मायावती इस चुनाव में कुछ अलग सोच रही है, बहुत लोग कहते हैं कि वो अबकी यूपी की नितीश कुमार बनेंगी. मलतब अखिलेश को धोखा देंगी. उसकी कुछ वजहें हैं, उनको पता है कि हासिए पर बड़ी शून्य हो चुकी बसपा को जिन्दा करने का अंतिम समय है और अखिलेश यादव की जरुरत थी इनके साथ गठबंधन करना. इसलिए ही इन्होने जानबूझ कर ऐसी सीटें चुनी जहाँ से इनके इनकी जीत की सम्भावना हो. बनारस, कानपुर, लखनऊ जैसी सीटें जहाँ बीजेपी मजबूत है, वहां उन्होंने सपा को लड़ने को कहा. इसबार वो अपने चक्कर में हैं कि काश यूपीए और एनडीए दोनों बहुमत से बहुत दूर रहे जाएं और देवगौड़ा जैसे मौका मिले और प्रधानमंत्री बन जाएं. वहीँ ये भी तय है कि अगर ये सपना नहीं पूरा हुआ तो यूपी के सीएम का सपना तो छोड़ नहीं देंगी, और न अखिलेश के लिए कोई त्याग हो जाएंगे उनकी तरफ से. जबकि अखिलेश ने भी यही सोचकर मज़बूरी में गठबंधन किया है कि कैसे भी करके मोदी को रोक लिया जाए. मैंने तो यहाँ तक सुना है कि अखिलेश कांग्रेस के साथ गठबंधन को तैयार थे लेकिन मायावती की जिद के आगे उनको झुकना पड़ा.
जैसा कि टिकटों के बटवारे में भी हमेशा कि तरह उन्होंने दूसरी पार्टियों से आए ब्राम्हणो (१५-१७ नेता बीजेपी से आए हैं जो अमित शाह के इशारे पर लड़ रहे, ऐसी भी खबरें आई हैं.) और खासकर जो नेता फंड दे पाएं उनको टिकट दिया है. इनके लिए एक और विकल्प खुला है. सभी मन रहे हैं कि एनडीए बहुमत से ३०-४० सीट दूर तक पहुँचती दिख रही है, ऐसे में, नविन पटनायक, टीआरएस, वाईएसआर के बाद मायावती भी एनडीए की एक साथी बन सकती हैं भाजपा के लिए. क्योंकि चंद्रशेखर राव और नविन पटनायक के ऐसा करने के काम चांस हैं, कुछ राजनीती करने के चलते. लेकिन मायावती को बीजेपी उप प्रधानमंत्री बनाकर या यूपी का सीएम बनाकर साधा जा सकती है. और वो जिस तरह की राजनीती करती हैं वो कहीं से भी अम्बेडकर या कांशीराम की विरासत को बढाती नहीं दिखती हैं. कभी कभी वो बहुत चतुर नेता बनने की कोशिश करती हैं लेकिन उनका अहंकार उनको जमीं पर नहीं नजर डालने देता है. देश की हर सीट पर अकेले लड़ने का फैसला भी उनका अहंकार ही होता है, नहीं तो बसपा का हर प्रदेश में ७-१० % वोट होता था जिसको बढ़ने के लिए कभी मेहनत नहीं की.
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