आज राम मनोहर लोहिया की जयंती है, और सोच कर बड़ा दुःख होता है कि उनके जैसी विकसित सोच रखने वाले समाजवादी नेता की विरासत को भारत नहीं संभल पाया. लोहिया की राजनीति के असली वारिस की बात होने पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, "लोहिया जिस तरह की राजनीति की बात करते थे, उसके ठीक ठीक अपनाने वाले तो केवल किशन पटनायक ही हो पाए. हालांकि उनको वो सम्मान नहीं मिला. बिहार की राजनीति में लोहिया को जिन्होंने काफी हद तक अपने जीवन में उतारा वो लालू ही रहे हैं. अगर आप 1990 से 1995 के बीच के लालू के भाषणों को देखें तो उनमें लोहिया की झलक मिलती थी. हालांकि बाद में उनके क़दम डगमगाए और उनमें उतना बड़ा विजन भी विकसित नहीं हो पाया. लालू लोहिया के जितने करीब पहुंच सकते थे, वहां तक पहुंचने में वो चूक गए."
राम मनोहर लोहिया ऐसे राजनेता थे जो अमरीका जा कर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से समाजवाद पर बहस कर सकते थे और मक़बूल फ़िदा हुसेन जैसे कलाकार की कला को भी राह दिखा सकते थे. दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मक़बूल फ़िदा हुसेन को कहा था, "ये जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो. रामायण को पेंट करो."
वो इतने बेबाक वक्त थे कि उस समय जब कोई नेहरू के सामने नहीं ठहरता था तो वो लोहिया संसद हिला देते थे. वे लोहिया ही थे जिन्होंने विपक्ष क्या होता है और उसे क्या करना चाहिए, का पाठ भारतीय लोकतंत्र को सिखाया. अपने प्रयासों से उन्होंने आजादी के बाद एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अपनी मौत से ठीक पहले यानी 1967 तक पानी पीने पर मजबूर कर दिया. लेकिन ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. राम मनोहर लोहिया की रचनात्मक राजनीति और अद्भुत नेतृत्व क्षमता का प्रभाव इतना दूरगामी रहा कि उनके जाने के करीब 20 सालों बाद ही उनके सिद्धांतों को मानने वाली कई पार्टियां भारतीय लोकतंत्र के पटल पर छाने लगीं. ‘सामाजिक न्याय’ की उनकी संकल्पना तो आज राजनीति का मूल सिद्धांत बन चुकी है. बताया जाता है कि लोहिया शुरू में नेहरूवादी थे और गांधीवादी वे बाद में बने. मतलब यह है कि शुरू में वे गांधी की तुलना में नेहरू से ज्यादा प्रभावित थे. बाद में नेहरू से उनका मोहभंग होता गया और गांधी के सिद्धांतों और कार्यनीतियों पर उनका भरोसा बढ़ता गया.
आज के ५० साल पहले वो लिव इन रिलेशन में रहे और कभी छुपाया नहीं। आप आज तो भारतीय राजनीती में इसकी उम्मीद भी नहीं कर सकते हैं. लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी. ये कम ही लोग जानते होंगे कि वे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे.
लोहिया क्या थे, इसे समझने के लिए मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर के बनाए उस कार्टून का जिक्र ज़रूरी है, जिसमें उन्होंने लोहिया का कार्टून बनाया और लिखा था कि आज सुबह लोहिया ने मंत्री पद की शपथ ली और शाम में ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
गांधी के मरने के बाद कांग्रेस मॉडल को नेहरू ने 1948 में खत्म कर दिया. कांग्रेस के समाजवादी नेताओं को पार्टी का विलय कांग्रेस में करने या कांग्रेस छोड़ने का विकल्प दिया गया. लोहिया को तो नेहरू ने कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाने का प्रस्ताव दिया. लेकिन उन्होंने अन्य समाजवादियों जिनमें जेपी भी शामिल थे, के साथ कांग्रेस छोड़ने का विकल्प चुना. यह समझते हुए भी कि कांग्रेस की छवि देशवासियों के दिलोदिमाग पर छप चुकी है और उसे हटाना आसान नहीं है, खासकर तब जब कोई स्थापित संगठन न हो और न ही मजबूत आर्थिक समर्थन. लेकिन लोहिया और उनके साथियों ने लोकतंत्र के हित मेंं विपक्ष की आवाज बनने और उसे बुलंद करने का फैसला लिया.
इसका परिणाम 1948 में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के गठन के रूप में हुआ. फिर 1952 में जेबी कृपलानी की ‘किसान मजदूर पार्टी’ के साथ विलय करके ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ का निर्माण किया गया. हालांकि मतभेदों के चलते लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से ‘सोशलिस्ट पार्टी’ को जिंदा करने का निर्णय किया.
लोहिया से सोशलिस्ट पार्टियों की इस टूट-फूट पर किसी ने पूछा तो उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा था, ‘समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और अमीबा में एकरूपता है. मतलब जैसे ही पार्टी मजबूत होकर बड़ी बनती है, अमीबा की तरह टूटकर फिर पहले की तरह छोटी हो जाती है.’ उनका यह कथन आज भी खुद को उनकी विरासत का उत्तराधिकारी कहने वाली पार्टियों पर लागू होता दिखता है. लोहिया और अन्य समाजवादियों की पहले आम चुनाव में हार हुई. लेकिन यह हार इन नेताओं की अलोकप्रियता की वजह से नहीं बल्कि उनके संगठन के कांग्रेस की तुलना में कमजोर होने और कमतर आर्थिक संसाधन होने के चलते हुई थी. इसे मजबूत कांग्रेस को नियंत्रण में रखने की जिजीविषा ही कहेंगे कि इस हार के बाद कई सोशलिस्ट पार्टियां एकजुट हो गईं. इसी समय लोहिया के सिद्धांत पार्टी के अन्य नेताओंं को पच नहीं रहे थे. वे जैसे भी हो केरल में सत्ता में बने रहना चाहते थे. इसी बात पर लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से सोशलिस्ट पार्टी को जिंदा करने का निर्णय लिया.
इसके बाद वे घूम-घूमकर तमाम पिछड़ी जातियों के संगठनों को जोड़ने लगे. इसी सिलसिले में उन्होंने बीआर अंबेडकर से मिलकर उनके ‘आॅल इंडिया बैकवर्ड क्लास एसोसिएशन’ के सोशलिस्ट पार्टी में विलय की बात शुरू की. बातचीत पक्की हो गई थी कि दिसंबर 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया. और उन्हें अपने साथ जोड़ने की उनकी मुहिम अधूरी रह गई. फिर भी ऐसे दूसरे संगठनों को जोड़ने का उनका प्रयास जारी रहा.
राम मनोहर लोहिया के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा रहा कि 1967 कांग्रेस पार्टी सात राज्यों में चुनाव हार गई और पहली बार विपक्ष उसे टक्कर देने की हालत में दिखने लगा. इस चुनाव के बाद लोहिया ने तय किया कि वे जेपी को मुख्यधारा में वापस लाकर विपक्ष को और मजबूत बनाएंगे.
राम मनोहर लोहिया ऐसे राजनेता थे जो अमरीका जा कर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से समाजवाद पर बहस कर सकते थे और मक़बूल फ़िदा हुसेन जैसे कलाकार की कला को भी राह दिखा सकते थे. दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मक़बूल फ़िदा हुसेन को कहा था, "ये जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो. रामायण को पेंट करो."
वो इतने बेबाक वक्त थे कि उस समय जब कोई नेहरू के सामने नहीं ठहरता था तो वो लोहिया संसद हिला देते थे. वे लोहिया ही थे जिन्होंने विपक्ष क्या होता है और उसे क्या करना चाहिए, का पाठ भारतीय लोकतंत्र को सिखाया. अपने प्रयासों से उन्होंने आजादी के बाद एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अपनी मौत से ठीक पहले यानी 1967 तक पानी पीने पर मजबूर कर दिया. लेकिन ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. राम मनोहर लोहिया की रचनात्मक राजनीति और अद्भुत नेतृत्व क्षमता का प्रभाव इतना दूरगामी रहा कि उनके जाने के करीब 20 सालों बाद ही उनके सिद्धांतों को मानने वाली कई पार्टियां भारतीय लोकतंत्र के पटल पर छाने लगीं. ‘सामाजिक न्याय’ की उनकी संकल्पना तो आज राजनीति का मूल सिद्धांत बन चुकी है. बताया जाता है कि लोहिया शुरू में नेहरूवादी थे और गांधीवादी वे बाद में बने. मतलब यह है कि शुरू में वे गांधी की तुलना में नेहरू से ज्यादा प्रभावित थे. बाद में नेहरू से उनका मोहभंग होता गया और गांधी के सिद्धांतों और कार्यनीतियों पर उनका भरोसा बढ़ता गया.
आज के ५० साल पहले वो लिव इन रिलेशन में रहे और कभी छुपाया नहीं। आप आज तो भारतीय राजनीती में इसकी उम्मीद भी नहीं कर सकते हैं. लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी. ये कम ही लोग जानते होंगे कि वे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे.
लोहिया क्या थे, इसे समझने के लिए मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर के बनाए उस कार्टून का जिक्र ज़रूरी है, जिसमें उन्होंने लोहिया का कार्टून बनाया और लिखा था कि आज सुबह लोहिया ने मंत्री पद की शपथ ली और शाम में ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
गांधी के मरने के बाद कांग्रेस मॉडल को नेहरू ने 1948 में खत्म कर दिया. कांग्रेस के समाजवादी नेताओं को पार्टी का विलय कांग्रेस में करने या कांग्रेस छोड़ने का विकल्प दिया गया. लोहिया को तो नेहरू ने कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाने का प्रस्ताव दिया. लेकिन उन्होंने अन्य समाजवादियों जिनमें जेपी भी शामिल थे, के साथ कांग्रेस छोड़ने का विकल्प चुना. यह समझते हुए भी कि कांग्रेस की छवि देशवासियों के दिलोदिमाग पर छप चुकी है और उसे हटाना आसान नहीं है, खासकर तब जब कोई स्थापित संगठन न हो और न ही मजबूत आर्थिक समर्थन. लेकिन लोहिया और उनके साथियों ने लोकतंत्र के हित मेंं विपक्ष की आवाज बनने और उसे बुलंद करने का फैसला लिया.
इसका परिणाम 1948 में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के गठन के रूप में हुआ. फिर 1952 में जेबी कृपलानी की ‘किसान मजदूर पार्टी’ के साथ विलय करके ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ का निर्माण किया गया. हालांकि मतभेदों के चलते लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से ‘सोशलिस्ट पार्टी’ को जिंदा करने का निर्णय किया.
लोहिया से सोशलिस्ट पार्टियों की इस टूट-फूट पर किसी ने पूछा तो उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा था, ‘समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और अमीबा में एकरूपता है. मतलब जैसे ही पार्टी मजबूत होकर बड़ी बनती है, अमीबा की तरह टूटकर फिर पहले की तरह छोटी हो जाती है.’ उनका यह कथन आज भी खुद को उनकी विरासत का उत्तराधिकारी कहने वाली पार्टियों पर लागू होता दिखता है. लोहिया और अन्य समाजवादियों की पहले आम चुनाव में हार हुई. लेकिन यह हार इन नेताओं की अलोकप्रियता की वजह से नहीं बल्कि उनके संगठन के कांग्रेस की तुलना में कमजोर होने और कमतर आर्थिक संसाधन होने के चलते हुई थी. इसे मजबूत कांग्रेस को नियंत्रण में रखने की जिजीविषा ही कहेंगे कि इस हार के बाद कई सोशलिस्ट पार्टियां एकजुट हो गईं. इसी समय लोहिया के सिद्धांत पार्टी के अन्य नेताओंं को पच नहीं रहे थे. वे जैसे भी हो केरल में सत्ता में बने रहना चाहते थे. इसी बात पर लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से सोशलिस्ट पार्टी को जिंदा करने का निर्णय लिया.
इसके बाद वे घूम-घूमकर तमाम पिछड़ी जातियों के संगठनों को जोड़ने लगे. इसी सिलसिले में उन्होंने बीआर अंबेडकर से मिलकर उनके ‘आॅल इंडिया बैकवर्ड क्लास एसोसिएशन’ के सोशलिस्ट पार्टी में विलय की बात शुरू की. बातचीत पक्की हो गई थी कि दिसंबर 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया. और उन्हें अपने साथ जोड़ने की उनकी मुहिम अधूरी रह गई. फिर भी ऐसे दूसरे संगठनों को जोड़ने का उनका प्रयास जारी रहा.
राम मनोहर लोहिया के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा रहा कि 1967 कांग्रेस पार्टी सात राज्यों में चुनाव हार गई और पहली बार विपक्ष उसे टक्कर देने की हालत में दिखने लगा. इस चुनाव के बाद लोहिया ने तय किया कि वे जेपी को मुख्यधारा में वापस लाकर विपक्ष को और मजबूत बनाएंगे.
इसके बाद वे घूम-घूमकर तमाम पिछड़ी जातियों के संगठनों को जोड़ने लगे.
इसी सिलसिले में उन्होंने बीआर अंबेडकर से मिलकर उनके ‘आॅल इंडिया बैकवर्ड
क्लास एसोसिएशन’ के सोशलिस्ट पार्टी में विलय की बात शुरू की. बातचीत पक्की
हो गई थी कि दिसंबर 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया. और उन्हें अपने साथ
जोड़ने की उनकी मुहिम अधूरी रह गई. फिर भी ऐसे दूसरे संगठनों को जोड़ने का
उनका प्रयास जारी रहा.
राम मनोहर लोहिया के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा
रहा कि 1967 कांग्रेस पार्टी सात राज्यों में चुनाव हार गई और पहली बार
विपक्ष उसे टक्कर देने की हालत में दिखने लगा. इस चुनाव के बाद लोहिया ने
तय किया कि वे जेपी को मुख्यधारा में वापस लाकर विपक्ष को और मजबूत
बनाएंगे. पर वे अक्टूबर में चल बसे.
हालांकि राम मनोहर लोहिया का
प्रयास करीब एक दशक बाद रंग लाया जब 1975 में जयप्रकाश नारायण राजनीति की
मुख्यधारा में वापस लौटे. आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में विपक्षी
पार्टियों की एकजुटता रंग लाई और 25 सालों से केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी
को हार का सामना करना पड़ा.
राम
मनोहर लोहिया ने जर्मनी में रहते कार्ल मार्क्स और एंगेल्स को खूब पढ़ा.
लेकिन उन्होंने पाया कि भारत के संदर्भ में कम्युनिस्ट विचारधारा अपूर्ण
है. मार्क्सवाद ने साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के संबंधों की जो व्याख्या की
थी लोहिया उससे असहमत थे. बल्कि वे तो उसे उल्टा मानते थे. मार्क्सवाद
मानता था कि पूंजीवाद के विकास से साम्राज्यवाद पनपता है. इसलिए पूंजीवाद
के खात्मे से ही साम्राज्यवाद का विनाश होगा. लोहिया ने बताया कि मामला असल
में उल्टा है. वह साम्राज्यवाद ही है जिससे पूंजीवाद का विकास हुआ. इसलिए
पूंजीवाद का नाश करने के लिए जरूरी है कि साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंका जाए.
उन्होंने ब्रिटेन के उदय को भारत जैसे उपनिवेशों के शोषण से जोड़ दिया और
कहा कि भारत को आजाद किए बगैर पूंजीवाद की जड़ें कमजोर नहीं हो सकती. इस
तरह लोहिया ने पूंजीवाद के विनाश के लिए भारत जैसे उपनिवेशों की आजादी को
सबसे महत्वपूर्ण बताया.
लोहिया
ने मार्क्स के वर्ग-सिद्धांत की भारत के संदर्भ में नई व्याख्या दी. उनके
अनुसार भारत का समाज औद्योगिक समाज नहीं है. इस समाज में असमानता की मुख्य
वजह जाति रही है. यहां पर शोषण का कारण जाति व्यवस्था रही है. इसलिए यहां
पर ‘बुर्जुआ’ और ‘सर्वहारा’ वर्गों की मौजूदगी मार्क्सवाद के सिद्धांतों की
तरह नहीं है.
राम मनोहर लोहिया का मानना था कि भारत की सवर्ण
जातियों को बुर्जुआ माना जाना चाहिए और तमाम वंचित वर्गों, जिनमें आदिवासी,
दलित, अन्य पिछड़ी जातियां और यहां तक कि सभी समुदायों की महिलाएं भी
शामिल हैं, को सर्वहारा माना जाना चाहिए. भारत के संदर्भ में मार्क्सवाद की
लोहिया की यह व्याख्या और इसके परिणाम क्रांतिकारी रहे.
आलोचकों का
भी मानना है कि साठ के दशक से भारत में समाजवादी विचारधारा के साथ-साथ
क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के पीछे लोहिया की इस अनूठी व्याख्या का ही
योगदान रहा है. इसने जातिगत पहचानों को तो मजबूती दी ही है, राजनीति में
वंचित जातियों की पैठ भी बढ़ाई है.
हर
तरह की विषमता को खत्म करने की दिशा में सप्तक्रांति सिद्धांत को भी राम
मनोहर लोहिया की अनूठी देन माना जाता है. इस सिद्धांत में सात बिंदु थे.
मसलन रंगभेद खत्म हो, जातिगत भेदभाव बंद हो, औरत और मर्द में कोई अंतर नहीं
है, राष्ट्रवाद को संकुचित नहीं व्यापक तरीके से समझा जाए, समाजवादी
आर्थिक मॉडल श्रेष्ठ है, सभी देश निरशस्त्रीकरण के रास्ते चलें और भेदभाव
से लड़ने का तरीका सत्याग्रह ही होना चाहिए.
लोहिया
के प्रयासों का ही असर रहा कि तमाम पिछड़ी जातियों में आत्मविश्वास विकसित
हुआ. उन्होंने कमोबेश सभी पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे बढ़ाया. उनके जाने
के बाद उत्तर भारत के कई राज्यों में समाजवादी विचारधारा की सरकार बनी.
इससे सामाजिक न्याय को अभूतपूर्व मजबूती मिली. किसी जानकार ने कहा है कि
गांधी को छोड़ दिया जाए तो लोहिया का अनुसरण करने वाली पार्टियों और नेताओं
की संख्या देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है.
No comments:
Post a Comment