Sunday, January 28, 2018

कासगंज हिंसा

मीडिया भी घटिया रिपोर्टिंग पर उतारू है. हिन्दी के 3 बड़े अख़बारों ने खबर में लिखा है," तिरंगा यात्रा का मुस्लिम समाज द्वारा विरोध करने के बाद सांप्रदायिक दंगे भड़के. 1 हिंदू युवक की मौत."....  इसे ये नहीं लिख सकते थे क़ि, " कासगंज में सड़क झंडा रोहण कर रहे लोगों के साथ तिरंगा रैली निकाल रहे लोगों से झड़प के बाद हिंसा में एक युवक की मौत" 
जबकि एबीपी न्यूज के वयराल सच में चश्मदीदों द्वारा बताया गया क़ि सड़क के किनारे मुस्लिम समुदाय ने झंडा रोहण का कार्यक्रम रखा था, वहीं से एबीवीपी के बाइक सवार लगभग 70-80 लोग निकले और जाने के लिए रास्ता माँगने लगे. उन्होने कहा क़ि थोड़ी देर रुक जाइए फिर चले जाना यहाँ भी तो तिरंगा ही फहरा रहे हैं. तो उन्होनें नारे बाजी शुरू कर दी. हिन्दुस्तान में रहना है तो वन्दे मातरम कहना है, हिंदू हिंदू हिन्दुस्तान, कटुए जाएँ पाकिस्तान..... और वीडियो में साफ दिखा क़ि तिरंगों के बीच में भगवा झंडा फहराया जा रहा था. ऐसे महॉल में लोग न भड़केंगे तो क्या होगा? मैं नहीं पक्ष ले रहा मूसलमानों का, जो भड़के और हिंसा की उनको क़ानून के हिसाब से सज़ा दी जाए. उनको उकसावे में न आकर खुद को शांत रखना चाहिए था. लेकिन क्या इसका ज़िम्मेदार आपको नहीं नज़र आया? बड़े शातिराना ढंग से लोग चंदन के खून, तिरंगे और हिंदू की बात करके खुद की लड़ाई को धर्म और देश की लड़ाई बना रहे हैं. इसमें साफ दिखता है क़ि लड़ाई एबीवीपी और कुछ मुसलिमलोगों के बीच थी. ना क़ि तिरंगे और हिन्दुस्तान के बीच. क्योंकि मुसलमान भी तो तिरंगा ही फहरा रहे थे. रही बात वन्दे मातरम की, तो गाने में कोई दिक्कत न होना चाहिए. जो ना गाना चाहे उसे पाकिस्तान भेजने और गद्दार कहने का कोई मतलब नहीं वैसे भी वो जय हिंद तो बोल ही रहा है. ये केवल और केवल आपके रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पूछे गये सवालों के जवाब से बचकर 2019 के चुनाव की तैयारी है.   
मुझे नहीं शक है किसी पर. 26 जनवरी को मैं अपने घर से ओफिस के बीच में 3-4 जगह ये देखता आया क़ि दाढ़ी टोपी वाले मुसलमान भी तिरंगा फहरा रहे थे. फेसबुक और व्हाट्सएप पर अधिकतर मुसलमान मित्रों ने तिरंगे का डीपी रखा या फिर अपनी फोटो के साथ तिरंगा लगाकर कोई अच्छा सा स्लोगन के साथ लगाया था. खूब शुभकामनाएँ दी. मैने तो कहीं नहीं सुना पाकिस्तान का समर्थन और हिन्दुस्तान या तिरंगे का विरोध करते हुए किसी को. ये  केवल और केवल उकसावे की राजनीति है. मुझे पता है आप मुझे भी मुस्लिम कहेंगे, मुझे भी पाकिस्तानी और देश द्रोही कहेंगे. लेकिन सच में सोचकर देखिए क्या इंसानों की लाशों पर बन रहा देश बहुत सुन्‍दर बन जाएगा? मान लिया सब मुसलमान पाकिस्तान चले गए.  या सब ख़त्म कर दिए आपने. फिर?????  जब आप किसी समाज में लोगों को लड़ने और हिंसा करने की आदत पड़ जाएगी, वो आपस में लड़ेंगे. किसी बच्चे को आवारा बना दो, वो सबसे लड़ता फिरे, घर वाले उसे ना रोके, फिर बड़ा होकर वो अपने ही माँ- बाप को कब मारने लगे कोई भरोसा नहीं है. इसलिए उनको प्यार से रहना सिखाइए. पाकिस्तान और तालिबान सब क्यों बर्बाद हो गये? क्योंकि वो पहले दूसरों को मारते थे, आज जब दूसरे नहीं बचे तो खुद के लोगों को मारते हैं. इसका उदाहरण आप, राम रहीम के लोगों का बवाल, हरियाणा और राजस्थान में जाट आरक्षण हिंसा, शहरनपुर में राजपूत और दलितों के दंगे, गुजरात में चली पाटीदार आंदोलन की हिंसा, अभी महाराष्ट्र में दलितों पर हमले फिर उनके द्वारा की गई हिंसा, और हाल ही में हुई राजपूतो की बच्चों तक पर हुई हिंसा में देख सकते हैं. इन हिंसाओं में कितने लोग मरे कोई जाकर देखता है उनके परिवारों को? जिन्होने अपने बेटे, पति और बाप खोए हैं, आज चंदन का नाम प्रयोग कर लो कल उसके माँ बाप को बुढ़ापे में जब बेटे की ज़रूरत होगी तो कोई नहीं जाएगा. इंसान मरते हैं, इंसानियत मरती है लेकिन होता कुछ नहीं क्योंकि नेता जिंदा रह जाता है. 

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