Sunday, January 28, 2018

आम बजट का पूर्वानुमान

जट पेश होने में कुछ ही समय बचा है. जाहिर है कि सरकार चार साल की अपनी उपलब्धियों को दिखाने के लिए आंकड़ेबाजी के सारे हुनर लगा देगी.  इसीलिए बजट की समीक्षा का काम हमेशा से ज्यादा कठिन और चुनौती भर होगा. बजट के मकसद को नहीं भूला जा सकता. बजट के जो मकसद हमने पहले से तय कर रखे हैं उनमें सरकार के लिए सबसे बड़ा काम यह है कि वह कैसे देश के कमजोर तबकों को सहूलियत पहुंचाए. लोकतांत्रिक राज व्यवस्था में सरकार की आमदनी और खर्च का हिसाब बनाते समय यही देखा जाता है कि उसने समर्थ और संपन्न लोगों से कितनी उगाही की और असमर्थ और विपन्न रह गए लोगों को कितना सुख बांटा. बजट के मकसद में यह भी शामिल है कि उसके ज़रिए महंगाई को काबू में रखा जाए. इसके अलावा भाविष्य में विकास की संभावनाएं बनाए रखने के लिए नई-नई कोशिश करना बजट का मकसद होता ही है. लेकिन हमारी मौजूदा माली हालत ऐसी नहीं बन पाई है कि ज्यादा आगे की बात सोच पाएं. इस बार के बजट में सिर्फ 2018 19 के साल के लिए गुजारे लायक हिसाब बना लें उतना ही काफी है. अब ये बात अलग है कि अपने निकट भविष्य के एक साल की आवश्यकताओं की कीमत पर भविष्य की बातों में उलझा दिया जाए. यह अंदेशा इस आधार पर है कि फिलहाल अपनी माली हालत ऐसी बनी दिख नहीं रही है कि निकट भविष्य की जरूरतों को ही पूरा कर पाएं. आइए देखते हैं कैसे? वैसे इसे तय करना हमेशा मुश्किल माना जाता है, लेकिन मौजूदा हालात में यह आसान इसलिए है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी जो गांव में बसती है और जिसे किसान कहते हैं वह मरणासन्न हालत में पहुंच गए हैं. इस आधार पर कह सकते हैं कि देश का बजट बनाते समय जो यह दुविधा बनी रहती है कि उद्योग व्यापार पर ज्यादा ध्यान लगाएं या कृषि पर, वह दुविधा इस बार बिल्कुल नहीं है. वैसे भी देश के सकल घरेलू उत्पाद के आकलन के लिए जो तीन क्षेत्र तय हैं उनमें सबसे बुरी हालत कृषि क्षेत्र की ही है. उसकी वृद्धि दर ऐतिहासिक रूप से नीचे यानी सिर्फ ढाई फीसद है. जो विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर की तुलना में सबसे कम है. देश की आधी से ज्यादा आबादी से सरोकार रखने वाले कृषि क्षेत्र का जीडीपी में योगदान सिर्फ 17 फीसद निकलकर आया है. जाहिर है कि देश में वंचित तबके को ढूंढना हो तो वह देश के ग्रामीण क्षेत्र में ही पाया जाएगा. यानी इस बार के बजट से कोई तर्कपूर्ण उम्मीद लगाना हो तो वह गांव और कृषि क्षेत्र के पक्ष में लगाना ही जायज़ है. पिछले साल के अनुभवों में जो सबसे भयावह है, वह बेरोजगारी की समस्या रही. यह समस्या जितने विकराल रूप में हमारे सामने है उसे किसी भी तरह अब और आगे टाला नहीं जा सकता. बेरोजगारी के आबड़ में गांव और शहर दोनों हैं. गांव के गरीब तो पहले ही बेरोजगारी से परेशान हो रहे थे अब शहरी ग़रीब भी इसकी जद में है. इस तरह इस बार के बजट में अगर रोज़गार बढ़ाने के लिए पर्याप्त धन का प्रावधान नहीं दिखा तो बजट की समीक्षा करने वाले तीखी प्रतिक्रिया कर रहे होंगे. पिछले कुछ साल से संतुलित बजट का जुमला चलने लगा है. लोकतांत्रिक राज व्यवस्था में 'सबका साथ-सबका विकास' नारा सुनने में अच्छा लग सकता है. लेकिन लोकतांत्रिक राजव्यवस्था के बजट का मकसद सबके विकास की बजाए संवेदनशील रूप से वंचित वर्ग का ध्यान रखने की बात करता है. बजट का मकसद ही समर्थ से लेकर असमर्थ को देना है. यह मकसद खूब सोच समझकर बनाया गया है. कोई भी नया तर्क पैदा नहीं किया जा सकता कि देश में पूंजी बढ़ाना इसलिए जरूरी है क्योंकि उससे गरीब और असमर्थ के पास पैसा अपने आप पहुंच जाएगा. दुनिया में जिन लोगों ने और खुद हमने भी यह करके देख लिया है कि यह तर्क काम का नहीं है. अब अमीरों के रूट से गरीबों को सुविधा पहुंचाने की बजाए गरीबों को सीधे रास्ते से देने के इंतजाम की दरकार है. यानी बहुत कम आसार हैं कि इस बार संतुलित बजट के जुमले को सरकार की तारीफ के लिए इस्तेमाल किया जा सके. दरकार यह है कि इस बार का बजट अच्छा खासा अंसतुलित होकर गरीब, किसान, महिलाओं, बच्चों और बुजु़र्गों के पक्ष में झुका दिखे. वैसे सरकार की तरफ से ये इशारा पहले ही दिया जा चुका है कि इस बार लोकलुभावन बजट की उम्मीद न करें. लेकिन इसकी व्याख्या नहीं की गई है. बेशक बजट बहुत ही गोपनीय दस्तावेज होता है क्योंकि इसके बारे में पहले पता चल जाए तो निवेशकों के सबसे बड़े बाजार जिसे शेयर बाजार कहते हैं उसमें लूट मचने का अंदेशा हो जाता है. सो सरकार के इशारे से बिल्कुल भी अटकल नहीं लगती कि उसका आखिरी बजट किसके पक्ष में होगा. हो सकता है कि इसका यह मतलब हो कि सरकारी खर्च के लिए पैसे की उगाही ताबड़तोड़ ढंग से की जाएगी. लेकिन ऐसी बातें कोई सरकार पहले से नहीं कहती. वह तो सनसनीखेज तरीके से उगाही को भी देश हित में बताकर सहलाते हुए टैक्स और दूसरे तरीकों से उगाही करती है. वैसे भी उद्योग और व्यापार का भी हाल अच्छा नहीं है. उन पर और ज्यादा बोझ पड़ा तो अब वे झल्ला उठेंगे. इस तरह बिल्कुल भी अंदाजा नहीं लग पा रहा है कि इस बार के बजट में गाज किस तबके पर गिरने वाली है.

कासगंज हिंसा

मीडिया भी घटिया रिपोर्टिंग पर उतारू है. हिन्दी के 3 बड़े अख़बारों ने खबर में लिखा है," तिरंगा यात्रा का मुस्लिम समाज द्वारा विरोध करने के बाद सांप्रदायिक दंगे भड़के. 1 हिंदू युवक की मौत."....  इसे ये नहीं लिख सकते थे क़ि, " कासगंज में सड़क झंडा रोहण कर रहे लोगों के साथ तिरंगा रैली निकाल रहे लोगों से झड़प के बाद हिंसा में एक युवक की मौत" 
जबकि एबीपी न्यूज के वयराल सच में चश्मदीदों द्वारा बताया गया क़ि सड़क के किनारे मुस्लिम समुदाय ने झंडा रोहण का कार्यक्रम रखा था, वहीं से एबीवीपी के बाइक सवार लगभग 70-80 लोग निकले और जाने के लिए रास्ता माँगने लगे. उन्होने कहा क़ि थोड़ी देर रुक जाइए फिर चले जाना यहाँ भी तो तिरंगा ही फहरा रहे हैं. तो उन्होनें नारे बाजी शुरू कर दी. हिन्दुस्तान में रहना है तो वन्दे मातरम कहना है, हिंदू हिंदू हिन्दुस्तान, कटुए जाएँ पाकिस्तान..... और वीडियो में साफ दिखा क़ि तिरंगों के बीच में भगवा झंडा फहराया जा रहा था. ऐसे महॉल में लोग न भड़केंगे तो क्या होगा? मैं नहीं पक्ष ले रहा मूसलमानों का, जो भड़के और हिंसा की उनको क़ानून के हिसाब से सज़ा दी जाए. उनको उकसावे में न आकर खुद को शांत रखना चाहिए था. लेकिन क्या इसका ज़िम्मेदार आपको नहीं नज़र आया? बड़े शातिराना ढंग से लोग चंदन के खून, तिरंगे और हिंदू की बात करके खुद की लड़ाई को धर्म और देश की लड़ाई बना रहे हैं. इसमें साफ दिखता है क़ि लड़ाई एबीवीपी और कुछ मुसलिमलोगों के बीच थी. ना क़ि तिरंगे और हिन्दुस्तान के बीच. क्योंकि मुसलमान भी तो तिरंगा ही फहरा रहे थे. रही बात वन्दे मातरम की, तो गाने में कोई दिक्कत न होना चाहिए. जो ना गाना चाहे उसे पाकिस्तान भेजने और गद्दार कहने का कोई मतलब नहीं वैसे भी वो जय हिंद तो बोल ही रहा है. ये केवल और केवल आपके रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पूछे गये सवालों के जवाब से बचकर 2019 के चुनाव की तैयारी है.   
मुझे नहीं शक है किसी पर. 26 जनवरी को मैं अपने घर से ओफिस के बीच में 3-4 जगह ये देखता आया क़ि दाढ़ी टोपी वाले मुसलमान भी तिरंगा फहरा रहे थे. फेसबुक और व्हाट्सएप पर अधिकतर मुसलमान मित्रों ने तिरंगे का डीपी रखा या फिर अपनी फोटो के साथ तिरंगा लगाकर कोई अच्छा सा स्लोगन के साथ लगाया था. खूब शुभकामनाएँ दी. मैने तो कहीं नहीं सुना पाकिस्तान का समर्थन और हिन्दुस्तान या तिरंगे का विरोध करते हुए किसी को. ये  केवल और केवल उकसावे की राजनीति है. मुझे पता है आप मुझे भी मुस्लिम कहेंगे, मुझे भी पाकिस्तानी और देश द्रोही कहेंगे. लेकिन सच में सोचकर देखिए क्या इंसानों की लाशों पर बन रहा देश बहुत सुन्‍दर बन जाएगा? मान लिया सब मुसलमान पाकिस्तान चले गए.  या सब ख़त्म कर दिए आपने. फिर?????  जब आप किसी समाज में लोगों को लड़ने और हिंसा करने की आदत पड़ जाएगी, वो आपस में लड़ेंगे. किसी बच्चे को आवारा बना दो, वो सबसे लड़ता फिरे, घर वाले उसे ना रोके, फिर बड़ा होकर वो अपने ही माँ- बाप को कब मारने लगे कोई भरोसा नहीं है. इसलिए उनको प्यार से रहना सिखाइए. पाकिस्तान और तालिबान सब क्यों बर्बाद हो गये? क्योंकि वो पहले दूसरों को मारते थे, आज जब दूसरे नहीं बचे तो खुद के लोगों को मारते हैं. इसका उदाहरण आप, राम रहीम के लोगों का बवाल, हरियाणा और राजस्थान में जाट आरक्षण हिंसा, शहरनपुर में राजपूत और दलितों के दंगे, गुजरात में चली पाटीदार आंदोलन की हिंसा, अभी महाराष्ट्र में दलितों पर हमले फिर उनके द्वारा की गई हिंसा, और हाल ही में हुई राजपूतो की बच्चों तक पर हुई हिंसा में देख सकते हैं. इन हिंसाओं में कितने लोग मरे कोई जाकर देखता है उनके परिवारों को? जिन्होने अपने बेटे, पति और बाप खोए हैं, आज चंदन का नाम प्रयोग कर लो कल उसके माँ बाप को बुढ़ापे में जब बेटे की ज़रूरत होगी तो कोई नहीं जाएगा. इंसान मरते हैं, इंसानियत मरती है लेकिन होता कुछ नहीं क्योंकि नेता जिंदा रह जाता है. 

Mera Wala Review "Padmavati"

संजय लीला भंसाली की चर्चित और विवादित फिल्म पद्मावत करीब एक मिनट लंबे डिस्क्लेमर के साथ शुरू होती है। संजय लीला भंसाली जैसी बड़े स्तर की फिल्म बनाने के लिए जाने जाते हैं वो आपको पद्मावत देखकर हर क्षण महसूस होगा। फिल्म के भव्य सेट, मंदिर, किला, किले के बाहर पड़ी सेना की छावनी के चलते ये फिल्म आपको दूसरी हिन्दी ऐतिहासिक फिल्मों से एक स्तर ऊपर की महसूस होगी। फिल्म में एक भी ऐसा दृश्य या संवाद नहीं है जिसके चलते विवाद की गुंजाइश महसूस हो। फिल्म पूरी तरह से राजपूताना गौरव का बखान करती है और खिलजी को हिंसक, क्रूर और आक्रमणकारी दिखाती है। सही मायनों में फिल्म खिलजी या दिल्ली सल्तनत को कबीलाई, औरतों और सत्ता के लिए लड़ते, सनकी लोगों के झुंड की तरह दिखाती है। दूसरी तरफ राजपूतों को बेहद संयमित, नियम-कायदों से लड़ने वाला दिखाया गया है।
फिल्म की कहानी मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत पर आधारित ये फिल्म 13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश और मेवाड़ के राजपूत सिसोदिया वंश के बीच लड़ी गई लड़ाई पर आधारित है। फिल्म शुरू होती है अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी को मार कर दिल्ली की शाही गद्दी पर बैठने वाले अलाउद्दीन खिलजी से जो हर बेशकीमती चीज को हासिल करना चाहता है। उसके पास पहुंचकर मेवाड़ से देश निकाला झेल रहा राजपुरोहित चेतन राघव उसे मेवाड़ की महारानी पद्मावती को नायाब बताते हुए हासिल करने के लिए उकसाता है और इसके बाद शुरू होती राजपूतों और खिलजी के बीच एक लंबी जंग। फिल्म में एक भी ऐसा दृश्य नहीं है जिसमें अलाउद्दीन खिलजी बने रणवीर सिंह और रानी पद्मावती बनी दीपिका पादुकोण एक साथ नजर आए हों। पूरी फिल्म में खिलजी रानी पद्मावती की झलक देखने के लिए उतावला नजर आता है। फिल्म का एक हिस्सा जिसमें खिलजी को शीशे में से रानी पद्मावती की झलक दिखाने की बात मानी जाती है वहां भी एक क्षण के लिए घूंघट में दिखाकर पर्दा बंद कर दिया जाता है। बाद में खिलजी ये बात बोलता भी है कि एक झलक दिखाने के नाम पर तुम राजपूतों ने भी तो मेरे साथ धोखा किया।
अभिनय के हिसाब से फिल्म के तीनों मुख्य एक्टर रावल रतन सिंह के रोल में शाहिद कपूर, रानी पद्मावती के रोल में दीपिका पादुकोण और अलाउद्दीन खिलजी के रोल में रणवीर सिंह अपने किरदार के साथ न्याय करते दिखते हैं। खिलजी के रोल में रणवीर सिंह इतने उम्दा लगे हैं कि ये रोल उनके करियर में एक मील का पत्थर साबित होगा। कुछ सीन में उनके संवाद और चेहरे के मक्कारी से भरे भाव देखने लायक है। अपने सर के ताज और पद्मावती को लेकर खिलजी की सनक उनके अभिनय में साफ नजर आती है। शाहिद कपूर अपने अभिनय से तो प्रभावित करते हैं लेकिन अपनी कद-काठी से मात खाते दिखते हैं। फिल्म के एक दृश्य जिसमें रावल रत्न सिंह की पीठ पर तीर खाए हुए हैं और खिलजी उनकी तलवार के पहुंच में होते हुए भी वो मार नहीं पाते बेहद शानदार है। दीपिका पादुकोण रानी पद्मावती के रोल प्रभावित करती हैं। खूबसूरती, प्रेम, धैर्य, युद्ध और त्याग सभी तरह के मनोभाव में रानी पद्मावती के किरदार में वो प्रभावित करती हैं। मलिक काफूर के रोल जिम सरब के हिस्से में कई अच्छे दृश्य हैं और वो आपको फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रहेंगे। 
भारत में इतिहास आधारित फिल्म बनाने की ज्यादा परंपरा नहीं है। ऐसे में ये फिल्म आपको अपनी आन बान शान के लिए लड़ते राजपूताना के इतिहास की झलक देगी। चित्तौड़गढ़ दुर्ग जिसमें माना जाता है कि आक्रमणकर्ताओं से बचने के लिए तीन बार जौहर किया गया है उन्हें ये फिल्म एक श्रद्धांजलि की तरह है। इसके अलावा राजस्थान की लोक संस्कृति भी फिल्म के माध्यम से करीब से देखने को मिलती है। वहीं फिल्म की सबसे बड़ी कमी है इसकी रफ्तार। फिल्म शुरुआत में बेहद धीमी है जिसके चलते दूसरे हाफ में काफी बोरिंग समय बीतता है। फिल्म के संगीत पर राजस्थानी भाषा और संस्कृति के साथ मिलाकर बेहतरीन डांस के साथ प्रस्तुत किया है। कुल मिलाकर देखने लायक फिल्म जिसे मैं 3.5 स्टार देता हूँ। एक स्टार शायद फिल्म के 33 कट्स पर मैंने काट लिया। असली कहानी और बेहतर होती।

Saturday, January 20, 2018

नौकरियों पर रवीश कुमार की रिपोर्ट सीरीज़

1- क्या जीएसटी के कारण राज्यों का औसत राजस्व घटा है? दावा था कि राज्यों का राजस्व बढ़ेगा. बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का कहना है कि ज़्यादातर व्यापारी 20 लाख से कम टर्नओवर वाले हो गए. इसके लिए सुशील मोदी ने suppression of turnovers शब्द का इस्तेमाल किया है. साफ शब्दों में व्यापारी टैक्स चोरी करने के लिए अपना टर्नओवर 20 लाख से कम दिखा रहे हैं. इसके कारण उन्हें जीएसटीएन में पंजीकरण की ज़रूरत नहीं होती है. यह भी देखा जा रहा है 1 करोड़ से अधिक टर्नओवर वाले जिन व्यापारियों ने कंपोजिशन स्कीम में पंजीकरण कराया था वो टैक्स नहीं दे रहे हैं. हमें तो यही बताया गया था कि जीएसटी लागू होने के बाद कोई टैक्स चोरी कर ही नहीं सकेगा तो फिर ये suppression of turnover कैसे हो रहा है सर. क्या जीएसटी के बाहर कोई दूसरा नेटवर्क बन चुका है जिससे कारोबार चल रहा है और चलने दिया जा रहा है. राज्य सरकार के कर्मचारी ही बता सकते हैं कि सैलरी समय पर मिल रही है या नहीं, बिल का पेमेंट हो रहा है या नहीं. कोई सुनने वाला नहीं तो मैं हूं न!
अख़बार ने लिखा है कि जीएसटी आने के बाद राज्यों का औसत राजस्व नवंबर और दिसंबर 2017 में 20 प्रतिशत कम हो गया है. अगर यह जारी रहा तो केंद्र सरकार को भरपाई करनी होगी. सितंबर के बाद फिर से पेट्रोल के दाम 70 रुपये प्रति लीटर के पार जा चुके हैं. कई शहरों में 80 रुपये प्रति लीटर हो गया है. भोपाल में 76 रुपये प्रति लीटर से ज़्यादा पर पेट्रोल मिल रहा है. वो भी क्या दौर था जब 60-65 होने पर ख़ूब प्रदर्शन होता था, अब 75 और 80 पर भी शांति है. यह बताता है कि लोग अभी 100 रुपये प्रति लीटर तक देने की स्थिति में आ गए हैं! काश कहीं चुनाव हो जाए, दाम अपने आप कम हो जाएं. 500 अरब उधारी का इरादा था मगर अब 200 अरब ही उधारी लेगी सरकार. ख़बर सुनकर नाचा बाज़ार. सेंसेक्स झम से पहुंचा 35,000 पार. मगर इससे नहीं मिलता रोज़गार. अब आपको इस ख़बर का गेम समझाते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया ने जहां इस ख़बर को डाला है उसी के बगल में एक और ख़बर है. आप यह न समझें कि सरकार ने कुछ अच्छा किया इसलिए अब वह 50,000 करोड़ की उधारी नहीं लेगी, 30,000 करोड़ की उधारी ही लेगी. बगल में खबर है कि सरकार इस वित्त वर्ष के आखिर तक अपनी हिस्सेदारी बेचकर 90,000 करोड़ जुटाएगी. आमतौर पर इसे विनिवेश कहते हैं जिसकी सब तारीफ करते हैं मगर ज़रा सोचिए. आप अपने भविष्य के लिए कुछ हिस्सा रखते हैं, क्या उसे बेचना हमेशा ही अच्छा होता है.
सरकार ने हिन्दुस्तान पेट्रोलियम, ओएनजीसी में अपनी हिस्सेदारी बेच दी है. पिछले साल सरकार ने 46,000 करोड़ की हिस्सेदारी बेची थी, इस साल 90,000 करोड़ तक पहुंचने के आसार दिख रहे हैं. फिर सरकार का कौन सा वित्तीय प्रबंधन है कि सब कुछ बेच ही रहे हैं. अगले वित्त वर्ष में सरकार अपना हिस्सा बेचकर 1 लाख करोड़ रुपये जुटाएगी. हिस्सा का मतलब है सरकार की पूंजी. संपत्ति. पहले के विनिवेश से मुल्क के आर्थिक जीवन में और आपके जीवन में क्या बदलाव क्या आया है, इसे कोई नहीं बताता है. बस सब कहेंगे अच्छा हुआ, अच्छा हुआ. बात समझो न बच्चा, कि क्या अच्छा हुआ. हुज़ूर को विदेशी निवेश से हो रहा प्यार है. मेक इन इंडिया नहीं चला तो 100 परसेंट एफ डी आई की पतवार है. उम्मीद बिकती है बाज़ार में, वोटर ख़रीदार है. रिटेल में 100 परसेंट, प्राइवेट बैंक में 74 परसेंट से बढ़कर 100 परसेंट. बस मत समझना बैंकों में बढ़ रहीं नौकरियां हैं. ज़रा अख़बार पढ़ना सीख लो, पता कर लो, बड़े बैंकों का क्या हाल है. जर्मनी का एक बड़ा भारी बैंक है डोएचे बैंक. आर्थिक और तकनीकी कारणों से यह बैंक 2015 से लेकर 2019 के बीच करीब 20,000 लोगों को निकाल देगा. अभी ख़बर आई है कि नीचे के 20 प्रतिशत कर्मचारियों को भी निकालेगा. 2007 की मंदी में बैंक ही तो डूबे थे. केंद्र सरकार के पास प्रत्यक्ष करों का जमावड़ा बढ़ा है. सोमवार तक 18.7 प्रतिशत बढ़ा है. बजट में अनुमान था कि 9.8 खरब जमा होगा और यह 6.89 खरब हो गया. बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि 1.22 खरब रिफंड भी करना है. उसे लौटाने की गति धीमी है. क्या असर पड़ेगा, किस पर असर पड़ेगा, इसका ज्ञान हमको नहीं है. फिलहाल अखबार ने लिखा है कि प्रत्यक्ष करों का जमा होना बता रहा है कि कई सेक्टर में प्रगति दिख रही है.

आम आदमी पार्टी की असली परीक्षा अब

आप' के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने से पैदा हुआ राजनीतिक संकट दिल्ली की तीनों पार्टियों बीजेपी, कांग्रेस और आप के लिए एक नई चुनौती भी है. अगले छह महीने में इन 20 सीटों पर चुनाव होंगे जो किसी छोटे राज्य के पूरे चुनाव से कम नहीं होंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ये चुनाव अपने-अपने पानी की परख करने का अवसर होंगे. गुजरात में 100 सीटों तक सिमट गई बीजेपी अगर इन 20 सीटों में 10 पर भी जीत हासिल करती है तो 2019 से पहले ये उसके लिए एक बड़ा टॉनिक होगा. आख़िर पिछली बार पूरी विधानसभा में उसके कुल 3 विधायक थे जो एक ही गाड़ी में विधानसभा आ सकते थे. अगर वह 10 से भी ज़्यादा सीटें जीत ले तो 2019 की भूमिका बन जाएगी. यही बात कांग्रेस के बारे में कही जा सकती है. दिल्ली में 15 बरस राज करने वाली कांग्रेस पिछले चुनावों में खाता तक नहीं खोल पाई. ऐन गुजरात चुनावों के वक़्त कांग्रेस के अध्यक्ष बने राहुल गांधी के आने के बाद कांग्रेस के पुनर्जीवन का दावा दिल्ली के चुनाव पुख़्ता कर सकते हैं. अगर कांग्रेस इन 20 में से 5 सीटें भी जीत ले तो उसके लिए बड़ी बात होगी.  लेकिन इस फ़ैसले के असली सबक आम आदमी पार्टी के लिए हैं. लोकपाल बिल के लिए चलाए गए अण्णा आंदोलन की कोख से पैदा हुई आम आदमी पार्टी शहरी मतदाताओं के बीच अचानक इसलिए लोकप्रिय हुई कि लोगों ने उसमें राजनीतिक सड़ांध के ख़िलाफ़ एक विकल्प बनने की उम्मीद देखी और माना कि वह राजनीतिक शुचिता को बहाल करेगी. वह दौर ऐसा था जब अरविंद केजरीवाल बिल्कुल बिजली का तार लगते थे जिसको किसी ने छू लिया तो करेंट लग जाए. लेकिन बिजली का यह तार धीरे-धीरे जैसे ठंडा होता हुआ व्यवस्था का पुर्जा होकर रह गया है. उस आम आदमी पार्टी में तीन तरह के लोग शामिल हुए थे- एक तो वे जो लोकपाल आंदोलन से पैदा हुए थे. ये नेक इरादों वाले नौजवान थे जो अपने समाज की बुराइयां दूर करना चाहते थे, लेकिन किस तरह- ये उन्हें नहीं मालूम था. दूसरी कतार उन लोगों की थी जो आप की लोकप्रियता देख दूसरे दलों से आप का हिस्सा बनते चले गए. 
लेकिन आप में एक और हिस्सा था जिसने इसे एक रचनात्मक व्यक्तित्व दिया था. यह समाजवादियों का वह धड़ा था जो किसी वैकल्पिक राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन के अभाव में मायूस था और जिसने आप से बड़ी उम्मीद पाली थी. योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और दिल्ली और देश भर के ढेर सारे ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी थे जिनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे केजरीवाल के जादू और आम आदमी पार्टी की ऊर्जा को वास्तविक बदलाव के वाहन की तरह इस्तेमाल कर सकेंगे. इन तीनों तरह के लोगों के समन्वय ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी को ऐसी विराट ताकत बनाया जिससे पूरे देश में एक उम्मीद फैल गई. 2013 में इसी ताकत के सहारे अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित जैसी दिग्गज उम्मीदवार को धूल चटा दी थी. 2015 में पूरी दिल्ली जैसे आम आदमी पार्टी के कब्ज़े में आ गई. तब पार्टी को सिर्फ़ अपने कार्यकर्ताओं और विराट जन समर्थन के सहारे जीत मिली थी. मगर क्रांतियां सबसे पहले अपने बच्चों को खा जाती हैं. सत्ता सबको बदलती है, उसने आप को भी बदला. आम आदमी पार्टी के भीतर टकराव दिखे, उसके सबसे ज़्यादा साख वाले नेता अपमानित करके निकाले गए, केजरीवाल ने पार्टी के भीतर स्टिंग की संस्कृति को बढ़ावा दिया, पूरी दिल्ली को स्टिंग करने की सलाह दे डाली, सरकार ने विज्ञापन पर इतने पैसे ख़र्च किए कि उस पर जांच बैठ गई. वह एक के बाद एक चुनावी मोर्चे पर भी शिकस्त खाती दिखी. बीते दिनों राज्यसभा में तीन सदस्यों को भेजे जाने पर जो अरुचिकर विवाद हुआ और उसका जो दिलचस्प अंत हुआ, वह भी आम आदमी पार्टी के बदलते चरित्र का सुराग देने वाला साबित हुआ. यह ताबूत की आख़िरी कील नहीं है. आम आदमी पार्टी अब भी दिल्ली में एक बड़ी ताकत है. उसके पास स्पष्ट से ज़्यादा बहुमत है. कार्यकर्ताओं का एक बड़ा समूह है. कई ऐसे नेता हैं जो अब भी दूसरे दलों के नेताओं से ज़्यादा साफ़-सुथरे हैं. लाभ के पद के जिस मामले में विधायक अयोग्य घोषित हुए हैं, उसका एक तकनीकी पहलू भी है. बल्कि सरकार चलाते हुए यह दिखता रहा है कि आम आदमी पार्टी नियम-कायदों की औपचारिकता की अक्सर अवहेलना करती रही है जिस पर उपराज्यपाल से उसका विवाद भी होता रहा है. तो ये छह महीने आप के लिए अपनी छूटी हुई लड़ाई वापस लड़ने के महीने होंगे. पार्टी में विज्ञापनबाज संस्कृति को बढ़ाने की जगह उसे कार्यकर्ताओं और लोगों में विश्वास को बढ़ावा देना होगा- उसे फिर उसी वैकल्पिक राजनीति की राह पर चलना होगा जिसे वह भूल आई है. इस क्रम में वह चाहे तो अपने पुराने और छूटे हुए दोस्तों को जोड़ने का काम भी कर सकती है. अब इस नई जंग के लिए आप का समय शुरू होता है.

Thursday, January 18, 2018

भारत के साथ इजरायल के रिश्ते

इजराइल और भारत के बीच बढते सम्बन्ध से भारत सरकार का किसी भी तरह से कोई फायदा नहीं है. सैन्य संबंध से सिर्फ और सिर्फ इजराइल का ही फायदा होगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि हिंदुस्तान में शुरू से दो तरह की चीज़े बराबरी में चलती आई है एक सरकार थी वो प्रो-फिलिस्तीन रही है और बरबरी में आरएसएस का नेटवर्क जुड़ा था.  यह नेटवर्क अपनी विचारधारा को बढ़ाने का काम कर रहा था. अब मोदी सरकार आई है वो उसी फ़िक्र की सरकार आ गयी है. दरअसल इजराइल यह सब कुछ करके ‘ग्रेटर इजराइल’ बनाना चाहता है. अगर हम “ग्रेटर इजराइल” के झंडे को देखें तो उसमें एक सितारा बना हुआ है और दो नीली रेखाए बनी हुई है, यह रेखाएं पानी की लहरों को दर्शा रही है यानी दरया-ए-फरात से लेकर दरया-ए-नील तक “ग्रेटर इजराइल” बनाना चाहता है और इसका एलान खुलेआम किया गया है. ग्रेटर इजराइल में मदीने का एक बड़ा हिस्सा है इसी के साथ जॉर्डन,सीरिया, इराक का एक बड़ा हिस्सा शामिल है. भारत को इस वक़्त पाकिस्तान से भी हमले का बड़ा खतरा नज़र आ रहा है. क्योंकि पाकिस्तान को इजराइल का साथी कहा जाने वाला सऊदी अरब पाकिस्तान को फण्ड दे रहा है. इजराइल भारत को खुलेआम इस्तेमाल कर रहा है. अगर हम येरुशलम मुद्दे की बात करें तो फिलिस्तीन के समर्थन में पूरी दुनिया के मुस्लिम एक तरफ थे और अमेरिका इजराइल एक तरफ है. अगर भारत ने वाकई फिलिस्तीन का समर्थन करता है तो उसने इजरायल के राष्ट्रपति को भारत में बुलाकर इतनी मेहमानवाजी में क्यों लगा हुआ है. अब सवाल उठता है क़ि इजरायल से भारत के संबंध अच्छे रखने से क्या फ़र्क पड़ेगा? असल में इस कदम से पाकिस्तान को मज़बूत बनाया जा रहा है. और इसकी वजह यह है कि जो बैतूल मुकद्दस से सभी मुसलमानों की भावनाएं जुड़ी हुई है, इजराइल इसे  खत्म करने की तैयारी में लगा हुआ है. OIC की एक बैठक हुई जिसमें तमाम मुस्लिम देश एक तरफ खड़े हो गए कि अगर भारत इजराइल के साथ अच्छे संबंध बनता है तो यह तमाम देश पाकिस्तान की तरफ खड़े हो जाएँगे और उन देशों के साथ चीन के संबंध बहुत अच्छे है. चाइना और पाकिस्तान के संबंध भी बहुत अच्छे रहे है. अब ट्रम्प का रवैया भले बदला है लेकिन अधिकतर इंटेलीजेंस और सिस्टम अभी भी ओबामा की नीति वाला ही है वहाँ. अमेरिका और इजराइल के इन सभी देशों से रिश्ते अच्छे नहीं है और अब रूस से भी संबंध खराब होते जा रहे है तो अब यह सवाल उठता है अब इन्हें बचाने कौन आएगा? तो इस से  साफ़ ज़ाहिर होता है कि हिंदुस्तान अगर इजराइल के साथ अच्छे संबंध बनाया है तो इससे यह साबित होगा कि भारत अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार रहा है और यह देश के बहुत खराब स्थति हो सकती है. कुछ लोग कह रहे हैं क़ि एक वक़्त आएगा जब पाकिस्तान भी फिलिस्तीन के साथ खड़ा होगा क्योंकि पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध खराब होते हुए नज़र आ रहे है. खैर मुझे ये बात नही समझ आई. यहाँ तक क़ि अमेरिका ने पाकिस्तान पर सहायता राशि देने से भी रोक लगा दी है. इस वक़्त पाकिस्तान को सहायता राशि की ज़रूरत जो वह अमेरिका से ना लेकर रूस से ले सकता है क्योंकि रूस और पाकिस्तान के संबंध पहले से ही ठीकठाक रहे हैं. न्यूक्लियर  पॉवर भी सिर्फ एक ही इस्लामिक देश के पास है और वो है पाकिस्तान. अगर भविष्य में अगर इजराइल के खिलाफ लड़ाई हुई तो पाकिस्तान की अहमियत और भी ज्यादा हो जाएगी. इस स्थिति में पाकिस्तान का साथ देने सभी मुस्लिम देश आ जाएँगे. तो सब बातों से पता चलता है कि भारत यह सब करके अपने दुश्मन देश पाकिस्तान को मज़बूत बना रहा है.
अगर इतिहास में देखें तो सऊदी अरब, और भी ज़्यादातर अरब देशों, भी इजरायल के बहुत अच्छे संबंध रहे है. लेबनान और जॉर्डन के इजराइल के साथ अच्छे संबंध रखे थे और उनका हाल सब जानते है. OIC की मीटिंग में सभी मुस्लिम देश एकजुट हो गए थे. सऊदी अरब का सब इतना साथ तो दे रहे है. लेकिन सऊदी अरब की इस वक़्त हालत की है यह सब जानते है. जबकि इजराइल को कोई भी देश पसंद नहीं कर रहा है. इजराइल और अमेरिका का साथ देना वाला कोई  भी देश नहीं बचा है. ट्रम्प के येरुशलम फैसले से एक बहुत अच्छी चीज़ सामने आई है और वो है “एकजुटता.” ट्रम्प के फैसले ने दुनिया भर के मुसलमानों को एकजुट कर दिया है और आने वाले वक़्त में हालत ऐसे पैदा होंगे कि पूरी दुनिया एक तरह होगी और अमेरिका और इजराइल एक तरफ.
अगर हिंदुस्तान भविष्य में इजराइल के साथ खड़ा हो जाता है तो एशिया में इसकी स्थिति पर क्या फर्क पड़ेगा?इस वक़्त हिंदुस्तान को ISIS का खतरा बढ़ता हुआ नज़र आ रहा है. ISIS को हिंदुस्तान में एयरलिफ्ट अमेरिका और इजराइल के द्वारा ही किया जा रहा है. अमेरिका और इजराइल अपने हथियार किसी ना किसी तरह से आतंकवाद समूह को बेच रहे है. जिससे भी सिर्फ अमेरिका और इजराइल का फायदा होता हुआ नज़र आ रहा है. हिंदुस्तान को इजराइल के साथ खड़े होने पर भी आतंकी हमलों का डर सताएगा और कुछ नहीं. हिंदुस्तान में आये दिन हिन्दू-मुस्लिम के बीच पैदा हो रही नफरत का उदहारण देखने को मिलता रहता है यह सब इसी का नतीजा है. भारत में इस तरह का खून खराबा आगे भी बहुत ज्यादा देखने को मिल सकता है अगर हिंदुस्तान यूं ही आँख बंद करे हुए इजराइल और अमेरिका का साथ देता रहा. भारत पर यह बहुत बड़ा खतरा है. यह अशांति का माहौल सिर्फ उन्ही इलाकों में है जहाँ “ग्रेटर इजराइल” बनाया जाएगा जैसे कि जॉर्डन, सीरिया, इराक, आदि. अफगानिस्तान में ISIS की दखलंदाजी बढती ही जारी है इसके पीछे भी अमेरिका और इजराइल का हाथ है. इजराइल को अपना “डिवाइड एंड रूल” फार्मूला पूरा करना जिसके लिए वो किसी भी हद्द तक जा सकता है. हिंदुस्तान में हिन्दू-मुस्लिम का विवाद इसका सबसे बड़ा उदहारण है. अमेरिका काम सिर्फ हिंदुस्तान के हिन्दू-मुस्लिम को बाटने करने का है, इसलिए हर कोई अमेरिका और इजराइल से खुद को बचाने की कर रहे है.

इजरायल और फ़लस्तीन का इतिहास

ऑटमन साम्राज्य ने 14वीं शताब्दी तक पूरे मिडिल ईस्ट पर अपना कब्जा कर लिया था और 19वीं सदी तक यह कमजोर होने लगा था। 19वीं सदी में पूरे यूरोप में राष्ट्रवाद की बहार आ गई, जिसमें इटली, जर्मनी अहम हैं, ये तमाम देश छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे थे, लेकिन एकीकरण के इस दौर में यह देश 1950 के आस-पास एक होना शुरु हो गए। इसी एकीकरण के दौर में थियोडोर हर्जल ने यहूदी राष्ट्र की बात शुरु की, इसे जाइनिस्ट आंदोलन का नाम दिया गया। जाइनिस्ट आंदोलन उसे कहते हैं जिसमें यहूदी एक बार फिर से अपनी पवित्र धरती पर जाना चाहते हैं, जहां से यहूदी धर्म की शुरुआत हुई थी, यह तकरीबन तीन हजार साल पहले फिलिस्तीन में इसकी शुरुआत हुई थी। यहूदियों के इजरायल जाने की एक और बड़ी वजह यह थी कि पूरे यूरोप में यहूदियों का संहार किया जा रहा था, जिसमें सिर्फ जर्मनी या हिटलर नहीं आता है, बल्कि पूरे यूरोप में फ्रांस, रूस, इटली, पोलैंड के देशों में यहूदियों पर काफी अत्याचार किया गया, इनके धर्म को कई जगहों पर बैन कर दिया गया। इन अत्याचारों के चलते यहूदियों ने अपनी धरती पर वापस जाने की शुरुआत की।  1917 में जब प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, तभी ऑटमन साम्राज्य हारने की कगार पर था, तभी ब्रिटेन के विदेश मंत्री सर आर्थर बैलफॉर ने कहा कि हम यहूदियों को युद्ध खत्म होने के बाद फिलिस्तीन में स्थापित करने की पूरी कोशिश करेंगे। लेकिन इसी दौरान ब्रिटेन ने गुपचुप तरीके से एक साइक्स पीको करार किया, इसे फ्रांस और रूस के साथ किया गया था, जिसमें यह कहा गया था कि प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद कौन सा देश किस देश पर अपना कब्जा करेगा। इस करार के तहत ब्रिटेन में फिलिस्तीन को अपने हिस्से में रखा था, जबकि सीरिया, जार्डन को फ्रांस को दे दिया गया था, जबकि टर्की के कुछ इलाकों को रूस को दे दिया गया था। इसके साथ ही अरब देशों को ब्रिटेन ने भरोसा दिया कि युद्ध के बाद वह फिलिस्तीन को आपको दे देंगे, अगर आप ऑटमन साम्राज्य के खिलाफ हमारा साथ दें। पहले विश्व युद्ध के बाद फिलिस्तीन में एक नई सरकार का गठन हुआ, इस दौरान बड़ी संख्या में फिलिस्तीन में यहूदी शरण लेने लगे, यहां इस समय यहूदियों की कुल आबादी सिर्फ 3 फीसदी थी, लेकिन अगले तीस साल में यह बढ़कर 30 फीसदी तक पहुंच गई। यहूदियों ने यहां आकर अरब लोगों से जमीन खरीदनी शुरू कर दी और यहां यहूदी बस्तियों की स्थापना करनी भी शुरू कर दिया। इसी दौरान 1936 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अरब ने बगावत शुरू कर दी, इस बगावत को खत्म करने के लिए ब्रिटेन की सरकार ने यहूदी लड़ाकों का साथ दिया। इस बगावत के बाद ब्रिटेन की सरकार ने यहूदियों के फिलिस्तीन आने पर कुछ पाबंदी लगा दी, जैसे अब हर साल 10 हजार से अधिक यहूदी यहां नहीं आ सकते हैं, ताकि अरब लोगों की बगावत को थोड़ा रोका जा सके। जिसके बाद यहूदी लड़ाके ब्रिटेन की सरकार के खिलाफ शुरू कर दिया और गुरिल्ला लड़ाई करने लगे। फिलिस्तीन में इस समय चल रहे विवाद के बीच ही 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, इस वक्त यूरोप में बड़ी त्रासदी हुई थी जिसे होलोकास्ट कहते हैं इसका मतलब होता है यहूदियों का जनसंहार, जर्मनी में लाखों की संख्या में यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया था। कहते हैं कि इस दौरान 40 लाख यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया। इस अत्याचार के दौर में यहूदी फिलिस्तीन की ओर भागने लगे, क्योंकि उन्हें लगने लगा था अगर जीवित रहना है तो हमें अपने ही देश जाना होगा। 1947 में यूएन में एक नया रिजोल्यूशन हुआ कि क्या यहूदियों को अपना एक देश मिलना चाहिए, जिसपर इजराइल को समर्थन मिला। इस रिजोल्यूशन के बाद इजरायल को दो भाग में बांट दिया गया, एक हिस्सा था यहूदी राज्य और एक था अरब राज्य। लेकिन बड़ी समस्या थी जेरूसलम क्योंकि यहां आधी आबादी यहूदियों की थी और आधी आबादी मुसलमानों की थी। इसलिए यूएन ने फैसला दिया कि जेरूसलम को अंतर्राष्ट्रीय सरकार के द्वारा चलाया जाएगा। लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद इजराइल के आस-पास के देशों ने इजराइल पर हमला कर दिया। मिश्र, सीरिया, इऱाक, जॉर्डन ने इजरायल पर हमला कर दिया, इसे 1948-49 का अरब इजराइल युद्ध कहते हैं। इसमें खास बात ये है क़ि अपने सुना होगा क़ि इजरायल बहुत ताकतवर देश है. दरअसल वो शुरुआत से ही बिना किसी को खबर किए अपनी सेना तैयार करने लगा था. इस युद्ध में इजरायल ने अपनी ताकत का परिचय देते हुए इन देशों को पीछे ढकेलकर अपनी जमीन में इजाफा किया, यानि कि जो जमीन इजराइल को यूएन की द्वारा दी गई थी अब वह इस युद्ध के बाद और बढ़ गई थी। इस लड़ाई के दौरान बड़ी संख्या में शरणार्थियों की समस्या खड़ी हो गई, इजरायल से तकरीबन सात लाख लोग विस्थापित हो गए, इस लड़ाई के बाद गाजा पट्टी का नियंत्रण इजरायल के पास चला गया और पश्चिमी घाट पर जार्डन ने कब्जा कर लिया था। मिश्र, सीरिया और जॉर्डन से इजरायल के रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे थे, इनके बीच में आपसी तनाव काफी ज्यादा था, 1967 में मिश्र ने अपनी सेना इजरायल की सीमा पर तैनात कर दी, लेकिन इजरायल ने मिश्र के हमले से पहले ही हमला कर दिया और इस लड़ाई में इजरायल ने मिश्र, जॉर्डन और सीरिया को बुरी तरह से हराया और कई इलाकों को इन देशों से इजरायल ने अपने कब्जे में कर लिया, जिसमें गाजा और वेस्ट बैंक आज भी इजरायल के कब्जे में है। 1978 में इजरायल को मिश्र ने पहली बार एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी थी जिसपर काफी विवाद हुआ था। उस वक्त मिश्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सदाक की कुछ साल बाद हत्या तक कर दी गई थी। इन तमाम संघर्ष के बाद फिलिस्तीन और इजरायल के बीच विवाद शुरू हुआ, इजरायल के खिलाफ PLO यानि पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ने इजरायल के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की, जिसके काफी चर्चित नेता थे यासिर अराफात। फिलिस्तीन के लोगों ने इजरायल सरकार के खिलाफ अपना विरोध शुरू कर दिया, क्योंकि इन लोगों को इनके अधिकार नहीं मिले और वेस्ट बैंक पर इजरायल की सेना तैनात थी। यह विवाद हिंसा में तब्दील हो गई और तकरीबन 100 यहूदी और 1000 अरब की मौत हो गई। इसी दौरान हमास का जन्म हुआ, जो कि PLO से भी ज्यादा खतरनाक थी। PLO इजरायल से समझौते के पक्ष में था, जबकि हमास का मानना था कि इजरायल देश का अस्तित्व ही नहीं है, हम इसे राष्ट्र नहीं मानते हैं। 1993 में ओस्लो करार के तहत इजरायल और फिलिस्तीन या यूं कहें इजरायल के पीएम येट्सचाक राबिन और पीएलओ के नेता यासिर अराफात के बीच समझौता हुआ, इन दोनों ही नेताओं को नोबेल पीस अवॉर्ड मिला था। इस समझौते के तहत पीएलओ ने इजरायल को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी और इजरायल की सरकार ने पीएलओ को मान्यता दी। इससे पहले पीएलओ को आतंकी संगठन माना जाता था। समझौते के तहत पांच साल के लिए हिंसा को रोकने पर करार हुआ। वर्ष 2000 में एक बार फिर से इजरायल और फिलिस्तीन के बीच संबंध खराब हो गए, इसकी बड़ी वजह थी उस वक्त इजरायल के राष्ट्रपति एहूद बराक 1000 सुरक्षा गार्ड को लेकर टेंपल माउंट पर चले गए, इसे यहूदियों और मुस्लिम दोनों का पवित्र स्थान कहा जाता है। इसके चलते फिलिस्तीन के लोग भड़क गए और हिंसा शुरू हो गई, इस दौरान तकरीबन 1000 यहूदी और 3200 फिलिस्तिनियों को मार दिया गया, कई बसों को उड़ा दिया गया और कई जगह पर धमाके किए गए। इस हिंसा के बाद इजरायल की सरकार इस विवाद का समाधान निकालने की बजाए इसे रोकने पर ध्यान लगाने लगी। इसके तहत इजरायल की सरकार ने गाजा पट्टी से यहूदियों को हटा दिया, इसके अलावा सेना को भी यहां से हटा लिया गया। इसके कुछ समय बाद यहां चुनाव होता है और हमास ने यहां का चुनाव जीत लिया। लेकिन PLO की पार्टी फताह ने हमास को सरकार में लेने से इनकार कर दिया। जिसके बाद 2007 में हमास ने गाजापट्टी पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और फतह को यहां से खदेड़ दिया और इसके बाद काफी ताकतवर बन गया। इस विवाद के बाद हमास ने इजरायल पर हमला करना शुरू कर दिया, हमास ने रिहायशी इलाकों में हमला करना शुरू कर दिया, ऐसे में इजरायल ने गाजा पट्टी की घेराबंदी कर दी, इसके तहत अब गाजा में किसी भी तरह का सामान नहीं जा सकता, कई जगह पर चेकपोस्ट बना दिया गया, कोई भी बाहर का जहाज गाजा में नहीं आ सकता है। इजरायल का कहना है कि इरान जैसे कई देश यहां रॉकेट को भेजता है। लेकिन इस नाकेबंदी के चलते अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से मिलने वाली मदद यहां नहीं पहुंच पाती, जिसकी वजह से पिछले 10 सालों में गाजा की स्थिति काफी खराब हो गई है। यहां 40 फीसदी तक बेरोजगारी है, लोगों के घर में बिजली-पानी नहीं है। गाजा में हमास और इजरायल के बीच कई बार युद्ध हुए, जिसमें हजारों लोगों की मौत हो चुकी है, इस लड़ाई में दोनों ही गुट स्थानीय नागरिकों को भी निशाना बनाते हैं। यरूशलम बहुत बड़ा शहर है, यह इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म के लिए काफी अहम है। यह यहूदियों का दुनिया में सबसे पवित्र स्थान है, इस्लाम में मक्का और मदीना के बाद यह तीसरा सबसे पवित्र स्थान है। ईसाई धर्म के लिए भी यह काफी अहम स्थान है क्योंकि यहां जीसस क्राइस को सूली पर चढ़ाया गया था। तीनों धर्म को अब्राहम धर्म कहा जाता है। पूर्वी यरूशलम में ज्यादातर मुस्लिम आबादी है, जबकि पश्चिमी हिस्से में यहूदी आबादी है, जबकि इनके बीचो-बीच यह पवित्र स्थान मौजूद है। यहां अल अक्सा मस्जिद में इजरायल 18-50 वर्ष के लोगों को जाने से रोकता है क्योंकि ये लोग अक्सर यहां प्रदर्शन करते हैं। यरूशलम को पूरी दुनिया में आज भी इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता नहीं मिली है। इजरायल यरूशलम को अपनी राजधानी मानता है, जबकि दुनिया के अन्य देश अभी भी तेलावीव है, लिहाजा सारे दूतावास यहीं स्थित हैं।

Sunday, January 14, 2018

पप्पू यादव एक नेता के रूप में

अगर भाषणों में अपना एजेंडा प्रस्तुत करना ही नेता की सबसे बड़ी खूबी है तो किसी भी समाजवादी, लेफ्ट नेता या केजरीवाल से भी बेहतर मुझे पप्पू यादव लगते हैं. आज के पहले लोकसभा में बोलते सुना था, तो तोड़ा बहुत पसंद थे. आज उनके कई इंटरव्यू और भाषण सुने तो लगा ये तो लालू यादव के शुरुआती दौर को आजतक पकड़ कर चलना चाहते हैं. वो संपत्ति और मनी के centralisation की बात करते हैं. मतलब किसी भी आदमी के पास 1 करोड़ से अधिक की संपत्ति या 10 लाख रुपए से अधिक पैसा नहीं होना चाहिए.  वो शिक्षा और स्वास्थ्य के माफियाओं को उखाड़ फेकने की बात करते हैं. निजीकरण के खिलाफ क़ानून लाना चाहते हैं. वो indirect टैक्स ख़त्म करना चाहते हैं. वो रोज़गार पर बहुत फ़िक्स एजेंडा रखते हैं क़ि अगर सरकार रोज़गार ना दे पाती है तो लोगों को सोसल सिक्योरिटी देना होगा. वो सीनियर सिटीज़न के देखरेख के लिए एक अलग से आयोग और फंड की व्यवस्था सोचते हैं. वो इंटरकास्ट मैरीजेस करने वालों को सरकारी नौकरी या 10 लाख रुपए देना चाहते हैं. वो जातिवाद को जड़ से ख़त्म करने के कई कड़े नियम बताते हैं. वो राजनीतिक चंदे और चुनाव प्रक्रिया पर पब्लिक फंडिंग (एक लिमिट तक ) चाहते हैं. वो राजनीति से पैसे और अपराध को खतम करना चाहते हैं। पार्लियामेन्ट्री सिस्टम में भी कई बदलाव करना चाहते हैं. जैसे जिसको अधिकतम 2 बच्चे हों, पढ़ा लिखा और संविधान की कुछ समझ रखता तो साथ ही साथ उसने इंटरकास्ट शादी भी की हो उसी को चुनाव लड़ने को मिलेगा.  वो संविधान को किसी धार्मिक ग्रंथ से ऊपर बनाने के लिए कई कदम उठाना चाहते हैं. वो धर्म को निजी मानकर पब्लिक में नहीं देखना चाहते हैं, मतलब किसी धार्मिक रैली या जुलूस का आयोजन पब्लिक प्लेस में नहीं हो. यहाँ तक क़ि वो शिक्षा को अनिवार्य बनाना चाहते हैं. वो क्रिकेट को पैसे से दूर करके अन्य खेलों को बढ़ाने के कई कार्यक्रम बताते हैं. वो किसी मार्क्सवादी या लेनिन वादी सिद्धांत से प्रेरित नेता से भी बेहतर व्यवस्था देखना चाहते हैं. वो राजनीति की गंदगी को बेहतर समझते हैं, इसलिए उसमें सफाई के लिए कई कीटनाशक क़ानून भी लाना चाहते हैं. वो दुनिया की हर घटना का ज़िम्मेदार राजनीति को मानते हैं. मतलब दुनियाँ में होने वाली हर घटना के पीछे सीधे या अपरोक्ष रूप से राजनीति को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. वो दहेज विरोधी क़ानून लाकर इस कुप्रथा को ख़त्म करने के कई उपाय बताते हैं. वो इसे प्रमोट करने के कई उपाय बताते हैं. जब कोई उनसे पूछे कि आप खुद कौन से संत हो? आप भी तो बाहुबली हो. तो वो बड़ी बेबाकी से कहते  हैं क़ि हाँ मैने अपराध किए हैं केश भी हुए हैं और मैने जीते भी हैं. इस देश के सिस्टम में केश जीतना कौन सी बड़ी बात हैं. लेकिन मेरे हर अपराध के पीछे एक सच था कभी किसी बड़े बाप की औलाद ने किसी ग़रीब औरत के साथ कुछ किया तो मैने उसको अगवाह करके उससे पैसे वसूल कर उसके जैसी न जाने कितनी लड़कियों की मदद की. मैने अब तक 1000 से अधिक लड़कियों की तरफ से शिकायतों में लड़के को डरा धमका के बिना दहेज के शादी करवाई है. मैने हज़ारों शादियों मे आर्थिक मदद की है. कितनों को नौकरी दिलवाई है. ग़रीबों की मदद की है दबंगो से. किसी भी दलित या पिछड़े पर हुए अत्याचारों के खिलाफ फारवर्ड लोगों को पीटा है. क्योंकि मुझे पता चल चुका था क़ि इस देश में "रण में विजय उसी की होगी जिसके बाहों में बल होगा." कोर्ट के चक्कर सालों लगाउँगा लेकिन न्याय न मिल पाएगा. कम से कम वो अपने अति आदर्शवादी व्यवस्था को सामने रखने में किसी भी नेता से बेहतर और बेबाक दिखते हैं. ऐसा लगता है क़ि काश इसे भी नायक फिल्म के अनिल कपूर जैसा मौका मिल जाए.

Saturday, January 13, 2018

आख़िर जजों को न्याय के लिए क्यों बोलना पड़ा?

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने आज सुबह मीडिया से बात करते हुए शीर्ष अदालत के काम के तरीके पर सवाल उठाए हैं, साथ ही उन्होंने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को एक पत्र भेजा है. शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों के इस तरह मीडिया में आने की घटना देश में पहली बार हुई है. इन चार जजों के इस कदम पर देश भर के न्यायपालिका से जुड़े लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. रिटायर्ड जज आरएस सोढ़ी ने जजों की मीडिया से बातचीत पर कहा, ‘मामला कोई मायने नहीं रखता. उनकी शिकायत प्रशासनिक मामलों को लेकर है. वे 4 हैं, उनके अलावा 23 और हैं. ये 4 मिलकर चीफ जस्टिस की गलत छवि बना रहे हैं. ये अपरिपक्व और बचकाना है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘मुझे ऐसा लगता है कि इन चारों पर अभियोग लगाया जाना चाहिए. उन्हें अब बैठकर फैसले देने का कोई अधिकार नहीं है. यह ट्रेड यूनियननुमा व्यवहार गलत है. लोकतंत्र पर खतरा उनके बताने की बात नहीं है, हमारे यहां संसद, कोर्ट और पुलिस काम कर रहे हैं.’ देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीश मीडिया के सामने आए. इन न्यायाधीशों में जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ शामिल है. उन्‍होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का प्रशासनिक कार्य ठीक से नहीं हो रहा है. ये चार जज शुक्रवार सुबह चीफ जस्टिस से मिले थे और अपना विरोध दर्ज कराया था है. ये प्रेस कॉन्‍फ्रेंस जस्टिस जे. चेलामेश्वर के घर पर हुई.
जस्टिस जे. चेलामेश्‍वर ने कहा, ‘हम चारों मीडिया का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं. यह किसी भी देश के इतिहास में अभूतपूर्व घटना है क्‍योंकि हमें यह ब्रीफिंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. हमने ये प्रेस कॉन्‍फ्रेंस इसलिए की ताकि हमें कोई ये न कहे हमने अपनी आत्मा बेच दी.’ जस्टिस चेलामेश्वर ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जो नहीं होना चाहिए था. हमें लगा, हमारी देश के प्रति जवाबदेही है और हमने मुख्य न्यायाधीश को मनाने की कोशिश की, लेकिन हमारे प्रयास नाकाम रहे अगर संस्थान को नहीं बचाया गया, लोकतंत्र नाकाम हो जाएगा.’ सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश को सुधारात्मक कदम उठाने के लिए कई बार मनाने की कोशिश की गई, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे प्रयास विफल रहे. उन्‍होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में प्रशासन सही से नहीं चल रहा है.

एफडीआई के नए नियमों के मायने

हमारी मौजूदा सरकार अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों के लिए एक से बढ़कर एक चुनौतियां पेश कर देती है, और अब उसने यह चुनौती पेश की है कि अर्थशास्त्री और पत्रकार विश्लेषण करें कि फ्डी (यानी फॉरिन डाइरेक्ट इनवेस्टमेंट यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के नए सरकारी ऐलानों का क्या असर पड़ेगा...? वैसे इस सरकार का यह कोई नया ऐलान नहीं है, क्योंकि पुरानी सरकार भी यह कवायद कर रही थी और नई सरकार अपने कार्यकाल में शुरू से विदेशी निवेश लाने की कवायद में लगी है. लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे अब तक नहीं आए. यह मसला जहां का तहां है कि ऐसा क्या करें कि विदेशी निवेशक अपना पैसा लेकर भारत में कारोबार करने आ जाएं. विदेशी पैसे की ज़रूरत हमें इसलिए है कि हमारे पास करने को बहुत से काम पड़े हैं, लेकिन हमारे पास उतने पैसे नहीं हैं. ये काम चालू हों, तो अर्थव्यवस्था आगे बढ़े और फिर बेरोज़गारी की समस्या भी निपटे. इसीलिए विदेशी निवेश बढ़ाने के काम में जुटी सरकार अब निर्माण, सिंगल ब्रांड रीटेल और विमानन के क्षेत्र में विदेशी निवेशकों को नए तरीके से लुभाने के लिए नई पेशकश लेकर आई है. वैसे तो सरकार के कार्यकाल का डेढ़ साल बचा है, लेकिन अगले महीने वह अपना आखिरी पूर्ण बजट पेश करने जा रही है. कहते हैं कि किसी सरकार का आखिरी बजट लोकलुभावन ऐलानों का होता है. इन्ही ऐलानों को वह अगले चुनाव में दोहराती है, लेकिन इस बार के बजट में सरकार के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह आने का अंदेशा है कि उन कामों को करने के लिए बजट में पैसे का इंतजाम वह कैसे दिखाएगी. दरअसल अब तक सब करके देख लिया, लेकिन सरकारी खजाने की हालत जस की तस है. सो, विदेशी निवेश और निजीकरण बढ़ाने के अलावा विकल्प हो ही क्या सकता है. वह तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ही थे, जो एक बार कह गए कि पैसे पेड़ों पर नहीं उगते, और वहीं वह यह बात भी दर्ज करा गए कि किफायत बरतिए. लेकिन उनकी वह बात पसंद नहीं की गई थी. एक अर्थशास्त्री की बात का विरोध किया गया था और यहां तक कि खुद उनके विरोधी अर्थशास्त्रियों ने उनका मज़ाक तक उड़ाया था. बहरहाल, आज के मुश्किल हालात में विदेशी निवेश के अलावा कोई तरीका कोई नहीं सुझा पाता. इसी महीने दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक हो रही है, जिसमें इस बार वित्तमंत्री नहीं, खुद प्रधानमंत्री जा रहे हैं. वह वहां विश्व की कई अर्थशक्तियों के बीच होंगे. दुनिया की बड़ी से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रमुखों के बीच भी उन्हें बोलने का मौका मिलेगा. विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए भरपूर वकालत का इससे अच्छा मौका और क्या हो सकता है. ज़ाहिर है, उन बैठकों के ऐन पहले अपने यहां निर्माण, सिंगल ब्रांड रीटेल और विमानन के क्षेत्र में विदेशी निवेशकों के लिए भारी छूट का ऐलान करने के बाद ही वह वहां जा रहे हैं. खासतौर पर भारीभरकम जमीन-जायदाद वाली सरकारी विमानन कंपनियों में विदेशी कारोबारियों के लिए हिस्सेदारी का प्रस्ताव लेकर. 
विदेशी निवेश के लिए विश्व में कारोबारियों को संकेत देने का एक माघ्यम कारोबार सुगमता की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग को भी माना जाता है. सरकार के इन ऐलानों से यह रैंकिंग बढ़ने के बानक बन गए हैं. इस रैंकिंग बढ़े आंकड़े से घरेलू राजनीति में प्रचार का एक मुद्दा भी तैयार हो जाता है कि सरकार ने देश की छवि चमकाने में क्या काम किया. विदेशी निवेश आए या न आए, इन ऐलानों से रैंकिंग का मकसद तो सध ही गया है. कहने को तो मौजूदा सरकार दावा करती है कि उसकी कोशिशों से अच्छा-खासा विदेशी निवेश आया. आंकड़ों के मुताबिक 17 फीसदी विदेशी निवेश बढ़ा. हालांकि यह उपलब्धि गिनाते वक्त यह नहीं बताया जाता कि हमें उम्मीद कितनी थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें दोगुने-तिगुने यानी 200 या 300 फीसदी बढ़ने की उम्मीद रही हो. अब अपने यहां लक्ष्य की नापतौल करने का रिवाज़ या चलन है नहीं, सो, ऐसे मामले में उपलब्धियों का आकलन भी मुश्किल है. फिर भी अगर फ्डी को आकर्षित करने के लिए इतने ताबड़तोड़ ढंग से नई छूटों का ऐलान करना पड़ा हो, तो यह खुद ही साबित कर देता है कि हमें पर्याप्त विदेशी निवेश की ज़रूरत है. यानी पुरानी कोशिशों का अपेक्षित असर हुआ नहीं. अब तक विदेशी निवेश के जो फायदे गिनवाए जाते रहे हैं, उनमें सबसे लुभावना फायदा रोज़गार के मौके पैदा होने का बताया जाता रहा है. आमतौर पर विशेषज्ञों का कहना है कि यह निवेश देश में पहले से काम कर रहे लोगों के रोज़गार खत्म भी करेगा. इसमें कोई शक नहीं कि विदेशी कंपनियां सबसे पहले अपने व्यापार के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करना चाहेंगी, जिसमें मानव संसाधन कम लगते हों. अभी अपना छोटा दुकानदार भी एक-दो नौकरों को ज़रूर रखता है, और वह खुद भी नौकर की तरह लगा रहता है. जब करोड़ों छोटे दुकानदारों पर ही बेरोज़गार हो जाने का अंदेशा बताया जा रहा हो, तो विदेशी कंपनियों के रोज़गार बढ़ाने और देसी कारोबार में रोज़गार खत्म होने का अंतर आसानी से समझा जा सकता है. इस सिलसिले में दो साल पहले इसी स्तंभ में बेरोज़गारी पर लिखे एक आलेख को भी याद किया जा सकता है. यह आलेख उस समय का है, जब कुछ दिनों के लिए सरकार ने 'मेक इन इंडिया' की बात चलाई थी और विदेशों में ब्रांड इंडिया की लोकप्रियता बढ़ाने की बात सोची थी. हालांकि बाद में वह विचार भी आगे बढ़ा नहीं दिखा.

Tuesday, January 9, 2018

दलितों के नए नेता जिग्नेश मेवानी

जिग्नेश मेवाणी गुजरात से आते हैं और हाल ही में हुए चुनाव में वह कांग्रेस के समर्थन से विधायक बने हैं. गुजरात में वह दलितों के नेता बनकर उभर रहे हैं लेकिन अभी उनको अपने दम पर बहुत कुछ साबित करना है. कांशीराम के बाद जितने भी दलित नेता हैं उनमें  मायावती  को छोड़कर कोई अलग धारा नहीं बना पाया है. महाराष्ट्र में रामदास अठावले एनडीए में हैं. दिल्ली में डॉ. उदितराज ने दलितों के लिए नया मंच खड़ा करने की कोशिश की लेकिन वह भी बीजेपी सांसद बन गए. बिहार से रामविलास पासवान भी एनडीए सरकार में मंत्री हैं. मायावती का भी जादू अब दलितों के सिर चढ़कर बोल नहीं रहा है. ये जिग्नेश मेवाणी के लिए चुनौती भी है और मौका भी. क्योंकि दलितों के दम पर ही मायावती उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बन चुकी हैं. अभी वर्तमान राजनीति में ऐसा कोई नेता नहीं है जो दलितों का विश्वास पूरी तरह से जीत सके. भीमराव अंबेडकर के पौत्र  प्रकाश अंबेडकर  इस मामले में उनकाे चुनौती दे सकते हैं लेकिन उनका प्रभाव भी महाराष्ट्र से बाहर देखना अभी बाकी है. लेकिन जिग्नेश जैसी ऊर्जा उनके अंदर नहीं है.  जिग्नेश मेवाणी एक पढ़े-लिखे युवा नेता हैं. अंग्रेजी साहित्य से उन्होंने मास्टर्स, एलएलबी और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है. साल में 2016 में उन्होंने गुजरात में दलितों पर गोरक्षकों की ओर से किए गए हमले के खिलाफ अहमदाबाद से ऊना तक मार्च निकाला था जिसमें 20 हजार के करीब लोगों ने हिस्सा लिया था. जिग्नेश मेवाणी के अंदर सड़क पर संघर्ष करने की क्षमता है. वह मृदुभाषी हैं, किसी भी तरह के प्रोपेगेंडा के खिलाफ वह सोशल मीडिया का अच्छा इस्तेमाल करना जानते हैं और टीवी पर बहस के दौरान भी वह जोरदार और तर्कों के साथ अपना पक्ष रखते हैं. जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस के समर्थन से विधायक जरूर बन गए हैं लेकिन यहीं से अब उनको अपनी राजनीति का रास्ता खोजना चाहिए.
चैनलों पर जिग्नेश को सुनने-देखने तथा अखबारों में उनके भाषणों के अंशों को पढ़ने पर वे जोशीले, ऊर्जावान तथा साहसी लगे. इस उम्र में, और वह भी नेतृत्व के लिए ये स्वाभाविक गुण हैं. लेकिन साथ में बहुत स्पष्ट तौर पर यह भी आभास हो रहा था कि उनमें उस वैचारिक स्पष्टता, सामाजिक समझ एवं दूरदर्शिता का अभाव है, जो उन्हें रचनात्मकता तक पहुंचा सकेगा. उनकी बातें तीन मुख्य स्तम्भों पर टिकी मालूम पड़ती हैं-मनुस्मृति का विरोध, संविधान का फ्रेम तथा मार्क्सवाद का दर्शनशास्त्र. इन तीनों में नया कुछ इसलिए नहीं है, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से उभरे लगभग सभी आंदोलनों ने अपने-अपने ढंग से इन्हीं उपायों को अपनाया है. जाहिर है कि अब तो ये उपाय और भी पुराने पड़कर अप्रभावी हो गए हैं. हां, शुरुआत करने के लिए ये थोड़े ठीक हो सकते हैं. लेकिन यदि इस शुरुआत को वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक संदर्भों में प्रौढ़ता प्राप्त नहीं हुई, तो इसका भी अंत अपने पूर्ववर्तियों की तरह होना निश्चित है. यह अवश्य होगा कि जिग्नेश सहित उनके कुछ अन्य सहयोगी (कन्हैया जैसे नौजवान) विधानसभाओं और संसद में अपनी सीटें सुरक्षित कर लेंगे, जैसा कि पैंथर पार्टी के साथ हुआ. या यदि जातिगत तत्व को छोड़ दिया जाए, तो आम आदमी पार्टी के साथ हुआ.
जिग्नेश मेवाणी को यह समझना होगा कि एक अधिनायकवादी व्यवस्था के विरुद्ध उठाए गए हथियार लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके विरुद्ध उतने कारगर नहीं होते. मार्क्सवाद आज एक ऐसा ही हथियार है. और यदि उन्हें इसका इस्तेमाल करना भी है, तो फिलहाल ‘मनुस्मृति’ के ‘जातिगत विभाजन’ की बजाय ‘वर्ग चरित्र’ के सिद्धांत पर ध्यान दें. उनके सामने इसके कई जीवंत प्रमाण मौजूद हैं कि उनके अपने समुदाय के ही प्रतिनिधि राजसत्ता प्राप्त करते ही स्वयं तथाकथित उच्च वर्ग; जिसे कार्ल-मार्क्स ‘शोषक वर्ग’ कहते हैं, बन जाते हैं. और डॉ आम्बेडकर की पूजा करने के बावजूद उनकी व्यक्तिपूजा के विरुद्ध विचारों को दरकिनार करके मूर्तियों की स्थापनाएं करने में जुट जाते हैं. ‘‘आरक्षण के सिद्धान्त को जाति समूह के अंदर ही आर्थिक आधार से न जोड़ने देना’’ इसी वर्ग-चरित्र की रणनीति है. इसलिए बाह्य सामाजिक विरोध (मनुस्मृति) से कहीं अधिक जरूरी है, अपने समुदाय के अंदर की प्रतिक्रियावादी शक्तियों का विरोध करना. साथ ही समुदाय को सक्षम बनाने के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों तथा सरकार द्वारा प्रदत्त उन सुविधाओं का समुचित रूप में उपयोग कराया जाना, जो उनके जीवन पर तत्काल सकारात्मक प्रभाव डालने की क्षमता रखते हैं. यह काम भी किसी राजनीतिक आंदोलन का ही अंग होता है, क्योंकि इससे आंदोलन को शक्ति मिलती है. हां, यदि जिग्नेश के मन में आंदोलन की जगह क्रांति की बात हो, तब बात कुछ अलग हो जाएगी.

क्या जेल जाने से ख़त्म होंगे लालू?

लालू प्रसाद यादव की पहचान एक ऐसे नेता की रही है जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों का फायदा उठाना बखूबी आता है. जब वे बिहार की राजनीति में नए-नए उभरे थे तो उस दौर में लोग उन्हें भदेस और असभ्य कहते थे. लेकिन लालू यादव ने इसे अपना एक स्टाइल बना लिया और यादव समाज के बीच न सिर्फ अपनी पैठ बनाई बल्कि समय के साथ इसे मजबूत करते चले गये. लालू यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो जब भी विपक्ष उन्हें वाजिब मसलों पर भी घेरने का प्रयास करता, वे इसे जाति और वर्ग का रंग दे देते थे. वे कहते थे कि अगड़ी जाति के नेताओं को यह बात अच्छी नहीं लगती कि पिछड़े वर्ग से आने वाला लालू यादव प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया है. इससे न सिर्फ वे मुद्दे धराशाई हो जाते बल्कि पिछड़ा वर्ग के बीच लालू का समर्थन कुछ और मजबूत हो जाता. इस शैली में राजनीति करने वाले लालू यादव एक बार फिर जेल में हैं. चारा घोटाले से संबंधित एक मामले में उन्हें अपराधी घोषित किया जा चुका है. ऐसे में उन्हें होने वाले राजनीतिक नुकसानों की चर्चा तो हर तरफ चल रही है लेकिन उनकी राजनीतिक शैली को जो भी समझते हैं, उनका कहना है कि लालू इस स्थिति का भी फायदा उठा सकते हैं. लालू यादव को सजा होते ही उन्होंने और उनके परिवार व पार्टी के नेताओं ने इसे केंद्र सरकार की बदले की कार्रवाई के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है. राजद नेता यह आरोप लगा रहे हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी लालू को ठिकाने लगाने की साजिश में केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी से मिले हुए हैं. स्थानीय स्तर पर राजद के नेता लालू के समर्थक वर्ग, खास तौर पर यादव और मुस्लिम समाज में, इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और नीतीश कुमार उनके वर्ग के नेता को निपटाकर उनके शोषण की साजिश पर काम कर रहे हैं. बिहार की राजनीति को जिसने भी करीब से देखा है, उसे यह मालूम होगा कि कुछ खास वर्ग के लोग लालू यादव की बातों पर आंख मूंदकर विश्वास करते हैं. 2015 के विधानसभा चुनावों में भी इसे देखा जा सकता था. जानकारों का कहना है कि ऐसे में लालू यादव अपनी पार्टी के लिए जितने उपयोगी जेल से बाहर थे उससे कम उपयोगी जेल के अंदर नहीं हैं.
दूसरे मामले में सजायाफ्ता होने की वजह से लालू यादव अब चुनाव नहीं लड़ सकते. वे सभा कर सकते हैं. लेकिन अगर उन्हें नये मामले में जमानत नहीं मिली तो तेजस्वी और तेजप्रताप यादव राजद के समर्थकों के बीच उनकी तस्वीर के साथ सभा करते हुए यह कह सकते हैं कि उनके नेता को साजिश के तहत जेल में डाला गया है. बिहार की राजनीति को समझने वालों का मानना है कि इसका राजनीतिक फायदा राजद को मिलना तय है. 2015 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद जब तेजस्वी यादव बिहार के उपमुख्यमंत्री बने और तेजप्रताप यादव कैबिनेट मंत्री तो उस वक्त यही कहा गया कि दोनों को लालू यादव का बेटा होने की वजह से ये जिम्मेदारियां मिलीं. लेकिन नीतीश सरकार से बाहर होने के बाद दोनों ने अपने-अपने स्तर पर पार्टी और कार्यकर्ताओं को नेतृत्व देने की कोशिशें की हैं. तेजस्वी पार्टी के उदार चेहरे की नुमाइंदगी करते हैं और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं तो तेजप्रताप यादव बिहार के अलग-अलग हिस्सों में जाकर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को पार्टी के साथ बनाए रखने और उन्हें उत्साहित रखने के काम में अधिक सक्रिय हैं. राजद के जमीनी कार्यकर्ता खुद को तेजप्रताप से अधिक जोड़कर देखते हैं. उन्हें लगता है कि तेजप्रताप अपने पिता लालू यादव की तरह ही सीधा हमला करते हैं. तेजस्वी के संबोधन में कार्यकर्ता खूब तालियां बजाते हैं और उत्साह दिखाते हैं. अब तक इन दोनों के बारे में यही माना जाता था कि ये पूरी तरह लालू यादव के कहे पर चलते हैं. लेकिन लालू यादव के जेल जाने के बाद से दोनों ने जिस तरह से अलग-अलग मोर्चों पर आक्रामक रुख अपनाया हुआ है, उससे इनकी छवि एक स्वतंत्र नेता के तौर पर स्थापित हो रही है. लालू यादव के बाहर न होने पर अगर तेजस्वी और तेजप्रताप एक प्रभावी जनसंपर्क अभियान चलाने में सफल हो जाते हैं तो इससे न सिर्फ लालू समर्थक पार्टी से जुड़े रहेंगे बल्कि तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव पूरी तरह से एक स्वतंत्र नेता के तौर पर भी राजद और बिहार में स्थापित हो जाएंगे.

Wednesday, January 3, 2018

भीमा कॉरेगांव घटना के बाद गुस्से में दलित

पुणे ज़िले में भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं सालगिरह पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सोमवार को हुई हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई है. इस लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पेशवा की सेना को हराया था. दलित ब्रिटिश सेना की इस जीत का जश्न मनाते हैं. ऐसा समझा जाता है कि तब अछूत समझे जाने वाले महार समुदाय के सैनिक ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की ओर से लड़े थे. भीमा-कोरेगांव की लड़ाई एक जनवरी 1818 को लड़ी गई थी. कुछ विचारक और चिंतक इस लड़ाई पिछड़ी जातियों के उस समय की उच्च जातियों पर जीत के रूप में देखते हैं. हालांकि, पुणे में कुछ दक्षिणपंथी समूहों ने इस जीत का जश्न मनाए जाने का विरोध किया था. जब लोग गांव में युद्ध स्मारक की ओर बढ़ रहे थे तो सोमवार दोपहर शिरूर तहसील स्थित भीमा-कोरेगांव में पथराव और तोड़-फोड़ की घटनाएं हुईं. हिंसा तब शुरू हुई जब एक स्थानीय समूह और भीड़ के कुछ सदस्यों के बीच स्मारक की ओर जाने के दौरान किसी मुद्दे पर बहस हुई. भीमा-कोरेगांव की सुरक्षा के लिए तैनात एक पुलिस अधिकारी ने बताया, बहस के बाद पथराव शुरू हुआ. हिंसा के दौरान कुछ वाहनों और पास में स्थित एक मकान को क्षति पहुंचाई गई. हिंसा में 25 से अधिक गाड़ियां जला दी गईं और 50 से ज़्यादा गाड़ियों में तोड़-फोड़ की गई.  पुलिस ने घटना के बाद कुछ समय के लिए पुणे-अहमदनगर राजमार्ग पर यातायात रोक दिया. राज्य रिज़र्व पुलिस बल की कंपनियों समेत और पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है. उन्होंने बताया कि मोबाइल फोन नेटवर्क को कुछ समय के लिये अवरूद्ध कर दिया गया ताकि भड़काऊ संदेशों को फैलाने से रोका जा सके. प्रदर्शनकारियों में मुंबई के कई इलाकों में सड़कें अवरूद्ध कर दीं, दुकानें बंद करा दीं और एक टेलीविजन समाचार चैनल के पत्रकार पर हमला भी किया.
पुणे में सोमवार को युद्ध की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में एक व्यक्ति की मौत से आक्रोशित लोगों के समूहों ने मंगलवार सुबह शहर के पूर्वी उपनगरीय इलाकों चेम्बूर, विखरोली, मानखुर्द और गोवंडी में विरोध प्रदर्शन किया और दुकानों एवं प्रतिष्ठानों को बंद करने पर मजबूर कर दिया. ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर प्रियदर्शन, कुर्ला, सिद्धार्थ कॉलोनी और अमर महल इलाकों में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की भीड़ जुट गई और उन्होंने जुलूस निकाला एवं सरकार तथा प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की. प्रदर्शनकारियों ने हार्बर लाइन के गोवंडी एवं चेंबूर रेलवे स्टेशनों पर स्थानीय ट्रेन सेवाएं रोक दीं. इस हिंसा के ख़िलाफ़ औरंगाबाद में भी प्रदर्शन हुए. इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथराव किया. प्रदर्शन के दौरान आगज़नी भी की गई. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर पत्थरबाज़ी की. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट से मामले की न्यायिक जांच के लिए आग्रह किया जाएगा. इसके अलावा एक युवा की मौत के मामले की जांच सीआईडी करेगी. मृतक के परिजन को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाएगा.
दलित नेता और गुजरात से निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी ने हिंसा से पहले गांव में बने युद्ध स्मारक का दौरा किया था. 31 दिसंबर को मेवाणी पुणे में हुई यलगार परिषद में भी शामिल हुए थे.
वहां पिछले 200 सालों से लोग जा रहे हैं, लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. यह ज़ाहिर था कि वहां ज़्यादा लोग जमा होंगे ऐसे में वहां ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत थी.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...