Thursday, December 19, 2013

लोकपाल, जोकपाल या वोटपाल

कल हमारे देश की संसद के लिए बहुत ही खास दिन रहा। 46 साल से लटका हुआ लोकपाल बिल पास हो गया. पहले तो इसपर किसी का ध्यान नहीं थालेकिन 2011 में अन्ना के आन्दोलन के बाद से पूरे देश में इसे लेकर एक मांग की आवाज उठ चुकी थीआम आदमी पार्टी कह रही है, कि यह लोकपाल नहीं जोक पाल हैवहीं सपा को छोड़ कर सभी राजनीतिक दल इसपर एकमत हुए, और पास भी कर दिया। मुलायम सिंह यादव द्वारा संसद में दिया गया कोई भी तर्क नहीं बल्कि उनका डर था, जो यह दिखता है कि अब तो उनकी राजनीति ही खत्म हो जाएगी।  अन्ना ह्जारे ने भी इसपर खुशी जताते हुए, अपना आठ-नौ दिन से चला रहा अनशन खत्म कर दियामौजूदा टीम अन्ना इस बिल को मंजूर कर रही हैमैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहूंगा कि यह मजबूत है, या कमजोरक्योंकि मैं अरविन्द और अन्ना का समर्थक होते हुए भी शुरु से ही लोकपाल बिल पर जस्टिस काटजू की तरह सोंचता थामुझे नहीं लगता है, कि लोकपाल का कोई भी स्वरूप भ्रष्टाचार को खत्म कर पाएगाक्या लोकपाल आसमान से आएगा? वो भी हमारे समाज का ही होगा, तो क्यों ना समाज को सही करो? लोकपाल भी भ्रष्ट हुआ तो क्या करोगे? जब कोई गारंटी नहीं है, तो सत्ता का एक और केन्द्र क्यों बना रहे हो? और कानून बना दो? मुझे तो लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार बढ़ने की आशंका दिखती है। 
खैर मेरे सोंचनें से क्या होता है? जब पूरा देश ही इसकी मांग कर रहा था, तो इसका पास होना भी जरूरी था
अब इसके पास होते ही इसका क्रेडिट लेने की कोशिश हो रही हैकांग्रेस ने चार राज्यों मे मिली हार से सबक लेते हुए ही इस बिल को पास करने का फैसला लिया पूरी तरह से सत्य नहीं हैवो पहले से ही सोंच रही थी कि लोकपाल बिल को हम राहुल गाँधी के लिए मास्टर स्ट्रोक की तरह प्रयोग करेंगेलेकिन सुषमा स्वराज ने लोकसभा में अपने भाषण में ही इसे भाँपते हुए कह दिया कि इसका श्रेय केवल अन्ना हजारे को जाता हैबाद में राहुल गाँधी ने भी अन्ना को ही श्रेय दे दियालेकिन फिर भी अगर कांग्रेस पार्टी इसका श्रेय लेगी तो भाजपा भी अपनी जिम्मेदार विपक्ष होने की बात कहेगीअब बीच में फंसे केजरीवालउन्हें क्या मिला? अब यह तो पता चल गया कि कांग्रेस ने यह बिल क्यों पास किया? अब यह भी पता कर लेते हैं कि भाजपा ने इसका समर्थन क्यों किया? क्योंकि भाजपा को आम आदमी पार्टी से डर लग रहा हैआपको यह बात अजीब लगेगी, लेकिन सच्चाई यही हैजिस सोसल मीडिया और शहरी वर्ग में मोदी की लहर थी, वहाँ तो केजरीवाल ने भी अपनी जगह बना ली हैइस बात से भाजपा प्रवक्ता टी. वी. पर यहाँ तक कहते मिल रहे हैं, कि मीडिया भाजपा की 500 सीटों को पीछे कर आप की 28 सीटों पर देख रही हैअब उनसे कोई पूछे कि पिछले एक साल में मीडिया ने किसको ज्यादा जगह दी है? किसके भाषण दो-दो घंटे तक ब्रेक-फ्री चले हैंइसी आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता को देखकर भाजपा ने सोचा कि अगर लोकपाल बिल पास हो गया तो केजरीवाल के हाथ से एक मुद्दा छीन लेंगेफिर अन्ना को धोखा देने का आरोप लगाकर केजरीवाल को घेर सकेंगेअगर आप ने सरकार बना ली तब जिसके खिलाफ लड़े थे, उसी से समर्थन ले लिया या कांग्रेस की B टीम कहकर घेर लेंगेनहीं तो राहुल के सामने मजबूत नजर आने वाले मोदी, केजरीवाल के आगे कमजोर पड जाएंगेलेकिन इन दोनो दलों की बात से मैं सहमत नहीं हूँ कि उन्होनें केजरीवाल से लोकपाल का मुद्दा छीना हैक्योंकि लोकपाल के आन्दोलन की आग का फायदा आप को दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिल चुका हैअब उसे इस मुद्दे की जरूरत ही नहीं हैअब वो राजनैतिक दल हैं और उनके पास अन्य मुद्दे हैंअब उन्हें मजबूत आधार मिल चुका है
अब अगर टीम अन्ना और केजरीवाल के सम्बंधों की बात करें तो पिछले एक साल के घटना क्रम पर नजर डालनी होगीजब अन्ना का आन्दोलन परवान चढ़ा तो उसमें केजरीवाल की अहम भूमिका थीआन्दोलन का  मैनेजमेंट, मीडिया, प्रचार, लोकपाल का प्रारूप सबकुछ केजरीवाल की देन थीबड़े नेताओं पर हमला करना और अच्छे और प्रसिद्ध लोंगों को आन्दोलन से जोडनें में उनका कोई सानी नहीं हैआज भी वह कला पार्टी में दिख रही हैअगर अरविन्द नहीं होते तो मुझे नहीं लगता है कि अन्ना हजारे रालेगढ़ सिद्धि से निकलकर बाहर पातेलेकिन अरविन्द ने वो सब कर दिखाया जो इमरजेंसी के समय में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने किया थाजब उन्हें लगा कि बिना राजनीति में आए कुछ नहीं होगा तो उनकी टीम दो हिस्से में बॅंट गईपहले "हम साथ-साथ हैं" फिर "हम दोनों हैं अलग-अलग, हम दोनों हैं जुदा-जुदा" अब अन्ना ने कह दिया "हम आपके हैं कौन"? फिर जब अन्ना ने केजरीवाल की भूमिका बढ़ती देखी तो सरकार का समर्थन कर उनके "पर" काटने की कोशिश कीअब अन्ना के पास कुछ बचा नहीं थामुझे तो यह लगता है कि किरण बेडी खुद किसी पार्टी (भाजपा में संभावना) में शामिल होने का मन बना रहीं हैंकेजरीवाल की इस बात में दम हो सकता है कि कोई उन्हें गुमराह कर रहा हैक्योंकि अभी तक अन्ना को लोकपाल बिल की बारिकियों का ज्ञान कम हैउन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती हैऐसे में उन्होने सरकारी बिल खुद नहीं पढ़ा होगालेकिन मुझे तो अन्ना की भी राजनैतिक महत्वाकांक्षा नजर आती हैपहले उन्होने अरविन्द से कहा कि मेरा नाम, फोटो मत प्रयोग करनाफिर कहा अरविन्द को मेरा आशीर्वाद नहीं हैजब अरविन्द ने चुनाव में अच्छा किया, तो बोले अगर मेरा आशीर्वाद होता तो वो जीत जातामतलब अन्ना स्वयं को वोट खीचाऊ शक्ति के रूप में देखने लगे हैंक्या पता उनके भी मन में क्या है। खैर लोकपाल या जोकपाल जो भी पास हुआ है, उसे सही से लागू करो तो जाने। अगर आपको सच में कुछ करना ही है, तो और भी वर्षों से लटके बिलों Whistle-blower Act, दंगा विरोधी बिल आदि  को पास करो। चुनाव सुधार पर कुछ करो। अन्यथा जनता बार-बार अपनी ताकत् दिखती रहेगी। आज हम भी जो आम आदमी पार्टी के पक्ष में दिखते हैं, अगर वो (AAP) भी गलत करेंगे तो उनका भी विरोध करते दिखेंगे।

Sunday, December 15, 2013

देवालय या शौंचालय

आज-कल राजनैतिक पार्टियों में एक नई बहस छिड़ गई है, शौचालय की। एक बार नब्बे के दशक में बसपा संस्थापक कांशीराम ने राममंदिर या बाबरी मस्जिद की जगह शौचालय बनवाने की बात कह दी थी। तो पूरे कट्टर हिन्दुत्ववादियों की गालियों का सामना उन्हें करना पड़ा था। अभी कुछ महीने पहले ही केन्द्रीय मंत्री जय राम रमेश ने भी देवालय से पहले शौचालय की बात कही थी, तो जिस भाजपा ने बहुत विरोध किया था। वही मोदी के देवालय से पहले शौचालय की बात पर बचाव करते नजर आए। संघ भी बैकफुट पर आ गया था। अभी दिल्ली विधान सभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और भाजपा ने अपने-अपने घोषणा पत्र में इस मुद्दे पर अपना वादा किया था। वहीं आम आदमी पार्टी ने तो दिल्ली में एक लाख शौचालय बनवाने की बात कह दी थी। आप ही सोचिए, जब राजधानी की यह हालत है, तो देश की बाकी जगह क्या दशा होगी?
जैसा कि आप देख रहे हैं, कि 2014 के पहले की बयानबाजी में मोदी का जवाब राहुल गाँधी की जगह नितीश कुमार को देना पड रहा है। उसी के चलते उन्होने बिहार में एक नियम बना दिया कि कोई भी पंचायत या नगर निकाय चुनाव वही आदमी लड सकेगा, जिसके घर में शौचालय होगा। इसे एक अच्छी पहल के रूप में देखा जा रहा है। हमारे देश में पहली बार नेताओं का ध्यान बुनियादी समस्याओं की ओर गया तो सही।
अभी हाल ही के दिनों में देश में मिशन मंगलयान की बहुत चर्चा होती रही। इसका मकसद यह पता लगाना था, कि मंगल पर मीथेन गैस है, या नहीं? निश्चित रूप से मीथेन मानव जीवन के लिए आवश्यक है। इस मिशन से हमारे देश का नाम रोशन हुआ। हम तीसरा देश बन गए, मंगल पर इस तरह का यान भेजने वाले। लेकिन इस कार्यक्रम में पूरे 400 करोड़ रुपए खर्च हो गए। हर्ष मन्दर जैसे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध भी किया। उनका कहना था, कि हम 400 बेकार में खर्च कर रहे हैं, पहले अपने देश की बुनियादी समस्याओं की तरफ देखना चाहिए। यह बात सही भी है कि ऐसी नाक उंची करके क्या फायदा कि आजादी के 66 साल बाद भी आधी से ज्यादा आबादी खुले में शौच करती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के चार लाख बच्चे डायरिया जैसी बीमारियों से मर जाते हैं। जिनका मुख्य कारण गंदगी ही होती है। आखिर हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं? हम खाने के अधिकार पर तो आ गए, लेकिन "पीने (पानी) के अधिकार" पर कब बात करेंगे? शौच और छत का अधिकार कब मिलेगा? एक पढ़ा-लिखा सभ्य समाज इस बात पर बात करने में संकोच करता है। अमीर लोगों को इस बात की तरफ सोंचने पर भी गंदगी महसूस होती है। लेकिन एक अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की खुले में शौच करने वालों की 60% जनसंख्या भारत में ही मौजूद है। UNICEF (यह बच्चों के स्वास्थ्य पर सर्वे करने वाली विश्व की सबसे बड़ी संस्था है। इसमें विश्व के 190 देशों का सर्वे हुआ था।) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 62 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं। W.H.O. के मुताबिक अगर भारत इस ओर ध्यान दे, तो अपनी GDP में 6.4% तक की लम्बी छलांग लगा सकता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस क्षेत्र में 24 हजार करोड़ रुपए प्रतिवर्ष गवां रहा है। इसकी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में प्रतिदिन 1000 बच्चों की मौत डायरिया से होती है। भारत में एक N.G.O. शुलभ नाम से लगभग 250 शहरों में इस ओर प्रयास कर रहा है। लेकिन इतने बड़े देश में एक संस्था के प्रयास से क्या होगा? सरकार को और भी कदम उठाने चाहिए।और ग्रामीण भारत की ओर जाना चाहिए।
यह देश की विडंबना ही है कि देश की राजनैतिक पार्टियाँ मंदिर-मस्जिद मुद्दे पर तो आन्दोलन कर घर-घर से पैसा और इंटें इकट्ठा करते हैं। लेकिन असली समस्या को ओर ध्यान देने में गंदा महसूस करते हैं। हम यह नहीं कह रहे हैं, कि कुछ हुआ नहीं है। 1991 में 75% लोग खुले में शौंच करते थे, वहीं 2011 में यह आंकड़ा 51% तक आ गया है। सिक्किम देश का पहला ऐसा राज्य है जहाँ पर 100% शौचालय मौजूद हैं। जल्द ही केरल और हिमांचल भी इस श्रेणी में आ जाएंगे। सबसे ज्यादा खराब हालत, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के हैं। वहीं महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और गुजरात के भी इसमें पीछे नहीं है।
Google करने पर पाया कि देश के 40% स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। चौकने वाली बात सामने आई है, क़ि 23% बच्चियाँ स्कूल इसलिए छोड़ देती हैं, क्योंकि कठिंन दिनों के समय उन्हें शौचालय नहीं मिल पाता है। इसी रिपोर्ट में दावा किया गया है, कि देश में 66% छेड़छाड़ की घटनाएँ बाहर शौच जाने के समय ही होती हैं। जय राम रमेश दावा करते हैं कि हम 2022 तक देश के हर घर को यह सुविधा दे पाएंगे। लेकिन W.H.O. 2054 तक इसे संभव नहीं मानता है. यह अंतर शहरों और गावों में तो और भी ज्यादा होगा? हमारे देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो इन आकड़ों पर नजर डालते ही बदबू महसूस करता है या मजाक उडाता है। अर्मत्य सेन तो इस मामले में बांग्लादेश को भारत से अच्छा मानते हैं। यहाँ वोट लेने के बदले जनता को लैपटाप, टी. वी. और मोबाइल तो दिए जा रहे हैं।  लेकिन इन मुद्दों को अपने घोषणा पत्र में जगह नहीं मिल पाती है, अगर मिलती भी है तो केवल घोषणापत्र तक। इस पर चर्चा करने वाले नरेन्द्र मोदी जी गुजरात में शौचालय के लिए 300 करोड़ का बजट रखते हैं, वहीं सरदार पटेल की मूर्ति के लिए 2500 करोड़। इसके लिए जरूरत है, नीतीश कुमार जैसे सामूहिक प्रयास की। जो राजनीति से ऊपर उठकर हो। हमें मंगल पर उड़ान भरणी चाहिए, मंदिर-मस्जिद भी जाना चाहिए। लेकिन इस बात पर भी ध्यान रखना होगा कि कहीं इस दौरान हमारा पैर *** पर न पड जाए।

Tuesday, December 10, 2013

2014 के सेमीफाइनल की समीक्षा

पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव चुके हैं, और मुझे तो जैसी उम्मीद थी, नतीजे वैसे ही रहे। सबसे पहले तो हमें बात करनी चाहिए, राजस्थान की, जहाँ अशोक गहलोत की हार पक्की हो चुकी थीक्यों की सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) वहाँ का इतिहास है, लेकिन कांग्रेस का सुफडा इस तरह से साफ होगा? यह किसी को उम्मीद नहीं थीअशोक गहलोत को अपने पांच और केन्द्र सरकार के 10 सालों के भ्रष्टाचार, मंहगाई, घोटालों और कुशासन का नतीजा भुगतना पड़ाहालांकि उन्होने आखिर 7-8 महीने में कुछ अच्छे कार्य किए थेलेकिन 13-14 साल के गुस्से को आप 6 महीने में ठंडा नहीं कर सकते हैं। मुझे नहीं लगता है, अब इस झटके से कांग्रेस कम से कम 10-15 के पहले या जब तक वसुंधरा राजे अपनी पहले वाली छवि (8 P.M. NO C.M.) फिर से नहीं दिखा दें, तब-तक खड़ी हो पाएगी।
अब बात करते हैं, मध्य प्रदेश की तो वहाँ भी शिवराज सिंह की जीत पक्की थी हालांकि कांग्रेस के पास कुछ मुद्दे थे, जिनपर वो भाजपा को घेर सकती थीलेकिन वही मुद्दे उसकी केन्द्र की सरकार पर हावी थे वैसे भी कांग्रेस और भाजपा के वोट शेयर में 10-12 प्रतिशत का अंतर थाजो कवर करना नामुमकिन था, जब तक क़ि कोई लहर ना होकांग्रेस के पास मध्य प्रदेश में कोई अच्छा नेत्रत्व भी नहीं थाजो शिवराज सिंह को टक्कर दे सकता उसकी आपसी फुट के बीच में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम प्रचार प्रमुख के तौर पर पेश किया, सिंधिया की साफ छवि और युवा होने के कारण समर्थन भी अच्छा मिला लेकिन तब-तक बहुत देर हो चुकी थीअंत में बची-खुची कसर टिकट के बटवारे में हुई गड़बड़ी ने पूरी कर दीभाजपा के कुछ विधायकों पर आरोप थे, लेकिन उन्हें पीछे कर शिवराज सिंह चौहान ने अपनी छवि से साफ कर दियाकांग्रेस की केन्द्र सरकार पर लगे आरोपों के चलते मोदी ने भी उसे बढिया घेरालेकिन यह उम्मीद नहीं थी, कि कांग्रेस की सीटें और भी कम हो जाएंगीनिश्चित रूप से इसे मोदी का असर मान सकते हैं
अब आते हैं, उस राज्य पर जहां का मुकाबला 8 तारीख को पूरे दिन ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच की तरह चलाछत्तीसगढ़ एक समय आया था, जब कांग्रेस 50 पर और भाजपा 39 पर ही आगे थीलेकिन समय जैसे-जैसे आगे बढ़ा, वैसे-वैसे भाजपा की जीत पक्की होती गई लेकिन दोनो की हार और जीत में वोट शेयर का अंतर केवल 1 प्रतिशत के आस-पास ही रहाएक दिन मैं अजित जोगी का इंटरव्यू सुन रहा था, जिसमें उन्होंने कहा कि हाँ इस बार टिकट के बटवारे में उनकी चली है, लेकिन बहुत जगह गलत मौजूदा विधायक उतार दिए गए हैंऔर वही हारे भी हैं। 20 सीटों पर हार का अंतर केवल 500 से 1000 वोटों तक ही रहा, अर्थात उसी के नेताओं के द्वारा खड़े किए गए, रूठे हुए निर्दलीय प्रत्याशियो ने हरा दियाबसतर में तो उसका प्रदर्शन ठीक था, लेकिन रायपुर जैसे शहरों में केन्द्र सरकार से रूठे हुए लोगों ने चावल वाले बाबा को पसंद कियावैसे कांग्रेस के ही खेमे से एक आवाज और थी, कि कांग्रेस को भाजपा और जोगी नाम की दो पार्टियों से लड़ना पड़ेगालेकिन इसबार जोगी की गलती कम चरणदास महंत की ज्यादा रही, जिनका पूरा समय तो शोभन बाबा के साथ डौंडिया खेड़ा में ही बीता
अंत में कांग्रेस के लिए आंसू आने पर नेपकिन जैसा सोनिया के जन्मदिन पर मिज़ोरम के नतीजे(40 में से कांग्रेस ने 33 सीटें जीतकर बहुमत प्राप्त की) रहे, जो उसकी उम्मीद को बरकरार रखेंगे।
अब हम बात करेंगे देश की राजधानी दिल्ली कीजहां का चुनाव सबसे प्रमुख थायह पता करने के लिए कि क्या मोदी की लहर है या नहींयहाँ के नतीजे देखकर लगा कि शायद यह लहर मोदी के पक्ष में कम कांग्रेस के विरोध में ज्यादा हैआप देख सकते हैं, कि भाजपा की सरकार वहीं पर है, जहाँपर कोई तीसरा विकल्प नहीं है इसका मतलब यह है, कि लोग कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा से भी खुश नहीं हैंदिल्ली से हमारे देश की राजनीति में एक नए नायक का उदय हुआ है वो है, अरविन्द केजरीवाल, जिसने एक नई राजनीति की शुरुआत की है एक ईमानदार छवि पेश कर इन सत्ता पर काबिज आकाओं को बता दिया है, कि आम आदमी की ताकत क्या होती है पहला नेता मिला जिसने केवल 20 करोड़ चंदा मिलने पर, कह दिया बस अब नहीं चाहिए8 तारीख के पहले जो एक्जिट-पोल वाले आप (आम आदमी पार्टी) को 6-18 सीटें दे रहे थेउससे हमें भी यह उम्मीद नहीं थीलेकिन इसके बाद अब उन सर्वे करने वाले संस्थानों खासकर इंडिया टुडे को तो अपने काम पर सोचना चाहिए कि बंद .सी. कमरों से रिपोर्टिंग नहीं होती है देश के युवाओं में एक ईमानदारी की लहर दौड़ी हैवो युवा जो विदेशों में या देश के अन्य हिस्सों में नौकरी करते हैं, और इस राजनीति से ऊभ गए हैं, वो छुट्टी लेकर आए अरविन्द का समर्थन करने के लिएदिल्ली में माहोल यह था, कि स्कूली बच्चे भी अपने मम्मी-पापा को झाड़ू पर वोट देने को कहते थे। इसमें से आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं, कि कांग्रेस की खराब हालत पर मुझे भी कुछ लिखने के दौरान याद नहीं आया. बहुत कम मौके आते हैं, जब कोई मुख्यमंत्री चुनाव हार जाए। जब केजरीवाल ने नई दिल्ली से लड़ने का फैसला किया था, तो राजनैतिक विश्लेषक इसे अरविन्द का पॉलिटिकल-सुसाइड कह रहे थे। क्योंकि नई दिल्ली में 60% सरकारी कर्मचारी रहते हैं, जो अरविन्द के पक्ष में नहीं दिख रहे थेइस बदलाव से  पहली बार हुआ जब कोई बड़े नेता के खिलाफ बड़ा नेता लड़ा। इस बदलाव से हो सकता है, कि मोदी भी अमेठी से चुनाव लड जाएँ।
लेकिन अब दिक़्कत यह है, कि विधान सभा त्रिशंकु हो गई हैकिसी को बहुमत नहीं प्राप्त हैनिश्चित रूप से भाजपा-अकाली दल का गठबंधन सबसे ज्यादा सीटें लाकर उभरा हैतो अब राज्यपाल भी भाजपा को बड़ा दल होने के नाते सरकार बनाने को आमंत्रित करेंगेलेकिन भाजपा है, कि वो सरकार बनाने से डर रही है उसके डर को मैं अलग देखता हूँभाजपा का यह फैसला दूरगामी हो सकता हैमतलब 2014 के चुनाव के पहले वह अल्पमत की सरकार नहीं बना सकती है, और जब विपक्ष में अरविन्द जैसे लोग होइस लिए उसे लगता है, कि यह सरकार ज्यादा नहीं टिकेगी, अगर अल्पमत की वजह से समझौते किए तो केजरीवाल मोदी को दिल्ली में घेरेंगेअगर केजारीवाल सरकार बना लेंगे तो भाजपा उनपर वार करके 2014 के आम चुनाव में केजरीवाल को घेर सकती हैवो कहेगी कि केजरीवाल तो कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे हैंतभी केजरीवाल भी विपक्ष में बैठने के मूड में हैंभाजपा को अब कांग्रेस का कम केजरीवाल का डर ज्यादा सता रहा है. उसे पता है, कि जहां पर  मोदी की लहर मानी जा रही थी, (शहरों में ही सोसल मीडिया और टी. वी. से लहर चलाई है), वहाँ तो केजारीवाल का भविष्य स्वर्णिम नजर रहा हैइसलिए भाजपा एक राज्य दिल्ली के लिए ही, अपने मिशन 2014 को खटाई में नहीं डाल सकती हैअगर राष्ट्रपति शासन लागू होता है, तो दोनों ही पार्टियों को अपना फायदा नजर रहा हैआम आदमी पार्टी को यह कि 20 सीटों पर जहां वो 200-1000 जैसे मामूली अंतर से हारे हैं, वहाँ सुधार कर फिर से चुनाव में बहुमत हासिल करेंगेवहीं भाजपा को यह उम्मीद है, कि चुनाव आयोग से बार-बार चुनाव में होने वाले खर्च के नाम पर सिफारिस करके वो 2014 के आम चुनाव के साथ ही दिल्ली का चुनाव भी करा लेंगे जो मोदी की लहर में निकल जाएगा। दिल्ली में ध्यान देने वाली बात यह भी है, कि मोदी ने 6 विधानसभाओं में रैली की थी, लेकिन 4 विधान सभाओं पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा और भाजपा को मिला वोट इस दुविधा में था, कि शायद आम आदमी पार्टी को वोट देने का अर्थ है, वोट बेकार करना उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था केजरीवाल जीत पाएंगे या कांग्रेस को रोकने की स्थिति में हैं। लेकिन अगर फिर से चुनाव हुए तो यह वोट आप के पक्ष में जा सकता है हालांकि भाजपा जैसा सोंच रही है, स्थिति ठीक उसके उलट भी हो सकती हैइस चुनाव से एक बात और सामने आई है, कि अगर 2014 में देश के सामने को मजबूत तीसरा विकल्प मौजूद हो तो देश की जनता उसकी तरफ देख सकती है। राजनीति में बदलाव यह हुआ है, कि पहली बार कोई पार्टी "पहले आप-पहले आप" करके विपक्ष में बैठने को बेताब हैं अच्छा है, कि दिल्ली में इस बार लखनऊ, रांची या हिमाचल वाली मार-काट नहीं हो रही हैअब आने वाले समय में उंट किस करवट बैठेगा? यह देखने वाली बात होगी

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...