Thursday, June 26, 2014

क्या यही हैं अच्छे दिन?

नरेन्द्र मोदी जी के नाम कमलेश कुमार का पत्र

आदरणीय नरेन्द्र भाई दामोदर भाई मोदी जी,
आपसे लोगों को खासकर हम उत्तरप्रदेशियों को ऐसे अच्छे दिनो की उम्मीद तो नही थी आपसे. क्या बजट लाए हैं आप? बिल्कुल मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम वाला कॉपी-पेस्ट कर दिया है. गरीब किसानों और गावों के विकास के लिए 100 करोड़, शिक्षा के लिए 100 करोड़ और सरदार पटेल की मूर्ति के लिए 200 करोड़. मैं तो कहता हूँ क़ि पहले आप सरदार पटेल की विचारधारा को पढिए. समझिए और उनके विचार जानिए जो वो आपके आका (मालिक) संघ के बारे में रखते थे. अगर वो सुनेंगे कि आपने अमित शाह को अपना महारथी बना रखा है तो वो फिर से मर जाएंगे लोगों के दिलों से भी.
खैर, बजट पर ही दो बातें करते हैं. आपने सोसल सेक्टर पर जितना खर्च करने को बोला था वो तो आपके वादे से 50 प्रतिशत कम है. आपने 100 नए स्मार्ट सिटी बनाने की बात तो कर दी लेकिन यह नहीं बता रहे हैं कि यह पैसा और जगह कहाँ से आएगी. आप इसके लिए कितने और गावों को उजाड़ देंगे. या फिर शहरों के लिए जंगल काट देंगे. फिर तो यह आदिवासी समाज के लिए बहुत दर्ददायक होगा. आप फिर नक्सलियों को गलत नहीं कह पाएंगे. आप 2-4-10 आधुनिक गाँव क्यों नहीं बना देते हैं. जो पुरेइ तरह से आत्‍मनिर्भर और स्वावलम्बी हों. आप गावों की तरफ क्यों ध्यान नहीं दे रहे हैं. आपने इंदिरा आवास और ना जाने कितनी यूपीए की योजनाएँ फोटोकॉपी करके रख दी हैं. मैं नहीं कह रहा हूँ कि इसमें सबकुछ गलत था. इस बजट में बहुत सी अच्छी चीजें थी. टैक्स में कमी और शहरी मिडल क्लास के लिए लोन सब्सिडी जैसी सुविधाएँ. लेकिन मैं मिडल क्लास नहीं गरीबों की बात कर रहा हूँ. लेकिन आपकी सरकार ने तो गरीबी नहीं गरीबों को हटाने की ठान ली है. आप मंहगाई पर कुछ नहीं बोल रहे हैं. आप कह सकते हैं कि मैं बहुत जल्दबाजी कर रहा हूँ. आपको 100 दिन भी नहीं दिए. लेकिन मैं आपके कार्यों पर बात नहीं कर रहा हूँ. मैं तो आपके वादे और बजट (जो आपका प्लान है) पर याद दिला रहा हूँ. मेरी इतनी औकात नहीं कि मैं आपको पत्र लिख सकूं, और आप भी इतने फ्री नहीं कि उसे पढ़ें लेकिन आपके भक्तों की गालियों को सुनने के लिए कुछ तो बनता ही है. हाँ याद आया जिनके लिए आप 100 करोड़ लगाकर आप नई लीडरसिप का वादा कर रहे हैं. आपसे एक और शिकायत है मुझे, हम यूपी बिहार वालों का दिल आपने जिस हिन्दी से जीता था वो हिन्दी कल जब अरुण जेटली जी अंग्रेज़ी में भाषन पढ रहे थे, तब बहुत बुरा या कहें बेज्जती महसूस कर रही थी. चलिए आप जल्द बाजी मत करिए पहले आप तो अपने प्रयास करते ही रहेंगे, जैसी कि हमें और सारे मीडिया वालों को उम्मीद है.
धन्यवाद!

आपका शुभेच्छुक....

कमलेश कुमार राठोड़ (यूपी के एक गाँव( जो आपकी पार्टी के संसद का है.) का युवा राजनीति का छात्र)

Wednesday, June 18, 2014

राज्यपालों पर गहराता विवाद

कल सुबह से बहुत सी खबरें रही थी, क़ि देश के कई राज्यों के राज्यपालों ने इस्तीफा दे दिया है। कई टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज के साथ एक्सपर्ट बहस भी होने लगी। कानून का छात्र होने के नाते मेरा भी मन इस बहस में कूदने का हुआ। हमें राज्यपाल पर बहस करने से पहले उसके संवैधानिक पद और स्थिति को समझना बहुत जरूरी है। राज्यपाल को कुछ लोग निराधार बता रहे हैं। अगर राज्यपाल को वर्तमान स्थिति से हटा दिया जाए तो राज्य शब्द ही अधूरा रह जाएगा। क्योंकि राज्य की कार्यपालिका की शक्तियाँ राज्यपाल में ही निहित होती हैं। केन्द्र में  राष्टपति के पद के बराबर राज्यपाल होता है। मुख्यमंत्री की नियुक्ति, मंत्रिमण्डल को अपदस्थ करना और राष्ट्रपति को आपातकाल में स्थिति में परामर्श देना राज्यपाल का कार्य होता है। इनसे भी प्रमुख कार्य है राज्य में केन्द्र की तरफ से सम्बन्ध रखने वाला प्रतिनिधित्व।
अनुच्छेद 156 के तहत इसे राष्ट्रपति नामांकित करता है। वस्तुतः वह अब राष्ट्रपति नहीं केन्द्र सरकार (वो भी प्रधानमंत्री का रिमोट जिसके पास हो।) की मर्जी से चलता है। आज इसी कारण से राज्यपाल को अभिकर्ता (एजेंट) कहा जाने लगा है।इसकी नियुक्ति सम्बंधी अनुच्छेद 156 की पहली लाइन ही यह कहती है कि It is the pleaser  of precident अर्थात राष्ट्रपति के प्रसाद स्वरूप। और राष्ट्रपति तो केंद्रसरकार का ही एक हिस्सा माना जा सकता है। क्योंकि उसकी भी अपनी सीमित शक्तियाँ होती हैं। इस विषय में हरगोविन्द बनाम रघुकुल 1979 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया जिसमें कहा गया कि राज्यपाल का पद केन्द्रीय सरकार के अधीन नियुक्त पद नहीं है। यह स्वतंत्र संवैधानिक पद है। यह केन्द्रीय सरकार के अधीन या नियंत्रण में नहीं कहा जा सकता है।
लेकिन फिर भी राज्यपाल अपनी स्वामिभक्ति करते अक्सर देखे जाते हैं। वे केन्द्र सरकार का भला करना ही अपना परम कर्तव्य मानते हैं। जहाँ राज्य और केन्द्र में भिन्न-भिन्न दलों की सरकारें होती हैं, वहाँ तो सरकार गिराने जैसी बातें इतिहास में भरी पड़ी हैं। रोमेश भंडारी बनाम कल्याण सिंह सरकार उत्तर प्रदेश का मामला इसमें सभी को याद होगा। 21/02/1998 को राज्यपाल भंडारी को पता चला कि कल्याण सिंह की सरकार के कई विधायक बागी हो चुके हैं, सो उन्होंने रात में कांग्रेस नेता जगदम्बिका पाल को बुला कर कल्याण सिंह सरकार को गिरा कर पाल की सरकार बनवा दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया जिसमें कहा गया कि किसी भी सरकार को तब तक नहीं गिराया जा सकता जब तक  कि वह दल अपना बहुमत विधानसभा में हासिल करने में असफल ना हो जाए। इसके बाद कल्याण सिंह की सरकार को फिर से बहाल किया गया।
इसी तरह से हरियाणा की लोकदल सरकार के मुख्यमंत्री देवीलाल की इच्छा के विरुद्ध व़हाँ राज्यपाल हरीलाल बरारी का उपयुक्त उदाहरण है। आप गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल को ही ले लीजिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदी को नाकों चने चबवा दिए थे। तमिलनाडु के   के मुख्यमंत्री एम। जी। रामचंद्रन की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री पद पर एम। आर। जानकी की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद में राज्यपाल सुंदरलाल खुराना को त्यागपत्र देना पड़ा था।
में कोई राज्यपाल के पद के खिलाफ नहीं बोल रहा हूँ। इसमें बहुत सुधारों की जरूरत है। जिसे सरकारिया कमीशन भी अपनी रिपोर्ट में बता चुका है। सरकारिया कमीशन का कहना था कि इस संवैधानिक पद पर कोई प्रतिष्ठावान व्यक्ति ही बिठाया जाना चाहिए। उसने कम से कम कानून की डिग्री तो ली ही हो। इसके लिए हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के रिटायर्ड जज भी बहुत उपयुक्त हो सकते हैं। वह व्यक्ति राज्य के बाहर का होना चाहिए। उसे राजनीति की समझ हो लेकिन राजनैतिक महत्वाकांक्षी ना हो। अगर वो पहले राजनेता रह चुका हो तो बाद में वह किसी भी प्रकार की राजनीति में नहीं जाना चाहिए।
लेकिन हमारे राज्यपालों का इतिहास उठकर देखा जाए तो एन डी तिवारी, मोती लाल वोहरा और राजस्थान के पूर्व गवर्नर बसंत दादा पाटील जैसे लोगों ने हमेशा ही इस पद की गरिमा को तार-तार किया है। हाल ही शीला दीक्षित को केरल के राज्यपाल के पद पर रात 4 बजे बिठा दिया गया था।
ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि राज्यपाल राज्य सरकार पर अपना रौब ही झाडता है। वह कोई भी कार्य मंत्री परिषद की सहमति के बिना नहीं कर सकता है। और मंत्रिपरिषद राज्य सरकार या विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है तो इसमें राज्यपाल कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। इसी के उलट जरूरत पड़ने पर राज्यपाल की शक्ति को लेकर एक और जजमेंट सुप्रीम कोर्ट ने एम पी। पुलिस एस्टबलिशमेंट बनाम एम पी राज्य के मामले में 2005 में दिया था। जिसमें कहा गया था कि अगर कोई मंत्री भ्रष्टाचार या किसी आपराधिक षड्यंत्र में लिप्त पाया जाता है तो राज्यपाल स्ववीकानुसार उसपर अभियोग चलाने के आदेश दे सकता है।
उपर्युक्त बातों से सिध्द होता है कि राज्यपाल का पद कोई फालतू या बेकार नहीं होता है बस जरूरत है इसमें कुछ बदलाव करने की। हमारी राजनैतिक जॅमाट फिलहाल तो ऐसा कोई भी बदलाव करने के मूड़ में नहीं दिख रही है। सुना तो यहाँ तक है कि आत राज्यपालों को हटाकर भाजपा के बुजुर्ग नेताओं को इस जगह पर कट-पेस्ट किया जाएगा। अगर ऐसा होगा तो हमें और भी टकरावों को देखने  के लिए तैयार रहना होगा। अगर कोई राज्यपाल इस्तीफा ना देने पर अड जाए तो क्या होगा? मुझे नहीं पता? लेकिन जो होगा मजेदार होगा। इस मुद्दे पर राज्यपालों को हटाने के तरीकों पर मैने कई संविधान विषेशग्यों से बात की तो पता चला कि तरीका तो सही है, लेकिन मंशा नहीं। राज्यपाल को हटाने के लिए कोई कारण बताना जरूरी नहीं है, लेकिन कोई कारण होना भी जरूरी है। मतलब अगर राज्यपाल केन्द्र के फैसले को चुनौती दे तो कोई कारण बताया जा  सके। लेकिन फिलहाल तो कोई पर्याप्त कारण नहीं मिल रहे हैं। ऐसे तो वही बातें भविष्य में भी देखने को मिल सकती हैं।
कल सुबह से बहुत सी खबरें आ रही थी, क़ि देश के कई राज्यों के राज्यपालों ने इस्तीफा दे दिया है. कई टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज के साथ एक्सपर्ट बहस भी होने लगी. कानून का छात्र होने के नाते मेरा भी मन इस बहस में कूदने का हुआ. हमें राज्यपाल पर बहस करने से पहले उसके संवैधानिक पद और स्थिति को समझना बहुत जरूरी है. राज्यपाल को कुछ लोग निराधार बता रहे हैं. अगर राज्यपाल को वर्तमान स्थिति से हटा दिया जाए तो राज्य शब्द ही अधूरा रह जाएगा. क्योंकि राज्य की कार्यपालिका की शक्तियाँ राज्यपाल में ही निहित होती हैं. केन्द्र में  राष्टपति के पद के बराबर राज्यपाल होता है. मुख्यमंत्री की नियुक्ति, मंत्रिमण्डल को अपदस्थ करना और राष्ट्रपति को आपातकाल में स्थिति में परामर्श देना राज्यपाल का कार्य होता है. इनसे भी प्रमुख कार्य है राज्य में केन्द्र की तरफ से सम्बन्ध रखने वाला प्रतिनिधित्व.
अनुच्छेद 156 के तहत इसे राष्ट्रपति नामांकित करता है. वस्तुतः वह अब राष्ट्रपति नहीं केन्द्र सरकार (वो भी प्रधानमंत्री का रिमोट जिसके पास हो.) की मर्जी से चलता है. आज इसी कारण से राज्यपाल को अभिकर्ता (एजेंट) कहा जाने लगा है.इसकी नियुक्ति सम्बंधी अनुच्छेद 156 की पहली लाइन ही यह कहती है कि It is the pleaser  of precident. अर्थात राष्ट्रपति के प्रसाद स्वरूप. और राष्ट्रपति तो केंद्रसरकार का ही एक हिस्सा माना जा सकता है. क्योंकि उसकी भी अपनी सीमित शक्तियाँ होती हैं. इस विषय में हरगोविन्द बनाम रघुकुल 1979 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया जिसमें कहा गया कि राज्यपाल का पद केन्द्रीय सरकार के अधीन नियुक्त पद नहीं है. यह स्वतंत्र संवैधानिक पद है. यह केन्द्रीय सरकार के अधीन या नियंत्रण में नहीं कहा जा सकता है.
लेकिन फिर भी राज्यपाल अपनी स्वामिभक्ति करते अक्सर देखे जाते हैं. वे केन्द्र सरकार का भला करना ही अपना परम कर्तव्य मानते हैं. जहाँ राज्य और केन्द्र में भिन्न-भिन्न दलों की सरकारें होती हैं, वहाँ तो सरकार गिराने जैसी बातें इतिहास में भरी पड़ी हैं. रोमेश भंडारी बनाम कल्याण सिंह सरकार उत्तर प्रदेश का मामला इसमें सभी को याद होगा. 21/02/1998 को राज्यपाल भंडारी को पता चला कि कल्याण सिंह की सरकार के कई विधायक बागी हो चुके हैं, सो उन्होंने रात में कांग्रेस नेता जगदम्बिका पाल को बुला कर कल्याण सिंह सरकार को गिरा कर पाल की सरकार बनवा दी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया जिसमें कहा गया कि किसी भी सरकार को तब तक नहीं गिराया जा सकता जब तक  कि वह दल अपना बहुमत विधानसभा में हासिल करने में असफल ना हो जाए. इसके बाद कल्याण सिंह की सरकार को फिर से बहाल किया गया.
इसी तरह से हरियाणा की लोकदल सरकार के मुख्यमंत्री देवीलाल की इच्छा के विरुद्ध व़हाँ राज्यपाल हरीलाल बरारी का उपयुक्त उदाहरण है. आप गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल को ही ले लीजिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदी को नाकों चने चबवा दिए थे. तमिलनाडु के   के मुख्यमंत्री एम. जी. रामचंद्रन की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री पद पर एम. आर. जानकी की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद में राज्यपाल सुंदरलाल खुराना को त्यागपत्र देना पड़ा था.
में कोई राज्यपाल के पद के खिलाफ नहीं बोल रहा हूँ. इसमें बहुत सुधारों की जरूरत है. जिसे सरकारिया कमीशन भी अपनी रिपोर्ट में बता चुका है. सरकारिया कमीशन का कहना था कि इस संवैधानिक पद पर कोई प्रतिष्ठावान व्यक्ति ही बिठाया जाना चाहिए. उसने कम से कम कानून की डिग्री तो ली ही हो. इसके लिए हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के रिटायर्ड जज भी बहुत उपयुक्त हो सकते हैं. वह व्यक्ति राज्य के बाहर का होना चाहिए. उसे राजनीति की समझ हो लेकिन राजनैतिक महत्वाकांक्षी ना हो. अगर वो पहले राजनेता रह चुका हो तो बाद में वह किसी भी प्रकार की राजनीति में नहीं जाना चाहिए.
लेकिन हमारे राज्यपालों का इतिहास उठकर देखा जाए तो एन डी तिवारी, मोती लाल वोहरा और राजस्थान के पूर्व गवर्नर बसंत दादा पाटील जैसे लोगों ने हमेशा ही इस पद की गरिमा को तार-तार किया है. हाल ही शीला दीक्षित को केरल के राज्यपाल के पद पर रात 4 बजे बिठा दिया गया था.
ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि राज्यपाल राज्य सरकार पर अपना रौब ही झाडता है. वह कोई भी कार्य मंत्री परिषद की सहमति के बिना नहीं कर सकता है. और मंत्रिपरिषद राज्य सरकार या विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है तो इसमें राज्यपाल कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं कर सकता है. इसी के उलट जरूरत पड़ने पर राज्यपाल की शक्ति को लेकर एक और जजमेंट सुप्रीम कोर्ट ने एम पी. पुलिस एस्‍टबलिशमेंट बनाम एम पी राज्य के मामले में 2005 में दिया था. जिसमें कहा गया था कि अगर कोई मंत्री भ्रष्टाचार या किसी आपराधिक षड्यंत्र में लिप्त पाया जाता है तो राज्यपाल स्ववीकानुसार उसपर अभियोग चलाने के आदेश दे सकता है.
उपर्युक्त बातों से सिध्द होता है कि राज्यपाल का पद कोई फालतू या बेकार नहीं होता है बस जरूरत है इसमें कुछ बदलाव करने की. हमारी राजनैतिक जॅमाट फिलहाल तो ऐसा कोई भी बदलाव करने के मूड़ में नहीं दिख रही है. सुना तो यहाँ तक है कि आत राज्यपालों को हटाकर भाजपा के बुजुर्ग नेताओं को इस जगह पर कट-पेस्ट किया जाएगा. अगर ऐसा होगा तो हमें और भी टकरावों को देखने  के लिए तैयार रहना होगा. अगर कोई राज्यपाल इस्तीफा ना देने पर अड जाए तो क्या होगा? मुझे नहीं पता? लेकिन जो होगा मजेदार होगा. इस मुद्दे पर राज्यपालों को हटाने के तरीकों पर मैने कई संविधान विषेशग्यों से बात की तो पता चला कि तरीका तो सही है, लेकिन मंशा नहीं. राज्यपाल को हटाने के लिए कोई कारण बताना जरूरी नहीं है, लेकिन कोई कारण होना भी जरूरी है. मतलब अगर राज्यपाल केन्द्र के फैसले को चुनौती दे तो कोई कारण बताया जा  सके. लेकिन फिलहाल तो कोई पर्याप्त कारण नहीं मिल रहे हैं. ऐसे तो वही बातें भविष्य में भी देखने को मिल सकती हैं.

Sunday, June 8, 2014

खराब रिपोर्टिंग का एक नमूना.

आज जब देश में महिलाओं के प्रति बढ रहे अपराध के लिए जिम्मेदार पुरुषवादी मानसिकता को लेकर एक नई बहस छिडी हुई है। इसके लिए मीडिया का भी एक हिस्सा बहुत तारीफ के काबिल है। इसके लिए पिछले साल 16 दिसंबर के बाद से तो बिल्कुल क्रांति आ गई। आशाराम बापू, तरुण तेजपाल और जस्टिस गांगुली के अलावा बहुत से प्रभावशाली लोगों ने एक हिम्मत दिखाकर पुलिस में रिपोर्ट कराई। इसके बाद की कार्यवाही के लिए मीडिया ने काफी अच्छा काम किया। लेकिन कुछ न्यूज चैनल पूरी तरह से मानसिक संतुलन खो चुके हैं। वो  टी.आर.पी. के लिए कुछ भी करने का मौका नहीं छोड़ते हैं। मैं आजतक चैनल (जो अपने को देश का नंबर वन चैनल कहता है) की एक रिपोर्ट दिखाता हूँ। वो कई बार गन्दे पोस्ट करता रहता है। उपर्युक्त पोस्ट में बताया गया है कि कैसे ********************* मुझे तो लिखने में शर्म आ रही है। अब आप इसे क्या कहेंगे?
http://aajtak.intoday.in/story/20-hot-and-naughty-sex-ideas-1-767036.html

इस न्यूज चैनल में दो-तीन महिला पत्रकार हैं, जो स्त्री अधिकारों के लिए बहुत बोलती रहती हैं। लेकिन क्या उनको इस पत्रकारिता में शर्म भी नहीं आती है। जब देखो ता पूनम पाण्डेय जैसे लोगों की तस्वीरें पोस्ट कर दिए जाते हैं। ब्रेकिंग न्यूज में लिखकर आता है ये देखिए फलानी हीरोइन की सेक्सी अनदेखी तस्वीरें। और इन्हीं सबके कारण पूनम पाण्डेय या श्रेयलिन चोपडा जैसे लोगों को बार-बार नंगी फोटो डालने की हिम्मत मिलती है।

http://aajtak.intoday.in/gallery/poonam-pandey-the-twitter-queen-1-3954.html

http://aajtak.intoday.in/gallery/poonam-pandey-hot-good-morning-pics-1-4021.html

http://aajtak.intoday.in/gallery/poonam-pandey-1-1477.html
क्या ऐसे चैनल इस सब के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। यह बात केवल आज तक की ही नहीं है, लगभग सभी चैनल जो अपने को नंबर वन बताते हैं (अपवाद स्वरूप एन.डी.टी.वी. राज्यसभा टी. वी. आदि को छोड़कर) एसी ही पत्रकारिता करते रहे हैं। कोई भी मुद्दा पकड में आया नहीं कि बस चालू हो जाते हैं। किसी भी घटिया मॉडल ने न्यूड होने या कोई सनसनी खेज बात कही बस ये लोग ब्रेकिंग न्यूज चला देते हैं। एक तरफ तो ये चैनल ही सबसे पहले अंधविश्वास के खिलाफ लड़ने वाले दाभोलकर की हत्या पर विरोध करते हैं, दूसरी तरफ रोज सुबह एक दो घंटे किसी पण्डित को बिठाकर भविष्य और राशि बताते रहते हैं। क्या ये उनके विचारों की हत्या नहीं है? हो सकता है कि जनता भी यही सब देखना भी चाहती हो लेकिन गुमराह किए जाने पर हमारा युवा हर गलत काम करना चाहेगा। आप उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार में किसी भी बात को लेकर तो "गुन्डाराज" टाइटल के फिल्मनुमा कई कार्यक्रम कर देते हैं। इसका कारण मुलायम सिंह का वो बयान बताते हैं, जिसमें उन्होंने बलात्कारी को फांसी न देने की बात की। लेकिन इसके उलट मध्य प्रदेश के ग्रहमंत्री बाबूलाल गौर का बयान कि बलात्कारी हमें बताकर नहीं जाता है, या छत्तीसगढ़ के ग्रहमंत्री का बयान कि बलात्कार धोखे से हो जाते हैं, पर कुछ भी नहीं कहते हैं। केवल मोदी के लिए सुरक्षा व्यवस्था के लिए 2-3 घंटे के एपिसोड दिखा जाते हैं।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...