कल हमारे देश
की संसद
के लिए
बहुत ही
खास दिन
रहा। 46 साल
से लटका
हुआ लोकपाल
बिल पास
हो गया.
पहले तो
इसपर किसी
का ध्यान
नहीं था। लेकिन 2011 में अन्ना के आन्दोलन
के बाद
से पूरे
देश में
इसे लेकर
एक मांग
की आवाज
उठ चुकी
थी। आम
आदमी पार्टी
कह रही
है, कि
यह लोकपाल
नहीं जोक
पाल है।
वहीं सपा
को छोड़
कर सभी
राजनीतिक दल
इसपर एकमत
हुए, और
पास भी
कर दिया। मुलायम सिंह यादव द्वारा संसद में दिया गया कोई भी तर्क नहीं बल्कि उनका डर था, जो यह दिखता है कि अब तो उनकी राजनीति ही खत्म हो जाएगी।
अन्ना ह्जारे
ने भी
इसपर खुशी
जताते हुए,
अपना आठ-नौ दिन
से चला
आ रहा
अनशन खत्म
कर दिया।
मौजूदा टीम
अन्ना इस
बिल को
मंजूर कर
रही है।
मैं इस
बहस में
नहीं पड़ना
चाहूंगा कि
यह मजबूत
है, या
कमजोर। क्योंकि
मैं अरविन्द
और अन्ना
का समर्थक
होते हुए
भी शुरु
से ही
लोकपाल बिल
पर जस्टिस
काटजू की
तरह सोंचता
था। मुझे
नहीं लगता है, कि
लोकपाल का
कोई भी
स्वरूप भ्रष्टाचार
को खत्म
कर पाएगा।
क्या लोकपाल
आसमान से
आएगा? वो
भी हमारे
समाज का
ही होगा,
तो क्यों
ना समाज
को सही
करो? लोकपाल भी भ्रष्ट
हुआ तो
क्या करोगे?
जब कोई
गारंटी नहीं
है, तो
सत्ता का
एक और
केन्द्र क्यों
बना रहे
हो? और
कानून बना
दो? मुझे
तो लोकपाल
बिल से
भ्रष्टाचार बढ़ने की आशंका दिखती
है।
खैर
मेरे सोंचनें
से क्या
होता है?
जब पूरा
देश ही
इसकी मांग
कर रहा
था, तो
इसका पास
होना भी
जरूरी था।
अब इसके पास
होते ही
इसका क्रेडिट
लेने की
कोशिश हो
रही है।
कांग्रेस ने
चार राज्यों
मे मिली
हार से
सबक लेते
हुए ही
इस बिल
को पास
करने का
फैसला लिया पूरी तरह से सत्य नहीं है। वो पहले से
ही सोंच
रही थी
कि लोकपाल
बिल को
हम राहुल
गाँधी के
लिए मास्टर
स्ट्रोक की
तरह प्रयोग
करेंगे। लेकिन
सुषमा स्वराज
ने लोकसभा
में अपने
भाषण में
ही इसे
भाँपते हुए
कह दिया
कि इसका
श्रेय केवल
अन्ना हजारे
को जाता
है। बाद
में राहुल
गाँधी ने
भी अन्ना
को ही
श्रेय दे
दिया। लेकिन
फिर भी
अगर कांग्रेस
पार्टी इसका
श्रेय लेगी
तो भाजपा
भी अपनी
जिम्मेदार विपक्ष होने की बात
कहेगी। अब
बीच में
फंसे केजरीवाल। उन्हें क्या
मिला? अब
यह तो
पता चल
गया कि
कांग्रेस ने
यह बिल
क्यों पास
किया? अब
यह भी
पता कर
लेते हैं
कि भाजपा
ने इसका
समर्थन क्यों
किया? क्योंकि
भाजपा को
आम आदमी
पार्टी से
डर लग
रहा है।
आपको यह
बात अजीब
लगेगी, लेकिन
सच्चाई यही
है। जिस
सोसल मीडिया
और शहरी
वर्ग में
मोदी की
लहर थी,
वहाँ तो
केजरीवाल ने
भी अपनी
जगह बना
ली है।
इस बात
से भाजपा
प्रवक्ता टी.
वी. पर
यहाँ तक
कहते मिल
रहे हैं,
कि मीडिया
भाजपा की
500 सीटों को पीछे कर आप
की 28 सीटों
पर देख
रही है।
अब उनसे
कोई पूछे
कि पिछले
एक साल
में मीडिया
ने किसको
ज्यादा जगह
दी है?
किसके भाषण
दो-दो
घंटे तक
ब्रेक-फ्री
चले हैं।
इसी आम
आदमी पार्टी
की लोकप्रियता
को देखकर
भाजपा ने
सोचा कि
अगर लोकपाल
बिल पास
हो गया
तो केजरीवाल
के हाथ
से एक
मुद्दा छीन
लेंगे। फिर
अन्ना को
धोखा देने
का आरोप
लगाकर केजरीवाल
को घेर
सकेंगे। अगर
आप ने
सरकार बना
ली तब
जिसके खिलाफ
लड़े थे,
उसी से
समर्थन ले
लिया या
कांग्रेस की B टीम
कहकर घेर
लेंगे। नहीं
तो राहुल
के सामने
मजबूत नजर
आने वाले
मोदी, केजरीवाल
के आगे
कमजोर पड
जाएंगे। लेकिन
इन दोनो
दलों की
बात से
मैं सहमत
नहीं हूँ
कि उन्होनें
केजरीवाल से
लोकपाल का
मुद्दा छीना
है। क्योंकि
लोकपाल के
आन्दोलन की
आग का
फायदा आप
को दिल्ली
विधानसभा चुनाव
में मिल
चुका है।
अब उसे
इस मुद्दे
की जरूरत
ही नहीं
है। अब
वो राजनैतिक
दल हैं
और उनके
पास अन्य
मुद्दे हैं।
अब उन्हें
मजबूत आधार
मिल चुका
है।
अब अगर टीम
अन्ना और
केजरीवाल के
सम्बंधों की
बात करें
तो पिछले
एक साल
के घटना
क्रम पर
नजर डालनी
होगी। जब
अन्ना का
आन्दोलन परवान
चढ़ा तो
उसमें केजरीवाल
की अहम
भूमिका थी।
आन्दोलन का मैनेजमेंट,
मीडिया, प्रचार,
लोकपाल का
प्रारूप सबकुछ
केजरीवाल की
देन थी।
बड़े नेताओं
पर हमला
करना और
अच्छे और
प्रसिद्ध लोंगों
को आन्दोलन
से जोडनें
में उनका
कोई सानी
नहीं है।
आज भी
वह कला
पार्टी में
दिख रही
है। अगर
अरविन्द नहीं
होते तो
मुझे नहीं
लगता है
कि अन्ना
हजारे रालेगढ़
सिद्धि से
निकलकर बाहर
आ पाते।
लेकिन अरविन्द
ने वो
सब कर
दिखाया जो
इमरजेंसी के
समय में
लोकनायक जयप्रकाश
नारायण ने
किया था। जब उन्हें
लगा कि
बिना राजनीति
में आए
कुछ नहीं
होगा तो
उनकी टीम
दो हिस्से
में बॅंट
गई। पहले
"हम साथ-साथ हैं"
फिर "हम दोनों हैं अलग-अलग, हम
दोनों हैं
जुदा-जुदा"
अब अन्ना
ने कह
दिया "हम आपके हैं कौन"?
फिर जब
अन्ना ने
केजरीवाल की
भूमिका बढ़ती
देखी तो
सरकार का
समर्थन कर
उनके "पर" काटने की कोशिश
की। अब
अन्ना के
पास कुछ
बचा नहीं
था। मुझे
तो यह
लगता है
कि किरण
बेडी खुद
किसी पार्टी
(भाजपा में
संभावना) में
शामिल होने
का मन
बना रहीं
हैं। केजरीवाल
की इस
बात में
दम हो
सकता है
कि कोई
उन्हें गुमराह
कर रहा
है। क्योंकि
अभी तक
अन्ना को
लोकपाल बिल
की बारिकियों
का ज्ञान
कम है।
उन्हें अंग्रेज़ी
नहीं आती
है। ऐसे
में उन्होने
सरकारी बिल
खुद नहीं
पढ़ा होगा। लेकिन मुझे
तो अन्ना
की भी
राजनैतिक महत्वाकांक्षा
नजर आती
है। पहले
उन्होने अरविन्द
से कहा
कि मेरा
नाम, फोटो
मत प्रयोग
करना। फिर
कहा अरविन्द
को मेरा
आशीर्वाद नहीं
है। जब
अरविन्द ने
चुनाव में
अच्छा किया,
तो बोले
अगर मेरा
आशीर्वाद होता
तो वो
जीत जाता। मतलब अन्ना
स्वयं को
वोट खीचाऊ
शक्ति के
रूप में
देखने लगे
हैं। क्या
पता उनके
भी मन
में क्या
है। खैर लोकपाल या जोकपाल जो भी पास हुआ है, उसे सही से लागू करो तो जाने। अगर आपको सच में कुछ करना ही है, तो और भी वर्षों से लटके बिलों Whistle-blower Act, दंगा विरोधी बिल आदि को पास करो। चुनाव सुधार पर कुछ करो। अन्यथा जनता बार-बार अपनी ताकत् दिखती रहेगी। आज हम भी जो आम आदमी पार्टी के पक्ष में दिखते हैं, अगर वो (AAP) भी गलत करेंगे तो उनका भी विरोध करते दिखेंगे।
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