स्तव में बजट को विशषज्ञों का विषय मान लिया गया है, जबकि यह सबसे आम और भाषाई रूप से निरक्षर व्यक्ति को समझ में आने वाला विषय बनाया जाना चाहिए. खैर; वर्ष 2017-18 के बजट में यह दावा किया गया है कि यह बजट गांव, गरीबों, युवाओं और नई तकनीक को समर्पित बजट है. वास्तव में यह बजट बाजार में गांव और संसाधनों को घोल देने की कोशिश वाला बजट है.
कोई भी बजट वैश्विक सन्दर्भों को नजरंदाज करके समझा नहीं जा सकता है. कहने को ही सही, पर हम गांव की तरफ लौटने के लिए क्यों मजबूर हो रहे हैं? पहले वर्ष 2007-08 की वैश्विक मंदी, फिर मंहगाई, बढ़ती बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदाओं और धोखाधड़ी से पटे पड़े बाजार के स्वभाव के कारण अब सरकारों को समझ आ रहा है कि गांव और खेती को खत्म करके कोई विकास नहीं हो सकता है. अब वे बीच का रास्ता ले रहे हैं. तुरंत ही गांव, युवाओं और खेती को संरक्षण दिए जाने के दावे पर विश्वास नहीं किया जा सकता है क्योंकि भारत सरकार देश की अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था के बीच के संबंधों को समझने में एक बार फिर से नाकाम साबित हुई है. वे भारत की समस्यायों का इलाज बाहरी संसाधनों, बाहरी तकनीक और बाहरी विचार में खोजने की कोशिश कर रहे हैं. हर साल ग्रामीण क्षेत्रों पर तीन लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं. बजट 2017-18 के वक्तव्य के तहत कहा गया है कि महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती यानी वर्ष 2019 तक एक करोड़ परिवारों को गरीबी से बाहर ले आया जाएगा और 50 हजार पंचायतें गरीबी से मुक्त होंगीं. इसके पीछे माना जा रहा है कि अब नकद हस्तांतरण की नीति अपनाई जाएगी. गरीबों को नकद लाभ दिया जाएगा, ताकि आर्थिक आधारों पर उन्हें गरीबी की रेखा से बाहर मान लिया जाए. बहरहाल सरकार यह बताने की स्थिति में नहीं है कि यदि सेवा और लाभ के बदले नकद दिए जाने से, जो मंहगाई बढ़ेगी, तब क्या लोगों का जीवन आसान रह जाएगा!
यह वायदा उस स्थिति में किया गया है, जिसमें गरीबी की परिभाषा की तय नहीं है. वर्तमान में न्यूनतम व्यय को गरीबी का आधार माना जाता है, जिसमें गरीबी के सामाजिक और संस्थानिक कारकों को पूरी तरह से बाहर रखा गया है. गरीबी का सबसे गहरा जुड़ाव बेरोजगारी और आजीविका के संकट से है. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के प्रतिवेदनों के मुताबिक भारत में वर्ष 2001 से 2015 के बीच 72333 लोगों ने गरीबी और बेरोजगारी के कारण आत्महत्या की. जनगणना 2011 के मुताबिक भारत में काम खोज रहे लोगों (जिनके पास कोई काम नहीं था) की संख्या 6.07 करोड़ थी, जबकि 5.56 करोड़ लोगों के पास सुनिश्चित काम नहीं था. इस मान से 11.61 करोड़ लोग सुरक्षित और स्थायी रोजगार की तलाश में थे. अनुमान बता रहे हैं कि यह संख्या वर्ष 2021 में बढ़कर 13.89 करोड़ हो जाएगी.
हर साल 60 लाख युवा स्नातक शिक्षा पूरी करते हैं, उन्हें भी रोजगार चाहिए. उनके लिए कौशल विकास के लिए 3500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. यह तय है कि भारत सरकार देश के युवाओं को कमजोर मानती है क्योंकि उनके पास बाजार के अनुरूप कौशल नहीं है, वह यह नहीं जानना चाहती है कि जो कौशल हमारे समाज और युवाओं में है, उसके मुताबिक भी अवसर खड़े किए जाएं. मसलन प्राकृतिक संसाधनों का पूरा हक समुदाय को देना, हस्त-कलाओं को प्रोत्साहन देना आदि. औद्योगिकीकरण के कारण स्थानीय संस्कृति, कलाएं और कौशल को आर्थिक नीतियों में “कमजोरी” ही माना जाता है.
वर्ष 1991 में जब घोषित रूप से उदारीकरण और निजीकरण की नीतियां अपनाई गई थीं, तब सबसे गहरा आघात गांव और खेती पर ही हुआ था. तबसे हर सरकार ने खुलकर यह कहा है कि जब तक लोगों को गांव और खेती से बाहर नहीं निकालेंगे, तब तक आर्थिक विकास के लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता है. ऐसा किया भी गया. परिणाम हुआ किसानों ने खूब आत्महत्याएं की, बेरोजगारी बढ़ी और भुखमरी बढ़ी.
सरकारें यह समझ ही नहीं पाईं कि सीमित संसाधनों के कारण केवल वृहद औद्योगिकीकरण से ऊंचे वित्तीय लक्ष्य हासिल भी नहीं किए जा सकते हैं और न ही सभी को रोजगार दिया जा सकता है. माध्यम और लघु उद्योगों को संरक्षण देने की बात कही गई है, पर यह तय करना होगा कि यह उद्योग लघु उद्योगों के पूरक बनें, बड़े उद्योगों के नहीं.
बहुत जरूरी है कि भारतीय व्यवस्था के अनुरूप औद्योगिकीकरण की नीति को प्रोत्साहित किया जाए. अब आप देखिए इन बिंदुओं को : वर्ष 2001 से वर्ष 2015 के बीच भारत में 234657 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की क्योंकि न तो उन्हें उत्पाद का उचित मूल्य मिला, न बाजार में संरक्षण मिला और न ही आपदाओं की स्थिति में सम्मानजनक तरीके से राहत मिली. उत्पाद की लागत बढ़ती गई और खुला बाजार किसानों को निचोड़ता गया. इस साल कृषि ऋण के रूप में 10 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इस सवाल का जवाब कौन देगा कि सरकार किसान को कर्जा तो देगी, पर वह “ऋण” चुकाएगा कैसे? इसका तब भी कोई जवाब नहीं था और आज भी कोई जवाब नहीं है. वास्तविकता यह है कि “कर्जा” ही किसानों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण बना है. दूसरी बात यह है कि सरकार कृषि उत्पादन के बढ़ने की घोषणा उपलब्धि के रूप में कर रही है; किन्तु इस बात को छिपा रही है कि कृषि उत्पाद की उपभोक्ता के स्तर की कीमत और किसान के स्तर की लागू कीमत में 50 से 300 प्रतिशत तक का अंतर होता है. किसान को दाल के 55 रुपये मिलते हैं, पर दाल बेचने वाली कंपनी को 200 रुपये या इससे भी ज्यादा मिलते हैं. सरकार ने इस विसंगति को मिटाने और किसानों की आय सुनिश्चित करने की कोई प्रतिबद्धता जाहिर नहीं की है. न्यूनतम समर्थन मूल्य को किसान हितैषी बनाने के संदर्भ में वह मौन ही है.
मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देने के लिए स्वाइल हेल्थ कार्ड पर बहुत जोर है; लेकिन क्या उन्हें यह जानकारी है कि मैदानी स्तर पर इस पहल के हश्र क्या हैं? जिन राज्यों में सूखा या बाढ़ की स्थिति से नुकसान होता है, उनके पास “अगले मौसम” में बुआई के लिए पूंजी नहीं होती है, क्योंकि पिछले 27 सालों में हमारी सरकारों ने बीजों, खाद, कीटनाशक और कृषि तकनीक में उसे बाहरी ताकतों-कंपनियों-एजेंटों पर निर्भर बना दिया है. अब भी वह प्रशिक्षण और उन्नत कृषि के नाम पर जीएम और अन्य बाहरी बीजों को ही प्रोत्साहित कर रही है. किसानों को सहायता तभी मिलती है, जब वे इन बाहरी बीजों या तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. जो किसान परंपरागत तरीके से खेती को विकसित करना चाहते हैं, उन्हें संरक्षण दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है. बजट में कहा गया है कि अगले पांच सालों में किसानों की आय दोगुनी करवा दी जाएगी. सवाल यह है कि आज बमुश्किल 3000 रुपये कमाने वाले परिवार की आय यदि वर्ष 2022 में 6000 रुपये हो भी गई, तो इसके मायने क्या होंगे? बहुत दुखद है कि हमारी चुनी हुई सरकारें किसी गहरे वित्तीय मायाजाल में फंस चुकी है, जिसमें से निकलने की ताकत उनमें बची नहीं है.
फसल बीमा योजना के विज्ञापन और आयोजनों पर ही 1200 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, पर यहां भी सवाल किसान तक लाभ के पंहुचने का है. सरकार अपने राजनीतिक हित साधने वाले विज्ञापनों पर इतना व्यय करने के लिए क्यों मजबूर है? यह अच्छा लगा कि भारत सरकार ने महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में आवंटन को बढ़ाया है. वर्ष 2016-17 में 38500 करोड़ का आवंटन हुआ था. इस पर वास्तविक व्यय 47000 करोड़ रुपये हुआ. इस साल इस योजना में आवंटन 48000 करोड़ रुपये रखा गया है. कुछ महीनों पहले तक राजनीतिक अपरिपक्वता के चलते इस योजना को “पूर्ववर्ती सरकारों की नाकामी का स्मारक” कहकर पेश किया जा रहा था. इसकी महत्ता को अब स्वीकार कर लिया गया है. सरकार ने कहा है कि हम मनरेगा को एक उत्पादक योजना बना रहे हैं. पिछले साल इस योजना में पांच लाख तालाब बनाए गए. इससे सूखे और पानी का संकट कम होगा. इस साल हम नए पांच लाख तालाब बनाएंगे. आकाशीय तकनीक से मनरेगा की निगरानी भी करेंगे. क्या मनरेगा का दायरा बस इतने तक ही है? सरकार ने यह एक वाक्य नहीं जोड़ा कि हम मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों की काम की मांग को समय पर पूरा करेंगे! उन्हें कानूनी प्रावधान के मुताबिक साप्ताहिक आधार पर मजदूरी का भुगतान भी करेंगे? यदि काम नहीं मिला तो बेरोज़गारी भत्ता देंगे या मजदूरी भुगतान में देरी होने पर मुआवज़ा देंगे. यह सब क़ानून के प्रावधान हैं. आज भी स्थिति यह है कि 6000 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है और केंद्र-राज्य सरकारें जरूरत के मान से पैसा जारी नहीं करती हैं और मजदूरों के शोषण पर मौन रहती हैं.
500 और 1000 रुपये की मुद्रा के बंद होने से एक बड़ा संकट सामाजिक अर्थव्यवस्था पर छाया था. यह मान जा रहा है कि लगभग 45 लाख लोग पिछले दो सालों में वापस अपने घर-गांव की तरफ गए हैं. इसके कारण मनरेगा के तहत काम की मांग बढ़ी है. इस स्थिति में यह सुनिश्चित करना होगा कि वास्तव में इन लोगों को रोजगार मिले और वे पुनः बदहाली और पलायन के लिए मजबूर न हों.
बड़े मूल्य की मुद्राबंदी का वास्तविक मकसद अब धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है. अब तक सरकारें यही कहती थीं कि आर्थिक सुधारों का लाभ तो बहुत हुआ है, पर यह कुछ परिवारों तक सीमित है. लोग टैक्स जमा नहीं करते हैं, इससे बाकी लोगों को इसका फायदा नहीं मिलता है. आठ नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के कारण बताए गए थे – काला धन, आतंकी गतिविधियां, नकली मुद्रा आदि. अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री जी ने जानकारी दी है कि नोटबंदी के बाद 1.09 करोड़ खातों में 2 लाख से 80 लाख रूपए जमा हुए हैं. इस जमा का औसत 5.03 लाख रूपए था. जबकि 1.48 लाख ऐसे खाते हैं जिनमें 80 लाख रूपए से ज्यादा जमा हुए हैं. इसमें जमा हुई औसत राशि 3.31 करोड़ रुपय थी. इस मान से अगर यह मान भी लिया जाए कि यह सभी खाता धारक संपन्न लोग हैं, तो भी इनकी संख्या 1.24 करोड़ ही हुई. भारत में 3.7 करोड़ लोग ऐसे ही आयकर जमा करते हैं. इन 1.24 करोड़ में से कई लोग वैसे ही करदाता होंगे. समझाने के लिए यह भी बताया गया है कि भारत में 3.7 करोड़ लोग ही आयकर विवरणिका दाखिल करते हैं, जबकि पांच सालों में 1.25 करोड़ से अधिक कारें बेंची गईं. दो करोड़ लोगों ने विदेश यात्रा की; पर लोग आयकर जमा नहीं करते हैं. अतः यह साफ दिखाई देता है कि “सम्पन्नता या मध्यम सम्पन्नता” के पैमाने पर लगभग पांच करोड़ लोग ही खरे उतारते हैं. जबकि भारत में कार्यशील जनसंख्या 48.18 करोड़ है. बेहतर होता कि सरकार यह भी देखती कि देश का लगभग पूरा धन निकालकर बैंकों में जमा कर लिए जाने से पता चल रहा है कि देश के 5 से 6 करोड़ लोगों तक ही सम्पन्नता सीमित रही है. हमारा पूरा विकास 80 फीसदी लोगों तक नहीं पंहुचा है. अभी हम आयकर निरीक्षक की सत्ता के अधीन होने वाले हैं. सरकार बार-बार यह कह रही है कि ईमानदार और कर निर्धारण करवाने वालों को परेशान नहीं किया जाएगा; लेकिन इसके लिए कौन से नए कदम उठाए जाएंगे, इसका कोई उल्लेख बजट भाषण में नहीं था.
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