पांच राज्यों के
विधान सभा
चुनाव आ
चुके हैं,
और मुझे
तो जैसी
उम्मीद थी,
नतीजे वैसे
ही रहे। सबसे पहले तो हमें बात करनी चाहिए, राजस्थान की, जहाँ अशोक गहलोत
की हार
पक्की हो
चुकी थी।
क्यों की सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency)
वहाँ का
इतिहास है,
लेकिन कांग्रेस
का सुफडा
इस तरह
से साफ
होगा? यह किसी को
उम्मीद नहीं
थी। अशोक
गहलोत को
अपने पांच
और केन्द्र
सरकार के
10 सालों के
भ्रष्टाचार, मंहगाई, घोटालों और कुशासन का नतीजा भुगतना पड़ा। हालांकि उन्होने
आखिर 7-8 महीने
में कुछ
अच्छे कार्य
किए थे। लेकिन 13-14 साल के गुस्से को
आप 6 महीने
में ठंडा
नहीं कर
सकते हैं। मुझे नहीं लगता है, अब इस झटके से कांग्रेस कम से कम 10-15 के पहले या जब तक वसुंधरा राजे अपनी पहले वाली छवि (8 P.M. NO C.M.) फिर से नहीं दिखा दें, तब-तक खड़ी हो पाएगी।
अब बात करते
हैं, मध्य
प्रदेश की
तो वहाँ
भी शिवराज
सिंह की
जीत पक्की
थी। हालांकि
कांग्रेस के
पास कुछ
मुद्दे थे,
जिनपर वो
भाजपा को
घेर सकती
थी। लेकिन
वही मुद्दे
उसकी केन्द्र
की सरकार
पर हावी
थे। वैसे
भी कांग्रेस
और भाजपा
के वोट
शेयर में
10-12 प्रतिशत का अंतर था। जो
कवर करना
नामुमकिन था,
जब तक
क़ि कोई
लहर ना
हो। कांग्रेस
के पास
मध्य प्रदेश
में कोई
अच्छा नेत्रत्व
भी नहीं
था। जो
शिवराज सिंह
को टक्कर
दे सकता। उसकी आपसी
फुट के
बीच में
ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम प्रचार
प्रमुख के
तौर पर
पेश किया,
सिंधिया की
साफ छवि
और युवा
होने के
कारण समर्थन
भी अच्छा
मिला लेकिन
तब-तक
बहुत देर
हो चुकी
थी। अंत
में बची-खुची कसर
टिकट के
बटवारे में
हुई गड़बड़ी
ने पूरी
कर दी। भाजपा के
कुछ विधायकों
पर आरोप
थे, लेकिन
उन्हें पीछे
कर शिवराज
सिंह चौहान
ने अपनी
छवि से
साफ कर
दिया। कांग्रेस
की केन्द्र
सरकार पर
लगे आरोपों
के चलते
मोदी ने
भी उसे
बढिया घेरा। लेकिन यह
उम्मीद नहीं
थी, कि
कांग्रेस की
सीटें और
भी कम
हो जाएंगी। निश्चित रूप
से इसे
मोदी का
असर मान
सकते हैं।
अब आते
हैं, उस
राज्य पर
जहां का
मुकाबला 8 तारीख को पूरे दिन
ट्वेंटी-ट्वेंटी
मैच की
तरह चला। छत्तीसगढ़। एक समय आया था,
जब कांग्रेस
50 पर और
भाजपा 39 पर
ही आगे
थी। लेकिन
समय जैसे-जैसे आगे
बढ़ा, वैसे-वैसे भाजपा
की जीत
पक्की होती
गई। लेकिन
दोनो की
हार और
जीत में
वोट शेयर
का अंतर
केवल 1 प्रतिशत
के आस-पास ही
रहा। एक
दिन मैं
अजित जोगी
का इंटरव्यू
सुन रहा
था, जिसमें
उन्होंने कहा
कि हाँ
इस बार
टिकट के
बटवारे में
उनकी चली
है, लेकिन
बहुत जगह
गलत मौजूदा
विधायक उतार
दिए गए
हैं। और
वही हारे
भी हैं। 20 सीटों पर
हार का
अंतर केवल 500 से 1000 वोटों तक ही रहा,
अर्थात उसी
के नेताओं
के द्वारा
खड़े किए
गए, रूठे
हुए निर्दलीय
प्रत्याशियो ने हरा दिया। बसतर
में तो
उसका प्रदर्शन
ठीक था,
लेकिन रायपुर
जैसे शहरों
में केन्द्र
सरकार से
रूठे हुए
लोगों ने
चावल वाले
बाबा को
पसंद किया। वैसे कांग्रेस
के ही
खेमे से
एक आवाज
और थी,
कि कांग्रेस
को भाजपा
और जोगी
नाम की
दो पार्टियों
से लड़ना
पड़ेगा। लेकिन
इसबार जोगी
की गलती
कम चरणदास
महंत की
ज्यादा रही,
जिनका पूरा
समय तो
शोभन बाबा
के साथ
डौंडिया खेड़ा
में ही
बीता।
अंत में कांग्रेस के लिए आंसू आने पर नेपकिन जैसा सोनिया के जन्मदिन पर मिज़ोरम के नतीजे(40 में से कांग्रेस ने 33 सीटें जीतकर बहुमत प्राप्त की) रहे, जो उसकी उम्मीद को बरकरार रखेंगे।
अंत में कांग्रेस के लिए आंसू आने पर नेपकिन जैसा सोनिया के जन्मदिन पर मिज़ोरम के नतीजे(40 में से कांग्रेस ने 33 सीटें जीतकर बहुमत प्राप्त की) रहे, जो उसकी उम्मीद को बरकरार रखेंगे।
अब हम बात
करेंगे देश
की राजधानी
दिल्ली की।
जहां का
चुनाव सबसे
प्रमुख था। यह पता
करने के
लिए कि
क्या मोदी
की लहर
है या
नहीं। यहाँ
के नतीजे
देखकर लगा
कि शायद
यह लहर
मोदी के
पक्ष में
कम कांग्रेस
के विरोध
में ज्यादा
है। आप
देख सकते
हैं, कि
भाजपा की
सरकार वहीं
पर है,
जहाँपर कोई
तीसरा विकल्प
नहीं है।
इसका मतलब
यह है,
कि लोग
कांग्रेस के
साथ-साथ
भाजपा से
भी खुश
नहीं हैं।
दिल्ली से
हमारे देश
की राजनीति
में एक
नए नायक
का उदय
हुआ है।
वो है,
अरविन्द केजरीवाल,
जिसने एक
नई राजनीति
की शुरुआत
की है।
एक ईमानदार
छवि पेश
कर इन
सत्ता पर
काबिज आकाओं
को बता
दिया है,
कि आम
आदमी की
ताकत क्या
होती है।
पहला नेता
मिला जिसने
केवल 20 करोड़
चंदा मिलने
पर, कह
दिया बस
अब नहीं
चाहिए। 8 तारीख
के पहले
जो एक्जिट-पोल वाले
आप (आम
आदमी पार्टी)
को 6-18 सीटें
दे रहे
थे। उससे
हमें भी
यह उम्मीद
नहीं थी। लेकिन इसके
बाद अब
उन सर्वे
करने वाले
संस्थानों खासकर इंडिया टुडे को
तो अपने
काम पर
सोचना चाहिए
कि बंद
ए.सी.
कमरों से
रिपोर्टिंग नहीं होती है। देश
के युवाओं
में एक
ईमानदारी की
लहर दौड़ी
है। वो
युवा जो
विदेशों में
या देश
के अन्य
हिस्सों में
नौकरी करते
हैं, और
इस राजनीति
से ऊभ
गए हैं, वो छुट्टी
लेकर आए
अरविन्द का
समर्थन करने
के लिए। दिल्ली में
माहोल यह
था, कि
स्कूली बच्चे
भी अपने
मम्मी-पापा
को झाड़ू
पर वोट
देने को
कहते थे। इसमें से आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं, कि कांग्रेस की खराब हालत पर मुझे भी कुछ लिखने के दौरान याद नहीं आया. बहुत कम मौके आते हैं, जब कोई मुख्यमंत्री चुनाव हार जाए। जब केजरीवाल ने नई दिल्ली से लड़ने का फैसला किया था, तो राजनैतिक विश्लेषक इसे अरविन्द का पॉलिटिकल-सुसाइड कह रहे थे। क्योंकि नई दिल्ली में 60% सरकारी कर्मचारी रहते हैं, जो अरविन्द के पक्ष में नहीं दिख रहे थेइस बदलाव से पहली बार हुआ जब कोई बड़े नेता के खिलाफ बड़ा नेता लड़ा। इस बदलाव से हो सकता है, कि मोदी भी अमेठी से चुनाव लड जाएँ।
लेकिन अब दिक़्कत
यह है,
कि विधान
सभा त्रिशंकु
हो गई
है। किसी
को बहुमत
नहीं प्राप्त
है। निश्चित
रूप से
भाजपा-अकाली
दल का
गठबंधन सबसे
ज्यादा सीटें
लाकर उभरा
है। तो
अब राज्यपाल
भी भाजपा
को बड़ा
दल होने
के नाते
सरकार बनाने
को आमंत्रित
करेंगे। लेकिन
भाजपा है,
कि वो
सरकार बनाने
से डर
रही है।
उसके डर
को मैं
अलग देखता
हूँ। भाजपा
का यह
फैसला दूरगामी
हो सकता
है। मतलब
2014 के चुनाव
के पहले
वह अल्पमत
की सरकार
नहीं बना
सकती है,
और जब
विपक्ष में
अरविन्द जैसे
लोग हो। इस लिए
उसे लगता
है, कि
यह सरकार
ज्यादा नहीं
टिकेगी, अगर
अल्पमत की
वजह से
समझौते किए
तो केजरीवाल
मोदी को
दिल्ली में
घेरेंगे। अगर
केजारीवाल सरकार बना लेंगे तो
भाजपा उनपर
वार करके
2014 के आम
चुनाव में
केजरीवाल को
घेर सकती
है। वो
कहेगी कि
केजरीवाल तो
कांग्रेस के
समर्थन से
सरकार चला
रहे हैं। तभी केजरीवाल
भी विपक्ष
में बैठने
के मूड
में हैं। भाजपा को
अब कांग्रेस
का कम
केजरीवाल का
डर ज्यादा
सता रहा
है. उसे
पता है,
कि जहां
पर
मोदी की लहर मानी जा
रही थी, (शहरों में
ही सोसल
मीडिया और
टी. वी.
से लहर
चलाई है),
वहाँ तो
केजारीवाल का भविष्य स्वर्णिम नजर
आ रहा
है। इसलिए
भाजपा एक
राज्य दिल्ली
के लिए
ही, अपने
मिशन 2014 को खटाई में नहीं
डाल सकती
है। अगर
राष्ट्रपति शासन लागू होता है,
तो दोनों
ही पार्टियों
को अपना
फायदा नजर
आ रहा
है। आम
आदमी पार्टी
को यह
कि 20 सीटों
पर जहां
वो 200-1000 जैसे मामूली अंतर से
हारे हैं,
वहाँ सुधार
कर फिर
से चुनाव
में बहुमत
हासिल करेंगे। वहीं भाजपा
को यह
उम्मीद है,
कि चुनाव
आयोग से
बार-बार
चुनाव में
होने वाले
खर्च के
नाम पर
सिफारिस करके
वो 2014 के
आम चुनाव
के साथ
ही दिल्ली
का चुनाव
भी करा
लेंगे जो
मोदी की
लहर में
निकल जाएगा। दिल्ली में ध्यान देने वाली बात यह भी है, कि मोदी ने 6 विधानसभाओं में रैली की थी, लेकिन 4 विधान सभाओं पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। और भाजपा को मिला वोट इस दुविधा में था, कि शायद आम आदमी पार्टी को वोट देने का अर्थ है, वोट बेकार करना। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था केजरीवाल जीत पाएंगे या कांग्रेस को रोकने की स्थिति में हैं। लेकिन अगर फिर से चुनाव हुए तो यह वोट आप के पक्ष में जा सकता है।
हालांकि भाजपा
जैसा सोंच
रही है,
स्थिति ठीक
उसके उलट
भी हो
सकती है। इस चुनाव से एक बात और सामने आई है, कि अगर 2014 में देश के सामने को मजबूत तीसरा विकल्प मौजूद हो तो देश की जनता उसकी तरफ देख सकती है। राजनीति में बदलाव यह हुआ है, कि पहली बार कोई पार्टी "पहले आप-पहले आप" करके विपक्ष में बैठने को बेताब हैं। अच्छा है, कि दिल्ली में इस बार लखनऊ, रांची या हिमाचल वाली मार-काट नहीं हो रही है। अब आने
वाले समय
में उंट
किस करवट
बैठेगा? यह
देखने वाली
बात होगी।
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