Saturday, September 30, 2017

रेलवे की इतनी घटिया हालत क्यों?

एलफिंस्टन स्टेशन के पादचारी पुल (फुटओवर ब्रिज) पर शुक्रवार को हुई भगदड़ में 22 लोगों की मौत के बाद दादर पुलिस स्टेशन में एडीआर यानी कि दुर्घटना से मौत का मामला दर्ज हुआ है. हालांकि मेरा ऐसा मानना है कि इस मामले में पश्चिम रेलवे प्रशासन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. वहां के संकरे पुल पर लोगों की भीड़ को चढ़ने और उतरने में रोज की मशक्कत को देखकर कोई भी आसानी से अंदाजा लगा सकता था कि कभी भी यहां भगदड़ हो सकती है और उसका अंजाम क्या होगा? जब ये हादसा हुआ तकरीबन उसी दौरान मैं एलफिंस्टन रेल स्टेशन पर ही चर्चगेट की तरफ बने नए पादचारी पुल पर था. अचानक से शुरू हुई तेज बारिश की वजह से लोग उस पुल पर ही खड़े होकर बारिश रुकने का इंतजार कर रहे थे. जैसे-जैसे स्टेशन पर दूसरी लोकल आती भीड़ और बढ़ती जा रही थी. आलम ये था कि बाहर से स्टेशन पर आने के लिए यात्रियों को पुल पर सीढ़ियां चढ़ने की जगह नहीं मिल रही थी और जाने वाले बारिश में भीगने के डर से पुल से उतर नहीं रहे थे. जो जहां था, वहीं खड़ा था और परेशान भी, क्योंकि दफ़्तर पहुंचने में देर हो रही थी.
मैं खुद साल 1993 से एलफिंस्टन स्टेशन पर आता-जाता रहा हूं. यहाँ अमूमन खाली रहने वाले दोनों रेलवे स्टेशनों पर भीड़ बढ़ती गई. एक समय आ गया था कि दोनों स्टेशनों के बीच से पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाले अंग्रेजों के जमाने के बने फ्लाईओवर पर चढ़कर स्टेशन के बाहर निकलने लिए बने पुल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों पर भीड़ इतनी बढ़ गई थी कि उस पर चढ़ने के लिए 3 से 5 मिनट का समय लगने लगा. धक्का-मुक्की और जेब कटने की शिकायतें आम हो गई थीं. ऐसा नहीं है कि रेल प्रशासन को परेल और एलफिंस्टन स्टेशन पर साल दर साल बढ़ रही भीड़ की जानकारी नहीं थी. उसे पूरी जानकारी थी इसलिए पिछले कुछ सालों में एलफिंस्टन पर दक्षिण की तरफ एक पादचारी पुल बनाया गया और उत्तर की तरफ हादसे वाला पुल भी अभी 10 साल पहले ही पुराने पुल से जोड़कर बनाया गया था. लेकिन भीड़ की तुलना में ये दोनों ही पुल नाकाफी रहे.
हादसे के बाद देर शाम खुद पश्चिम रेलवे ने एक प्रेस रिलीज जारी कर दावा किया कि परेल और एलफिंस्टन स्टेशन को जोड़ने के लिए पुराने पुल के समानान्तर ही 12 मीटर चौड़े एक और पुल बनाने की योजना पहले ही पास हो चुकी है और उसका टेंडर भी निकाला जा चुका है. मतलब ये कि रेल प्रशासन यहां की बढ़ती भीड़ और होने वाली अनहोनी की आशंका से भली-भांति परिचित था. लेकिन उसे पुल बनाने के लिए जितनी तेजी दिखानी चाहिए थी, उतनी तेजी नहीं दिखाई. फिर क्यों ना रेल प्रशासन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हो? ये सिर्फ हादसा नहीं, जान-बूझकर लोगों को रोज मौत के मुंह में भेजने से कम नहीं है. गैर-इरादतन हत्या का मामला यानी कि धारा 304 आ जिसमें मंशा नहीं, जानकारी जरूरी होती है... और जो रेल प्रशासन को थी.

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