Friday, February 24, 2017
बीएमसी चुनावों के क्या संकेत?
Tuesday, February 21, 2017
यूपी का भविष्य मुसलमानों के मूड पर निर्भर
यूपी में ज़मीनी सियासी हक़ीकत
Monday, February 20, 2017
बीएमसी चुनाव पर नज़र
बीएसपी और मायावती का क्या होगा?
Tuesday, February 14, 2017
ढाई आखर प्रेम के पढै सो पंडित होय
#Love #Valentine #14Feb
ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय !
अक्सर देखा जाता है कि कोई अगर “प्यार” इस विषय पर चर्चा करता है तो वह यहीं से शुरू करता है की “प्यार केवल प्रेमी –प्रेमिकाओंका ही नहीं होता, माँ और बेटे का, भगवान और भक्त का भी होता है...” आदि आदि !! लेकिन मुझे यह भाषणबाज़ी नहीं करनी है. या फिर इसकी असलियत पर बात करनी है.
प्रेम को शब्दों में उतारना संभव तो नहीं है, लेकिन कोशिश तो कर ही सकता हूँ. मेरे हिसाब से खुदा जब इश्क की इबारत लिखने बैठा तो थोड़ी देर बाद ही अधूरा छोड़कर उठ गया होगा। इसके अहसास को शिद्दत से महसूस करने के लिए ही इसका अधूरापन बहुत जरूरी है। खुदा ने यह जान-बूझकर अधूरा छोड़ा होगा, क्योंकि इसे पूरा कर देता तो इंसान को किसी चीज की जरूरत नहीं होती। आपने कभी सोचा है कि क्यों किसी को खो देने की कशिश किसी को पा लेने से खुशी से ज्यादा असर रखती है? हर किसी की जिंदगी में किसी को पा लेने की आकांक्षा होती है, जो मंजिल तक नहीं पहुंच पाने के दर्द की शक्ल में हमेशा जिंदा रहती है। चाहे कुछ भी हो, प्रेम आपके अंतर्मन को नई परिभाषा देता है। राधा और कृष्ण के नाम एक ही पन्नो पर लिखे हैं। फर्क बस इतना है कि दोनों एक-दूसरे के पीछे लिखे हैं। साथ भी हैं, जुदा भी नहीं और जुदा भी। ठीक ऐसी ही है इश्क की कायनात जिसमें आप जिसे खो देते हैं, वह आपके जहनो-दिल में ऐसा बस जाता है कि आप उसके साथ भी हैं और जुदा भी। इस अधूरी मोहब्बत ने ही हमें गालिब, फराज, साहिर, फिराक जैसे अजीम शायर दिए हैं। उनके लफ्जों में इश्क के मायने और निखरकर आते हैं। हमेशा किसी की हां से या किसी के पहलू में जिंदगी गुजारने से ही इश्क पूरा नहीं होता। इश्क होने से पहले क्या इस बात की शर्त रखी जाती है कि आप जिसे चाहें वह ताउम्र आपके पास रहे? क्या साथ रहना भी पास रहने जितना अहम नहीं है?शायद है, क्योंकि आपको उस शख्स से अहसासों का जुड़ाव है जो उम्र या फासलों से कभी नहीं मिट पाता।जीवन के हर मोड़ पर जब आप थोड़ी देर रुककर अपने माजी को याद करेंगे तो वह चेहरा आपका पीछा करता नजर आएगा। ऐसा होना आपकी आने वाली जिंदगी पर असर डाले, ऐसाभी नहीं है। वह जो पीछे छूट गया है, उसे आप वापस तो नहीं ला सकते लेकिन उसकी यादें सहेजकर आने वाली जिंदगी में वही रंग भर सकते हैं। यह बात सच है कि अतीत अच्छा हो या बुरा, आगे चलकर दुःख ही देता है। अहमद फराज का एक शेर है :
"उस शख्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया।"
जिंदगी इस इश्क के फलसफे से पूरी हो जाती है लेकिन इश्क कभी खुद पूरा नहीं हो पाता। दिलों को दिलों से जोड़ने वाला यह अनूठा एहसास दिलों में नमी भी भर देता है। हर अफसाना बहुत मीठे दर्द से शुरू होता है लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसे एहसास पर ही खत्म हो। कई कहानियां अनचाही चुभते हुए अंत पर पर खत्म होती हैं। ऐसे में लगता है कि दुनिया में कुछ भी नहीं बचा। सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन यहीं से आपकी मोहब्बत आपकी प्रेरणा बन जाती है। आपके सोचने की शक्ति आश्चर्यजनक रूप से बदलने लगती है। यह ऐसा वक्त होता है जब आपके भीतर सब कुछ टूटने लगता है लेकिन आपके अंदर सृजन नई अंगड़ाई लेता है। लेकिन सबसे मुश्किल लम्हा वह होता है जब वक्त की सीढ़ियों पर वह कभी आपको बैठे मिल जाए। तब क्या कीजिएगा, मुंह फेरकर चले जाइएगा या मुलाकात कीजिएगा? उनकी दहलीज पर न जाने की कसम तो आपने खाई ही होगी लेकिन अगर राह में ही टक्कर हो जाए तो क्या कीजिए? भले ही दोनों के बीच वक्त और हालात बहुत फासला बना देते हैं लेकिन एक-दूसरे को आप दोनों ने कभी भुलाया ही नहीं। एक शायर का शेर है,
"न जाने कितनी बातें थी, न जाने कितने शिकवे थे,
हुआ जब सामना उनसे तो न वो बोले ना हम बोले."
यादों में जिंदा शक्लें ख्वाबों के दरीचों में जब-तब उभर आती हैं। आंखों से समंदर फूट पड़ता है। कदम पीछे जाने को बेताब होते हैं लेकिन उसका कोई रास्ता ही नहीं होता। उसे भूलने के बहाने बार-बारयाद करते हैं।
'मुद्दतें गुजरी, तेरी याद भी आई ना हमें,
और हम भूल गए हों तुझे, ऐसा भी नहीं...।'
इश्क वह मुकद्दस जज्बा है जिसमें डूबकर ही उसे समझा जा सकता है। किनारे बैठकर इसकी गहराई का अंदाजा नहीं लगा सकते। हर किसी की जिंदगी में ऐसा मौका आता है जब आपकी मोहब्बत उजड़ जाती है लेकिन यह अंत नहीं होता। यहां से आपकी नई यात्रा शुरू होती है। आपके अंतर की यात्रा, जिसमें आपको खुद को खोजना और पाना होता है। बिछड़े हुए साथी की याद को दिल में दफन करने की कोशिश सभी करते हैं लेकिन ऐसा कभी मुमकिन नहीं होता। और इसे गम की तरह लेने की जरूरत ही नहीं। ऐसी स्थिति में यह सोचें कि आप कितने खुश किस्मत हैं कि खुदा ने इश्क की नेमत आप पर बरसाई है।
प्यार की बात होते ही आजकल सोसल मीडिया पर बेवफ़ाई की बात करना शुरू कर दी जाती है. इसपर ही लिखने वाले शायर ज़्यादा फेमस हुए हैं. फ़राज़ का बड़ा ही मशहूर शेर है,
"बेवफा ने हमारे जख्म का कुछ यूँ किया इलाज,
मरहम भी लगाया तो खंजर की नोक से..."
मेरे हिसाब से किसी को बेवफा कहकर नफ़रत करना ठीक नहीं होता है. सबकी अपनी अपनी मजबूरियाँ होती हैं.
"कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी ग़ालिब,
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता...."
कुमार विश्वास की "एक पगली लड़की" कविता की एक लाइन है,
"वो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
हूँ बहुत मजबूर, मगर अम्मा बाबा से डरती हूँ..."
मेरा उन मित्रों से भी कहना है जो कल किसी को प्रपोस करने वाले हैं. अगर आपका प्यार आपको स्वीकार करता है, तो खुश हो जाना लेकिन अगर अस्वीकार हो जाता है, तो उसको हंसकर टाल देना. मैने अभी ही चार पाँच दिन पहले एक शेर लिखा था.
"कोई ठुकरा दे तो हंसकर जी लेना,
क्योंकि मोहब्बत की दुनियाँ में जबरजस्ती नहीं होती."
इतने खूबसूरत एहसास से आपको तरबतर किया है। जब भी माजी की यादों में खोएंगे तो हमेशा कुछ न कुछ जरूर पाएंगे। यह बेवजह जाया नहीं हुआ है।भगवान ने दिल के रूप में सबसे अहम हिस्सा हमको दिया है। इसका काम है सिर्फ प्यार करना। यह प्रेम जानता है, प्रेम करता है और प्रेम चाहता है। इसे मौका दें कि आपके अंदर के प्यार को बाहर बिखेरें। अतृप्ति तो प्रेम का स्थार्यी भाव है, जो हमेशा रहेगा। लेकिन इसे तृप्त करने की कोशिश ही जिंदगी को जिंदा रखती है वर्ना दुनिया वीरान होती।
अंत में मेंहदी हसन की कुछ पंक्तियों के साथ ख़त्म करना चाहूँगा,
"बन गए दोस्त भी मेरे दुश्मन,
इक तुम्हारे करीब आने से,
जबकि अपना तुम्हें बना ही लिया,
तो कौन डरता है अब जमाने से,
तुम भी दुनिया से दुश्मनी ले लो,
दोनो मिल जाएँ इस बहाने से,
चाहे सारा जहाँ मिट जाए,
इश्क मिटता नहीं मिटाने से.
Sunday, February 12, 2017
यूपी चुनाव से कौन क्या खोएगा क्या पाएगा?
तमिलनाडु में राजनीतिक उठापटक
235 सीटों वाली तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए. फिलहाल एआईएडीएमके के पास 135 और डीएमके के पास 89 सीटें हैं. पनीरसेल्वम खेमे का दावा है कि उनके पास 50 से ज्यादा विधायकों का समर्थन है, जबकि शशिकला ने करीब 94 विधायकों को एक रिजॉर्ट में बंद करके रखा है
Friday, February 3, 2017
बजट में किसानों से वादे और रोज़गार की असलियत
ये बजट था या लॉलीपॉप?
बजट में चुनावी फंडिंग की पारदर्शिता पर सवाल
अभी तक प्रति व्यक्ति कैश चंदे की सीमा 20 हज़ार है. वित्तमंत्री ने इसे घटाकर 2000 रुपये प्रति व्यक्ति कर दिया है. वित्त मंत्रालय ने यह कदम चुनाव आयोग के सुझाव को मानते हुये उठाया लेकिन क्या इससे चुनावी फंडिंग में काला धन रुकेगा. इतने बड़े-बड़े संगठनात्मक ढांचे वाली पार्टियों के कार्यकर्ता क्या दस लोग इक्ट्ठा नहीं कर सकते जो 2000x10=20000 बना दें. यानी चंदे की सीमा 2000 रुपये प्रति व्यक्ति करना काले धन को नहीं रोकेगा बल्कि पार्टियों को थोड़ी से मेहनत और करनी पड़ेगी.
• 7 राष्ट्रीय पार्टियों और 50 क्षेत्रीय पार्टियों की कुल फंडिंग का 70 प्रतिशत गुमनाम स्रोतों से आता है.
• ये आंकड़े 2004 से 2015 के बीच के हैं.
• कांग्रेस पार्टी इस मामले में सबसे आगे है. इसकी 83 प्रतिशत चंदा राशि का स्रोत पता नहीं है.
• बीजेपी का 65 प्रतिशत चंदा कहां से आया किसी को पता नहीं.
• वामपंथी पार्टी सीपीएम का भी 53 प्रतिशत चंदा अनजान लोगों ने दिया.
• समाजवादी पार्टी का 94 प्रतिशत और
• बीएसपी का तो सारा चंदा ( 100 प्रतिशत) पता नहीं कहां से आया क्योंकि एक रुपये का भी स्रोत नहीं बताया गया.
एडीआऱ के जगदीप छोकर कहते हैं 'बजट घोषणा के बाद लोग मुझे बधाई वाले संदेश भेजने लगे कि आप लोगों की मेहनत रंग ले आई है लेकिन मैं कहता हूं कि पहले 19,999 की नकद रसीद कटती थी और अब 1999 की कटेगी. काला धन कैसे रुकेगा जब तक जमा पैसे का स्रोत न बताया जाये. जन प्रतिनिधि कानून की धारा 29(c) के तहत पार्टियों को 20 हज़ार रुपये से अधिक के चंदे की घोषणा करनी होती है लेकिन ये किसने कहा है कि उससे कम चंदे की जानकारी न दी जाये. क्या कोई कानून पार्टियों को ऐसा करने से रोकता है?'
जगदीप छोकर का यही सवाल हमें आगे ले जाता है जिसमें वित्तमंत्री ने बजट भाषण में कहा कि राजनीतिक पार्टियां चैक या डिजिटल तरीके से चंदा लेने की अधिकारी होंगी. सवाल ये है कि क्या पहले इस तरह चंदा लेने पर कोई रोक थी? वामपंथी पार्टी सीपीएम ( जो उसूलों के तहत उद्योगपतियों से चंदा नहीं लेती लेकिन जिसके 53 प्रतिशत चंदे का स्रोत पता नहीं है) कहती है कि चुनाव आयोग की निगरानी में एक चुनाव फंड बनाया जाये जहां लोग चंदा दे सकें और फिर वहीं से सारे पैसे को चुनाव के दौरान पार्टियों को दिया जाये. कांग्रेस की भी तकरीबन यही राय है लेकिन सवाल ये है कि कैश फंडिंग को पूरी तरह क्यों न रोका जाये और हर पैसे का हिसाब चुनाव आयोग के सामने दिया जाना क्यों न ज़रूरी हो. एक ऐसे वक्त में जब सरकार डिजिटल लेन देन की बात करती है तो और गरीब से गरीब व्यक्ति को भी मोबाइल एप इस्तेमाल करने के लिये उत्साहित कर रही है तब 2000 रुपये की सीमा को शून्य क्यों न किया जाये. क्यों सरकार 2000 रुपये का दरवाज़ा कैश के ज़रिये खुला रख रही है. क्या इसमें सभी पार्टियों की मिली भगत नहीं है.
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
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इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...