Friday, April 28, 2017

आम आदमी पार्टी में कुमार विश्वास ही उम्मीद हैं।

आज कुछ दोस्तों से आम आदमी पार्टी के भविष्य को लेकर चर्चा हो ही रही थी कि किसी ने फेसबुक पर लल्लन टाॅप लाइव चला दिया जिसमें आम आदमी पार्टी को बचाने की अंतिम आस कुमार विश्वास को राष्ट्रीय संयोजक बनाने की बातें हो रही थी। 
इसपर मैंने आराम से सोचकर देखा तो लगा कि सचमुच इस दौर में जहां परसेप्शन की लडाई है और केजरीवाल की इमेज उनकी ईमानदारी और नियत से अलग राहुल गांधी की तरह जोकर या देशद्रोही बना दी गई है, तब अगर कुमार विश्वास पार्टी के नेता बने तो क्या होगा? असल में इस समय इमोशंस पर राजनीति हो रही है, व्हाटस एप की एक दुनिया है जहां असली राजनीति राष्ट्रवाद के नाम पर हो रही है। जिसमें सेकुलर पार्टी या नेता को सीधे हिन्दू विरोधी या पाकिस्तान से जोड दिया जाता है। और ये सब कम से कम 4-5 सालों तक और चलने वाला है। कुमार विश्वास एक ऐसे नेता हैं जो बीजेपी को इस मुद्दे पर बौना साबित कर देंगे। राष्ट्रवाद के नाम पर जितने वो मुखर हैं उतना शायद बीजेपी के भी कई नेता नहीं। वो पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद बयान दे सकते हैं कि, "कल मैं अपने बचपन के मित्र मनीष के  साथ लाल चौक पर तिरंगा फहराने जा रहा हूँ।" फिर चाहे वो जम्मू में ही गिरफ्तार हो जाएँ। वो स्मृति ईरानी, मोदी, अमित शाह, किरन बेदी पर ऐसे तंज करते हैं जो लोगों में उत्साह और चर्चा का दौर शुरू कर देते हैं। उनके पास दिलीप पांडेय, कपिल मिश्रा जैसे प्रखर राष्ट्रवादी नेता हैं जो ऐसा करने में मदद करेंगे। हो सकता है आप सोच रहे हों कि इससे मुस्लिम समुदाय दूर जा सकता है। लेकिन वो अब सेकुलर नैशनलिज्म की बात करने लगे हैं। उनका कविता मंचों से बयान कि एक मुस्लिम जब पांच बार की नमाज पढता है तभी उसका वंदे मातरम पूरा हो जाता है। वो पुराने कुमार विश्वास नहीं है जो कह देते थे कि, " यूपी पुलिस एक एफआईआर पर जैसे संत को उठा लेती है वैसे बुखारी को गिरफ्तार करके दिखाए। ऐसा भी नहीं है कि वो सेकुलर होते होते हिन्दू विरोधी हो जाएं। उनको हम हार्डकोर सेकुलर नैशनलिस्ट कह सकते हैं। भ्रष्टाचार और राष्ट्रवाद के साथ साथ वो हिन्दुत्व के एजेंडे पर बीजेपी को सफल नहीं होने देंगे। अच्छे वक्ता होने की वजह से कार्यकर्ताओं में बहुत जोश भरेगे। कांग्रेस और राहुल गांधी पर मजाक करने की वजह से लोग कांग्रेस का हितैषी भी नहीं समझेंगे। 
लेकिन इसमें कुछ डर भी हैं। पहला डर है केजरीवाल धडे का पार्टी में उनको बर्दाश्त कर पाना। दूसरा डर है उनका रणनीतिक तौर पर होशियार न होना। ऐसे में क्या वो अन्य रणनीतिकारों की मानेंगे? ये डर मिटाकर आम आदमी पार्टी को एक कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि 2019 के चुनाव में दो साल से भी कम का समय बचा है। पंजाब, गोवा,एमसीडी हार के बाद उनके पास दिल्ली ही बची है जिसमें केजरीवाल ने अपने दम पर काम नहीं किया तो 2019 लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी हार सकते हैं। इसलिए केजरीवाल को संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी के साथ सीएम के काम करने चाहिए और पार्टी पर अपनी पकड रखते हुए चेहरा किसी और को बना दें। कुमार विश्वास इसके सबसे बेहतरीन विकल्प हैं । मुझे पता है कि इससे पार्टी के सेकुलर फेस को खतरा है लेकिन कुमार विश्वास दोनों के बीच का रास्ता निकालना जानते हैं। रही बात आरक्षण विरोधी बयानों की। तो आपको बता दूँ कि एक बार जेएनयू में केजरीवाल के आरक्षण विरोधी भाषण हुए थे। लेकिन राजनीति में आते ही उसपर चुप हो गए। वैसे भी पर्दे के पीछे तो केजरीवाल ही काम करने वाले है। सही है या गलत मुझे नहीं पता लेकिन ये मुददों को हाइजैक करने का राजनीतिक दौर है। जो बाबा साहब अंबेडकर हिन्दू धर्म के प्रखर विरोधी रहे हैं। उनको बीजेपी जैसी हिन्दुत्ववादी पार्टी हाईजैक कर लेती है। वो एकदम से बसपा से एकाधिकार छीनकर दलितों के वोट ले जाती है। इसी तरह आम आदमी पार्टी भी बीजेपी से राष्ट्रवाद के मुद्दे को सेकुलर रहते हुए हाईजैक कर सकती है। कम से कम सोसल मीडिया के दौर में जोक्स का हिस्सा बने केजरीवाल की जगह कुमार विश्वास पर जोक्स और पप्पू टाइप छवि पेंट करने में कुछ समय तो लगेगा। हो न हो केजरीवाल और पार्टी जाने। लेकिन इस मुद्दे पर कम से कम एक पाॅलिटिकल एनालिसिस्ट के तौर पर बात तो कर सकते हैं।

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