Friday, December 11, 2015

क्या सच में न्याय हुआ है?

सलमान खान को बॉम्बे हाईकोर्ट ने हिट एंड रन केस में सभी आरोपों से मुक्त कर दिया, क्योंकि सरकारी पक्ष आरोपों के समर्थन में निर्णायक पेश सबूत नहीं कर सका। न्याय होना ही नहीं चाहिए, होते हुए भी दिखना चाहिए। भले ही न्याय की मूर्ति पर पट्टी लगी है लेकिन न्याय होने के इंतज़ार में खड़े लोगों की आंख पर पट्टी नहीं होती है। 
जज की मंशा की तो नहीं लेकिन अदालत के फैसलों की सार्वजनिक समीक्षा की जा सकती है। हाई कोर्ट ने एक तरह से सेशन कोर्ट के फैसले की समीक्षा की है और अभी सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा बाकी है। लेकिन 6 मई के फैसले में सलमान ख़ान को पांच साल की सज़ा सुनाई जाती है और 10 दिसंबर को उनके खिलाफ कोई सबूत ही नहीं मिलता है। अदालतों के इतिहास में ऐसा होता है। दो अदालतों के फैसले में अंतर होता है और सुप्रीम कोर्ट के ही एक से लेकर दो और तीन जजों की बेंच के फैसले में अंतर होता है। लेकिन क्या इतना अंतर आना चाहिए। पांच साल की सज़ा और फिर सीधे बरी। क्या सलमान ख़ान को सलमान होने का लाभ मिला है। अगर ये सवाल है तो क्या सलमान को सलमान होने की सज़ा नहीं मिली।
आखिर उस रात गाड़ी कौन चला रहा था, चलाने वाला नशे में था या नहीं। इन सवालों के जवाब क्या अब कभी नहीं मिलेंगे। क्या गाड़ी अपने आप चल रही थी या मरने वाला मरा ही नहीं। फिर अब्दुल की एक टांग कैसे खराब हो गई। क्या इतने सारे गरीब लोग ताकतवर सलमान के ख़िलाफ साज़िश कर रहे थे। यह भी समझना चाहिए कि अदालत के पास जैसे सबूत होंगे फैसला भी वैसा ही आएगा। सबूत से जुड़े सवालों की ज़िम्मेदारी पुलिस की बनती है। क्या पुलिस इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। यह सवाल महाराष्ट्र सरकार से पूछा जाना चाहिए। अदालत ने पुलिस के पेश किए हुए सबूतों को पर्याप्त नहीं माना या पुलिस के इरादे को लेकर कुछ शक हुआ। इस सवाल का मुकम्मल जवाब तो फैसले की कापी पढ़ने के बाद ही मिलेगा। क्या अदालत ने ऐसा कहा कि पुलिस ने सलमान की मदद की। मैंने फैसला नहीं पढ़ा है। पर क्या आपको भी लग रहा है कि इस मामले में सलमान के साथ साथ मामले की जांच करने वाली पुलिस भी बरी हो गई है। अदालत ने कहा कि संदेह का लाभ आरोपी को मिलता है लेकिन क्या इसकी बहस हो सकती है कि जांच के दौरान संदेह की स्थितियां पैदा भी की जा सकती हैं। इसलिए इस केस को लेकर पुलिस से जुड़े सवालों और फैसले से जुड़े सवालों में फर्क करना होगा। सरकारी पक्ष के पास सबसे बड़ा गवाह कांस्टेबल रविन्द्र पाटिल था। उसका बयान धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने हुआ था लेकिन हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि रविन्द्र पाटिल की गवाही को पूरी तरह से सबूत मानकर नीचली अदालत ने गलती की। कांस्टेबल रविंद्र पाटिल हादसे के वक्त सलमान के साथ था और उसी ने पुलिस को हादसे की सूचना दी थी।
अब सवाल यह उठता है क़ि क्या सलमान खान की मदद के लिए पुलिस द्वारा लचर केस बनाया गया या बड़े वकीलों ने न्याय व्यवस्था को लचर बना दिया? सलमान खान मुक्त हो गए, परंतु उनका पूर्व सुरक्षा अधिकारी रवींद्र पाटिल न्यायिक सड़ांध का शिकार होकर 30 वर्ष की उम्र में ही मर गया।
सलमान खान को जनवरी, 2002 मे अंडरवर्ल्ड की धमकी के बाद महाराष्ट्र पुलिस द्वारा सुरक्षा मुहैया कराई गई थी, जिसके लिए रवींद्र पाटिल की नियुक्ति हुई थी। सितंबर, 2002 में दुर्घटना के वक्त रवींद्र पाटिल टोयोटा लैंडक्रूसर कार में मौजूद था और उसने सलमान खान को शराब के नशे में तेज़ कार चलाने से मना किया था। दुर्घटना के बाद रवींद्र ने ही बांद्रा पुलिस के सम्मुख इस मामले की पहली एफआईआर दर्ज कराई थी।
इसके बाद रवींद्र के खिलाफ अदालत से असहयोग करने, तथा ड्यूटी में कोताही बरतने के आरोप लगाए गए, और उनकी पुष्टि किए बिना 2006 में उसे गिरफ्तार कर आर्थर रोड जेल भेज दिया गया, जहां वह अपराधियों के बीच आत्मग्लानि और टीबी का शिकार होकर वर्ष 2007 में मुंबई के एक अस्पताल में गुमनाम मौत का शिकार हो गया। एक पुलिस अधिकारी मरकर भी सलमान खान की सुरक्षा और रिहाई की अपनी जिम्मेदारी पूरी कर गया, लेकिन सारे सबूतों के बावजूद अदालत ने निम्न कारणों से सलमान खान को बरी कर दिया...
कार में कुल तीन लोग थे... पहला - सलमान खान, जो खुद को बचा रहे थे। दूसरा - पुलिस अधिकारी रवींद्र पाटिल, जिसने मामले की एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन बाद में उसी को फंसाकर जेल भेज दिया गया। तीसरा - कमाल खान, जो मामले के बाद विदेश भाग गए। विदेशी नागरिक होने की वजह से उनके विरुद्ध वर्ष 2003 में लुकआउट नोटिस जारी किया गया, लेकिन वह पुलिस तफ्तीश में शामिल ही नहीं हुए। अब दलील दी जा रही है कि कमाल खान वर्ष 2008 से उपलब्ध थे, लेकिन उनका बयान नहीं लिया गया और यह अदालती निर्णय का बड़ा आधार बन गया। मामले के अनुसार सलमान खान नशे में थे, जिसके प्रमाणस्वरूप पुलिस द्वारा बार में शराब पीने के बिल पेश किए गए थे। फिल्मी तरीके से सलमान खान ने बार में अपनी उपस्थिति से इनकार नहीं किया, लेकिन उनके अनुसार उन्होंने शराब नहीं, वरन नींबू पानी पिया था, जिसे अदालत ने मान भी लिया।
मामले के अनुसार शराब पीने के बाद सलमान खान ने तेज स्पीड में गाड़ी चलाकर एक्सीडेंट किया। सलमान खान ने शुरू में कहा कि वह 30 किलोमीटर की स्पीड से गाड़ी चला रहे थे। बाद में उनके एक और ड्राइवर अल्ताफ को मामले में लाने की कोशिश की गई। दुर्घटना के 12 साल बाद इनके पुराने वफादार अशोक सिंह ने गाड़ी चलाने की जिम्मेदारी ले ली और इस तरह सलमान खान बगैर ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी चलाने के आरोप से मुक्त हो गए और हर बात पर सबूत की बात करने वाली अदालत ने इस पर कोई सबूत नहीं मांगा।
मामले के अनुसार सलमान खान गाड़ी चलाने के बाद ड्राइविंग सीट से उतरकर भाग गए थे। बचाव पक्ष के वकीलों के अनुसार, क्योंकि दूसरा दरवाजा नहीं खुल रहा था, इसलिए सलमान खान ड्राइविंग सीट से उतरकर 15 मिनट बाद वहां से गए, जिसे अदालत ने मान भी लिया। सलमान खान के वकीलों के अनुसार टोयोटा लैंडक्रूसर जैसी बड़ी गाड़ी का टायर फट गया, जिससे दुर्घटना हुई। इसके लिए आरटीओ के अधिकारियों ने झूठे साक्ष्यों को प्रमाणित भी कर दिया, कितना फिल्मी लगता है ना यहाँ पर घटनाक्रम?
अदालत ने सोहैल खान के बॉडीगार्ड तथा अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर भी गौर नहीं किया, जिन्होंने कार में सिर्फ तीन लोगों के होने की बात कही थी, और जिनमें अशोक सिंह शामिल नहीं था। ट्रायल कोर्ट ने मामले को आईपीसी के 304-ए से 304-II में परिवर्तित कर सलमान खान को सभी आरोपों का दोषी माना, परंतु हाईकोर्ट ने सलमान खान को सभी आरोपों से दोषमुक्त करते हुए पुलिस को उनका पासपोर्ट वापस करने का निर्देश दिया है।
अदालत द्वारा 12 साल बाद अशोक सिंह के बयान को प्रामाणिक मानकर सलमान खान को छोड़ने से आपराधिक विधि-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। देश में चार लाख कैदी हैं, जिनमें अधिकांश गरीब, कमजोर और अशिक्षित हैं। इस फैसले से साबित होता है कि अदालती व्यवस्था गरीबों को जेल भेजने के लिए बनी है। रसूखदार कभी भी कानून के शिकंजे में नहीं आते, और अगर फंस भी जाएं, तो वरिष्ठ अधिवक्ताओं की फौज अपने तर्कों से पूरे मामले को ध्वस्त कर देती है,  सलमान खान का बरी होना कई कहानियां कहता है। कुछ वह जो मैं लिख नहीं सकता, जो महज इंसाफ के गलियारों की गप्प हैं। कुछ वह जो मैं लिख सकता हूं, लेकिन डर लगता है कि अदालतें न जाने किस नजर से उसे अपनी तौहीन समझ लें। मैं इन सबके बीच, बचते बचाते यह पुख्ता तरीके से कह सकता हूं कि मीडिया का मन अदालत ने पहले ही बना दिया था। फैसले को लेकर कोई शॉक नहीं लगा। अदालत में जो कुछ हो रहा था वह यह बताने के लिए काफी था कि सलमान छूट रहे हैं। यह सब सिलसिलेवार हो रहा था। जज साहब एक के बाद एक सबूतों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा रहे थे। मीडिया में यह लगातार रिपोर्ट भी हो रहा था।
ऊपरी अदालत को पूरा हक है कि निचली अदालत के फैसले को पलट दे, लेकिन इन सबके बीच कुछ छूट गया है। किसी फिल्म की कहानी जैसा लगता है एक किसी अशोक सिंह नाम के ड्राइवर का सामने आना... 13 साल चुप रहना... और एक दिन अचानक सेशन कोर्ट में कहना कि - जज साहब मैं हूं वह शख्स जिसने गाड़ी से फुटपाथ पर सोते लोगों को रौंदा था। सेशन कोर्ट सवाल पूछता रहा कि तुम इतने साल कहां थे ?  विशेष सरकारी वकील की यह दलील मुझे सही लगी है कि पाटिल के पास ऐसी कोई वजह नहीं थी कि सलमान के खिलाफ झूठ बोले। ऊपरी अदालत ने उसे पूरी तरह नकार दिया। 
तो क्या अदालतें सिर्फ सबूत देखती हैं ? या मामला सबूतों की गुणवत्ता को लेकर था। इस सवाल का जवाब सिर्फ वह लोग दे सकते हैं जिनको फैसले लेने हैं। उनके चश्मे के नंबर पर निर्भर करता है कि वे किसी अशोक सिंह को, रवीन्द्र पाटिल को कितना वजन देते हैं। बहरहाल, अदालतों के फैसले सिर माथे। जज साहब रिटायर होने वाले हैं, उनके तर्कों को चुनौती देने के रास्ते राज्य के सामने खुले हैं।

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