अभी कुछ दिनों पहले ही एक कार्यक्रम में राजनाथ सिंह जी 2014 की नीतियों पर बात कर रहे थे। मैनें सी. एस. डी. एस. (C.S.D.S.) के संपादक अभय कुमार दुबे जी को मैसेज (SMS) किया क़ि भाजपा की 2014 के लिए अर्थनीति क्या है? अभय जी ने पूंछा लेकिन राजनाथ सिंह जी ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया। अभी एक दिन बाबा रामदेव ने मोदी के सामने समर्थन की शर्त रख दी, कि वो हमारी अर्थनीति को स्वीकार करें। मोदीजी ने भी कोई ठोस जवाब तो नहीं दिया, जमकर राजनैतिक जवाब देते हुए, कहा की हम इस पर गहन रूप से विचार करेंगे।
अब हमें यह समझना होगा कि बाबा की शर्तें क्या थी? उनका कहना है, कि भारत में सभी 32 प्रकार के कर खत्म कर दिए जाएँ और बैंकिंग ट्रांजेंक्सन पर टैक्स लगा दिया जाए। यह जो बात कही गई, वह इस प्रकार का आदमी ही कह सकता है, जो टैक्स से बहुत परेशान है, और मुम्बई या दिल्ली के अलावा भारत नहीं जानता हो। पहली बात तो यह कि जिस भारत देश में 16 लाख करोड़ रुपए प्रतिवर्ष खर्चा आता है। और 130 करोड़ जनता में से केवल 4 करोड़ जनता ही टैक्स दे रही हो। ऐसे देश में आप टैक्स खत्म करके क्या साबित करना चाहते हैं। फिर देश का खर्चा कहाँ से निकलेगा? हाँ एक सी. ए. (Charted Accountant) असिस्टेंट होंने के नाते मैं यह कह सकता हूँ, कि भारत में टैक्स का सरलीकरण (Simplification) होना चहिए। आदमी सर्विस टैक्स और टी. डी. एस. सरीखी चीजों से बहुत परेशान है। उपर से मुम्बई में एल. बी. टी. (Local Body Tax) और लगा दिया। अब वैट पर भी सरचार्ज लगाने की सोंच रहे रहे हैं। सेल्स टैक्स की जगह वैट का आना सरलीकरण की ही एक प्रक्रिया थी। लेकिन उसपर सही से अमल नहीं हो सका है। आदमी टैक्स देने से नहीं उसके झंझट से डरता है। टैक्स लेना तो ठीक है, परन्तु उसे उसी प्रकार की सुविधाएँ भी मिलनी चाहिए। आदमी इनकम टैक्स ओफ़िस के चक्कर लगाने से डरता है। इसमें सुधारों की तो जरूरत है, लेकिन अगर यह खत्म हो गया तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? कभी सोचा है, बाबा रामदेव ने। अब बात करते हैं बैंकिंग ट्रान्जेक्सन पर टैक्स की। तो आप अगर एक अनपढ आदमी से भी पूंछे तो वो आपको यह बता सकता है, कि जो आदमी ज्यादा कमाता है सरकार उसी से कुछ टैक्स लेती है। आदमी की आमदनी जिस हिसाब से होती है, उसी प्रतिशत में टैक्स पड़ता है। दुनिया के हर देश में लगभग टैक्स लेने की यही प्रक्रिया होगी, इसकी मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है। मैनें भी एक टैक्स विरोधी मित्र से पूछा कि दुनिया का एक भी देश बताइए जहाँ टैक्स नहीं पड़ता हो। तो उन्होंने दुबई, स्विटजरलैंड, उत्तरी अमेरिका के कई देशो बरर्मुडा, बहामा और ब्राजील के नाम बताए। ब्राजील में तो यह व्यवस्था 1995-2001 तक खत्म भी हो चुकी थी। दुबई की अगर बात की जाए तो वो एक छोटा सा शहर जो आर्थिक रूप से बहुत मजबूत है। बाकी अरब देशों में तेल निकलने की वजह से अर्थव्यवस्था मजबूत है। उत्तरीअमेरिका के छोटे-छोटे देश जहां खनिजों का भंडार है, 20-25 लाख आबादी है। वहाँ ऐसा हो सकता है। लेकिन भारत जैसे बड़े और आर्थिक रूप से पिछड़े या असमानता प्रधान देश में आप इस तरह की बातों को सोच भी नहीं सकते हैं। बाबा रामदेव इसके विकल्प के रूप में जो बातें बता रहे हैं, उनमें सबसे प्रमुख है बैंकों के लेन-देन पर 2% टैक्स लगा दिया जाए। अब इस बात से तो उनकी आर्थिक और सामाजिक निरक्षरता साबित होती है। भारत में नियमानुसार कमाई के हिसाब से टैक्स देने की बात कही गई है। उदाहरण के लिए मैं 1 लाख 20 हजार रुपए सालाना कमाता हूँ, तो मुझे कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। कभी मेरे घर पर जरूरत पड़ी तो अपने बॉस से लोन लेकर 50 हजार रुपए लेकर पिताजी के खाते में ट्रांसफर कर दिए. इसपर मेरे खाते से बैंक 1 हजार और पिताजी के खाते से भी इतने ही रुपए काट लेगी। मतलब मुझे मेरे बॉस को 52 हजार रुपए चुकाने पडेंगे, अगर ब्याज लिया तो अलग से। जबकि नियमानुसार यह मेरी कमाई नहीं उधार था। तब तो मैं बैंक में पैसे न डालकर उनके हाथ में ही देना पसंद करूंगा।
उपर्युक्त उदाहरण से ही ऐसा सोंचने वालों के दावों की पोल खुल जाती है। इस नियम से तो हर आदमी बैंक का प्रयोग ही कम कर देगा। आप बात काला धन लाने की कर रहे थे, जबकि इससे तो काला धन और बाहर जाएगा। फिर से लोग रजाइयों और दीवारों में पैसा रखने लगेंगे। अभी भी रखते होंगे. फिर अगर बैंकिंग साक्षरता की बात की जाए तो इसमें भी हमारे देश की एक आबादी का बड़ा हिस्सा अबतक बैंकों से दूर है। आज हमारे देश में हर दूसरे आदमी के पास बैंक खाता नहीं है। 10 ऐसे राज्य हैं, जहाँ यह अंतर और भी अधिक है। तो फिर क्या आप यह योजना दिल्ली, मुम्बई और अहमदाबाद के लिए ही रखेंगे?
फिर दूसरी बात बाबा ने कही कि आप 1000 और 500 के नोट बंद कर दो। आप ही बताइए क्या यह काला धन रोंकने का कारगर मुद्दा होगा। ऐसा करने से देश के मध्यमवर्ग और ईमानदारउच्चवर्ग को बहुत दिक्कतें आने वाली हैं। आपकी यह टैक्स व्यवस्था किसी के भी समझ में नहीं आ रही है। क्या प्रोपर्टी खरीदने, ए.सी. खरीदने, पेट्रोल खरीदने या अन्य चीजों पर एक ही टैक्स होना चाहिए। फिर तो यह मोटी बुध्दि वाली बात हो गई। और इससे गरीब या अमीर का अंतर खत्म हो जाएगा। सब पर टैक्स की एक ही दर लगेगी. मजबूत अर्थव्यवस्था के नाम पर बाबा ने जो यह आइडिया दिया है, यह बिल्कुल फ्लॉप और किसी निरक्षर व्यक्ति का लगता है। मुझे नहीं लगता है कि उनकी यह बेतुकी माँग वो मोदी जी मान लेगे, जो गुजरात में टैक्स के नाम पर बहुत सक्त रहते हैं। बाबा को बरगला कर एक कमेटी ही बना दी जाएगी। एक तरफ बाबा मोदी की जीत के बाद अपने वित्त मंत्री का पद सोच रहे हैं। मोदी जी या भाजपा उनको भले ही वोट के डर से साफ इंकार न करे, लेकिन हमारे अनुसार तो उन्हें अपना ध्यान योगा पर ही लगाना चाहिए। अगर वो अर्थशास्त्र का काम करने लगे, तो देश को चौपट कर देंगे।
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