक आलोचना भी जरूरी है।

पिछले दो महीने से देश में चली राजनैतिक बदलाव की बयार से मैं भी बच नहीं पाया। कुछ मुद्दों पर मैने भी आम आदमी पार्टी  से प्रभावित हुआ। कल मायावती के जन्मदिन पर भी लखनऊ में उनकी एक बड़ी रैली थी। राजनैतिक विद्यार्थी होने कारण मैने उनका पूरा 1-1.5 घंटे का भाषण सुना। बहुत अच्छे से मैने उसका विश्लेषण किया। उन्होने पहली बार अपने भाषण में समाजवादी पार्टी को कम जगह दी। सपा और कांग्रेस पर भी निशाना तो साधा लेकिन उतना जोरदार नहीं जो भाजपा और आम आदमी पार्टी पर था। उन्होंने सपा की तो आलोचना कम की क्योंकि उन्हें पता है, कि अखिलेश सरकार की मीडिया में हुई किरकिरी की वजह से साख अब उठ नहीं पाएगी। कांग्रेस पूरे देश में इतनी कमजोर है, कि अब उसको भी लोग रेस से बाहर मानने लगे हैं। मायावती भी अपनी उर्जा कमजोरों पर ना लगाकर मजबूत मोदी पर भड़ास निकाली। उन्होंने मोदी का वैचारिक विरोध किया। उन्हें गोधरा से लेकर मुजफ़्फ़र नगर तक के दंगों का दोषी बताते हुए आलोचना की। पिछले कई दिनों से मोदी भी अपने चाय वाला होने का फायदा उठाते हुए इमोसनल फायदा उठा रहे थे। उनकी इस बात को कोई भी काउन्टर नहीं कर पा रहा था। लेकिन पहली बार मायावती ने मोदी की इस ढाल को वैचारिक चुनौती दी। उन्होने कहा क़ि कोई भी चायवाला देश का प्रधानमंत्री बने तो सबको खुशी होगी, लेकिन अगर कोई दलित चायवाला एक आई.पी.एस. भी बन जाए तो स्वीकार नहीं किया जाता है। उन्होने तमिलनाडु के चाय वालों का उदाहरण भी दिया कि वहाँ पर दलितों के लिए अलग कप और ग्लास होते हैं। नीतीश के उस ऐतिहासिक ज्ञान वाले भाषण के बाद पहली बार किसी ने मोदी को सही से घेरा। मोदी अब इसका कैसे जवाब देते हैं। उसका तो पता नहीं लेकिन यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, क़ि वो वैचारिक जवाब नहीं होगा। हो सकता है वही कांग्रेस के चंगू-मंगू कहकर काउन्टर अटैक करें।
मायावती भी एक सामाजिक आन्दोलन से निकली हुई नेत्री हैं। उन्हें डर है कि कहीं गैर-राजनैतिक सेकुलर हिन्दू-मुस्लिम वोट केजरीवाल ना ले जाएँ । अतः उन्हें केजरीवाल के उत्तरप्रदेश में सरकार विरोधी वोटों को बांटने का हिस्सेदार मान रही हैं। तभी आम आदमी पार्टी और केजरीवाल भी उनके निशाने पर रहे। अभी तक हमने जो केजरीवाल की आलोचना सुनी थी वो इस प्रकार थी...अन्ना आन्दोलन को हाईजैक कर आए हैं, कांग्रेस से समर्थन ले लिया, भाजपा-कांग्रेस की बी-टीम हैं या जो अन्ना के नहीं हुए वो देश के क्या होंगे? लेकिन इस आलोचना को आम जन मानस में सुनने वाले कान केवल भाजपा या कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को छोड़कर किसी के पास नहीं थे। लेकिन पहली बार केजरीवाल की वैचारिक आलोचना हुई है। उनकी इस अलोंचना ने भले ही कुछ प्रभाव न डाला हो लेकिन एक बार सोंचने को तो मजबूर कर ही दिया है। उन्होंने कहा कि दलितों, अल्पसंख्यकों व अन्य शोसित वर्गों को उच्चवर्गों या खुद के वैश्य या बनिया समाज को एक पंक्ति में खड़ा करके आम आदमी नहीं कह सकते। पहली बार किसी ने केजरीवाल की जाति पर भी बात की। देश को भी यह बात अब पता चली कि केजरीवाल बनिया जाति से आते हैं। केजरीवाल की आम आदमी की परिभाषा को भी उन्होनें चैलेंज किया।
निजीतौर पर एक पार्टी का समर्थक होने के नाते मैं इस बात पर माया के खिलाफ गुस्सा भी निकाल सकता था, लेकिन उनकी आलोचना की बजाय अपने गिरेमान में भी देखना अनिवार्य है। अब आम आदमी पार्टी एक राष्‍ट्रीय पार्टी बन गई है, तो मुझे लगता है क़ि उन्हें अब हर अहम राजनैतिक मुद्दे पर अपनी राय देश के सामने रखनी चाहिए। जैसे आतंकवाद, सेकुलरिज्म, आरक्षण, क्षेत्रीयता, नक्सलवाद, विदेशनीति और अर्थनीति। लेकिन इन मुद्दों पर अब तक पार्टी की तरफ से कोई स्पष्ट राय नहीं आई है। कई प्रवक्ता इन चीजों को पुरानी राजनीति की घटिया चीजें कह देते हैं। जैसे कुछ दिनों पहले ही पार्टी की एक मात्र दलित महिला विधायक और मंत्री राखी बिडलान ने आरक्षण को गैर-जरूरी बता दिया था। अब उन्हें इतनी भी अक्ल नहीं थी कि अगर वो सीट आरक्षित न होती तो शायद उन्हें टिकट ही ना मिलता। आज आम आदमी पार्टी में बहुत बड़ा युवावर्ग आरक्षण विरोधी भी जुड़ा है, मोदी के साथ भी। भले ही इन्हीं कुछ मुद्दों की वजह से हमारे देश की राजनीति इतनी बदहालत में हो। लेकिन देश के इतिहास, संस्कृति और समाज को देखते हुए आप इन मुद्दों से बच भी नहीं सकते हैं। अपनी विचारधारा तो बतानी ही पड़ेगी. एक और कार्यक्रम में पार्टी प्रवक्ता प्रो. आनन्द कुमार ने इन मुद्दों पर जल्दी ही पार्टी की अन्तः कमेटी की तैयार रिपोर्ट को देश के सामने रखने को कहा था। लेकिन मुझे नहीं लगता है, कि पार्टी की हाईकमान इन मुद्दों पर इतनी जल्दी चुनावी व्यस्तता के बीच आम सहमति पा सकती है। केजरीवाल, मनीष और योगेन्द्र की विचारधारा अलग-अलग है। कुमार विश्वास दक्षिणपंथी झुकाव के और प्रशान्त भूषण वामपन्थी हैं। एक लोकतान्त्रिक देश और पार्टी में ऐसा होना भी चाहिए, लेकिन देश चलाने के लिए एक राय होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर देश जनता पार्टी का बिखराव देख चुका है।
पहले हमने दलित चिंतक प्रो. विवेक कुमार को एक टीवी कार्यक्रम में यह कहते सुना था कि जे. एन. यू. मे केजरीवाल का आरक्षण विरोधी भाषण हुआ था। मैने वो भाषण की रिकॉर्डिंग सुनी लेकिन मुझे यह कहीं से भी नहीं लगा कि अरविन्द का वो भाषण आरक्षण विरोधी था। केजरीवाल ने यह कहा था कि आरक्षण जिन जातियों को मिल रहा है, उन्हीं को मिले लेकिन उनमे भी जो परिवार एक बार आरक्षण प्राप्त कर ले, उसे आरक्षण ना देकर अन्य अपेक्षित गरीब परिवार को लाभ दिया जाए। यही बात देश का हर दलित पिछड़ा और गरीब चाहता है। मेरे गाँव में ही 10-12 पिछड़ी जातियाँ रहती हैं, लेकिन केवल दो-तीन यादव परिवारों से ही 18-20 लोग सरकारी नौकरी करते हैं। यही दशा दलितों की भी है। जम्मू-कश्मीर पर आई प्रशांत भूषण की राय को मीडिया और विरोधी पार्टियों ने बहुत दुष्प्रचारित किया। उन्होंने इस बयान को ऐसे बताया जैसे प्रशांत ने यह कह दिया हो कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। जबकि इसके पहले जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी APASPA हटाने की बात कही थी। सरकार और प्रशांत भी पूर्व में कई बार यह बात दोहरा चुके हैं। मैं स्वयं इस बात को मानता हूँ, कि पूरे जम्मू-कश्मीर से लेकर लद्दाख तक सेना रहे या ना रहे इस बात पर जनता की राय लेनी चाहिए। कई बार सेना की वजह से वहाँ के लोगों को परेशानियाँ होती रही हैं। आर्मी के जवानों द्वारा कश्मीरी लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाए होती रही हैं। तो जनता की राय लेना कोई बुरी बात नहीं हो सकती है। आज पार्टी विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने कुछ सवाल उठाए, मुझे निजी तौर पर उनके 2-3 मुद्दों पर लगा क़ि सरकार को सोंचना चाहिए। लेकिन बिन्नी की मंत्रीमंडल में ना शामिल किए जाने पर दिखी नाराजगी ने आज के सवालों को संदेह के घेरे में ला दिया है। बिन्नी को मैं चुनाव के पहले से जानता हूँ, जब वो पार्षद हुआ करते थे। उन्होने कई अच्छे काम किए थे। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जमीन खड़ी करने मे बिन्नी का भी योगदान है। उनके काम और नाम को ईमानदारी के मॉडल मे रूप में पेश किया गया है। मोहल्ला सभा का मॉडल भले ही अरविन्द ने स्वराज किताब में बनाया हो लेकिन, विनोद कुमार बिन्नी ने ही सबसे पहले प्रयोग किया था। हम यह भी कह सकते हैं, क़ि एक ईमानदार और गैर-महत्वाकांक्षी होने के नाते केजरीवाल को आर्थिक नीतियों पर यहजल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी। हम भी मानते हैं, कि यह जनता को शॉर्टटर्म में दी गई राहत है, लेकिन यह भी सच है क़ि यह राहत आगामी चुनाव को देखते हुए दी गई है। सवाल बहुत हैं। आम आदमी पार्टी की तरफ से कुछ जवाब दिए भी गए हैं। लेकिन कुछ सवालों के जवाब आने बाकी हैं। उनका भी इंतजार रहेगा। तब-तक अलोंचना करते रहिए, लेकिन आलोचना वैचारिक हो। यही लोकतंत्र की मजबूती का एक मंत्र भी है।

Tuesday, January 7, 2014

बाबा रामदेव का टैक्सासन

अभी कुछ दिनों पहले ही एक कार्यक्रम में राजनाथ सिंह जी 2014 की नीतियों पर बात कर रहे थे। मैनें सी. एस. डी. एस. (C.S.D.S.) के संपादक अभय कुमार दुबे जी को मैसेज (SMS) किया क़ि भाजपा की 2014 के लिए अर्थनीति क्या है? अभय जी ने पूंछा लेकिन राजनाथ सिंह जी ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया। अभी एक दिन बाबा रामदेव ने मोदी के सामने समर्थन की शर्त रख दी, कि वो हमारी अर्थनीति को स्वीकार करें। मोदीजी ने भी कोई ठोस जवाब तो नहीं दिया, जमकर राजनैतिक जवाब देते हुए, कहा की हम इस पर गहन रूप से विचार करेंगे।
अब हमें यह समझना होगा कि बाबा की शर्तें क्या थी? उनका कहना है, कि भारत में सभी 32 प्रकार के कर खत्म कर दिए जाएँ और बैंकिंग ट्रांजेंक्सन पर टैक्स लगा दिया जाए। यह जो बात कही गई, वह इस प्रकार का आदमी ही कह सकता है, जो टैक्स से बहुत परेशान है, और मुम्बई या दिल्ली के अलावा भारत नहीं जानता हो। पहली बात तो यह कि जिस भारत देश में 16 लाख करोड़ रुपए प्रतिवर्ष खर्चा आता है। और 130 करोड़ जनता में से केवल 4 करोड़ जनता ही टैक्स दे रही हो। ऐसे देश में आप टैक्स खत्म करके क्या साबित करना चाहते हैं। फिर देश का खर्चा कहाँ से निकलेगा? हाँ एक सी. ए. (Charted Accountant) असिस्टेंट होंने के नाते मैं यह कह सकता हूँ, कि भारत में टैक्स का सरलीकरण (Simplification) होना चहिए। आदमी सर्विस टैक्स और टी. डी. एस. सरीखी चीजों से बहुत परेशान है। उपर से मुम्बई में एल. बी. टी. (Local Body Tax) और  लगा दिया। अब वैट पर भी सरचार्ज लगाने की सोंच रहे रहे हैं। सेल्स टैक्स की जगह वैट का आना सरलीकरण की ही एक प्रक्रिया थी। लेकिन उसपर सही से अमल नहीं हो सका है। आदमी टैक्स देने से नहीं उसके झंझट से डरता है। टैक्स लेना तो ठीक है, परन्तु उसे उसी प्रकार की सुविधाएँ भी मिलनी चाहिए। आदमी इनकम टैक्स ओफ़िस के चक्कर लगाने से डरता है। इसमें सुधारों की तो जरूरत है, लेकिन अगर यह खत्म हो गया तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? कभी सोचा है, बाबा रामदेव ने। अब बात करते हैं बैंकिंग ट्रान्जेक्सन पर टैक्स की। तो आप अगर एक अनपढ आदमी से भी पूंछे तो वो आपको यह बता सकता है, कि जो आदमी ज्यादा कमाता है सरकार उसी से कुछ टैक्स लेती है। आदमी की आमदनी जिस हिसाब से होती है, उसी प्रतिशत में टैक्स पड़ता है। दुनिया के हर देश में लगभग टैक्स लेने की यही प्रक्रिया होगी, इसकी मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है। मैनें भी एक टैक्स विरोधी मित्र से पूछा कि दुनिया का एक भी देश बताइए जहाँ टैक्स नहीं पड़ता हो। तो उन्होंने दुबई, स्विटजरलैंड, उत्तरी अमेरिका के कई देशो बरर्मुडा, बहामा और ब्राजील के नाम बताए। ब्राजील में तो यह व्यवस्था 1995-2001 तक खत्म भी हो चुकी थी। दुबई की अगर बात की जाए तो वो एक छोटा सा शहर जो आर्थिक रूप से बहुत मजबूत है। बाकी अरब देशों में तेल निकलने की वजह से अर्थव्यवस्था मजबूत है। उत्तरीअमेरिका के छोटे-छोटे देश जहां खनिजों का भंडार है, 20-25 लाख आबादी है। वहाँ ऐसा हो सकता है। लेकिन भारत जैसे बड़े और आर्थिक रूप से पिछड़े या असमानता प्रधान देश में आप इस तरह की बातों को सोच भी नहीं सकते हैं। बाबा रामदेव इसके विकल्प के रूप में जो बातें बता रहे हैं, उनमें सबसे प्रमुख है बैंकों के लेन-देन पर 2% टैक्स लगा दिया जाए। अब इस बात से तो उनकी आर्थिक और सामाजिक निरक्षरता साबित होती है। भारत में नियमानुसार कमाई के हिसाब से टैक्स देने की बात कही गई है। उदाहरण के लिए मैं 1 लाख 20 हजार रुपए सालाना कमाता हूँ, तो मुझे कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। कभी मेरे घर पर जरूरत पड़ी तो अपने बॉस से लोन लेकर 50 हजार रुपए लेकर पिताजी के खाते में ट्रांसफर कर दिए. इसपर मेरे खाते से बैंक 1 हजार और पिताजी के खाते से भी इतने ही रुपए काट लेगी। मतलब मुझे मेरे बॉस को 52 हजार रुपए चुकाने पडेंगे, अगर ब्याज लिया तो अलग से। जबकि नियमानुसार यह मेरी कमाई नहीं उधार था। तब तो मैं बैंक में पैसे न डालकर उनके हाथ में ही देना पसंद करूंगा।
उपर्युक्त उदाहरण से ही ऐसा सोंचने वालों के दावों की पोल खुल जाती है। इस नियम से तो हर आदमी बैंक का प्रयोग ही कम कर देगा। आप बात काला धन लाने की कर रहे थे, जबकि इससे तो काला धन और बाहर जाएगा। फिर से लोग रजाइयों और दीवारों में पैसा रखने लगेंगे। अभी भी रखते होंगे. फिर अगर बैंकिंग साक्षरता की बात की जाए तो इसमें भी हमारे देश की एक आबादी का बड़ा हिस्सा अबतक बैंकों से दूर है। आज हमारे देश में हर दूसरे आदमी के पास बैंक खाता नहीं है। 10 ऐसे राज्य हैं, जहाँ यह अंतर और भी अधिक है। तो फिर क्या आप यह योजना दिल्ली, मुम्बई और अहमदाबाद के लिए ही रखेंगे?
फिर दूसरी बात बाबा ने कही कि आप 1000 और 500 के नोट बंद कर दो। आप ही बताइए क्या यह काला धन रोंकने का कारगर मुद्दा होगा। ऐसा करने से देश के मध्यमवर्ग और ईमानदारउच्चवर्ग को बहुत दिक्कतें आने वाली हैं। आपकी यह टैक्स व्यवस्था किसी के भी समझ में नहीं आ रही है। क्या प्रोपर्टी खरीदने, ए.सी. खरीदने, पेट्रोल खरीदने या अन्य चीजों पर एक ही टैक्स होना चाहिए। फिर तो यह मोटी बुध्दि वाली बात हो गई। और इससे गरीब या अमीर का अंतर खत्म हो जाएगा। सब पर टैक्स की एक ही दर लगेगी. मजबूत अर्थव्यवस्था के नाम पर बाबा ने जो यह आइडिया दिया है, यह बिल्कुल फ्लॉप और किसी निरक्षर व्यक्ति का लगता है। मुझे नहीं लगता है कि उनकी यह बेतुकी माँग वो मोदी जी मान लेगे, जो गुजरात में टैक्स के नाम पर बहुत सक्त रहते हैं। बाबा को बरगला कर एक कमेटी ही बना दी जाएगी। एक तरफ बाबा मोदी की जीत के बाद अपने वित्त मंत्री का पद सोच रहे हैं। मोदी जी या भाजपा उनको भले ही वोट के डर से साफ इंकार न करे, लेकिन हमारे अनुसार तो उन्हें अपना ध्यान योगा पर ही लगाना चाहिए। अगर वो अर्थशास्त्र का काम करने लगे, तो देश को चौपट कर देंगे।

Sunday, January 5, 2014

राहुल गाँधी जी को आम युवा की पाती

आदरणीय राहुल भईया,
                       गुस्ताखी के लिए माफी चाहता हूँ, जो आपको व्यस्तता के समय डिसटर्ब कर दिया। वो तो इन्टरनेट पर आपके प्रति मोदी सेना का #PAPPU वार देखकर रहा नहीं गया। मैं आज के 21वीं सदी के भारत का एक आम युवा (आपका छोटा भाई) हूँ। आम लिखने से आप यह न समझिएगा, कि मैं आम आदमी पार्टी का दूत हूँ। आम का तो आजकल सीजन चल रहा है। कहीं आपको मैंगो फ्रूटी वाला इमरान खान और परणिति चोपडा का एड तो नहीं याद आ गया। कन्फ्यूज मत होइए, आम खाने वाला नहीं। आम आदमी वाला। मजाक छोडिए, अब आता हूँ मुद्दे की बात पर।
सुना है, कि 16-17 जनवरी को पार्लियामेंट्री कमेटी की मीटिंग में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए आपका नाम घोषित किया जाने वाला है। ये लोग आपको उपहार नहीं चुनाव से पहले ही हार (पहनाने वाला नहीं) देने वाले हैं।  सबको पता है, कि इस बार कांग्रेस की हार तय है, ना मानो तो अपने सच्चे नेताओं (जयराम रमेश, मणिशंकर अय्यर और जनार्दन द्विवेदी) से पूंछकर देखिए। दस साल से आपकी पार्टी देश को लूटती आ रही है। मनमोहन सिंह का गुस्सा जनता आपके सिर उतार देगी। तो क्या फायदा? हाँ मैं आपको यह सलाह जरूर देता हूँ, कि आपको मिशन 2019 पर लग जाना चाहिए। हो सकता है, चुनाव 2015 तक ही हो जाएँ, क्योंकि अगली सरकार की उम्र कम ही होगी। फिर आप सामने आना। क्यों ना अभी आप एक डॅमी (मीरा कुमार, शिन्दे या चिदंबरम) को खड़ा कर दें। हालांकि आपने अभी कुछ महीनों में कुछ अच्छे कार्य (लोकपाल, दागी प्रत्याशी हटाने या जनता से जुड़कर मैनिफेस्टो बनाना, समलैंगिगता के खिलाफ बोलना) किए हैं, लेकिन तबतक आप बहुत देर कर चुके थे। मैं यह भी नहीं कहता कि आपकी सरकार ने पेपर पर अच्छा काम नहीं किया है। लेकिन उसे जमीन पर भी लाना पड़ेगा। आपकी यह बात बहुत अच्छी लगी, कि पहली बार आपने हार स्वीकार की और विरोधी आम आदमी पार्टी से सीखने की बात की। अगर आपको कुछ सीखना ही है, तो आप महात्मा गाँधी, अपने पिता राजीव गाँधी, ए.के. एंटेनी और कांग्रेस के इतिहास से सीखिए। अपने चापलूस टीम मेंबरों (संजय झा, रनदीप सूरजेवाला और दिग्विजय) की बजाय जमीनी नेताओं सत्यव्रत चतुर्वेदी, जयराम रमेश, जनार्दन द्विवेदी, सचिन पायलट और मणिशंकर अय्यर सरीखों से सलाह लिया करिए। आज भी केवल फ़ेसबुक और ट्विटर से जंग नहीं जीती जा सकती है। पहले आपको जमीन पर भी कुछ करना पड़ेगा। फिर आई. टी. सेल बिठाइएगा। नहीं तो मोदी के जैसे गुब्बारे से हवा निकल जाएगी।  कुछ मीडिया हल्कों से हवा आ रही है, कि पार्टी प्रियंका दीदी को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में है। लेकिन आप इसे भी नहीं होने देना नहीं तो वो भी पार्टी को हार से नहीं बचा सकेंगी। उसमें आपकी भी इज्जत जाएगी। लोग आपको प्रियंका दीदी से कमजोर मानने लगेंगे। अभी से उनकी भी उर्जा बचकर रखिए और 2019 में वापसी के लिए वो बहुत काम आएंगी।
राहुल भईया मैं आपकी एक और बात से नाराज हूँ कि आप कह रहे हैं, कि आप शादी नहीं करेंगे। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि अब आपकी मोस्ट बैचलर ऑफ इंडिया वाली छवि नही रह गई है। अब कॉलेज की लड़कियां आपको देखकर आई. लव यू. नहीं कहती हैं। मैं तो कहता हूँ आप मिशन 2019 में एक अच्छी सी हिन्दुस्तानी (अगर कोई विदेशी पसंद आ गई हो तो बताइए, हम उसे भी स्वीकार कर लेंगे) कन्या से विवाह करके जाएँ।  कोशिस यह करिएगा कि भाभी की राजनीतिक समझ भी अच्छी हो। एक से भले दो। हाँ इससे एक बात और अच्छी होगी, कि आपका मन भारत में ज्यादा लगेगा और जनता यह नहीं कहेगी कि राहुल गाँधी तो हमेशा विदेश में ही रहते हैं। आप कुमार विश्वास के ऐलान से बिल्कुल भी डरिएगा नहीं। अमेठी में आपको हराना आसान काम नहीं है। (जब तक सपा आपके साथ है)। सबसे अच्छा तो तब होगा जब मोदी भी कुमार की ललकार सुनकर अमेठी से कूद जाएँ। वहां से कुमार तो आपको टक्कर दे सकते हैं, लेकिन मोदी जी की जमानत जब्त हो जाएगी। मेरी आदत वो नहीं है, कि आपसे युवाओं के लिए पुरानी घिसी-पिटी बातें (अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीब) पर आपकी राय और मदद माँगूं। आप तो यह करना चाहते हैं, लेकिन पता नहीं कब?  अंत में एक बाद कह दूं कि देश को आपकी पार्टी की बहुत जरूरत है, बसर्ते उसमें ईमानदार लोग हों। और आप मोदी के सहजादा शब्द से बिल्कुल चिंता मत करिए, क्योकि जिस दिन कांग्रेस पार्टी से आपके परिवार का वर्चस्व खत्म हो गया, उसी दिन पार्टी खत्म हो जाएगी। पत्र खुला होने के कारण कुछ बातें नहीं लिख सका हूँ, उम्मीद है आप खुद समझ जाएंगे या किसी जमीनी और ईमानदार नेता से पूंछ लेंगे। अगर आपका दिल कहे तो आप मनमोहन सिंह जी बात (राष्ट्रपति बनने) पर भी ध्यान देकर देखना।

धन्यवाद!

आपका युवा शुभचिंतक
कमलेश कुमार राठोर 

चिराग तले अंधेरा

कल तहलका का 2014 का पहला अंक पढ़ा। पूरी पत्रिका को साहित्यमय बनाने के लिए बधाई। चूंकि मैं भी साहित्यप्रेमी रहा हूँ, बहुत अच्छा लगा। कमलेश्वर जी को बहुत पहले से पढता आ रहा था। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और राहुल संक्रत्यायन के बाद कमलेश्वर जी ही मुझे पसंद रहे हैं। उनकी रचना आजादी मुबारक, अम्मा, आगामी अतीत, कोहरा, मांस का दरिया, पति पत्नी और वो तथा एक सड़क सत्तावन गलियाँ बहुत पसंद हैं। जब उन्होनें आलोचना लिखनी शुरु की तभी से मैंने नामवर सिंह को सही से जाना। कल तहलका में उनकी सहयोगी लेखक मन्नू भंडारी का संस्मरण पढ़ा। बहुत चालाकी और दिल से लिखा गया था। ऐसा लिखने वाले के अंदर कलेजा चाहिए, वो भी अपने खास मित्र के मरने के बाद।
कमलेश्वर जी ने बहुत सी कहानियाँ, उपन्यास और आलोचनाएँ सामाजिक स्थिति पर लिखी हैं। हर रचना में उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को उजागर किया। पुरुषवादी विचारधारा पर बार-बार कठोर प्रहार किए। उनकी रचनाओं को पढकर उनकी विचारधारा को भी समझा जा सकता था। हमेशा ही ऐसा होता रहा है, कि लेखक की रचना पढ़कर ही उसे पहचाना जाता है। उसका सामाजिक योगदान भी पता चलता है। लेकिन कल मन्नू भंडारी ने जिस तरह से उनकी जिंदगी से पर्दा उठाया मैं तो दंग रह गया। उसके पहले मैने उनकी आत्मकथा-3 पढी थी। लेकिन उसमें ऐसा कुछ भी जिक्र नही किया गया था। असलियत पढ़कर रात भर सो नहीं पाया। क्या कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है? जो लिखे कुछ और जीवन में कुछ और। ऐसा भी नहीं था कि केवल प्रेम प्रसंग रहे हों, दीपा नाम की औरत से उनको बच्चा था, मुम्बई और कलकत्ता में कई औरतों से ऐसे ही सम्बंध थे। अपनी पत्नी के साथ में बहुत निर्दयता का व्यवहार करते थे। मेरे हिसाब से तो इतना गिरे चरित्र का आदमी होना ही गुनाह है। अगर मन्नू जी ने यह बातें 15 साल पहले कही होती तो शायद कमलेश्वर की यह झूंठी महानता नहीं होती। हम मन्नू जी की भी मजबूरी समझ सकते हैं। लेकिन कल से मेरे मन में ना जाने क्यों हर एक लेखक की निजी जिंदगी जानने को लेकर एक इच्छा सी जाग गई है। अभी तक तो हम उस जीवनी पर ही विश्वास करते थे। जिसमें लिखा होता था, " बचपन से संघर्ष किया, पढने-लिखने में होसियार थे, 4-5 भाषाओ के साहित्य में बड़ा योगदान है आदि।" इसी प्रकार से अब राजेन्द्र यादव का वो बुढ़ापा वाला प्रेम-प्रसंग याद आ रहा है, जिसमें चार-पांच महीने पहले उनके नौकर को सजा हो गई थी। वो पता नही अब तक छूटा भी है या नहीं। राजेन्द्र के बारे में भी रिसर्च करने पर पता चला कि उनका भी चरित्र कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। इसी तरह से अब सक होता है, कि जय शंकर प्रसाद की तीन-तीन पत्नियाँ इतनी जल्दी कैसे मर गईं? भले ही वो निर्दोष हों, लेकिन सवाल तो उठता ही है।
वो लेखक जो मेरे आदर्श रहे हैं, उनकी जिंदगी में इस तरह की बाते सुनकर बहुत दुख होता है। यही दुख  अभी तरुण तेजपाल और एक कानून का विद्यार्थी होने के नाते जस्टिस गांगुली केस में भी हुआ था। जब कोई ऐसा आदमी जो हमारे समाज को एक राह दिखाने वाला हो। (इसमें आशाराम बापू का उदाहरण सटीक है। ) वह कुछ ऐसा कुकृत्य करता है, तो अत्यंत पीड़ा होती है। जब ये लोग ऐसा करेंगे तो समाज का बिगाड़ा हुआ, अनपढ, अपराधी प्रवृति के तबके से सोंच बदलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...