Tuesday, January 9, 2018

दलितों के नए नेता जिग्नेश मेवानी

जिग्नेश मेवाणी गुजरात से आते हैं और हाल ही में हुए चुनाव में वह कांग्रेस के समर्थन से विधायक बने हैं. गुजरात में वह दलितों के नेता बनकर उभर रहे हैं लेकिन अभी उनको अपने दम पर बहुत कुछ साबित करना है. कांशीराम के बाद जितने भी दलित नेता हैं उनमें  मायावती  को छोड़कर कोई अलग धारा नहीं बना पाया है. महाराष्ट्र में रामदास अठावले एनडीए में हैं. दिल्ली में डॉ. उदितराज ने दलितों के लिए नया मंच खड़ा करने की कोशिश की लेकिन वह भी बीजेपी सांसद बन गए. बिहार से रामविलास पासवान भी एनडीए सरकार में मंत्री हैं. मायावती का भी जादू अब दलितों के सिर चढ़कर बोल नहीं रहा है. ये जिग्नेश मेवाणी के लिए चुनौती भी है और मौका भी. क्योंकि दलितों के दम पर ही मायावती उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बन चुकी हैं. अभी वर्तमान राजनीति में ऐसा कोई नेता नहीं है जो दलितों का विश्वास पूरी तरह से जीत सके. भीमराव अंबेडकर के पौत्र  प्रकाश अंबेडकर  इस मामले में उनकाे चुनौती दे सकते हैं लेकिन उनका प्रभाव भी महाराष्ट्र से बाहर देखना अभी बाकी है. लेकिन जिग्नेश जैसी ऊर्जा उनके अंदर नहीं है.  जिग्नेश मेवाणी एक पढ़े-लिखे युवा नेता हैं. अंग्रेजी साहित्य से उन्होंने मास्टर्स, एलएलबी और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है. साल में 2016 में उन्होंने गुजरात में दलितों पर गोरक्षकों की ओर से किए गए हमले के खिलाफ अहमदाबाद से ऊना तक मार्च निकाला था जिसमें 20 हजार के करीब लोगों ने हिस्सा लिया था. जिग्नेश मेवाणी के अंदर सड़क पर संघर्ष करने की क्षमता है. वह मृदुभाषी हैं, किसी भी तरह के प्रोपेगेंडा के खिलाफ वह सोशल मीडिया का अच्छा इस्तेमाल करना जानते हैं और टीवी पर बहस के दौरान भी वह जोरदार और तर्कों के साथ अपना पक्ष रखते हैं. जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस के समर्थन से विधायक जरूर बन गए हैं लेकिन यहीं से अब उनको अपनी राजनीति का रास्ता खोजना चाहिए.
चैनलों पर जिग्नेश को सुनने-देखने तथा अखबारों में उनके भाषणों के अंशों को पढ़ने पर वे जोशीले, ऊर्जावान तथा साहसी लगे. इस उम्र में, और वह भी नेतृत्व के लिए ये स्वाभाविक गुण हैं. लेकिन साथ में बहुत स्पष्ट तौर पर यह भी आभास हो रहा था कि उनमें उस वैचारिक स्पष्टता, सामाजिक समझ एवं दूरदर्शिता का अभाव है, जो उन्हें रचनात्मकता तक पहुंचा सकेगा. उनकी बातें तीन मुख्य स्तम्भों पर टिकी मालूम पड़ती हैं-मनुस्मृति का विरोध, संविधान का फ्रेम तथा मार्क्सवाद का दर्शनशास्त्र. इन तीनों में नया कुछ इसलिए नहीं है, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से उभरे लगभग सभी आंदोलनों ने अपने-अपने ढंग से इन्हीं उपायों को अपनाया है. जाहिर है कि अब तो ये उपाय और भी पुराने पड़कर अप्रभावी हो गए हैं. हां, शुरुआत करने के लिए ये थोड़े ठीक हो सकते हैं. लेकिन यदि इस शुरुआत को वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक संदर्भों में प्रौढ़ता प्राप्त नहीं हुई, तो इसका भी अंत अपने पूर्ववर्तियों की तरह होना निश्चित है. यह अवश्य होगा कि जिग्नेश सहित उनके कुछ अन्य सहयोगी (कन्हैया जैसे नौजवान) विधानसभाओं और संसद में अपनी सीटें सुरक्षित कर लेंगे, जैसा कि पैंथर पार्टी के साथ हुआ. या यदि जातिगत तत्व को छोड़ दिया जाए, तो आम आदमी पार्टी के साथ हुआ.
जिग्नेश मेवाणी को यह समझना होगा कि एक अधिनायकवादी व्यवस्था के विरुद्ध उठाए गए हथियार लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके विरुद्ध उतने कारगर नहीं होते. मार्क्सवाद आज एक ऐसा ही हथियार है. और यदि उन्हें इसका इस्तेमाल करना भी है, तो फिलहाल ‘मनुस्मृति’ के ‘जातिगत विभाजन’ की बजाय ‘वर्ग चरित्र’ के सिद्धांत पर ध्यान दें. उनके सामने इसके कई जीवंत प्रमाण मौजूद हैं कि उनके अपने समुदाय के ही प्रतिनिधि राजसत्ता प्राप्त करते ही स्वयं तथाकथित उच्च वर्ग; जिसे कार्ल-मार्क्स ‘शोषक वर्ग’ कहते हैं, बन जाते हैं. और डॉ आम्बेडकर की पूजा करने के बावजूद उनकी व्यक्तिपूजा के विरुद्ध विचारों को दरकिनार करके मूर्तियों की स्थापनाएं करने में जुट जाते हैं. ‘‘आरक्षण के सिद्धान्त को जाति समूह के अंदर ही आर्थिक आधार से न जोड़ने देना’’ इसी वर्ग-चरित्र की रणनीति है. इसलिए बाह्य सामाजिक विरोध (मनुस्मृति) से कहीं अधिक जरूरी है, अपने समुदाय के अंदर की प्रतिक्रियावादी शक्तियों का विरोध करना. साथ ही समुदाय को सक्षम बनाने के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों तथा सरकार द्वारा प्रदत्त उन सुविधाओं का समुचित रूप में उपयोग कराया जाना, जो उनके जीवन पर तत्काल सकारात्मक प्रभाव डालने की क्षमता रखते हैं. यह काम भी किसी राजनीतिक आंदोलन का ही अंग होता है, क्योंकि इससे आंदोलन को शक्ति मिलती है. हां, यदि जिग्नेश के मन में आंदोलन की जगह क्रांति की बात हो, तब बात कुछ अलग हो जाएगी.

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