बीएमसी के चुनाव में इसबार ऐसा पहली बार हो रहा है जब ये स्थानीय नहीं राष्ट्रीय मुद्दों पर हो रहे हैं. शिवसेना और बीजेपी का पुराना गठबंधन टूटने के बाद यहाँ की लड़ाई कुछ और रोमांचक हो गई है. अब सभी दल अकेले अकेले मैदान में हैं. सबसे बड़ी बात यहाँ बसपा और सपा भी कई सीटों पर काफ़ी मजबूत चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस और और एनसीपी भी अलग अलग हैं इसलिए अब केवल पोस्ट पॉल एलाइंस की ही उम्मीद कर सकते हैं. क्योंकि बहुमत मिलना किसी भी दल के लिए बहुत मुश्किल काम है. बीजेपी पॉस (गुजराती, मारवाड़ी) इलाक़ों में तो अच्छी नज़र आती है लेकिन स्लॅम मराठी इलाक़ों में शिवसेना अच्छी स्थिति में है. कुछ सीटों पर छोड़कर एमएनएस भी केवल वोट कटवा ही मानी जा रही है. इसबार देखने वाली बात है क़ि उत्तर भारतीय वोट बीजेपी को मिल रहा है. दूसरी तरफ कांग्रेस का खेल एमआईएम बिगाड़ रही है. क्योंकि महाराष्ट्र के मुस्लिम वॉटर्स में ओवैसी की पार्टी ने अच्छी पकड़ बनाकर रखी है. समाजवादी पार्टी और एनसीपी भी मुस्लिम वोट काट रही है और यहाँ एक साथ वोट करने वाला कोई मुद्दा है नहीं इसलिए कांग्रेस या अन्य सेकुलर दल लड़ाई से बाहर जाता दिखता है.
पूरी स्थिति का आकलन करें तो शिवसेना का मजबूत होना उसके मराठी इलाक़ों में किए गए कामों के कारण है. आप मराठी इलाक़ों में देखिए हर मोहल्ले में शिव सेना की शाखाएँ हैं, युवा सेना, बाल सेना, छात्र सेना, महिला सेना, खेल मंडल जैसे संगठन हर वर्ग में उसकी पैठ मजबूत करते हैं. शिक्षा से लेकर खेल तक में शिवसेना काफ़ी काम और लोगों की मदद करती है. दूसरी मुख्य बात है मराठी अस्मिता का जिंदा रखना. शिवसेना गणपति फेस्टिवल से लेकर शिवाजी महाराज जयंती और हर हिंदू त्यौहार पर सार्वजनिक कार्यक्रम करती है. जिसकी फंडिंग पार्टी करती है. वो बालठाकरे और शिवाजी महाराज के नाम पर लोगों को बाँधकर रखते हैं. इसलिए मराठी वोटों में और किसी दल का सेंध लगा पाना मुश्किल है. अगर एमएनएस चाहे तो कुछ कर सकती है लेकिन इतना आसान नहीं है इतना बड़ा संगठन तैयार करना जो शिवसेना ने 40-50 साल में तैयार किया है. मराठी युवाओं में राज ठाकरे को लेकर एक जोश तो है लेकिन अभी इस पीढ़ी के आगे एक पूरी पुरानी जमात है जिसको बाला साहब ठाकरे के पुत्र के साथ ही चलना है. इसलिए ही युवा अकेले नहीं जा पा रहा है उसके साथ. दूसरी बात यहाँ की जनता को राजठाकरे पर भरोसा भी कम है कि वो चुनाव जीत पाएँगे. वैसे अगर दोनों दल साथ लड़े तो अच्छे नतीजे आ सकते हैं लेकिन एक साथ लड़ना मुश्किल है. क्योंकि राज ठाकरे को जो पद और सीटें चाहिए वो उद्धव ठाकरे देने में डरते हैं क्योंकि उनको डर है कि वो शिवसेना पर कब्जा कर लेंगे, और उद्धव की शर्तों पर राज ठाकरे का साथ आना मुश्किल है. फिलहाल तो शिवसेना और बीजेपी में इस बात को लेकर टक्कर है क़ि सीटें किसकी ज़्यादा आएँगी? बहुमत आना तो मुश्किल है.
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