बड़े बुजर्गो की बातों से लेकर स्कूली किताबो और उच्चतर शिक्षा की किताबो तक, देश की भौगोलिक स्तिथि से लेकर छोटे- बड़े नेताओं के भाषणों तक यही बात देखी, पढ़ी और सुनी है कि #भारत_एक_कृषिप्रधान_देश_है_। पर आज इन किसानों को देख कर प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में ऐसा है?
सरकार इन किसानो की समस्याओं को दूर करना तो बहुत दूर की कौड़ी है इनकी समस्याओं को सुनना तक मुनासिब नही समझ रही है। वास्तव में बहुत ही दर्दनाक, भयावह और वीभत्स स्तिथि है. आंदोलन के अंतिम दिन इन किसानों पर सोसल मीडिया पर खूब हमले हुए क़ि वामपंथी थे, इनके पास बिसलेरी का पानी कैसे आया? विपक्ष का किया धरा है..... आदि आदि!
लेकिन सच में सोचिए और इन किसानों के मासूम चेहरे देखिए. देखकर आँसू आ जाते हैं. मुझे कई बार बहुत मन हुआ क़ि दिल्ली जाकर इनके साथ आंदोलन करना चाहिए. लेकिन कुछ निजी कारणों की वजह से नहीं जा पाया. गाँधी वादी या अहिंसक आंदोलन के जितने भी तरीके हो सकते थे, वो सब उन्होने अपना लिए. पहले तो वो दिल्ली जैसे बड़े और अनजान शहर में आकर इतने दिन तक अकेले लड़ते रहे यही सराहनीय है. कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं क़ि वो तमिलनाडु सरकार के खिलाफ क्यों नहीं लड़ते हैं. दरअसल उन्होंने तमिलनाडु सरकार के खिलाफ भी काफ़ी आंदोलन किया है. लेकिन ये वैसे ही है जैसे हम हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट जाते हैं. उनके आंदोलन में एक गजब की रचनात्मकता है. हाल में उन्होंने एक शख्स को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुखौटा पहनाया और फिर वहां बैठे सारे किसानों पर उससे कोड़े लगवाए। कोड़े मार रहे शख्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुखौटा पहनने के अलावा उनकी तरह के कपड़े भी पहन रखे थे। प्रदर्शन कर रहे किसानों ने हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए कहा, ‘हम लोगों को नजरअंदाज करके मोदी ने बता दिया कि वह हम लोगों को दिल्ली से भगाना चाहते हैं, कभी-कभी तो हमें लगता है कि इससे अच्छा तो हम लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाए।’ नेशनल साउथ इंडियन रिवर लिंकिंग फार्मर के प्रदेश अध्यक्ष पी आय्याकन्नू ने कहा कि कोड़े की मार झेलने के लिए 25 किसान अपने आप सामने आए। लेकिन 23 पिटाई की मार को ज्यादा देर झेल नहीं पाए। किसानों में पीएम मोदी को लेकर खासी नाराजगी है। एक किसान ने कहा कि हम लोग यहां गर्म सड़क पर सो रहे हैं और पीएम एसी वाले कमरे में रहते हैं। कुछ किसानों ने दावा किया कि मोदी किसानों से गुलामों जैसा बर्ताव कर रहे हैं। जंतर मंतर पर बैठे किसान अरुण जेटली, उमा भारती, राजनाथ सिंह, राधा मोहन सिंह से मिल चुके हैं। लेकिन पीएम मोदी से उनकी मुलाकात नहीं हुई है। वे लोग ‘मोदी जी, मोदी जी जंतर मंतर आओ जी’ के नारे लगाते भी देखे गए हैं।
44 डिग्री पारे की गर्मी में प्रदर्शिन कर रहे किसान लगातार बीमार पड रहे हैं। मोदी का पुतला बनाकर उसमें अपना खून चढा रहे हैं। सडक पर डालकर चावल सांभर खाते हैं। अपने मृत साथियों के नर कंकाल की माला बनाकर पहने हैं। किसी किसी के पास तो इतना भी नहीं है कि वापस जाकर खाएंगे क्या? फिर भी न उस बहरी सरकार को फर्क पडता है, न उसके बादशाह को फर्क पडता है और न आपको कोई फर्क पडता है। हद तो तब हो गई जब उन्होने अपना ही मूत्र पी लिया और धमकी दी क़ि अगले दिन मल खाएँगे......... बहुत अधिक लिखने से अच्छा है आप ये चित्र देखकर ही समझें.....













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