जर्मनी भी अब अमेरिका जैसे नाटक कर रहा है अपने कट्टरपंथी ना होने का, अब वो भी सड़क पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं क़ि जिन 13% लोगों ने एएफडी (पॉप्युलिस्ट राइट विंग पार्टी) को वोट दिया है हम उनसे असहमत हैं. या जर्मनी वैसा नहीं है. लेकिन बात ये भी है क़ि आख़िर एएफडी को वोट देने वाले 13% लोग हैं तो जर्मन ही ना? ठीक वैसे ही जब अमेरिका ट्रम्प को सत्ता में बिठाकर आंदोलन करता है क़ि वो कट्टरपंथी नहीं हैं.
दरअसल वहाँ कट्टरपंथी संगठन को चुनाव में 95 के आसपास सीटें मिलना महज संयोग या संख्या नहीं है. ये एंजेला मार्केल की एक नाकामी के तौर पर देखी जा रही है. सीरिया से आए हुए लोगों के खिलाफ मतलब एंटी माइग्रेट मुद्दे पर एएफडी ने लोगों का समर्थन प्राप्त किया और सीरिया में हो रहे युद्ध में पुतिन की भूमिका महत्वपूर्ण है. इसी कारण आ रहे शरणार्थियों का जर्मनी में आना दक्षिणपंथी दल ने खूब उठाया. इसमें लोग मज़ाक में ही सही पुतिन को एंजेला मार्केल की जीत की तरह देख रहे हैं. असल में पुतिन और एंजेला के बीच के तनातनी वाले संबंध सबको पता हैं. उनकी एक मीटिंग की कुत्ते वाली एक कहानी भी कई बार चर्चा में आती है. इस पार्टी ने यही प्रयोग किया. मार्केल को कुछ हदतक एंटीइनकमबैंसी का भी सामना करना पड़ा. लेकिन पूरे विश्व में हुए चुनावों में एक बात सामने आई है वो है राइटविंग का इस्लाम विरोध के नाम पर जीतना. न जितना तो समर्थन हासिल करना. चाहे आप अमेरिका, भारत, फ्रांस अपवाद हो सकता है. और अब जर्मनी.
वैसे पढ़कर अच्छा लगा कि जर्मनी की चुनाव व्यवस्था काफ़ी अच्छी है. वहाँ जितनी सीटें संसद में हैं उतनी सीटों पर दो दो चुनाव होते हैं. मतलब 299 सीटों पर पहले आप अपने प्रत्याशी को वोट दीजिए, जो मेंबर ऑफ पार्लियामेंट होगा, जो उस एरिया का प्रतिनिधित्व करता है. दूसरा वोट उसी सीट पर आप अपनी पसंद की पार्टी को दे सकते हैं. इसमें आप दूसरी पार्टी को भी पसंद कर सकते हैं. अर्थात 598 सदस्य संसद में जाते हैं. कई बार जब जब ये डिसबैलेंस हो जाता है तो इसके लिए सीटों की संख्या बढ़ा दी जाती है. अब तक एंजेला मार्केल का बहुमत तो नहीं साबित हुआ लेकिन अंत तक कैसे भी जुगाड़ या गठबंधन करके सरकार उनकी ही बनेगी. यहाँ सीडीयू और सीएसयू के गठबंधन को 246 सीट मिली हैं, इसी गठबंधन की तरफ से चांसलर थी एंजेला मार्केल. कुल 598 सीटों पर चुनाव हुए. एसपीडी (सोसल डेमोक्रेटिक पार्टी) भी इस गठबंधन में शामिल थी जिसे 153 सीट मिली हैं. आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एफएफडी) अभी एक दो साल पुरानी ही पार्टी है. इस चुनावों के नतीजे इसलिए और चौकाने वाले हैं क्योंकि हिटलर के बाद से इस देश (जर्मनी) ने कसम खा ली थी क़ि कभी राइट विंग या दक्षिण पंथी पार्टी या नेता को सत्ता के करीब जाने का मौका नहीं देंगे. और एएफडी ठीक उसी तरह की राजनीति करता है. वैसे तो वहाँ क़ानून में हिटलर का समर्थन करना क्राइम है इसलिए वो खुलकर उसपर नहीं बोलते हैं लेकिन दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी की सेना के कारनामे पर खूब बाते करते हैं क़ि हमने क्या खोया? क्या पाया? इसमें रेडिकल लेफ्ट हर देश की तरह फिर से फेल हो गई है. सोसलिस्ट पार्टी के नेता ने पहले तो मना किया था एंजेला को समर्थन से लेकिन दोनों पर खूब दबाव है राइटविंग को दूर रखने का. इसलिए हो सकता है जमैका कोलेशन बनाया जाए. ये मजेदार होता है क़ि सभी संभावित गठबंधन वाली पार्टियों के झंडे के रंग (हरा, काला और पीला) को मिलाकर एक किया जाता है और जब उसका रंग जमैका के झंडे की तरह हो जाता है तो इस कोलेशन की सरकार बन जाती है.
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