Tuesday, September 26, 2017

मनमोहन को हमेशा याद करेगा अर्थ जगत

हमारे देश में एक प्रधान मंत्री थे, मनमोहन सिंह जी. बड़ा चुप रहने और लोगों का जोक मैटेरियल बनने वाले. लेकिन जब मैने उनके बारे में कुछ तथ्य पढ़े तो दंग रह गया क़ि हम तो इनके कर्ज़दार हैं. क्योंकि आज उनका जन्मदिन भी है इसलिए इसपर मैं कुछ लिखना चाहता हूँ. जब भी मनमोहन सिंह से उनकी सफलता के बारे में पूछा गया, उन्होंने कहा: मैं जो कुछ भी हूं, अपनी पढ़ाई-लिखाई की वजह से हूं. आज के पाकिस्तान में पड़ने वाले गाह गांव में पैदा हुए थे मनमोहन सिंह. गांव में ना तो बिजली थी ना स्कूल और हॉस्पिटल. मीलों चलकर स्कूल जाते. केरोसिन लैंप में पढ़-पढ़ के अपनी आंखें खराब कर ली थी इन्होंने. पर पढ़ना नहीं छोड़ा. और पढ़ते-पढ़ते ऑक्सफ़ोर्ड से पीएचडी कर ली. फिर प्रोफेसर, रिज़र्व बैंक गवर्नर, केन्द्रीय मंत्री होते हुए प्रधानमंत्री भी बने.
पार्टीशन के बाद इनका परिवार इंडिया आ गया था. बड़ी दिक्कत थी. पर पढ़ाई में बहुत तेज होने के कारण इनको स्कॉलरशिप मिल गई. हमेशा फर्स्ट आये थे. इंग्लैंड में इनको इकॉनोमिक्स का एडम स्मिथ पुरस्कार मिला था. पर ये बहुत शर्मीले थे. बबक के पत्रकार मार्क टली को इन्होंने एक बार बताया था कि कैंब्रिज में पढ़ने के दौरान ये ठंड में भी ठंडे पानी से ही नहाते थे. क्योंकि गर्म पानी के पास भीड़ लगी रहती थी. और वहां के लोगों को ये अपने लम्बे बाल नहीं दिखाना चाहते थे. बाद में ये इंडिया आ गए और अमृतसर के एक कॉलेज में पढ़ाने लगे. वहां पर उनके पड़ोसी थे लेखक मुल्कराज आनंद. एक दिन आनंद इनको जवाहर लाल नेहरू से मिलाने ले गए. नेहरू ने इनको सरकार जॉइन करने के लिए कहा. पर कॉलेज में पढ़ाने का कॉन्ट्रैक्ट था इनका. इन्होंने इनकार कर दिया.
90 के दशक की शुरुआत में भारत की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई थी. दुनिया में भी खाड़ी युद्ध के चलते पेट्रोलियम क्राइसिस हो गई थी. ऐसा हो गया था कि भारत के पास पैसा नहीं बचा था, काम चलाने लायक भी. उस वक़्त नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया. इकॉनमी में सुधार करने के लिए. मनमोहन सिंह के पास जब मंत्री बनने की खबर आई तो इनको मजाक लगा था. अगली सुबह डांट पड़ी तो समझ आया कि सीरियस मैटर है. इंफ इस सुधार पर नज़र गड़ाए हुआ था. पर देश में ऐसा माहौल बना था कि लोग कहने लगे थे कि ये नेता अब देश को बेच देंगे. ऐसे में नए नियम लाने में डर भी था. राव का साफ़ कहना था कि अगर ये सुधार सफल हो गए तो सरकार को क्रेडिट मिलेगा. अगर नहीं हुआ तो सिर्फ मनमोहन की जिम्मेदारी होगी. पर सुधार सफल हुए. देश सही रास्ते चल पड़ा.
भारत में दो ऐसे एक्ट बने हैं जो जनता को सबसे ज्यादा अधिकार देते हैं: कंज्यूमर एक्ट और र्टी. मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही ये एक्ट पास हो गया. इसके लिए देश के लोग लम्बे समय से लड़ रहे थे. इस एक्ट के चलते जनता अफसरों से जवाब-तलब कर सकती है. इसके पहले अफसर हर रिपोर्ट को कॉन्फीडेंशियल कहकर किसी को बताते ही नहीं थे. इसके चक्कर में भ्रष्टाचार बहुत होता था. पर इसी एक्ट के चलते ही मनमोहन सरकार पर घोटालों के आरोप भी लगे.
ये एक ऐसा एक्ट आया, जिसने सरकार और जनता के रिश्ते को बदल दिया. ये तय करना कि सरकार लोगों को अपने गांव के पास रोजगार दिलाएगी, अपने आप में बहुत बड़ा कदम था. साथ ही ये ऐसा प्रोग्राम था जिसमें औरतों को प्राथमिकता दी गई. ये प्रोग्राम पूरे परिवार को टारगेट करता था. रोजगार ना दिला पाने पर अफसरों पर कार्रवाई का प्रावधान था. सरकारी जिम्मेदारियों की ये नई पहल थी. हालांकि बाद में इसमें भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे. पर वो अलग बातें हैं जो कि एक्ट से अलग हैं. एक्ट के इरादों पर डाउट नहीं किया जा सकता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस एक्ट की आलोचना करते हुए कहा था कि इसे मनमोहन सरकार की सबसे बड़ी असफलताओं के रूप में याद रखा जायेगा. पर उन्होंने भी इस एक्ट को ख़त्म नहीं किया.
भारत की प्रगति के साथ ही ऊर्जा जरूरतें बहुत ज्यादा बढ़ गईं. हर गांव तक बिजली पहुंचाने के लिए बिजली पैदा करना भी जरूरी था. इसके लिए न्यूक्लिअर प्लांट लगाना सबसे आसान तरीका है. पर इसके साथ ही जिम्मेदारी और खतरा भी बढ़ जाता है. साथ ही देश में माहौल ये भी बन रहा था कि ये सरकार अमेरिका के हाथ फिर कुछ बेचना चाहती है. मनमोहन सरकार की सहयोगी कम्युनिस्ट पार्टी ने ऐलान कर दिया कि ये डील होगी तो हम सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे. ले भी लिया. पर बिना किसी डर के मनमोहन सिंह ने इस ऐतिहासिक डील को पूरा किया. ये नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर बहुत बड़ी डिप्लोमेटिक जीत थी. 
स्वतंत्रता से ठीक पहले बंगाल में अकाल पड़ा था. 30 लाख लोग मरे थे. फिर चीन से लड़ाई के तुरंत बाद भी अकाल पड़ा. उसी दौरान पाकिस्तान से भी लड़ाई हुई थी. ग्रीन रेवोलुशन के बाद स्थिति थोड़ी बदली. पर वक़्त गुजरने के बाद भी देश के बहुत सारे लोग भर पेट खाना नहीं खा पा रहे थे. ऐसे में मनमोहन सरकार का लोगों का खाना सुरक्षित करवाना दुनिया की किसी भी सरकार के लिए मॉडल बन गया. ये जरूर है कि एक तरफ इसकी आलोचना हुई कि सरकार लोगों पर पैसा बर्बाद कर रही है. लोगों तक अनाज पहुंच भी नहीं रहा. पर एक हद तक लोगों की जरूरतें जरूर पूरी हुईं. किसी भी आलोचना से परे ये सरकार की जिम्मेदारियों का एक नमूना था.

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