Friday, March 22, 2019

जहाँ कांग्रेस की उम्मीदें

केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक यह मानने को तैयार नहीं हैं कि 2019 लोकसभा चुनावों में देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस उन्हें चुनौती देने की स्थिति में है. इसके बावजूद कांग्रेस हर राज्य के हिसाब से अपनी रणनीति बना रही है. जहां वह अपने दम पर चुनाव लड़ सकती है, वहां की अलग रणनीति है और जहां उसे सहयोगी दलों की जरूरत है, वहां वह उनसे गठबंधन को अंतिम रूप देने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है.
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में 50 सीटों से भी कम पर सिमट गई कांग्रेस को इस बार किन राज्यों से सीटों में बढ़ोतरी की उम्मीद है. अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के बाद पांच राज्य ऐसे दिख रहे हैं, जहां कांग्रेस को सबसे अधिक उम्मीदें हैं. ध्यान से देखें तो पता चलता है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इन्हीं पांच राज्यों में सबसे अधिक सक्रिय हैं.
इसमें पहला मध्य प्रदेश जहाँ लोकसभा की कुल 29 सीटें हैं. इनमें से अभी कांग्रेस के पास सिर्फ तीन हैं. इन तीन सीटों में से एक सीट छिंदवाड़ा की है जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ जीतते आए हैं. दिसंबर, 2018 में वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए. इसका मतलब यह हुआ कि मध्य प्रदेश से कांग्रेस के पास सिर्फ दो ही लोकसभा सांसद बचे हैं.
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मध्य प्रदेश से सीटों में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की उम्मीद है. पार्टी को ऐसी उम्मीद इसलिए है कि 15 सालों बाद उसे बीते साल विधानसभा चुनावों में जीत हासिल हुई. इससे कांग्रेस का हौसला बुलंद है. मध्य प्रदेश से सीटों की बढ़ोतरी की उसकी उम्मीद की दूसरी वजह यह है कि यहां कांग्रेस और भाजपा के अलावा कोई अन्य मजबूत क्षेत्रीय पार्टी नहीं है. इसलिए कांग्रेस नेताओं को यह लग रहा है कि मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधे मुकाबले का फायदा कांग्रेस को मिलेगा. कांग्रेस नेताओं को यह भी लग रहा है कि प्रदेश में 15 साल की और केंद्र में पांच साल की भाजपा सरकार के खिलाफ यहां के लोगों में जो नाराजगी है, उसका उसे फायदा मिल सकता है.
दूसरा राज्य है राजस्थान। इस राज्य में लोकसभा की कुल 25 सीटें हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में इनमें से एक भी कांग्रेस को नहीं मिली थी. सभी सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीते थे. बाद में अलवर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार को जीत हासिल हुई. इसका मतलब यह हुआ कि राजस्थान में अभी कांग्रेस के पास सिर्फ एक लोकसभा सांसद है.
लेकिन प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस की दिसंबर, 2018 में हुई वापसी से पार्टी को यह उम्मीद है कि राजस्थान से निश्चित तौर पर उसकी लोकसभा सीटें बढ़ेंगी. राजस्थान कांग्रेस के नेताओं को यह लग रहा है कि दिसंबर में ही उनकी सरकार बनी है और जब लोकसभा चुनाव हो रहे होंगे तो उनकी सरकार के कार्यकाल का तकरीबन चार महीना पूरा होगा, ऐसे में उन्हें किसी सत्ताविरोधी लहर का सामना नहीं करना पड़ेगा. जबकि भाजपा को जिस सत्ताविरोधी लहर का सामना हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में करना पड़ा है, उससे कहीं अधिक सत्ताविरोधी लहर का सामना उसे लोकसभा चुनावों में करना पड़ेगा. मध्य प्रदेश की तरह ही राजस्थान में भी कोई मजबूत क्षेत्रीय दल नहीं है. इसलिए भाजपा और कांग्रेस के सीधे मुकाबले में कांग्रेसी नेताओं को उम्मीद है कि इस बार उनकी सीटें बढ़ेंगी.
इसी लिस्ट में एक और राज्य है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य गुजरात है. 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस गुजरात की कुल 26 सीटों में से एक सीट भी नहीं जीत पाई थी. इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को यहां अच्छी-खासी सफलता की उम्मीद है. गुजरात कांग्रेस के नेताओं से बात करने पर इसकी तीन वजहें समझ में आती हैं. पहली तो यह कि 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन काफी सुधरा था. 2017 के चुनावों में भाजपा जैसे-तैसे बहुमत के आंकड़े को पार कर पाई.
दूसरी वजह यह बताई जा रही है कि गुजरात में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के रूप में जिस तरह से एक नया युवा नेतृत्व उभरा है और इसने जिस तरह से नरेंद्र मोदी को घेरने का काम किया है, उससे कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में लाभ मिल सकता है. तीसरी वजह यह बताई जा रही है कि यहां भी मध्य प्रदेश और राजस्थान की तरह कोई तीसरी पार्टी नहीं है. भाजपा से सीधा मुकाबले की स्थिति में पार्टी नेताओं को लग रहा है कि गुजरात में उनकी सीटों की संख्या इस बार दहाई के अंक में पहुंच सकती है.

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