Sunday, December 15, 2013

देवालय या शौंचालय

आज-कल राजनैतिक पार्टियों में एक नई बहस छिड़ गई है, शौचालय की। एक बार नब्बे के दशक में बसपा संस्थापक कांशीराम ने राममंदिर या बाबरी मस्जिद की जगह शौचालय बनवाने की बात कह दी थी। तो पूरे कट्टर हिन्दुत्ववादियों की गालियों का सामना उन्हें करना पड़ा था। अभी कुछ महीने पहले ही केन्द्रीय मंत्री जय राम रमेश ने भी देवालय से पहले शौचालय की बात कही थी, तो जिस भाजपा ने बहुत विरोध किया था। वही मोदी के देवालय से पहले शौचालय की बात पर बचाव करते नजर आए। संघ भी बैकफुट पर आ गया था। अभी दिल्ली विधान सभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और भाजपा ने अपने-अपने घोषणा पत्र में इस मुद्दे पर अपना वादा किया था। वहीं आम आदमी पार्टी ने तो दिल्ली में एक लाख शौचालय बनवाने की बात कह दी थी। आप ही सोचिए, जब राजधानी की यह हालत है, तो देश की बाकी जगह क्या दशा होगी?
जैसा कि आप देख रहे हैं, कि 2014 के पहले की बयानबाजी में मोदी का जवाब राहुल गाँधी की जगह नितीश कुमार को देना पड रहा है। उसी के चलते उन्होने बिहार में एक नियम बना दिया कि कोई भी पंचायत या नगर निकाय चुनाव वही आदमी लड सकेगा, जिसके घर में शौचालय होगा। इसे एक अच्छी पहल के रूप में देखा जा रहा है। हमारे देश में पहली बार नेताओं का ध्यान बुनियादी समस्याओं की ओर गया तो सही।
अभी हाल ही के दिनों में देश में मिशन मंगलयान की बहुत चर्चा होती रही। इसका मकसद यह पता लगाना था, कि मंगल पर मीथेन गैस है, या नहीं? निश्चित रूप से मीथेन मानव जीवन के लिए आवश्यक है। इस मिशन से हमारे देश का नाम रोशन हुआ। हम तीसरा देश बन गए, मंगल पर इस तरह का यान भेजने वाले। लेकिन इस कार्यक्रम में पूरे 400 करोड़ रुपए खर्च हो गए। हर्ष मन्दर जैसे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध भी किया। उनका कहना था, कि हम 400 बेकार में खर्च कर रहे हैं, पहले अपने देश की बुनियादी समस्याओं की तरफ देखना चाहिए। यह बात सही भी है कि ऐसी नाक उंची करके क्या फायदा कि आजादी के 66 साल बाद भी आधी से ज्यादा आबादी खुले में शौच करती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के चार लाख बच्चे डायरिया जैसी बीमारियों से मर जाते हैं। जिनका मुख्य कारण गंदगी ही होती है। आखिर हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं? हम खाने के अधिकार पर तो आ गए, लेकिन "पीने (पानी) के अधिकार" पर कब बात करेंगे? शौच और छत का अधिकार कब मिलेगा? एक पढ़ा-लिखा सभ्य समाज इस बात पर बात करने में संकोच करता है। अमीर लोगों को इस बात की तरफ सोंचने पर भी गंदगी महसूस होती है। लेकिन एक अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की खुले में शौच करने वालों की 60% जनसंख्या भारत में ही मौजूद है। UNICEF (यह बच्चों के स्वास्थ्य पर सर्वे करने वाली विश्व की सबसे बड़ी संस्था है। इसमें विश्व के 190 देशों का सर्वे हुआ था।) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 62 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं। W.H.O. के मुताबिक अगर भारत इस ओर ध्यान दे, तो अपनी GDP में 6.4% तक की लम्बी छलांग लगा सकता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस क्षेत्र में 24 हजार करोड़ रुपए प्रतिवर्ष गवां रहा है। इसकी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में प्रतिदिन 1000 बच्चों की मौत डायरिया से होती है। भारत में एक N.G.O. शुलभ नाम से लगभग 250 शहरों में इस ओर प्रयास कर रहा है। लेकिन इतने बड़े देश में एक संस्था के प्रयास से क्या होगा? सरकार को और भी कदम उठाने चाहिए।और ग्रामीण भारत की ओर जाना चाहिए।
यह देश की विडंबना ही है कि देश की राजनैतिक पार्टियाँ मंदिर-मस्जिद मुद्दे पर तो आन्दोलन कर घर-घर से पैसा और इंटें इकट्ठा करते हैं। लेकिन असली समस्या को ओर ध्यान देने में गंदा महसूस करते हैं। हम यह नहीं कह रहे हैं, कि कुछ हुआ नहीं है। 1991 में 75% लोग खुले में शौंच करते थे, वहीं 2011 में यह आंकड़ा 51% तक आ गया है। सिक्किम देश का पहला ऐसा राज्य है जहाँ पर 100% शौचालय मौजूद हैं। जल्द ही केरल और हिमांचल भी इस श्रेणी में आ जाएंगे। सबसे ज्यादा खराब हालत, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के हैं। वहीं महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और गुजरात के भी इसमें पीछे नहीं है।
Google करने पर पाया कि देश के 40% स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। चौकने वाली बात सामने आई है, क़ि 23% बच्चियाँ स्कूल इसलिए छोड़ देती हैं, क्योंकि कठिंन दिनों के समय उन्हें शौचालय नहीं मिल पाता है। इसी रिपोर्ट में दावा किया गया है, कि देश में 66% छेड़छाड़ की घटनाएँ बाहर शौच जाने के समय ही होती हैं। जय राम रमेश दावा करते हैं कि हम 2022 तक देश के हर घर को यह सुविधा दे पाएंगे। लेकिन W.H.O. 2054 तक इसे संभव नहीं मानता है. यह अंतर शहरों और गावों में तो और भी ज्यादा होगा? हमारे देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो इन आकड़ों पर नजर डालते ही बदबू महसूस करता है या मजाक उडाता है। अर्मत्य सेन तो इस मामले में बांग्लादेश को भारत से अच्छा मानते हैं। यहाँ वोट लेने के बदले जनता को लैपटाप, टी. वी. और मोबाइल तो दिए जा रहे हैं।  लेकिन इन मुद्दों को अपने घोषणा पत्र में जगह नहीं मिल पाती है, अगर मिलती भी है तो केवल घोषणापत्र तक। इस पर चर्चा करने वाले नरेन्द्र मोदी जी गुजरात में शौचालय के लिए 300 करोड़ का बजट रखते हैं, वहीं सरदार पटेल की मूर्ति के लिए 2500 करोड़। इसके लिए जरूरत है, नीतीश कुमार जैसे सामूहिक प्रयास की। जो राजनीति से ऊपर उठकर हो। हमें मंगल पर उड़ान भरणी चाहिए, मंदिर-मस्जिद भी जाना चाहिए। लेकिन इस बात पर भी ध्यान रखना होगा कि कहीं इस दौरान हमारा पैर *** पर न पड जाए।

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