Wednesday, February 21, 2018

कहाँ भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया?

पिछले 4 साल से मोदी सरकार और उनके समर्थकों द्वारा खूब प्रचारित किया जा रहा था क़ि भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है. एक भी स्कैम नहीं हुआ. बस सब जगह अच्छे दिन आ गये हैं. असल में लोगों का नज़रिया भ्रष्टाचार को लेकर केवल टूजी, कोयला घोटाला और कॉमनवेल्थ स्कैम जैसे घोटालों को लेकर बन गया है. अब ऐसे घोटाले तो न दो महीनें में हो जाते हैं और न ही तुरंत बाहर आ जाते हैं. 2005- 06 के घोटाले यूपीए के अंतिम समय में आए थे बाहर. इसलिए इस सरकार के भी आगे चलकर आ सकते हैं. दूसरी बात ये क़ि सरकार घोटाले बाहर आने के लिए जो एजेन्सिज को कितना फ्री रखती है. ईडी, सीबीआई, और इनकमटैक्स विभाग कितना फ्री हैं दुनियाँ जानती है. अब तो सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोत्तम अदालत के जज भी बाहर आकर प्रेस कांफ्रेस करके शिकायत करने लगे. जस्टिस लोया का क्या हुआ? आरटीआई जैसे क़ानून दबाए जा रहे हैं. व्हिसल ब्लोअर एक्ट बनाया नहीं गया, तो कौन शिकायत करेगा जान जोखिम में डालकर? व्यापम में न जाने कितने सैकड़ों गवाहों की हत्या हो गई. लोकपाल क़ानून जो कांग्रेस सरकार ने बनाया भी था वो 4 साल में नियुक्त नहीं किया गया. और बीजेपी शासित राज्यों में तो कितने घोटाले चल ही रहे हैं. एमपी में व्यापम से लेकर छत्तीसगण में चावल, नमक, सिचाई, और बिहार में शौचालय घोटाला तक फैले पड़े हैं. कहाँ कहाँ कार्यवाही हुई? और फिर आप भ्रष्टाचार को केवल घोटाले शब्द की परिभाषा में क्यों देखते हैं? क्या पुलिस ने 100-200 रुपए लेने बंद कर दिए? क्या राशन कार्ड से लेकर आपका सरकारी दफ़्तरों में काम फ्री में होने लगा? और नेताओं की ही बात करो तो कौन सा नेता अपनी कमाई से हेलीकॉपटर से उड़ता है? किसके बाप ने पैसा कमा कर रखा था कोई चाय बेचता था तो कोई पकौड़े बनाता था फिर ये हेलिकोपर कहाँ से आए. ये किसके पैसे से हो रहा है? मैं किसी एक दल विशेष की बात नहीं कर रहा हूँ. सब के सब नेता वही कर रहे हैं. इतनी मंहगी राजनीति में आप किसी से कैसे उम्मीद कर सकते हैं बिना भ्रष्टाचार के ये सब ठाट-बाट? अभी 2जी स्कैम को अदालत ने ये कहकर ख़तम कर दिया क़ि सीबीआई ने कोई भी सबूत पेश नहीं किया. अब या तो कांग्रेस बिल्कुल पाक साफ है या फिर घोटाला हुआ था लेकिन छुपाया गया? क्या इतने बड़े घोटाले को दबा देना भी एक घोटाला नहीं है?
अब पीएनबी घोटाले ने ही पूरे देश को सकते में डाल दिया. इस कांड से अब तक सरकार  और उसके समर्थक लोग मीडिया तक सदमे में है. हो सकता है कि सरकार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है कि भ्रष्टाचार को लेकर देश में निराशा और हताशा न फैले, लेकिन इस घोटाले ने देश के विश्वास की नींव तक मार कर दी है. अब तक हमें यही पता था कि बैंक अपने दिए कर्ज़ों के वापस न आने से परेशान हैं. लगभग सारे सरकारी बैंक इतने ज़्यादा परेशान हैं कि आम लोगों की जमा रकम से उनका काम नहीं चल पा रहा है. इस संकट से निपटने के लिए सरकार को यह ऐलान करना पड़ा था कि इन बैंकों में सरकार की तरफ से रकम डाली जाएगी. बैंको के सामने एमरजेंसी जैसे हालात में इसके अलावा और कोई चारा था भी नहीं, लेकिन अचानक इस बैंक घोटाले ने बैंकों की हालत और भी ज़्यादा सनसनीखेज बना दी है.  अब सरकार को नए सिरे से हिसाब लगाना पड़ेगा कि बैंकों को सरकार की तरफ से पैसा पहुंचाने पर देश के आम लोग क्या धारणा बनाएंगे. पीएनबी बैंक घोटाला किसी कर्ज़ की वापसी का नहीं है, बल्कि फर्जी तरीके से बैंक से गारंटी का कागज़ हथियाकर दूसरे बैंकों से पैसा निकाल लेने का है. पैसा निकाला जा चुका है. दो दिन पहले बताया गया था कि 11,000 करोड़ रुपये की लूट हो गई. अब पता चला है कि लूट या ठगी का यह आंकड़ा 21,000 करोड़ का है. शेयर बाज़ारों में 'घपले में फंसे सरकारी बैंक' के शेयर खरीदने वाले लाखों लोगों की 10,000 करोड़ से ज़्यादा की रकम डूब चुकी है. इतना ही नहीं, दूसरे सरकारी बैंकों के शेयर भी बुरी हालत में हैं. उन्हें कितनी चोट पहुंची, इसका हिसाब अभी नहीं लगा है, लेकिन इतना तय है कि यह भी 10-20,000 करोड़ से ज़्यादा ही बैठेगी. नवीनतम आकलन के मुताबिक रकम 60,000 करोड़ का आंकड़ा पार करने को है. व्यवस्था पर यकीन करने वाले देश के छोटे-मझोले निवेशकों का यकीन हिल गया. जिन लोगों का पैसा बैंकों में जमा है, उसकी सुरक्षा को लेकर लोगों के मन में डर अलग है. यानी इस घोटाले ने दूर-दूर तक हालत बिगाड़ दी है. सरकार सबसे पहले यह कहने में लगी कि यह घोटाला पुरानी सरकार के वक्त का है. इसके लिए ज़रूरी था कि घोटाले को कम से कम पांच साल पुराना बताया जाए, क्योंकि लगभग चार साल से वह खुद ही सरकार में है. दूसरा काम सरकार ने यह किया कि इसे सिर्फ बैंक का घोटाला बताया जाए, लेकिन दिक्कत यह आई कि यह बैंक देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक है. तीसरा काम सरकार यह कर रही है कि किसी तरह यह संदेश जाए कि पुरानी सरकार का घोटाला मौजूदा सरकार ने पकड़ा, लेकिन इसमें झोल यह है कि बड़े फर्जीवाड़े की लगभग सारी तारीखें पिछले एक साल की निकलकर आ रही हैं. पुराने कुछ मामले अगर निकलकर आए भी तो सरकार इस सवाल का जवाब कहां से ला पाएगी कि उसकी सरकार बनने के बाद चार साल से हो क्या रहा था. भ्रष्टाचार ही तो वह मुददा था, जिसके सहारे मौजूदा सरकार सत्ता में आई थी. इसीलिए इस घोटाले ने मौजूदा सरकार के भ्रष्टाचारमुक्त शासन के नारे को तहस-नहस कर दिया. जनता को इस बात से क्या मतलब कि घोटाला सीधे सरकार ने किया या सरकार के अफसरों ने किया. उसे यह सुनना भी अच्छा नहीं लगेगा कि ऐसे घोटाले पहले से चल रहे थे, क्योंकि इस बात को तो चार साल पहले सुनाया गया था और जनता ने यकीन किया था कि सरकार बदलने से भ्रष्टाचार के हालात बदल जाएंगे, जो नहीं बदले.
यह घोटाला अपने आकार के कारण दुनिया में सनसनी फैलाने के लिए काफी था, लेकिन इस घोटाले के आरोपी का कारोबार इतने सारे देशों में है कि घोटाला उजागर होते ही हर देश का मीडिया इस खबर को रात-दिन बजा रहा है. आसानी से माना जा सकता है कि इस कांड को विदेशी निवेशक भी गौर से जान-सुन रहे होंगे. विदेशों में बसा भारतीय समुदाय इस कांड को सुनकर भौंचक रह गया होगा. सबसे ज़्यादा गौर उस अंतरराष्ट्रीय संस्था ने किया होगा, जो दुनिया के तमाम देशों में भ्रष्टाचार की स्थिति का आकलन करती है. 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' नाम की यह संस्था हर साल तमाम देशों में भ्रष्टाचार का आकलन करके उन्हें एक क्रम में लगाती है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' की इस सूची में कम भ्रष्ट देश से शुरू करने के बाद सबसे भ्रष्ट देश को क्रमवार लगाया जाता है. यह आकलन एक प्रकार से हर देश का भ्रष्टाचार सूचकांक होता है. पिछले दो-तीन साल से हम लोग यह ऐतराज़ कर रहे थे कि हमें ज़्यादा भ्रष्ट देशों की श्रेणी में क्यों डाला जाता है. हमें पता है कि 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' के सर्वेक्षण में नागरिकों से ही पूछा जाता है कि वे घूस देने के लिए कितने बाध्य हैं. इसी से इस बात का आकलन होता है कि किसी देश में घूस लेने की तत्परता का क्या स्तर है. भ्रष्टाचार के मामले में हमें बहुत खराब हालत में बताए जाने से अब तक हमें टीआई के इस सर्वेक्षण पर शक होता था, लेकिन पनब घोटाले ने हमारा भ्रम दूर कर दिया. बहरहाल, इस सनसनीखेज़ घोटाले के उजागर होने के बाद हमारे भ्रष्टाचार सूचकांक का ज़्यादा कबाड़ा होने के आसार बढ़ गए हैं. बेशक अब हमें घरेलू राजनीति के अलावा अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि के प्रबंधन के काम पर भी ज़ोर-शोर से लगना पड़ेगा, बहरहाल, भ्रष्टाचार के मामले में हम और गहरे गड्ढे में पहुंचे दिख रहे हैं.

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