सीरिया में अबतक लगभग 3 लाख लोगों को बशर अल असद सरकार द्वारा मारा जा चुका है। किसी देश की सरकार का अपने ही नागरिकों की बड़े पैमाने पर हत्या का यह एक और उदाहरण है। मज़ेदार बात यह है कि इतने बड़े नरसंहार के बावजूद पूरी दुनिया , संयुक्त राष्ट्र , मानवअधिकार जैसी पोपट संस्थाएं और यहाँ तक कि इस्लामिक राष्ट्र भी चुप हैं। दरअसल , अमेरिका के नेतृत्व में पश्चीमी देशों ने एशिया और विशेषकर मिडिल ईस्ट को बर्बाद करने के लिए जो साजिश रची उसकी चपेट में एक एक करके सब आ रहे हैं। ईराक और सद्दाम हुसैन को लेकर तब के तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की माँगी गयी माफी इस अमेरिकी साजिश को सिद्ध करती है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने दुनिया के अन्य तमाम देशों को बर्बाद करने के लिए एक ऐसे अचूक अस्त्र का निर्माण किया है जिससे कोई बचने नहीं वाला। वह अस्त्र है "आतंकवाद" , और इस आतंकवाद के दो तीन खौफनाक चेहरे , ओसामा बिन लादेन , और फिर "बगदादी"। अपने प्रचार तंत्र से चाहे जिसे इन आतंकवादी संगठनों का समर्थक बता दो , खुद कहीं बम ब्लास्ट या हमला करा दो और उसे इन छद्म आतंकी संगठनों का कारनामा बता कर किसी इस्लामिक देश के मासूम नागरिकों पर बम गिराओ , कभी खुद पर तो कभी किसी पर हमला करा कर ऐसे छद्म आतंकी संगठनों की उपस्थिति को विश्वसनीय बनाओ और फिर किसी मुस्लिम देश के किसी क्षेत्र में इन छद्म संगठनों और आतंकवादियों की मौजूदगी के नाम पर नीरिह जनता को बम गिरा कर छलनी छलनी कर दो। भारत में इस छद्म आतंकवाद के नाम पर ऐसे ही मुसलमानों को भी प्रताड़ित किया जाता रहा है। अमेरिका द्वारा आतंकवाद पैदा ही मुस्लिम देशों और मुसलमानों को बर्बाद करने के लिए किया गया है। आतंकवाद और कुछ नहीं बल्कि अमेरिका का पैदा किया गया एक ऐसा भस्मासुर है जो धीरे धीरे सबको खा जाएगा , जहाँ अमेरिकी हित खतरे में आया वहाँ आतंकवाद पैदा हो जाएगा और वह देश आतंकवाद का समर्थक। पाकिस्तान उदाहरण है। जबतक वह अमेरिका के साथ था तब तक वह उसका लाडला था , जैसे ही वह अमेरिकी खेल समझ कर चीन की तरफ हुआ तब से वह आतंकवाद की आंड़ में अमेरिकी आक्रमण के केन्द्र में है। अमेरिका के नेतृत्व में तेल के लिए यह खेल पिछले कई दशकों से चल रहा है और एक एक करके सब इसकी जद में आएंगे। ईराक , अफगानिस्तान , सीरिया , पाकिस्तान , यमन , लीबिया के बाद अगला नंबर और अन्य देशों का आएगा जो अमेरिका के इशारे पर नहीं चलेंगे , जो आज तमाशबीन हैं वह ठीक वैसे ही कल जद में आएंगे जैसे।
ईराक , लीबिया , सीरिया , अफगानिस्तान में सबसे पहले वहाँ के लोगों ने आपस में लड़ना शुरू किया। ईराक में सुन्नी और खुर्द आपस में लड़े तो सीरिया में शिया और सुन्नी , अफगानिस्तान में कट्टरपंथी और लिबरल लोग आपस में लड़े। फिर इन अशांत देशों में बाहरी देशों ने हस्तक्षेप करना शुरू किया। आज यह देश तबाह और बर्बाद हो गये। ईराक , सीरिया , लीबिया और अफगानिस्तान के ठीक उन शुरुआती दिनों जैसी स्थिति आज भारत की है। यहाँ भी हिन्दू-मुस्लिम-दलित आपस में लड़ मर रहे हैं , कोई किसी को भीड़ बनकर मार रहा है तो कोई जला रहा है। एक वर्ग का दूसरे वर्ग पर आक्रमण लगातार हो रहा है। गिद्ध हथियारों का जखीरा बनाए नज़र लगाए बैठे हैं। हमें अपने भारत की चिंता है. सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ 6 साल पहले शुरू हुई शांतिपूर्ण बगावत पूरी तरह से गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है. इसमें अब तक 3 लाख लोग मारे जा चुके हैं. इस गृहयुद्ध में पूरा देश तबाह हो गया है और दुनिया के ताक़तवर देश भी आपस में उलझ गए हैं. संघर्ष शुरू होने से पहले ज़्यादातर सीरियाई नागरिकों के बीच भारी बेरोज़गारी, व्यापक भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव और राष्ट्रपति बशर अल-असद के दमन के ख़िलाफ़ निराशा थी. बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल असद की जगह ली थी. अरब के कई देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था.
सीरिया की असद सरकार को यह असहमति रास नहीं आई और उसने आंदोलन को कुचलने के लिए क्रूरता दिखाई. सरकार के बल प्रयोग के ख़िलाफ़ सीरिया में राष्ट्रीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया और लोगों ने बशर अल-असद से इस्तीफे की मांग शुरू कर दी. वक़्त के साथ आंदोलन लगातार तेज होता गया. विरोधियों ने हथियार उठा लिए. विरोधियों ने इन हथियारों से पहले अपनी रक्षा की और बाद में अपने इलाक़ों से सरकारी सुरक्षाबलों को निकालना शुरू किया. असद ने इस विद्रोह को 'विदेश समर्थित आतंकवाद' करार दिया और इसे कुचलने का संकल्प लिया. उन्होंने फिर से देश में अपना नियंत्रण कायम करने की कवायद शुरू की. दूसरी तरफ विद्रोहियों का ग़ुस्सा थमा नहीं था. वे भी आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार रहे. इस वजह से दोनों पक्षों के बीच हिंसा लगातार बढ़ती गई. 2012 आते आते सीरिया बुरी तरह से गृहयुद्ध में प्रवेश कर चुका था. सैकड़ों विद्रोही गुटों ने एक समानांतर व्यवस्था स्थापित कर ली ताकि सीरिया पर उनका नियंत्रण कायम हो सके. इसका नतीजा यह हुआ कि यह लड़ाई असद और उनके विरोधियों से आगे निकल गई. सीरिया की लड़ाई में क्षेत्रीय और दुनिया की ताक़तों की एंट्री हुई. इसमें ईरान, रूस, सऊदी अरब और अमरीकी का सीधा हस्तक्षेप सामने आया. इन देशों ने असद और उनके विरोधियों को सैन्य, वित्तीय और राजनीतिक समर्थन देना शुरू किया. सीरिया में कई देशों की एंट्री से युद्ध की स्थिति और गंभीर हो गई. सीरिया दुनिया का एक छद्म युद्ध मैदान बन गया. बाहरी देशों पर सीरिया में सांप्रदायिक दरार पैदा करने का भी आरोप लगा. सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. इसी संघर्ष में शिया बनाम सुन्नी की भी स्थिति पैदा हुई. शिया बनाम सुन्नी की दरार के कारण अत्याचार और बढ़ा. इस मतभेद से न केवल लोग मारे जा गए बल्कि सभी समुदायों में राजनीतिक तब्दीली की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया. जिहादी ग्रुपों को शिया-सुन्नी का विभाजन रास आया और उन्हें भी यहां पसरने का मौक़ा मिला. इस युद्ध में जिहादियों के आने से पूरी तस्वीर ही बदल गई. हयात ताहिर अल-शम ने अल क़ायदा से जुड़े संगठन अल-नुसरा फ्रंट से गंठबंधन किया. इसके बाद इसने सीरिया के उत्तरी-पश्चिमी राज्य इदलिब पर नियंत्रण कायम किया. दूसरी तरफ़ कथित इस्लामिक स्टेट का उत्तरी और पूर्वी सीरिया के व्यापक हिस्सों पर क़ब्ज़ा हो गया. यहां सरकारी बलों, विद्रोही गुटों, कुर्दिश चरमंथियों, रूसी हवाई हमलों के साथ अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन देशों के बीच संघर्ष शुरू हुआ. ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़गानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरियाई आर्मी की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे ताकि उनके पवित्र जगह की रक्षा की जा सके. असद के लिए सीरिया में स्थिति मुश्किल होती जा रही थी. असद ने अपना नियंत्रण हासिल करने के लिए विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाकों में सितंबर 2015 में हवाई हमले शुरू किए. रूस का कहना है कि हवाई हमले में केवल आतंकवादियों को निशाना बनाया जा रहा है. हालांकि ऐक्टिविस्टों का कहना था कि हमला पश्चिमी देशों के समर्थन वाले विद्रोही ग्रुपों पर किया गया. 6 महीने बाद पुतिन ने सीरिया से अपने सैन्य बलों की वापसी का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि सीरिया में उनका मिशन पूरा हो गया है. हालांकि रूसी मदद के कारण ही विद्रोहियों के क़ब्जे वाले एलप्पो में असद को फिर से नियंत्रण कायम करने में मदद मिली।
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