Saturday, January 20, 2018

आम आदमी पार्टी की असली परीक्षा अब

आप' के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने से पैदा हुआ राजनीतिक संकट दिल्ली की तीनों पार्टियों बीजेपी, कांग्रेस और आप के लिए एक नई चुनौती भी है. अगले छह महीने में इन 20 सीटों पर चुनाव होंगे जो किसी छोटे राज्य के पूरे चुनाव से कम नहीं होंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ये चुनाव अपने-अपने पानी की परख करने का अवसर होंगे. गुजरात में 100 सीटों तक सिमट गई बीजेपी अगर इन 20 सीटों में 10 पर भी जीत हासिल करती है तो 2019 से पहले ये उसके लिए एक बड़ा टॉनिक होगा. आख़िर पिछली बार पूरी विधानसभा में उसके कुल 3 विधायक थे जो एक ही गाड़ी में विधानसभा आ सकते थे. अगर वह 10 से भी ज़्यादा सीटें जीत ले तो 2019 की भूमिका बन जाएगी. यही बात कांग्रेस के बारे में कही जा सकती है. दिल्ली में 15 बरस राज करने वाली कांग्रेस पिछले चुनावों में खाता तक नहीं खोल पाई. ऐन गुजरात चुनावों के वक़्त कांग्रेस के अध्यक्ष बने राहुल गांधी के आने के बाद कांग्रेस के पुनर्जीवन का दावा दिल्ली के चुनाव पुख़्ता कर सकते हैं. अगर कांग्रेस इन 20 में से 5 सीटें भी जीत ले तो उसके लिए बड़ी बात होगी.  लेकिन इस फ़ैसले के असली सबक आम आदमी पार्टी के लिए हैं. लोकपाल बिल के लिए चलाए गए अण्णा आंदोलन की कोख से पैदा हुई आम आदमी पार्टी शहरी मतदाताओं के बीच अचानक इसलिए लोकप्रिय हुई कि लोगों ने उसमें राजनीतिक सड़ांध के ख़िलाफ़ एक विकल्प बनने की उम्मीद देखी और माना कि वह राजनीतिक शुचिता को बहाल करेगी. वह दौर ऐसा था जब अरविंद केजरीवाल बिल्कुल बिजली का तार लगते थे जिसको किसी ने छू लिया तो करेंट लग जाए. लेकिन बिजली का यह तार धीरे-धीरे जैसे ठंडा होता हुआ व्यवस्था का पुर्जा होकर रह गया है. उस आम आदमी पार्टी में तीन तरह के लोग शामिल हुए थे- एक तो वे जो लोकपाल आंदोलन से पैदा हुए थे. ये नेक इरादों वाले नौजवान थे जो अपने समाज की बुराइयां दूर करना चाहते थे, लेकिन किस तरह- ये उन्हें नहीं मालूम था. दूसरी कतार उन लोगों की थी जो आप की लोकप्रियता देख दूसरे दलों से आप का हिस्सा बनते चले गए. 
लेकिन आप में एक और हिस्सा था जिसने इसे एक रचनात्मक व्यक्तित्व दिया था. यह समाजवादियों का वह धड़ा था जो किसी वैकल्पिक राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन के अभाव में मायूस था और जिसने आप से बड़ी उम्मीद पाली थी. योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और दिल्ली और देश भर के ढेर सारे ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी थे जिनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे केजरीवाल के जादू और आम आदमी पार्टी की ऊर्जा को वास्तविक बदलाव के वाहन की तरह इस्तेमाल कर सकेंगे. इन तीनों तरह के लोगों के समन्वय ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी को ऐसी विराट ताकत बनाया जिससे पूरे देश में एक उम्मीद फैल गई. 2013 में इसी ताकत के सहारे अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित जैसी दिग्गज उम्मीदवार को धूल चटा दी थी. 2015 में पूरी दिल्ली जैसे आम आदमी पार्टी के कब्ज़े में आ गई. तब पार्टी को सिर्फ़ अपने कार्यकर्ताओं और विराट जन समर्थन के सहारे जीत मिली थी. मगर क्रांतियां सबसे पहले अपने बच्चों को खा जाती हैं. सत्ता सबको बदलती है, उसने आप को भी बदला. आम आदमी पार्टी के भीतर टकराव दिखे, उसके सबसे ज़्यादा साख वाले नेता अपमानित करके निकाले गए, केजरीवाल ने पार्टी के भीतर स्टिंग की संस्कृति को बढ़ावा दिया, पूरी दिल्ली को स्टिंग करने की सलाह दे डाली, सरकार ने विज्ञापन पर इतने पैसे ख़र्च किए कि उस पर जांच बैठ गई. वह एक के बाद एक चुनावी मोर्चे पर भी शिकस्त खाती दिखी. बीते दिनों राज्यसभा में तीन सदस्यों को भेजे जाने पर जो अरुचिकर विवाद हुआ और उसका जो दिलचस्प अंत हुआ, वह भी आम आदमी पार्टी के बदलते चरित्र का सुराग देने वाला साबित हुआ. यह ताबूत की आख़िरी कील नहीं है. आम आदमी पार्टी अब भी दिल्ली में एक बड़ी ताकत है. उसके पास स्पष्ट से ज़्यादा बहुमत है. कार्यकर्ताओं का एक बड़ा समूह है. कई ऐसे नेता हैं जो अब भी दूसरे दलों के नेताओं से ज़्यादा साफ़-सुथरे हैं. लाभ के पद के जिस मामले में विधायक अयोग्य घोषित हुए हैं, उसका एक तकनीकी पहलू भी है. बल्कि सरकार चलाते हुए यह दिखता रहा है कि आम आदमी पार्टी नियम-कायदों की औपचारिकता की अक्सर अवहेलना करती रही है जिस पर उपराज्यपाल से उसका विवाद भी होता रहा है. तो ये छह महीने आप के लिए अपनी छूटी हुई लड़ाई वापस लड़ने के महीने होंगे. पार्टी में विज्ञापनबाज संस्कृति को बढ़ाने की जगह उसे कार्यकर्ताओं और लोगों में विश्वास को बढ़ावा देना होगा- उसे फिर उसी वैकल्पिक राजनीति की राह पर चलना होगा जिसे वह भूल आई है. इस क्रम में वह चाहे तो अपने पुराने और छूटे हुए दोस्तों को जोड़ने का काम भी कर सकती है. अब इस नई जंग के लिए आप का समय शुरू होता है.

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...