Thursday, January 16, 2014

"आप" की वैचारिक आलोचना भी जरूरी है।

पिछले दो महीने से देश में चली राजनैतिक बदलाव की बयार से मैं भी बच नहीं पाया। कुछ मुद्दों पर मैने भी आम आदमी पार्टी  से प्रभावित हुआ। कल मायावती के जन्मदिन पर भी लखनऊ में उनकी एक बड़ी रैली थी। राजनैतिक विद्यार्थी होने कारण मैने उनका पूरा 1-1.5 घंटे का भाषण सुना। बहुत अच्छे से मैने उसका विश्लेषण किया। उन्होने पहली बार अपने भाषण में समाजवादी पार्टी को कम जगह दी। सपा और कांग्रेस पर भी निशाना तो साधा लेकिन उतना जोरदार नहीं जो भाजपा और आम आदमी पार्टी पर था। उन्होंने सपा की तो आलोचना कम की क्योंकि उन्हें पता है, कि अखिलेश सरकार की मीडिया में हुई किरकिरी की वजह से साख अब उठ नहीं पाएगी। कांग्रेस पूरे देश में इतनी कमजोर है, कि अब उसको भी लोग रेस से बाहर मानने लगे हैं। मायावती भी अपनी उर्जा कमजोरों पर ना लगाकर मजबूत मोदी पर भड़ास निकाली। उन्होंने मोदी का वैचारिक विरोध किया। उन्हें गोधरा से लेकर मुजफ़्फ़र नगर तक के दंगों का दोषी बताते हुए आलोचना की। पिछले कई दिनों से मोदी भी अपने चाय वाला होने का फायदा उठाते हुए इमोसनल फायदा उठा रहे थे। उनकी इस बात को कोई भी काउन्टर नहीं कर पा रहा था। लेकिन पहली बार मायावती ने मोदी की इस ढाल को वैचारिक चुनौती दी। उन्होने कहा क़ि कोई भी चायवाला देश का प्रधानमंत्री बने तो सबको खुशी होगी, लेकिन अगर कोई दलित चायवाला एक आई.पी.एस. भी बन जाए तो स्वीकार नहीं किया जाता है। उन्होने तमिलनाडु के चाय वालों का उदाहरण भी दिया कि वहाँ पर दलितों के लिए अलग कप और ग्लास होते हैं। नीतीश के उस ऐतिहासिक ज्ञान वाले भाषण के बाद पहली बार किसी ने मोदी को सही से घेरा। मोदी अब इसका कैसे जवाब देते हैं। उसका तो पता नहीं लेकिन यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, क़ि वो वैचारिक जवाब नहीं होगा। हो सकता है वही कांग्रेस के चंगू-मंगू कहकर काउन्टर अटैक करें।
मायावती भी एक सामाजिक आन्दोलन से निकली हुई नेत्री हैं। उन्हें डर है कि कहीं गैर-राजनैतिक सेकुलर हिन्दू-मुस्लिम वोट केजरीवाल ना ले जाएँ । अतः उन्हें केजरीवाल के उत्तरप्रदेश में सरकार विरोधी वोटों को बांटने का हिस्सेदार मान रही हैं। तभी आम आदमी पार्टी और केजरीवाल भी उनके निशाने पर रहे। अभी तक हमने जो केजरीवाल की आलोचना सुनी थी वो इस प्रकार थी...अन्ना आन्दोलन को हाईजैक कर आए हैं, कांग्रेस से समर्थन ले लिया, भाजपा-कांग्रेस की बी-टीम हैं या जो अन्ना के नहीं हुए वो देश के क्या होंगे? लेकिन इस आलोचना को आम जन मानस में सुनने वाले कान केवल भाजपा या कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को छोड़कर किसी के पास नहीं थे। लेकिन पहली बार केजरीवाल की वैचारिक आलोचना हुई है। उनकी इस अलोंचना ने भले ही कुछ प्रभाव न डाला हो लेकिन एक बार सोंचने को तो मजबूर कर ही दिया है। उन्होंने कहा कि दलितों, अल्पसंख्यकों व अन्य शोसित वर्गों को उच्चवर्गों या खुद के वैश्य या बनिया समाज को एक पंक्ति में खड़ा करके आम आदमी नहीं कह सकते। पहली बार किसी ने केजरीवाल की जाति पर भी बात की। देश को भी यह बात अब पता चली कि केजरीवाल बनिया जाति से आते हैं। केजरीवाल की आम आदमी की परिभाषा को भी उन्होनें चैलेंज किया।
निजीतौर पर एक पार्टी का समर्थक होने के नाते मैं इस बात पर माया के खिलाफ गुस्सा भी निकाल सकता था, लेकिन उनकी आलोचना की बजाय अपने गिरेमान में भी देखना अनिवार्य है। अब आम आदमी पार्टी एक राष्‍ट्रीय पार्टी बन गई है, तो मुझे लगता है क़ि उन्हें अब हर अहम राजनैतिक मुद्दे पर अपनी राय देश के सामने रखनी चाहिए। जैसे आतंकवाद, सेकुलरिज्म, आरक्षण, क्षेत्रीयता, नक्सलवाद, विदेशनीति और अर्थनीति। लेकिन इन मुद्दों पर अब तक पार्टी की तरफ से कोई स्पष्ट राय नहीं आई है। कई प्रवक्ता इन चीजों को पुरानी राजनीति की घटिया चीजें कह देते हैं। जैसे कुछ दिनों पहले ही पार्टी की एक मात्र दलित महिला विधायक और मंत्री राखी बिडलान ने आरक्षण को गैर-जरूरी बता दिया था। अब उन्हें इतनी भी अक्ल नहीं थी कि अगर वो सीट आरक्षित न होती तो शायद उन्हें टिकट ही ना मिलता। आज आम आदमी पार्टी में बहुत बड़ा युवावर्ग आरक्षण विरोधी भी जुड़ा है, मोदी के साथ भी। भले ही इन्हीं कुछ मुद्दों की वजह से हमारे देश की राजनीति इतनी बदहालत में हो। लेकिन देश के इतिहास, संस्कृति और समाज को देखते हुए आप इन मुद्दों से बच भी नहीं सकते हैं। अपनी विचारधारा तो बतानी ही पड़ेगी. एक और कार्यक्रम में पार्टी प्रवक्ता प्रो. आनन्द कुमार ने इन मुद्दों पर जल्दी ही पार्टी की अन्तः कमेटी की तैयार रिपोर्ट को देश के सामने रखने को कहा था। लेकिन मुझे नहीं लगता है, कि पार्टी की हाईकमान इन मुद्दों पर इतनी जल्दी चुनावी व्यस्तता के बीच आम सहमति पा सकती है। केजरीवाल, मनीष और योगेन्द्र की विचारधारा अलग-अलग है। कुमार विश्वास दक्षिणपंथी झुकाव के और प्रशान्त भूषण वामपन्थी हैं। एक लोकतान्त्रिक देश और पार्टी में ऐसा होना भी चाहिए, लेकिन देश चलाने के लिए एक राय होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर देश जनता पार्टी का बिखराव देख चुका है।
पहले हमने दलित चिंतक प्रो. विवेक कुमार को एक टीवी कार्यक्रम में यह कहते सुना था कि जे. एन. यू. मे केजरीवाल का आरक्षण विरोधी भाषण हुआ था। मैने वो भाषण की रिकॉर्डिंग सुनी लेकिन मुझे यह कहीं से भी नहीं लगा कि अरविन्द का वो भाषण आरक्षण विरोधी था। केजरीवाल ने यह कहा था कि आरक्षण जिन जातियों को मिल रहा है, उन्हीं को मिले लेकिन उनमे भी जो परिवार एक बार आरक्षण प्राप्त कर ले, उसे आरक्षण ना देकर अन्य अपेक्षित गरीब परिवार को लाभ दिया जाए। यही बात देश का हर दलित पिछड़ा और गरीब चाहता है। मेरे गाँव में ही 10-12 पिछड़ी जातियाँ रहती हैं, लेकिन केवल दो-तीन यादव परिवारों से ही 18-20 लोग सरकारी नौकरी करते हैं। यही दशा दलितों की भी है। जम्मू-कश्मीर पर आई प्रशांत भूषण की राय को मीडिया और विरोधी पार्टियों ने बहुत दुष्प्रचारित किया। उन्होंने इस बयान को ऐसे बताया जैसे प्रशांत ने यह कह दिया हो कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। जबकि इसके पहले जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी APASPA हटाने की बात कही थी। सरकार और प्रशांत भी पूर्व में कई बार यह बात दोहरा चुके हैं। मैं स्वयं इस बात को मानता हूँ, कि पूरे जम्मू-कश्मीर से लेकर लद्दाख तक सेना रहे या ना रहे इस बात पर जनता की राय लेनी चाहिए। कई बार सेना की वजह से वहाँ के लोगों को परेशानियाँ होती रही हैं। आर्मी के जवानों द्वारा कश्मीरी लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाए होती रही हैं। तो जनता की राय लेना कोई बुरी बात नहीं हो सकती है। आज पार्टी विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने कुछ सवाल उठाए, मुझे निजी तौर पर उनके 2-3 मुद्दों पर लगा क़ि सरकार को सोंचना चाहिए। लेकिन बिन्नी की मंत्रीमंडल में ना शामिल किए जाने पर दिखी नाराजगी ने आज के सवालों को संदेह के घेरे में ला दिया है। बिन्नी को मैं चुनाव के पहले से जानता हूँ, जब वो पार्षद हुआ करते थे। उन्होने कई अच्छे काम किए थे। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जमीन खड़ी करने मे बिन्नी का भी योगदान है। उनके काम और नाम को ईमानदारी के मॉडल मे रूप में पेश किया गया है। मोहल्ला सभा का मॉडल भले ही अरविन्द ने स्वराज किताब में बनाया हो लेकिन, विनोद कुमार बिन्नी ने ही सबसे पहले प्रयोग किया था। हम यह भी कह सकते हैं, क़ि एक ईमानदार और गैर-महत्वाकांक्षी होने के नाते केजरीवाल को आर्थिक नीतियों पर यहजल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी। हम भी मानते हैं, कि यह जनता को शॉर्टटर्म में दी गई राहत है, लेकिन यह भी सच है क़ि यह राहत आगामी चुनाव को देखते हुए दी गई है। सवाल बहुत हैं। आम आदमी पार्टी की तरफ से कुछ जवाब दिए भी गए हैं। लेकिन कुछ सवालों के जवाब आने बाकी हैं। उनका भी इंतजार रहेगा। तब-तक अलोंचना करते रहिए, लेकिन आलोचना वैचारिक हो। यही लोकतंत्र की मजबूती का एक मंत्र भी है।

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