मायावती का हारना भी उत्तर प्रदेश के लिए घातक होगा. बेहतर राजनीति और लोकतंत्र को बचाए रखने या सामाजिक न्याय के ळिए उनका होना बहुत आवश्यक है. इसलिए मुझे बावजूद इसके क़ि उनके दल और उनमें कुछ कमियाँ होंगी, कहने में कुछ संकोच नहीं है क़ि वो उत्तर प्रदेश के लिए आवश्यक हैं. अगर वो इस चुनाव में हार गईं तो शायद बीएसपी के अस्तित्व को ख़त्म करने की बातें शुरू हो जाएँगी, अखिलेश के पास उम्र है, अभी उनको और भी मौके मिल सकते हैं लेकिन मायावती के लिए ये आख़िरी चुनाव है इसलिए मुझे उनसे सहानुभूति भी है. मैं अभी उत्तर प्रदेश के दौरे से आया हूँ, वहाँ मैने अपने गाँव और आसपास के लोगों से बात की, ख़ासकर दलित समाज के लोग उनमें अपना हीरो या मसीहा देखते हैं. एक महिला बोलीं बेटा अगर कांशीराम और बहन जी ना होते तो आज हम तुम्हारे सामने खड़े होने लायक भी नहीं थे. हर छोटा बड़ा आदमी बहन जी में कुछ उम्मीद देखता है. मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जाएगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं. मूर्तियां और पत्थर लगाने से कई लोगों को नाराज़गी रही. लेकिन किसी लोकप्रिय नेता के नाम पर कब्ज़ा कर लेना और फिर मूर्तियां लगवा देना इस देश के सभी राजनीतिक दलों की राजनीति का हिस्सा रहा है. मायावती ने जो जगहें बनवाईं वो आज लोगों के काम भी आ रही हैं. लेकिन जीते-जी खुद की मूर्ति लगवाना भी अपने आप में एक अलग घटना थी. मायावती को बारीक नज़र से तब भी देखा गया जब उन्होंने 2007 में अपने दम पर सरकार बनाई. उनके हेयर स्टाइल से लेकर उनके पर्स तक पर आर्टिकल लिखे गए. नोटों की माला पर तंज किए गए. बेशक मायावती का ये आचरण अगड़ी जाति वालों को और मीडिया को चुभा होगा लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि उस बदलाव में एक रिवोल्ट यानि विद्रोह छुपा हुआ था. उनका ऐसा करना दलित समाज में एक आत्मविश्वास भर रहा था. ये देश के लिए एक ऐतिहासिक मंज़र था जब एक दलित महिला अगड़ी जाति के समर्थन के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई. महिला होने पर ज़ोर है क्योंकि जयललिता हों या ममता बनर्जी हों, पुरुष सत्ता से लड़ना इतना आसान कभी नहीं रहा जहां कानून बनाने वालों ने किसी महिला नेत्री की साड़ी खींची और कभी किसी के बाल खींचे. इस पूरे पक्ष को मीडिया ने महसूस कम किया. मीडिया को कम से कम इस पहलू के लिए हमेशा ही मायावती और वंचित समाज के दूसरे नेताओं को बढ़त देनी चाहिए. उनके संघर्ष को आप दूसरे किसी नेता के समकक्ष नहीं रख सकते. उत्तर प्रदेश के चुनावों में मायावती को इसलिए भी सबसे मजबूत योद्धा माना जाना चाहिए क्योंकि वो अकेली मैदान में हैं ना किसी से गठबंधन और ना कोई दूसरा नेता जो कैंपेन कर सके. वो अकेली ही मोर्चा संभाले हुए हैं. उनपर टिकट बेंचने या गुण्डों को पार्टी में रखने के आरोप लगते रहे हैं, भ्रष्टाचार के भी आरोप उनकी सरकार पर थे, लेकिन दलित समाज ये सब नहीं देखता है, उसे बड़ा गर्व होता है जब कोई उनके समाज का नेता ख़ासकर महिला इस उँचाई पर जाकर सबपर शासन करते हैं. फिलहाल जो भी होगा बड़ा दिलचस्प होगा क्योंकि मीडिया से दूर उनके वॉटर्स अभी भी कहते हैं कि उनकी पार्टी किसी से कमजोर नहीं है. वो अकेले ही चुनाव जीत रही हैं.
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राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
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