Tuesday, February 20, 2018

कनेडियन पीएम का स्वागत फीका क्यो?

इस समय कैनाडीयन प्रधानमंत्री जस्टिन टुडो अपने 7 दिवसीय भारत दौरे पर आए हुए हैं, जबकि उनकी इस यात्रा को कोई भी अधिक भाव नहीं दे रहा है. मोदी सरकार के एक जूनियर कृषि राज्यमंत्री शेखावत ने उनका स्वागत किया. जबकि इसके पहले चीन, जापान, अमेरिका, अरब के राजकुमार, इजरायल के राष्ट्राध्यक्षों को खुद मोदी जी प्रोटोकॉल तोड़कर दौड़े दौड़े अगवानी करके पूरा देश घूमते थे. यहाँ तक क़ि सरकार का कोई बड़ा मंत्री भी नहीं जा रहा है. यूपी में वो ताजमहल देखने गए तो यूपी के सीएम या कोई मंत्री भी नहीं पहुँचे. वो कल गुजरात गये लेकिन मोदी जी हमेशा की तरह दौड़े दौड़े गाँधीनगर नहीं पहुँचे. जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी इवांका ट्रम्प (जिनकी कोई सरकारी हैसियत नहीं है,) के सामने पूरी सरकार बिछी पड़ी थी. सच पूछो तो भारतीय मीडिया भी उन्हें केवल इसलिए ही थोड़ा बहुत कवरेज दे रहा है क्योंकि वो दिखने में बहुत चार्मिंग या हैंडसम हैं. उनकी बीवी और बच्चे भी दिखने में बहुत खूबसूरत हैं शायद इसलिए तोड़ा बहुत तवज्जो मिल रहा है. इसके पीछे एक बड़ा कारण है दरअसल कनाडा में सिखों की एक बड़ी जनसंख्या रहती है. खुद जस्टिन टुडो की कनाडाई सरकार में 4 बड़े सिख मंत्री हैं. उनके रक्षा मंत्री हरजीत सज्जन अभी कुछ महीने पहले भारत आए थे, तो उन्होंने पंजाब के मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से मिलने की इच्छा जताई थी, तब कैप्टन ने ये कहकर साफ मना कर दिया था क़ि वो खालिस्तान समर्थक हैं. पूर्व में भी ये देखा जाता रहा है क़ि खालिस्तान आंदोलन में फंडिंग भी कनाडा में रहने वाले सिखों से होती रही है. हालाँकि कनाडा सरकार का ये स्टैंड है कि हम अटूट भारत का समर्थन और उसकी संप्रभुता का सम्मान करते हैं लेकिन अगर कोई यहाँ खालिस्तान की माँग करता है तो हम उसको रोकेंगे नहीं, क्योंकि ये उसकी अभिव्यक्ति की आज़ादी है. यही कारण है क़ि पश्चिमी देश का बड़ा नेता भारत आए और उसकी अनदेखी कर दी जाए, अगर इसमें मोदी सरकार बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती तो शायद कांग्रेस को एक मौका मिल जाता उसपर हमलावर होने का. असल में इन दोंनो नेताओं (मोदी और जस्टिन टुडो) की विचारधारा में भी काफ़ी फ़र्क है. मोदी जी रॉबिन हुड टाइप हैं, बिल्कुल ट्रम्प जैसे. इनकी छवि मुस्लिम विरोधी और दक्षिणपंथी है. वहीं टुडो बिल्कुल राहुल गाँधी की तरह हैं. लेकिन जिस दौर से राहुल गाँधी गुजर रहे हैं, वो टुडो 2013 में छोड़ आए हैं. एक तो वो खुद एक राजनीतिक परिवार से आते हैं, जिनके पिता 4 बार प्रधानमंत्री रहे हैं.  2006-07 के आसपास उनकी रिपब्लिकन पार्टी नंबर एक से सीधे हाशिए पर पहुँच गई. उनके आगे कंज़र्वेटिव और न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी को हराना बड़ी चुनौती थी. और टुडो हमेशा से ही राहुल गाँधी की तरह वहाँ मज़ाक और हल्के में लिए जाते थे. वो कभी इंजीनियरिंग पढ़ने लगे, तो कभी इनवायरमेंटल स्टडी तो कभी बाउन्सर की जॉब करने लगे. फिर फ्रेंच पढ़ाने लगे. और कुछ भी पूरा नहीं करके अधूरा ही छोड़ देते थे. तभी कुछ लोगों की नज़र उनपर गई कि शायद इसके लुक और युवा होने की वजह से जनता इसे पसंद करने लगे. वो राजनीति में आने की सोच ही रहे थे क़ि विपक्ष ने उनपर जमकर हमले शुरू कर दिए. कोई भी उनको सीरियस नहीं लेता था. उसी दौरान उन्होने कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता Patrick Brazeua को बॉक्सिंग मैच की चुनौती दे डाली. देश में सनसनी फैल गई. वैसे तो टुडो की फिटनेस बढ़िया थी, वो स्पोर्ट्स में काफ़ी एक्टिव थे, लेकिन उनकी सिगरेट पीने की आदत की वजह से उनका स्टेमिना काफ़ी कम हो गया था. फिर मैच हुआ, और टुडो उसे जीत गये. फिर वो राजनीति में आए और 2013 में प्रधानमंत्री बन गए. वो राजनीतिक तौर पर काफ़ी करेक्ट या परफ़ेक्ट माने जाते हैं. वो बहुत ज़्यादा लिबरल हैं, कभी थर्ड जेंडर के अधिकारों के लिए सड़क पर आकर डांस करने लगते हैं, तो कभी महिलाओं के आंदोलन में हिस्सा लेते हैं. अपने पीएम ओफिस में भी अपने बच्चे को लेकर चले जाते हैं. हमेशा कट्टर ताकतों के खिलाफ रहते हैं, और किसी से दुश्मनी भी मोल नहीं लेते हैं. ऐसा भी नहीं वो काफ़ी मजबूत प्रधानमंत्री हैं, जैसा कि मैने बताया क़ि वो खुद काफ़ी लिबरल और सेकुलर हैं, इसलिए उनकी कैबिनेट में भी 4 सिख मंत्री हैं, कनाडा में माइगरेट्स और अल्पसंख्यकों के लिए काफ़ी सुविधाएँ हैं. कह सकते हैं अगर सभी देशों के राष्ट्राध्यकों की लोकप्रियता का मुकाबला हो तो वो आसानी से जीत सकते हैं. उनकी आलोचना भी होती है, क्योंकि वो एनवायमेंट को लेकर यूएन में हुए एक समझौते को तोड़ते नज़र आते हैं. जिसमें कहा गया था क़ि ऐसे ही चलता रहा तो ग्लोबल वार्मिंग की वजह से आने वाले 70-80 सालों में दुनियाँ से जीवन ख़तम हो जाएगा, इसलिए सबकी ज़िम्मेदारी है इसे बचाने की. कनाडा में प्राकृतिक संसाधन काफ़ी मात्रा में हैं और जनसंख्या उसके मुक़ाबले कम. शायद विश्व की 0.1-0.2% लेकिन जितना वो तेल और गैस निकालते हैं उससे होने वाला प्रदूषण विश्व के प्रदूषण का काफ़ी बड़ा हिस्सा है. इसलिए उनकी आलोचना भी काफ़ी होती है. जस्टिस टूडो के बारे में एक बात बताना भूल गया कि वो कनाडा की एक बडी ऐतिहासिक गलती के लिए ऑफिशियली माफी मांग चुके हैं। शायद 1914 की बात है जब एशिया से कुछ प्रवासी समुद्र के रास्ते कनाडा जा रहे थे, उसमें भारतीय भी बडी संख्या में थे। जिनको तत्कालीन कनाडा सरकार ने वापस कर दिया था.  इस गलती के लिए सरकार की तरफ से माफी मांग चुके हैं। इसलिए भी इनका काफी सम्मान किया जाता है।

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