कल तहलका का 2014 का पहला अंक पढ़ा। पूरी पत्रिका को साहित्यमय बनाने के लिए बधाई। चूंकि मैं भी साहित्यप्रेमी रहा हूँ, बहुत अच्छा लगा। कमलेश्वर जी को बहुत पहले से पढता आ रहा था। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और राहुल संक्रत्यायन के बाद कमलेश्वर जी ही मुझे पसंद रहे हैं। उनकी रचना आजादी मुबारक, अम्मा, आगामी अतीत, कोहरा, मांस का दरिया, पति पत्नी और वो तथा एक सड़क सत्तावन गलियाँ बहुत पसंद हैं। जब उन्होनें आलोचना लिखनी शुरु की तभी से मैंने नामवर सिंह को सही से जाना। कल तहलका में उनकी सहयोगी लेखक मन्नू भंडारी का संस्मरण पढ़ा। बहुत चालाकी और दिल से लिखा गया था। ऐसा लिखने वाले के अंदर कलेजा चाहिए, वो भी अपने खास मित्र के मरने के बाद।
कमलेश्वर जी ने बहुत सी कहानियाँ, उपन्यास और आलोचनाएँ सामाजिक स्थिति पर लिखी हैं। हर रचना में उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को उजागर किया। पुरुषवादी विचारधारा पर बार-बार कठोर प्रहार किए। उनकी रचनाओं को पढकर उनकी विचारधारा को भी समझा जा सकता था। हमेशा ही ऐसा होता रहा है, कि लेखक की रचना पढ़कर ही उसे पहचाना जाता है। उसका सामाजिक योगदान भी पता चलता है। लेकिन कल मन्नू भंडारी ने जिस तरह से उनकी जिंदगी से पर्दा उठाया मैं तो दंग रह गया। उसके पहले मैने उनकी आत्मकथा-3 पढी थी। लेकिन उसमें ऐसा कुछ भी जिक्र नही किया गया था। असलियत पढ़कर रात भर सो नहीं पाया। क्या कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है? जो लिखे कुछ और जीवन में कुछ और। ऐसा भी नहीं था कि केवल प्रेम प्रसंग रहे हों, दीपा नाम की औरत से उनको बच्चा था, मुम्बई और कलकत्ता में कई औरतों से ऐसे ही सम्बंध थे। अपनी पत्नी के साथ में बहुत निर्दयता का व्यवहार करते थे। मेरे हिसाब से तो इतना गिरे चरित्र का आदमी होना ही गुनाह है। अगर मन्नू जी ने यह बातें 15 साल पहले कही होती तो शायद कमलेश्वर की यह झूंठी महानता नहीं होती। हम मन्नू जी की भी मजबूरी समझ सकते हैं। लेकिन कल से मेरे मन में ना जाने क्यों हर एक लेखक की निजी जिंदगी जानने को लेकर एक इच्छा सी जाग गई है। अभी तक तो हम उस जीवनी पर ही विश्वास करते थे। जिसमें लिखा होता था, " बचपन से संघर्ष किया, पढने-लिखने में होसियार थे, 4-5 भाषाओ के साहित्य में बड़ा योगदान है आदि।" इसी प्रकार से अब राजेन्द्र यादव का वो बुढ़ापा वाला प्रेम-प्रसंग याद आ रहा है, जिसमें चार-पांच महीने पहले उनके नौकर को सजा हो गई थी। वो पता नही अब तक छूटा भी है या नहीं। राजेन्द्र के बारे में भी रिसर्च करने पर पता चला कि उनका भी चरित्र कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। इसी तरह से अब सक होता है, कि जय शंकर प्रसाद की तीन-तीन पत्नियाँ इतनी जल्दी कैसे मर गईं? भले ही वो निर्दोष हों, लेकिन सवाल तो उठता ही है।
वो लेखक जो मेरे आदर्श रहे हैं, उनकी जिंदगी में इस तरह की बाते सुनकर बहुत दुख होता है। यही दुख अभी तरुण तेजपाल और एक कानून का विद्यार्थी होने के नाते जस्टिस गांगुली केस में भी हुआ था। जब कोई ऐसा आदमी जो हमारे समाज को एक राह दिखाने वाला हो। (इसमें आशाराम बापू का उदाहरण सटीक है। ) वह कुछ ऐसा कुकृत्य करता है, तो अत्यंत पीड़ा होती है। जब ये लोग ऐसा करेंगे तो समाज का बिगाड़ा हुआ, अनपढ, अपराधी प्रवृति के तबके से सोंच बदलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
कमलेश्वर जी ने बहुत सी कहानियाँ, उपन्यास और आलोचनाएँ सामाजिक स्थिति पर लिखी हैं। हर रचना में उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को उजागर किया। पुरुषवादी विचारधारा पर बार-बार कठोर प्रहार किए। उनकी रचनाओं को पढकर उनकी विचारधारा को भी समझा जा सकता था। हमेशा ही ऐसा होता रहा है, कि लेखक की रचना पढ़कर ही उसे पहचाना जाता है। उसका सामाजिक योगदान भी पता चलता है। लेकिन कल मन्नू भंडारी ने जिस तरह से उनकी जिंदगी से पर्दा उठाया मैं तो दंग रह गया। उसके पहले मैने उनकी आत्मकथा-3 पढी थी। लेकिन उसमें ऐसा कुछ भी जिक्र नही किया गया था। असलियत पढ़कर रात भर सो नहीं पाया। क्या कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है? जो लिखे कुछ और जीवन में कुछ और। ऐसा भी नहीं था कि केवल प्रेम प्रसंग रहे हों, दीपा नाम की औरत से उनको बच्चा था, मुम्बई और कलकत्ता में कई औरतों से ऐसे ही सम्बंध थे। अपनी पत्नी के साथ में बहुत निर्दयता का व्यवहार करते थे। मेरे हिसाब से तो इतना गिरे चरित्र का आदमी होना ही गुनाह है। अगर मन्नू जी ने यह बातें 15 साल पहले कही होती तो शायद कमलेश्वर की यह झूंठी महानता नहीं होती। हम मन्नू जी की भी मजबूरी समझ सकते हैं। लेकिन कल से मेरे मन में ना जाने क्यों हर एक लेखक की निजी जिंदगी जानने को लेकर एक इच्छा सी जाग गई है। अभी तक तो हम उस जीवनी पर ही विश्वास करते थे। जिसमें लिखा होता था, " बचपन से संघर्ष किया, पढने-लिखने में होसियार थे, 4-5 भाषाओ के साहित्य में बड़ा योगदान है आदि।" इसी प्रकार से अब राजेन्द्र यादव का वो बुढ़ापा वाला प्रेम-प्रसंग याद आ रहा है, जिसमें चार-पांच महीने पहले उनके नौकर को सजा हो गई थी। वो पता नही अब तक छूटा भी है या नहीं। राजेन्द्र के बारे में भी रिसर्च करने पर पता चला कि उनका भी चरित्र कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। इसी तरह से अब सक होता है, कि जय शंकर प्रसाद की तीन-तीन पत्नियाँ इतनी जल्दी कैसे मर गईं? भले ही वो निर्दोष हों, लेकिन सवाल तो उठता ही है।
वो लेखक जो मेरे आदर्श रहे हैं, उनकी जिंदगी में इस तरह की बाते सुनकर बहुत दुख होता है। यही दुख अभी तरुण तेजपाल और एक कानून का विद्यार्थी होने के नाते जस्टिस गांगुली केस में भी हुआ था। जब कोई ऐसा आदमी जो हमारे समाज को एक राह दिखाने वाला हो। (इसमें आशाराम बापू का उदाहरण सटीक है। ) वह कुछ ऐसा कुकृत्य करता है, तो अत्यंत पीड़ा होती है। जब ये लोग ऐसा करेंगे तो समाज का बिगाड़ा हुआ, अनपढ, अपराधी प्रवृति के तबके से सोंच बदलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
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