Thursday, March 28, 2019
मायावती क्या करेंगी इस चुनाव में?
An appeal to you
Dear friends & family members 😊
I know Some people are hurting because I'm criticising modi ji continually. I can understand your feelings. Dears plz don't take it on your heart. I'm just criticising the wrong policies of any govt. It's my duty as a citizen, Also my freedom of expression, given by Baba Saheb's Constitution. I can't leave politics because It's in my blood. I'm not fan of any party or leader. If I will not do this, then these dirty leaders will never talk about real issues of public. They will make confuse us in Hindu- Muslim, Pakistan or temple- mosque. It is also my promise that I will speak always against every govt. if Rahul Gandhi will be PM tomorrow, I will criticize him on every wrong decision. because leaders has millions for spend on their work's advertising. And the fourth column of democracy (media) is not doing his/her job well. They are hungry for just TRP. "I want to save ur freedom because Modi is leader of orthodox people's like rss. Their agenda is anti minorities n also women. They are like KHAP, who can't see a girl in jeans or short they want in GHUNGHAT on every women. So if you want to give a liberal society to ur next generation, plz Vote against haters like BJP, SHIVSENA, MIM or any religious orthodox."
Thank you.
राहुल गांधी की NYAY योजना में कितना दम?
Saturday, March 23, 2019
राम मनोहर लोहिया की जीवनी
राम मनोहर लोहिया ऐसे राजनेता थे जो अमरीका जा कर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से समाजवाद पर बहस कर सकते थे और मक़बूल फ़िदा हुसेन जैसे कलाकार की कला को भी राह दिखा सकते थे. दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मक़बूल फ़िदा हुसेन को कहा था, "ये जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो. रामायण को पेंट करो."
वो इतने बेबाक वक्त थे कि उस समय जब कोई नेहरू के सामने नहीं ठहरता था तो वो लोहिया संसद हिला देते थे. वे लोहिया ही थे जिन्होंने विपक्ष क्या होता है और उसे क्या करना चाहिए, का पाठ भारतीय लोकतंत्र को सिखाया. अपने प्रयासों से उन्होंने आजादी के बाद एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अपनी मौत से ठीक पहले यानी 1967 तक पानी पीने पर मजबूर कर दिया. लेकिन ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. राम मनोहर लोहिया की रचनात्मक राजनीति और अद्भुत नेतृत्व क्षमता का प्रभाव इतना दूरगामी रहा कि उनके जाने के करीब 20 सालों बाद ही उनके सिद्धांतों को मानने वाली कई पार्टियां भारतीय लोकतंत्र के पटल पर छाने लगीं. ‘सामाजिक न्याय’ की उनकी संकल्पना तो आज राजनीति का मूल सिद्धांत बन चुकी है. बताया जाता है कि लोहिया शुरू में नेहरूवादी थे और गांधीवादी वे बाद में बने. मतलब यह है कि शुरू में वे गांधी की तुलना में नेहरू से ज्यादा प्रभावित थे. बाद में नेहरू से उनका मोहभंग होता गया और गांधी के सिद्धांतों और कार्यनीतियों पर उनका भरोसा बढ़ता गया.
आज के ५० साल पहले वो लिव इन रिलेशन में रहे और कभी छुपाया नहीं। आप आज तो भारतीय राजनीती में इसकी उम्मीद भी नहीं कर सकते हैं. लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी. ये कम ही लोग जानते होंगे कि वे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे.
लोहिया क्या थे, इसे समझने के लिए मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर के बनाए उस कार्टून का जिक्र ज़रूरी है, जिसमें उन्होंने लोहिया का कार्टून बनाया और लिखा था कि आज सुबह लोहिया ने मंत्री पद की शपथ ली और शाम में ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
गांधी के मरने के बाद कांग्रेस मॉडल को नेहरू ने 1948 में खत्म कर दिया. कांग्रेस के समाजवादी नेताओं को पार्टी का विलय कांग्रेस में करने या कांग्रेस छोड़ने का विकल्प दिया गया. लोहिया को तो नेहरू ने कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाने का प्रस्ताव दिया. लेकिन उन्होंने अन्य समाजवादियों जिनमें जेपी भी शामिल थे, के साथ कांग्रेस छोड़ने का विकल्प चुना. यह समझते हुए भी कि कांग्रेस की छवि देशवासियों के दिलोदिमाग पर छप चुकी है और उसे हटाना आसान नहीं है, खासकर तब जब कोई स्थापित संगठन न हो और न ही मजबूत आर्थिक समर्थन. लेकिन लोहिया और उनके साथियों ने लोकतंत्र के हित मेंं विपक्ष की आवाज बनने और उसे बुलंद करने का फैसला लिया.
इसका परिणाम 1948 में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के गठन के रूप में हुआ. फिर 1952 में जेबी कृपलानी की ‘किसान मजदूर पार्टी’ के साथ विलय करके ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ का निर्माण किया गया. हालांकि मतभेदों के चलते लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से ‘सोशलिस्ट पार्टी’ को जिंदा करने का निर्णय किया.
लोहिया से सोशलिस्ट पार्टियों की इस टूट-फूट पर किसी ने पूछा तो उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा था, ‘समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और अमीबा में एकरूपता है. मतलब जैसे ही पार्टी मजबूत होकर बड़ी बनती है, अमीबा की तरह टूटकर फिर पहले की तरह छोटी हो जाती है.’ उनका यह कथन आज भी खुद को उनकी विरासत का उत्तराधिकारी कहने वाली पार्टियों पर लागू होता दिखता है. लोहिया और अन्य समाजवादियों की पहले आम चुनाव में हार हुई. लेकिन यह हार इन नेताओं की अलोकप्रियता की वजह से नहीं बल्कि उनके संगठन के कांग्रेस की तुलना में कमजोर होने और कमतर आर्थिक संसाधन होने के चलते हुई थी. इसे मजबूत कांग्रेस को नियंत्रण में रखने की जिजीविषा ही कहेंगे कि इस हार के बाद कई सोशलिस्ट पार्टियां एकजुट हो गईं. इसी समय लोहिया के सिद्धांत पार्टी के अन्य नेताओंं को पच नहीं रहे थे. वे जैसे भी हो केरल में सत्ता में बने रहना चाहते थे. इसी बात पर लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से सोशलिस्ट पार्टी को जिंदा करने का निर्णय लिया.
इसके बाद वे घूम-घूमकर तमाम पिछड़ी जातियों के संगठनों को जोड़ने लगे. इसी सिलसिले में उन्होंने बीआर अंबेडकर से मिलकर उनके ‘आॅल इंडिया बैकवर्ड क्लास एसोसिएशन’ के सोशलिस्ट पार्टी में विलय की बात शुरू की. बातचीत पक्की हो गई थी कि दिसंबर 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया. और उन्हें अपने साथ जोड़ने की उनकी मुहिम अधूरी रह गई. फिर भी ऐसे दूसरे संगठनों को जोड़ने का उनका प्रयास जारी रहा.
राम मनोहर लोहिया के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा रहा कि 1967 कांग्रेस पार्टी सात राज्यों में चुनाव हार गई और पहली बार विपक्ष उसे टक्कर देने की हालत में दिखने लगा. इस चुनाव के बाद लोहिया ने तय किया कि वे जेपी को मुख्यधारा में वापस लाकर विपक्ष को और मजबूत बनाएंगे.
Friday, March 22, 2019
जहाँ कांग्रेस की उम्मीदें
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में 50 सीटों से भी कम पर सिमट गई कांग्रेस को इस बार किन राज्यों से सीटों में बढ़ोतरी की उम्मीद है. अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के बाद पांच राज्य ऐसे दिख रहे हैं, जहां कांग्रेस को सबसे अधिक उम्मीदें हैं. ध्यान से देखें तो पता चलता है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इन्हीं पांच राज्यों में सबसे अधिक सक्रिय हैं.
इसमें पहला मध्य प्रदेश जहाँ लोकसभा की कुल 29 सीटें हैं. इनमें से अभी कांग्रेस के पास सिर्फ तीन हैं. इन तीन सीटों में से एक सीट छिंदवाड़ा की है जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ जीतते आए हैं. दिसंबर, 2018 में वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए. इसका मतलब यह हुआ कि मध्य प्रदेश से कांग्रेस के पास सिर्फ दो ही लोकसभा सांसद बचे हैं.
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मध्य प्रदेश से सीटों में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की उम्मीद है. पार्टी को ऐसी उम्मीद इसलिए है कि 15 सालों बाद उसे बीते साल विधानसभा चुनावों में जीत हासिल हुई. इससे कांग्रेस का हौसला बुलंद है. मध्य प्रदेश से सीटों की बढ़ोतरी की उसकी उम्मीद की दूसरी वजह यह है कि यहां कांग्रेस और भाजपा के अलावा कोई अन्य मजबूत क्षेत्रीय पार्टी नहीं है. इसलिए कांग्रेस नेताओं को यह लग रहा है कि मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधे मुकाबले का फायदा कांग्रेस को मिलेगा. कांग्रेस नेताओं को यह भी लग रहा है कि प्रदेश में 15 साल की और केंद्र में पांच साल की भाजपा सरकार के खिलाफ यहां के लोगों में जो नाराजगी है, उसका उसे फायदा मिल सकता है.
दूसरा राज्य है राजस्थान। इस राज्य में लोकसभा की कुल 25 सीटें हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में इनमें से एक भी कांग्रेस को नहीं मिली थी. सभी सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीते थे. बाद में अलवर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार को जीत हासिल हुई. इसका मतलब यह हुआ कि राजस्थान में अभी कांग्रेस के पास सिर्फ एक लोकसभा सांसद है.
लेकिन प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस की दिसंबर, 2018 में हुई वापसी से पार्टी को यह उम्मीद है कि राजस्थान से निश्चित तौर पर उसकी लोकसभा सीटें बढ़ेंगी. राजस्थान कांग्रेस के नेताओं को यह लग रहा है कि दिसंबर में ही उनकी सरकार बनी है और जब लोकसभा चुनाव हो रहे होंगे तो उनकी सरकार के कार्यकाल का तकरीबन चार महीना पूरा होगा, ऐसे में उन्हें किसी सत्ताविरोधी लहर का सामना नहीं करना पड़ेगा. जबकि भाजपा को जिस सत्ताविरोधी लहर का सामना हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में करना पड़ा है, उससे कहीं अधिक सत्ताविरोधी लहर का सामना उसे लोकसभा चुनावों में करना पड़ेगा. मध्य प्रदेश की तरह ही राजस्थान में भी कोई मजबूत क्षेत्रीय दल नहीं है. इसलिए भाजपा और कांग्रेस के सीधे मुकाबले में कांग्रेसी नेताओं को उम्मीद है कि इस बार उनकी सीटें बढ़ेंगी.
इसी लिस्ट में एक और राज्य है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य गुजरात है. 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस गुजरात की कुल 26 सीटों में से एक सीट भी नहीं जीत पाई थी. इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को यहां अच्छी-खासी सफलता की उम्मीद है. गुजरात कांग्रेस के नेताओं से बात करने पर इसकी तीन वजहें समझ में आती हैं. पहली तो यह कि 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन काफी सुधरा था. 2017 के चुनावों में भाजपा जैसे-तैसे बहुमत के आंकड़े को पार कर पाई.
दूसरी वजह यह बताई जा रही है कि गुजरात में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के रूप में जिस तरह से एक नया युवा नेतृत्व उभरा है और इसने जिस तरह से नरेंद्र मोदी को घेरने का काम किया है, उससे कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में लाभ मिल सकता है. तीसरी वजह यह बताई जा रही है कि यहां भी मध्य प्रदेश और राजस्थान की तरह कोई तीसरी पार्टी नहीं है. भाजपा से सीधा मुकाबले की स्थिति में पार्टी नेताओं को लग रहा है कि गुजरात में उनकी सीटों की संख्या इस बार दहाई के अंक में पहुंच सकती है.
Thursday, March 21, 2019
2019 चुनाव के अनुमान
अगर आपको लग रहा कि यूपी का कुछ असर नहीं होगा चुनाव में तो आप याद रखिए कि उत्तर प्रदेश में तो महागठबंधन होने के बाद भी बीजेपी को 40-45% वोट मिल रहा है, जो सपा बसपा के मूल वोट के बराबर ही है. बाकि अखिलेश मायावती जैसे एसी पसंद नेताओं से नया वोट तो जुड़ नहीं रहा, इसका मलतब आधी सीटें तो बीजेपी जीत रही है. समाजवादी पार्टी तो ठीक से मेहनत करती तो अकेले दम पर २५ सीटें जीत सकती थी. बाकि गठबंधन का फायदा तो बसपा को होगा. बसपा को अपनी साख बचाने का अच्छा मौका मिला है, जो बिना गठबंधन के एक भी सीट नहीं जीत सकती थी. मायावती ने होशियारी की और बसपा के हिस्से वही सीटें आईं जिसमें बीजेपी कमजोर होती। सपा को अधिकतर वो सीटें मिली हैं जहाँ सपा+बसपा+कांग्रेस का मिलकर वोट भी बीजेपी के बराबर नहीं होता है. उदाहरण के लिए कानपुर, बनारस, लखनऊ। बाकी बहुत सीटों पर तो मुस्लिम वोट असमंजस में रहेगा और राष्ट्रिय चुनाव की वजह से कांग्रेस को ही वोट देगा.
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...