मैंने आज देश की सभी
लोकसभा की सीटों का राज्य वार आकलन किया है. जिसका आधार लोकल मिडिया की रिपोर्ट्स,
एमए की पढाई के दौरान मैंने सर्वे करने का वैज्ञानिक तरीका जो अधिकतर लोग प्रयोग करते
हैं वो सीखा था, उसी से जातीय और सामाजिक,
राजनितिक समीकरणों को अपने हिसाब से एनालिसिस करके कुछ हिसाब लगाता हूँ. १००% तो कोई भी सही नहीं हो सकता है, और अपना कोई
एजेंडा नहीं है इसलिए, लेकिन मैं खुद के समझने के लिए ही हर चुनाव में अपने अनुमान
अलग से ईमानदारी से लगता रहा हूँ, जो कभी सच तो कभी गलत होते हैं, इसबार भी गलत होंगे
तो ठीक से सिखने को मिला था कि अबकी क्या गलती रह गई जो समझ नहीं पाया.
अगर
आपको 2019 का चुनाव देखना
है तो आप साउथ
के २ राज्यों पर नजर रखिए.
बाकि सब जगह तो
स्थिति साफ़ है. पहला राज्य है तमिलनाडु जहाँ
पर बीजेपी ने सबसे बड़ा
मास्टर स्ट्रोक चलकर एआईडीएमके को अपने साथ
ले लिया. ये भी तय
है
कि एआईडीएमके कम से कम
25 सीटें जीतेगी. क्योंकि जयललिता के निधन के
बाद द्रमुक के मजबूत होने
की संभावनाएं थी, लेकिन उधर करूणानिधि के भी निधन के बाद द्रमुक
दोनों भाइयों स्टालिन और अलागिरी के
झगडे में फंस कर रह गई
है. रजनीकांत ने राजनितिक पार्टी
बनाने का फैसला तो
किया लेकिन वो इस चुनाव
में नहीं उतर रहे हैं. जबकि कमल हसन
की भी कोई चर्चा
वहां की स्थानीय मिडिया में
नहीं है. वो भी एक
साल में तयारी करके इतने बड़े राज्य में चुनाव नहीं जीत सकते हैं.
दूसरा
राज्य है, आंध्र प्रदेश जहाँ पर अभी तो गठबंधन नहीं हुआ है लेकिन अगर
बीजेपी की जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस
से बातचीत चालू है. उत्तर भारत के राजनितिक पंडितों
को खबर नहीं होगी लेकिन पिछले एक- डेढ़ साल में आंध्र प्रदेश कांग्रेस के अधिकतर नेता
वाईएसआर में जुड़ चुके हैं. इसलिए वाईएसआर काफी मजबूत स्थिति में है. 16-17
सीटें तो वाईएसआर जीतेगी ही.
बस
इन्हीं दोनों की मिलकर ४०
सीटों के आधार पर
सरकार तय होगी. अगर ये दोनों गठबंधन
नहीं हुए होते तो शायद एनडीए
२२०-२३० सीटों तक सिमट जाती.
कांग्रेस की रणनीति में
कमी रही कि तमिलनाडु में
पहले करूणानिधि और अब स्टालिन
से चिपके
हैं. जयललिता थीं तब कांग्रेस से
एआईडीएमके के रिश्ते अलग
थे, लेकिन अब पनीर सेल्वम
से सुधर सकते थे.
दूसरी
तरफ राहुल गाँधी तेलंगाना में नुकसान उठाने के बाद भी
नायडू के साथ गठंधन
कर रहे हैं. जबकि जगन रेड्डी तो उनके अपने
दल से गए थे,
बात करते तो शायद वो
बीजेपी के साथ नहीं
जाते, बल्कि घर वापसी भी
हो सकती थी.
अगर आपको लग रहा कि यूपी का कुछ असर नहीं होगा चुनाव में तो आप याद रखिए कि उत्तर प्रदेश में तो महागठबंधन होने के बाद भी बीजेपी को 40-45% वोट मिल रहा है, जो सपा बसपा के मूल वोट के बराबर ही है. बाकि अखिलेश मायावती जैसे एसी पसंद नेताओं से नया वोट तो जुड़ नहीं रहा, इसका मलतब आधी सीटें तो बीजेपी जीत रही है. समाजवादी पार्टी तो ठीक से मेहनत करती तो अकेले दम पर २५ सीटें जीत सकती थी. बाकि गठबंधन का फायदा तो बसपा को होगा. बसपा को अपनी साख बचाने का अच्छा मौका मिला है, जो बिना गठबंधन के एक भी सीट नहीं जीत सकती थी. मायावती ने होशियारी की और बसपा के हिस्से वही सीटें आईं जिसमें बीजेपी कमजोर होती। सपा को अधिकतर वो सीटें मिली हैं जहाँ सपा+बसपा+कांग्रेस का मिलकर वोट भी बीजेपी के बराबर नहीं होता है. उदाहरण के लिए कानपुर, बनारस, लखनऊ। बाकी बहुत सीटों पर तो मुस्लिम वोट असमंजस में रहेगा और राष्ट्रिय चुनाव की वजह से कांग्रेस को ही वोट देगा.
(नोट:
ये स्थिति पुलवामा, बालाकोट के बाद हुई
है, उसके पहले समीकरण ठीक उलट थे. गठबंधन कम से कम
55, कांग्रेस 10-12 सीटें जीत सकती थी. भले किसी को समझ में
न आए लेकिन शिवपाल
फैक्टर यूपी में बहुत काम करेगा. क्योंकि उनके पास वो सब सपा
नेता जा रहे हैं,
जो ५ साल से
सपा के टिकट पर
लड़ने की तयारी कर
रहे थे, और अब वो
सीट बसपा के कहते में
चली गई है.)
बिहार
में महागठबंधन हुआ है लेकिन उसको
महागठबंध नहीं कह सकते हैं.
क्योंकि पासवान, नितीश और बीजेपी के
सामने कुशवाहा, "बिहार" कांग्रेस और मांझी बहुत
कमजोर पड़ेगे. वहां स्थिति लगभग २०१४ जैसी या उससे थोड़ी
काम है है, लेकिन
नितीश के एनडीए में
जुड़ने से सीटों की
संख्या एकदम से बढ़ जाएगी.
मध्यप्रदेश
और राजस्थान दो ऐसे राज्य
हैं जहाँ बीजेपी विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी
लोकसभा में आधी सीटें या उससे कुछ
अधिक जीतेगी. छत्तीसगढ़, झारखण्ड सहित कई आदिवासी पट्टी
राज्यों में कांग्रेस कुछ मजबूत दिख रही है. बीजेपी को सिटीजन चार्टर
बिल की वजह से
असम में जो नुकसान होगा
वो उड़ीसा और पश्चिम बंगाल
से पूरा हो जाएगा. ये
वो दो राज्य हैं
जहाँ बीजेपी २०१४ के मुकाबले सबसे
अधिक फायदे में रहेगी.
महाराष्ट्र
में शिवसेना, बीजेपी का गठंधन होने
की वजह से एनसीपी और
कांग्रेस में ५०-५० की
लड़ाई हो गई है.
गुजरात में विधानसभा की बात दूसरी
थी, अब लोकसभा में
गुजराती प्रधानमंत्री बनने के नाम पर
मोदी को फायदा होगा,
दूसरी तरफ जिसका ध्यान नहीं गया वो ये है
कि विधानसभा चुनाव में अशोक गहलोत और राहुल गाँधी
की मेहनत से कांग्रेस एकजुट
थी, जो एक साल
से लगातार टूट भी रही है
और उसके कई विधायक बीजेपी
में जा चुके हैं.
हार्दिक पटेल आए हैं, लेकिन
ये तो औपचारिक है,
विधानसभा में भी तो उनका
कांग्रेस को खुला समर्थन
था.
कर्णाटक
एक राज्य था जहाँ कांग्रेस
हमेशा अच्छा करती थी, लेकिन विधानसभा में जो जातीय (लिंगायत+हिंदुत्व) समीकरण बीजेपी ने बिठाए, उसकी
काट अभी तक कांग्रेस ढूंढ़
नहीं पाई है. कांग्रेस का जेडीएस के
साथ गठबंधन है लेकिन उन
दोनों के नेताओं मंत्रियों
में जो रोज झगडे
होते हैं, वो जगजाहिर हैं.
जेडीएस ने अधिक सीटें
मांग ली, जो मज़बूरी में
कांग्रेस को देनी पड़ी.
जबकि जेडीएस यूपी की आरएलडी जैसे
ही एक समुदाय विशेष
और थोड़े क्षेत्र की पार्टी मात्र
है. उसका वोट पुरे कर्णाटक में नहीं है.
कांग्रेस
के पास अभी भी समय है,
नवीन पटनायक, केसीआर, रेड्डी, जैसे नेताओं से बात करे
और तमिलनाडु कर्णाटक में जितनी ताकत हो लगा कर
लड़ लें. राजस्थान, मध्यप्रदेश में भी बीजेपी को
कम से कम सीटों
पर रोक लेना भी बड़ी बात
होगी. एक बात तो तय नजर आती
है कि मोदी सरकार की वापसी होगी लेकिन उतनी मजबूत सरकार नहीं होगी, और विपक्ष मजबूत
होगा जो लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर है.
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