मुंबई में जुलाई 2005 में 700 लोग मारे गए, हज़ारों करोड़ की बर्बादी हुई, उससे हमने क्या सबक सीखा और वो सबक कहां है इस वक्त. 2015 में चेन्नई शहर में बारिश और बांध के कारण बाढ़ का पानी घुस गया. एक मंज़िला घर डूब गए. 343 लोग मारे गए. क्या हमने कोई सबक सीखा, सीखा तो वो सबक क्या है. 10 मार्च 2017 के हिन्दू अख़बार में चेन्नई बाढ़ पर फोलोअप स्टोरी छपी है. तमिलनाडु सरकार चेन्नई की नदियों के किनारे बसे 55,000 परिवारों को हटाने की योजना बना रही है. बाढ़ के दो साल बाद राज्य एक्शन प्लान इसलिए बना रहा है क्योंकि मद्रास हाईकोर्ट ने अदयार और कूअम नदी के किनारे से अतिक्रमण हटाने को कहा है. इस 21 जुलाई को सीएजी ने संसद में एक रिपोर्ट रखी. उस रिपोर्ट में 2007 से लेकर 2016 के बीच भारत के 17 राज्यों में बाढ़ नियंत्रण की क्या तैयारी है उसकी समीक्षा की गई है. आपको हैरानी होगी कि अगस्त 2016 तक देश के 15 राज्यों और कें शासित प्रदेशों में फ्लड फोरकास्टिंग सिस्टम ही नहीं लगा है, तय हुआ था कि 100 लगाएंगे. कई जगहों पर टेलीमेट्री स्टेशन बनना था, जिससे तुरंत का तुरंत डेटा मिल जाए, एक तो बना नहीं और जहां बना वहां उपकरण वगैरह चोरी या खराब हो गए. भारत में 4,862 बांध हैं मगर 90 फीसदी के पास आपातकालीन योजना नहीं है. बिहार की बाढ़ में न जाने कितनी सड़कें बह गईं. कोई पूछने और बताने वाला नहीं है कि नदी के बहाव के रास्ते में ये सड़कें कैसे बन गईं. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अभी तक किसी भी राज्य ने अपने यहां बाढ़ के संभावित मैदानों की पहचान नहीं की है मतलब अगर पानी बढ़ा तो कहां तक फैल सकता है और उन इलाकों में घर दुकान नहीं बनाना है. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 1981 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने बाढ़ के संभावित मैदानों की पहचान का सुझाव दिया था. असम और यूपी को छोड़ किसी ने कोई काम नहीं किया. 1975 में सेंट्रल वाटर कमीशन ने राज्यों के लिए एक आदर्श बिल बना कर दिया, मणिपुर और राजस्थान को छोड़ कर किसी ने ऐसा बिल पास नहीं किया. बिल ही पास हुआ होगा, काम तो हुआ नहीं होगा. ये हाल है हमारे देश में बाढ़ नियंत्रण की. स साल के लिए असम ने केंद से 2,392 करोड़ रुपये की मांग की है. सीएजी की रिपोर्ट पढ़कर सन्न रह गया. असम ने 2007 से 2012 के बीच 2,043 करोड़ की मांग की थी, इस पैसे का चालीस फीसदी ही अभी तक मिला है.
1985 में हुई बारिश के बाद बीएमसी ने ब्रिटिश कंस्लटेंट वाट्सन हॉक्स्ले को नियुक्त किया कि वे शहर की योजना बना कर दें कि एक घंटे में 50 मिलिमीटर बारिश हो जाए तो कैसे निपटा जाए. आठ साल लगाकर रिपोर्ट तैयार की गई, लेकिन बीएमसी ने लागू करने में 12 साल और लगा दिए. इस प्रोजेक्ट का पूरा पैसा भी खर्च नहीं हुआ, न ही सारे सुझावों पर अमल किए गए. मुंबई की नदियं पोइसर, ओशिवारा, दहीसर, मिठी को आज़ाद करने की ज़रूरत है ताकि बारिश का पानी इनके ज़रिये बाहर प्रवाहित हो सके. मगर प्राकृतिक रास्तों का अतिक्रमण होता रहा है. अनदेखी होती रही है. बिल्डिंग बना देंगे तो पानी के निकलने का रास्ता कहां से निकलेगा. मगर हम राजस्थान की बात करेंगे. हिन्दी में भी छप रही डाउन टू अर्थ पत्रिका की इस बार की कवर स्टोरी राजस्थान पर है. अनिल अश्विनी शर्मा ने राजस्थान के बाढ़ग्रस्त इलाकों पाली, सिरोही, जालौर, बाड़मेर और जैसलमेर की तीन दर्जन से अधिक गांवो का दौरा कर यह रिपोर्ट तैयार की है. राजस्थान में बाढ़ न केवल नियमित होती जा रही है बल्कि विनाशकारी रूप धरती जा रही है. राजस्थान के पाली ज़िले में पिछले ही महीने बाढ़ आई थी. बाढ़ का पानी तो उतर गया है मगर लोग सरकार का इंतज़ार कर रहे हैं कि उनके नुकसान की भरपाई करने कब आएगी. यही पाली अगर मुंबई की पाली हिल्स होती तो टीवी वाले तूफान मचा देते. गनीमत है कि राजस्थान वाले पाली के स्थानीय लोग जनहित याचिकाओं के ज़रिए सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे हैं. पंह साल में बारिश वहां 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ती जा रही है. जलवायु परिवर्तन के कारण यह सब हो रहा है. इस साल राजस्थान के पांच ज़िलों के हज़ार से अधिक गांव बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. बारिश के कारण नदियों की धारा बदल रही है. अनिल अश्वनी शर्मा की मेहनत से लिखी गई यह रिपोर्ट राजस्थान और बाढ़ के बारे में समझ ही बदल देती है. अच्छी बात है कि हिन्दी में ऐसी रिपोर्ट लिखी गई है. आमतौर पर पर्यावरण पर पढ़ने लायक लेख अंग्रेज़ी में ही लिखे जाते हैं.
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